Thursday, 2 July 2026

कुल्हड़ की आत्मकथा

कुल्हड़ की आत्मकथा (सन 2003 में रचित)
- कविराज तरुण 

मैं वही मिट्टी का प्याला हूँ,
जो अमृत पीता अमृत देकर;
मैं वही मिट्टी का प्याला हूँ,
जो रस देता नीरस होकर।

तो चलो आज बतलाता हूँ,
अपने जीवन की आत्मकथा;
कैसे जन्मा इस धरती पर,
कैसे गुज़री आयु-व्यथा॥

मैं सूत्रपात हूँ समन्वय का,
एकल मेरा अस्तित्व नहीं;
अनगिनत धूलकणों का वैभव हूँ,
पृथक मेरा व्यक्तित्व नहीं।

वैसे भी एकल में शक्ति नहीं होती,
ये कहते सभी, सिर्फ मैं नहीं कहता;
एकल जीवन तन्हाई भरा है व्यर्थ,
ये सहते सभी, सिर्फ मैं नहीं सहता॥

मैं बना हूँ पानी गले लगाकर,
खुद को चक्के पर नचवाकर;
इस वायु ने मुझको सुखाया,
फिर अग्नि ने मुझको पकाया।
तब कहीं जाकर मैं पूर्ण हुआ,
पंचतत्त्वों से निर्मित स्थूल हुआ॥

धरती, जल, वायु, अग्नि, आकाश,
में हुआ मेरा विकास;
तो कहो भला मैं इंसान नहीं,
बस! इसलिए कि मुझमें जान नहीं॥

पर जब गर्म रस अभिभूत हुआ,
रुधिर-सा तब महसूस हुआ;
फिर जाना ये जीवन क्या है,
दुख में भी कितनी खुशियाँ हैं।

पर इस खुशी को मैंने त्याग दिया,
सिर्फ मृदुल होठों का स्पर्श पाने को;
अपने जीवन-रस को प्रस्तुत किया,
बस प्यार से हाथ लगाने को॥

परन्तु!

तुमने मुझे तिरस्कृत किया,
जब जीवन मेरा नीरस हुआ;
देखो सीता त्यागी गई,
उनका भी ऐसा हश्र हुआ।

अग्नि-परीक्षा उन्होंने भी दी,
अग्नि-परीक्षा मैंने भी दी;
जीवनभर प्रीति निभाई उसने,
जीवनभर प्रीति निभाई मैंने।
पर फिर क्यों ये परिणाम मिला,
धरती में हमको विश्राम मिला॥

क्या यही है तुम्हारी परम्परा?
यही है संस्कार!
मूल्य ही नहीं कुछ उसका,
जो तुम्हें कुछ देने में है बेकार॥

वाह रे ऐसी संस्कृति!!
जब तक काम, तब तक प्रणाम;
वरना...
प्रत्यक्ष है तिरस्कृति!!

Thursday, 11 June 2026

सौ तितलियाँ

मनुष्य चाहे कितनी भी मजबूती से यथार्थ को स्वीकार कर ले, उसके भीतर आशा का बीज कभी पूरी तरह मरता नहीं। वह बस सोया रहता है। और जैसे ही मन की पहरेदारी कम होती है, उम्मीदें फिर से पंख फैलाकर उड़ने लगती हैं।

ये तो बड़ा आसान था सच को संभालना 
रातों को देर जाग कर ख्वाबों को टालना
लेकिन ये क्या हुआ जरा सी आँख लग गई
उम्मीद की सौ तितलियाँ एक साथ जग गईं

Saturday, 9 May 2026

माखनलाल सरकार जी

पूज्यनीय माखनलाल सरकार 

ढलती हुई उम्र के 
अठानवे पड़ाव में 
एक बच्चे की किलकारियों सी मुस्कान लिए 
जैसे फूल खिल जाता है 
भोर के सूरज में 
जैसे चिड़िया चाहकने लगती हैं
अपने घोंसलें से बाहर आकर 
आप आये हो संघर्ष की कहानी कहने 

वो संघर्ष जो उतना ही आपका है 
जितना हनुमान का था सीता को बचाने में 
जितना श्रीकृष्ण का था यशोदा को पाने में 
वो संघर्ष जिसे 
पूरी जवानी देकर सींचा गया 
और वो भी किसी लालसा के बिना 
केवल उस स्वप्न के लिए 
जो कभी शिवाजी ने 
हिन्दवी स्वराज के लिए देखा था 
जो कभी श्यामा प्रसाद ने 
भारतवर्ष के लिए देखा था 

