Sunday, 5 January 2014

आशिक़ी

आशिक़ी

खामोश रातों को जगाकर
और सुलाकर चाँद को
चांदनी अपनी बना लो
आशिक़ी है ।।
अर्क फूलों का चुराकर
मंद सी मुस्कान लाकर
होंट पर उसके सजा दो
आशिक़ी है ।।

कि एक हँसी पर वार दो
और तार दो
दुनियाँ का सारा अफ़साना
आशिक़ी है ।।
आँखों से इतना प्यार दो
कि बंद पलकों में
गुलपोश हो जाये ज़माना
आशिक़ी है ।।

मै नही और तू नही
बस हम से तारीख़ मुल्तज़ी
बेख़ौफ़ अपनी हसरतो का जो हो तराना
आशिक़ी है ।।
अपनी धुन मे चल पड़ा
न इस जग का कोई आसरा
जब सुध मे उसकी खोया हुआ है दिल दीवाना
आशिक़ी है ।।

आज़ाद अपनी सोच में
ज़ज्बात की धारा बहे
और जब भीग जाए ये मन कुँवारा
आशिक़ी है ।।
हयात ज़न्नत शबनमी
गुलज़ार महफ़िल रोशिनी
इनसे भी बढ़कर हो कोई प्यारा
आशिक़ी है ।।

--- कविराज तरुण

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