Thursday, 10 August 2017

ग़ज़ल - ये रोटियां

ग़ज़ल - ये रोटियां

2122 2122 2122 212

भूख से बेबस पिता अधिकार हैं ये रोटियां ।
मांग कर ही मिल सके स्वीकार हैं ये रोटियां ।।

रात दिन कितने जतन करता रहा इस उम्र मे ।
वक़्त के हाथों मगर लाचार हैं ये रोटियां ।।

बानगी देखो समय की लात हर हालात मे ।
कश्मकश जद्दोजहद हरबार हैं ये रोटियां ।।

छत नही सर पर कभी हम रोटियों का क्या कहें ।
मलकियत मकबूलियत सरकार हैं ये रोटियां ।।

मोह क्या है क्या है' माया इससे' क्या मतलब तरुण ।
मुश्किलों की तीज का त्योहार हैं ये रोटियां ।।

कविराज तरुण सक्षम

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