आप लड़ते लड़ते 
मर भी सकते थे 
जैसे अनेकोनेक योद्धा चल बसे 
पर फिर..
संघर्ष को जीवित कौन रखता 
फिर ये जीती जागती 
कहानी कौन कहता 
कौन बता पाता कि 
निःस्वार्थ प्रेम किसे कहते हैं 
एक कार्यकर्ता की ताकत को 
भला कौन जान पाता 
स्वयं से ज्यादा 
उद्देश्यों की चिंता 
परिणाम से ज्यादा 
परिश्रम को महत्व 
ये कोई आम बात नही 
ये साक्ष्य है 
उस आशा के दीपक का 
जिसकी लौ को आपने जलाये रखा 
आँधियों से तूफानों से

आपकी इस मुस्कान में 
एक इतिहास छुपा है 
साधना का 
समर्पण का 
और इसके लिए 
ना तो जरूरत है 
किसी उपहार की 
ना ही किसी पुरस्कार की 
पर ये जो कंधे पर 
अंगवस्त्र मिला है पंतप्रधान के हाथों 
ये जो नतमस्तक हुए हैं वो 
आपके सम्मान में 
ये जान लीजिये कि उनके साथ 
एक सौ चालीस करोड़ जनता भी 
आपके श्रीचरणों को 
प्रणाम करती है

©कविराज तरुण 
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Wednesday, 18 March 2026

सब ढूंढ़ते हैं

हिज्र में जीने का सबब ढूंढ़ते हैं 
हार जाने पर हम भी रब ढूंढ़ते हैं

पास रहते हैं तो जताते नही हैं 
दूर जाने पर सब के सब ढूंढ़ते हैं

देखकर उसको दिल कहाँ तक भरेगा 
उसके लब को मेरे ये लब ढूंढ़ते हैं

और कुछ पाने को नही इस शहर में
होश आता है जब भी तब ढूंढ़ते हैं

उसकी लत इसतरहा लग गई है 'तरुण' अब 
जब भी उठती है ये तलब ढूंढ़ते हैं

Monday, 2 March 2026

रणभूमि 2

पांच दिन की बैंकिंग स्वीकार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

जो हमारी जान लेने पर उतारू नीति है 
उस नीति का पुरजोर से प्रतिकार होना चाहिए

क्या कहा हमसे नही अब फर्क तुमको पड़ रहा 
क्या कहा ये बैंक वाला फालतू में लड़ रहा 

क्या कहा हमने नही कुछ भी दिया है देश को 
क्या कहा हम लोग केवल आ रहे उपदेश को 

तो तुम्हारी सोच को धिक्कार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

तुम नही आओगे तो फिर कौन आयेगा यहाँ 
बात मन की सामने फिर कौन लायेगा यहाँ 

तुम नही बोलोगे तो आवाज़ कैसे आयेगी 
पांच दिन की बैंकिंग कैसे भला मिल पायेगी 

आवाज़ दो हम एक हैं यलगार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

हम सदा जनतंत्र की सेवा समर्पण में रहे 
नोटबंदी जब हुई तो हम प्रबंधन में रहे 

हम खुशी से कर्म को अपने निभाते ही रहे 
परिवार को भी भूलकर जन धन सजाते ही रहे 

अब बैंक कर्मी का सुखी परिवार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

पांच दिन की बैंकिंग स्वीकार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

रणभूमि 1

शक्ति के अनुसार परिचय दो जहाँ के सामने
खामोश रहकर कब समझ आयेंगे तेरे मायने
अंगार आँखों मे लिए यलगार होना चाहिए
रणभूमि में शूरवीर ही स्वीकार होना चाहिए


तुम इस घनी काली अमावस में दिया लेकर चलो*
क्यूँ अकेले चल रहे तुम काफिला लेकर चलो
रण जीतने का मंच अब तैयार होना चाहिए
रणभूमि में शूरवीर ही स्वीकार होना चाहिए


अस्तित्व की है ये लड़ाई और है सम्मान की
हाँ ये लड़ाई है हमारे आपके पहचान की
इस बात का हर एक में संचार होना चाहिए
रणभूमि में शूरवीर ही स्वीकार होना चाहिए


