Wednesday, 18 March 2026

सब ढूंढ़ते हैं

हिज्र में जीने का सबब ढूंढ़ते हैं 
हार जाने पर हम भी रब ढूंढ़ते हैं

पास रहते हैं तो जताते नही हैं 
दूर जाने पर सब के सब ढूंढ़ते हैं

देखकर उसको दिल कहाँ तक भरेगा 
उसके लब को मेरे ये लब ढूंढ़ते हैं

और कुछ पाने को नही इस शहर में
होश आता है जब भी तब ढूंढ़ते हैं

उसकी लत इसतरहा लग गई है 'तरुण' अब 
जब भी उठती है ये तलब ढूंढ़ते हैं

No comments:

Post a Comment