Wednesday, 18 March 2026

सब ढूंढ़ते हैं

हिज्र में जीने का सबब ढूंढ़ते हैं 
हार जाने पर हम भी रब ढूंढ़ते हैं

पास रहते हैं तो जताते नही हैं 
दूर जाने पर सब के सब ढूंढ़ते हैं

देखकर उसको दिल कहाँ तक भरेगा 
उसके लब को मेरे ये लब ढूंढ़ते हैं

और कुछ पाने को नही इस शहर में
होश आता है जब भी तब ढूंढ़ते हैं

उसकी लत इसतरहा लग गई है 'तरुण' अब 
जब भी उठती है ये तलब ढूंढ़ते हैं

Monday, 2 March 2026

रणभूमि 2

पांच दिन की बैंकिंग स्वीकार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

जो हमारी जान लेने पर उतारू नीति है 
उस नीति का पुरजोर से प्रतिकार होना चाहिए

क्या कहा हमसे नही अब फर्क तुमको पड़ रहा 
क्या कहा ये बैंक वाला फालतू में लड़ रहा 

क्या कहा हमने नही कुछ भी दिया है देश को 
क्या कहा हम लोग केवल आ रहे उपदेश को 

तो तुम्हारी सोच को धिक्कार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

तुम नही आओगे तो फिर कौन आयेगा यहाँ 
बात मन की सामने फिर कौन लायेगा यहाँ 

तुम नही बोलोगे तो आवाज़ कैसे आयेगी 
पांच दिन की बैंकिंग कैसे भला मिल पायेगी 

आवाज़ दो हम एक हैं यलगार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

हम सदा जनतंत्र की सेवा समर्पण में रहे 
नोटबंदी जब हुई तो हम प्रबंधन में रहे 

हम खुशी से कर्म को अपने निभाते ही रहे 
परिवार को भी भूलकर जन धन सजाते ही रहे 

अब बैंक कर्मी का सुखी परिवार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

पांच दिन की बैंकिंग स्वीकार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

रणभूमि 1

शक्ति के अनुसार परिचय दो जहाँ के सामने
खामोश रहकर कब समझ आयेंगे तेरे मायने
अंगार आँखों मे लिए यलगार होना चाहिए
रणभूमि में शूरवीर ही स्वीकार होना चाहिए


तुम इस घनी काली अमावस में दिया लेकर चलो*
क्यूँ अकेले चल रहे तुम काफिला लेकर चलो
रण जीतने का मंच अब तैयार होना चाहिए
रणभूमि में शूरवीर ही स्वीकार होना चाहिए


अस्तित्व की है ये लड़ाई और है सम्मान की
हाँ ये लड़ाई है हमारे आपके पहचान की
इस बात का हर एक में संचार होना चाहिए
रणभूमि में शूरवीर ही स्वीकार होना चाहिए


जो हमको दबाने के मूड में हैं वो भी सुनें ये गौर से
ये गद्दियां हिल जायेंगी अबकी हमारे शोर से
ऐसे लोगों की सोच पर धिक्कार होना चाहिए
रणभूमि में शूरवीर ही स्वीकार होना चाहिए

Friday, 13 February 2026

वक़्त बदल भी सकता है

छोटी आंखों में अंबर सा सपना पल भी सकता है 
आज नहीं है कुछ भी, तो क्या, वक्त बदल भी सकता है

इक काम पकड़ तू चलता चल, रुकना तेरा काम नहीं
रुका हुआ जो काम है पगले, आगे चल भी सकता है

जगत चराचर जीव अचंभित, कुछ भी तेरे हाथ नही 
डरता क्यों है अनहोनी से, खतरा टल भी सकता है

इतना मुश्किल जो होता, कर पाता कोई और नही
पर्वत के उस पार क्षितिज से, सूर्य निकल भी सकता है

सब में तो भगवान छुपे है, फिर क्या खोजे आज 'तरुण'
नेकी का परिणाम अचानक, तुझको फल भी सकता है

~कविराज तरुण

Monday, 26 January 2026

जागो तभी सबेरा होगा

माना के घनघोर कुहासा 
टूटी है इस मन की आशा 

रात कालिमा लेकर आई 
गहरी काजल सी परछाई 

पर अब दूर अंधेरा होगा 
जागो! तभी सबेरा होगा

तुम दीपक सा जलने वाले 
तुमसे ही उत्पन्न उजाले 

तुम चमके तो जग है चमका 
तुम दमके तो सूरज दमका 

किरणों का फिर डेरा होगा 
जागो! तभी सबेरा होगा

पर उपदेश कुशल बहु तेरे 
पर्वत को जब बादल घेरे 

तब आँखों में स्वप्न सजाये 
पुंज कोई पर्वत पर आये

उसने चित्र उकेरा होगा 
जागो! तभी सबेरा होगा

नयनों में ही विरहा बीते 
आंसूँ का जल पीते पीते 

निज को हमने नही संवारा 
तो फिर अम्बर का ये तारा 

ना मेरा ना तेरा होगा 
जागो! तभी सबेरा होगा

उत्तर क्या दें प्रश्न अधूरा 
जीवन जैसे भाँग धतूरा 

खाये तो बौराना तय है 
या मरने का मन में भय है 

ऐसे नही बसेरा होगा 
जागो! तभी सबेरा होगा

पांच दिन की बैंकिंग

पांच दिन की बैंकिंग स्वीकार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

जो हमारी जान लेने पर उतारू नीति है 
उस नीति का पुरजोर से प्रतिकार होना चाहिए

क्या कहा हमसे नही अब फर्क तुमको पड़ रहा 
क्या कहा ये बैंक वाला फालतू में लड़ रहा 

क्या कहा हमने नही कुछ भी दिया है देश को 
क्या कहा हम लोग केवल आ रहे उपदेश को 

तो तुम्हारी सोच को धिक्कार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

तुम नही आओगे तो फिर कौन आयेगा यहाँ 
बात मन की सामने फिर कौन लायेगा यहाँ 

तुम नही बोलोगे तो आवाज़ कैसे आयेगी 
पांच दिन की बैंकिंग कैसे भला मिल पायेगी 

आवाज़ दो हम एक हैं यलगार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

हम सदा जनतंत्र की सेवा समर्पण में रहे 
नोटबंदी जब हुई तो हम प्रबंधन में रहे 

हम खुशी से कर्म को अपने निभाते ही रहे 
परिवार को भी भूलकर जन धन सजाते ही रहे 

अब बैंक कर्मी का सुखी परिवार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

पांच दिन की बैंकिंग स्वीकार होना चाहिए 
जो हुआ पहले नही इस बार होना चाहिए

Sunday, 25 January 2026

ग़ज़ल - आवारगी को देखकर

हैरान हूँ अपनी जवाँ बे-बस्तगी को देखकर
इस बेखुदी को देखकर, आवारगी को देखकर

दिल फिर किसी पे मर मिटा अपनी हदों को छोड़कर 
समझायें क्या इस उम्र की नादानगी को देखकर

जब हर तरफ हो शोर तो फिर है यही तब लाजिमी 
रुक जाइये थम जाइये अब सादगी को देखकर

सहरा में जैसे प्यास से लड़ता है कोई बावरा 
जीता रहा मै उम्र भर उस तिशनगी को देखकर

आसान है इनके लिए दिल तोडना दिल जोड़ना 
मन भर गया मेरा 'तरुण' इस दिल्लगी को देखकर