जो हमको दबाने के मूड में हैं वो भी सुनें ये गौर से
ये गद्दियां हिल जायेंगी अबकी हमारे शोर से
ऐसे लोगों की सोच पर धिक्कार होना चाहिए
रणभूमि में शूरवीर ही स्वीकार होना चाहिए

Friday, 13 February 2026

वक़्त बदल भी सकता है

छोटी आंखों में अंबर सा सपना पल भी सकता है 
आज नहीं है कुछ भी, तो क्या, वक्त बदल भी सकता है

इक काम पकड़ तू चलता चल, रुकना तेरा काम नहीं
रुका हुआ जो काम है पगले, आगे चल भी सकता है

जगत चराचर जीव अचंभित, कुछ भी तेरे हाथ नही 
डरता क्यों है अनहोनी से, खतरा टल भी सकता है

इतना मुश्किल जो होता, कर पाता कोई और नही
पर्वत के उस पार क्षितिज से, सूर्य निकल भी सकता है

सब में तो भगवान छुपे है, फिर क्या खोजे आज 'तरुण'
नेकी का परिणाम अचानक, तुझको फल भी सकता है

~कविराज तरुण

Monday, 26 January 2026

जागो तभी सबेरा होगा

माना के घनघोर कुहासा 
टूटी है इस मन की आशा 

रात कालिमा लेकर आई 
गहरी काजल सी परछाई 

पर अब दूर अंधेरा होगा 
जागो! तभी सबेरा होगा

तुम दीपक सा जलने वाले 
तुमसे ही उत्पन्न उजाले 

तुम चमके तो जग है चमका 
तुम दमके तो सूरज दमका 

किरणों का फिर डेरा होगा 
जागो! तभी सबेरा होगा

पर उपदेश कुशल बहु तेरे 
पर्वत को जब बादल घेरे 

तब आँखों में स्वप्न सजाये 
पुंज कोई पर्वत पर आये

उसने चित्र उकेरा होगा 
जागो! तभी सबेरा होगा

नयनों में ही विरहा बीते 
आंसूँ का जल पीते पीते 

निज को हमने नही संवारा 
तो फिर अम्बर का ये तारा 

ना मेरा ना तेरा होगा 
जागो! तभी सबेरा होगा

उत्तर क्या दें प्रश्न अधूरा 
जीवन जैसे भाँग धतूरा 

खाये तो बौराना तय है 
या मरने का मन में भय है 

ऐसे नही बसेरा होगा 
जागो! तभी सबेरा होगा

पांच दिन की बैंकिंग

पांच दिन की बैंकिंग स्वीकार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

जो हमारी जान लेने पर उतारू नीति है 
उस नीति का पुरजोर से प्रतिकार होना चाहिए

क्या कहा हमसे नही अब फर्क तुमको पड़ रहा 
क्या कहा ये बैंक वाला फालतू में लड़ रहा 

क्या कहा हमने नही कुछ भी दिया है देश को 
क्या कहा हम लोग केवल आ रहे उपदेश को 

तो तुम्हारी सोच को धिक्कार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

तुम नही आओगे तो फिर कौन आयेगा यहाँ 
बात मन की सामने फिर कौन लायेगा यहाँ 

तुम नही बोलोगे तो आवाज़ कैसे आयेगी 
पांच दिन की बैंकिंग कैसे भला मिल पायेगी 

आवाज़ दो हम एक हैं यलगार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

हम सदा जनतंत्र की सेवा समर्पण में रहे 
नोटबंदी जब हुई तो हम प्रबंधन में रहे 

हम खुशी से कर्म को अपने निभाते ही रहे 
परिवार को भी भूलकर जन धन सजाते ही रहे 

अब बैंक कर्मी का सुखी परिवार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

पांच दिन की बैंकिंग स्वीकार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

Sunday, 25 January 2026

ग़ज़ल - आवारगी को देखकर

हैरान हूँ अपनी जवाँ बे-बस्तगी को देखकर
इस बेखुदी को देखकर, आवारगी को देखकर

दिल फिर किसी पे मर मिटा अपनी हदों को छोड़कर 
समझायें क्या इस उम्र की नादानगी को देखकर

जब हर तरफ हो शोर तो फिर है यही तब लाजिमी 
रुक जाइये थम जाइये अब सादगी को देखकर

सहरा में जैसे प्यास से लड़ता है कोई बावरा 
जीता रहा मै उम्र भर उस तिशनगी को देखकर

आसान है इनके लिए दिल तोडना दिल जोड़ना 
मन भर गया मेरा 'तरुण' इस दिल्लगी को देखकर

Monday, 24 November 2025

रुतबा नही गया

इस दिल से तेरा आज भी रुतबा नहीं गया
तन्हा गया मगर कोई रुसवा नहीं गया

इक प्यार और प्यार की तमआम उम्र में 
मसला यही रहा कि वो बदला नही गया

दो आँख थी दीदार में दोनों लगी रही 
कुछ और हमसे आज भी देखा नही गया

अब इसके बाद प्यार की ताबीर और क्या
होशे दिलो जाने जिगर क्या क्या नही गया

दिल मुत्तली हुआ था तेरे नाम हमसफर
ये आज भी तेरा अभी कब्ज़ा नही गया

Sunday, 28 September 2025

इतना तो आसान नही है

लिपटी है सीने से मेरे, कैसे छोड़ के जाऊँ मै 
पापा-पापा रटती है वो क्या उसको समझाऊं मै

पापा जितने प्यारे हैं उतने तो भगवान नही हैं 
छोड़ के आना बच्चे को इतना तो आसान नही है

जब उसको अपने मन की इच्छा पूरी करवानी हो 
या फिर कोई नया गेम या नई चीज मंगवानी हो
धीमे से कहकर कानों में पढ़ने वो लग जाती है
'पापा सब दिलवायेंगे' ये कहकर वो इतराती है 

अब उसकी इच्छा के आगे मेरा कुछ अरमान नही है 
छोड़ के आना बच्चे को इतना तो आसान नही है

मासूम सवालों से उसने अक्सर ही चौकाया है 
कान्हा ने क्यों चुरा चुरा के माखन इतना खाया है
श्री राधा रानी की सखियां काहें इतनी सारी थीं 
गईया को मुरली की धुन क्यों लगती इतनी प्यारी थी 

इन प्रश्नों का क्या उत्तर दूँ इतना मुझमे ज्ञान नही है 
छोड़ के आना बच्चे को इतना तो आसान नही है

चाहे रात में निकलो लेकिन पापा मुझे उठाकर जाना 
अगली बारी आओगे कब? ये भी ज़रा बताकर जाना
मै मन लगाकर पढ़ती हूँ पापा अच्छे से रहती हूँ 
पर छुट्टी जिस दिन होती है मै राह तुम्हारी तकती हूँ

प्यार छुपा जो बातों में उसका कोई अनुमान नही है 
छोड़ के आना बच्चे को इतना तो आसान नही है

बैंक की किताब दीजिये

मुझको अपने बैंक की किताब दीजिये 
प्रक़्यूजिट पर टैक्स का हिसाब दीजिये
ब्रांच ब्रांच ज़ख़्मी ये फज़ाएं हो गईं 
बोझ तले सारी इच्छाएं हो गईं 
धीरे धीरे जेब पर सदाएं हो गईं 
कोई तो रिलीफ का ख़िताब दीजिये 
प्रक़्यूजिट पर टैक्स का हिसाब दीजिये
मुझको अपने बैंक की किताब दीजिये 
प्रक़्यूजिट पर टैक्स का हिसाब दीजिये

बैठे बैठे लोग हम गरीब हो गए 
हाल चाल ढाल सब अजीब हो गए 
यानी हम मौत के करीब हो गए 
दूर अपने चेहरे से नकाब कीजिये 
प्रक़्यूजिट पर टैक्स का हिसाब दीजिये
मुझको अपने बैंक की किताब दीजिये 
प्रक़्यूजिट पर टैक्स का हिसाब दीजिये

आप भला कैसे पी एल आई खा गए 
दूध सारा बेच के मलाई खा गए 
आप तो हमारी ही कमाई खा गए 
लीज़ वाले टैक्स का जवाब दीजिये
प्रक़्यूजिट पर टैक्स का हिसाब दीजिये
मुझको अपने बैंक की किताब दीजिये 
प्रक़्यूजिट पर टैक्स का हिसाब दीजिये

स्टॉफ धीरे धीरे देखो कम हो गए 
क्लर्क तो जैसे सारे ख़तम हो गए 
यानी बिना हाथ के ही हम हो गए 
फाइव डे की बैंकिंग जनाब दीजिये
प्रक़्यूजिट पर टैक्स का हिसाब दीजिये
मुझको अपने बैंक की किताब दीजिये 
प्रक़्यूजिट पर टैक्स का हिसाब दीजिये