Monday, 1 June 2015

कशिश

अब्र आँखों से गिरा देते हैं
यादों में तेरी ।
शहद सा स्वाद लगे मुझको बातों में तेरी ।
हर घड़ी गिन गिन के गुजारी तेरे इंतज़ार में ।
रूमानी असर आज भी बाकी है तेरे प्यार में ।
कशिश बाकी है ऐसी कि कोई और भाता ही नही ।
कोई भी आये तेरे करीब तो सहा जाता हो नही ।
झूठ बोलकर मुझसे तू फरेब मत कर ...
झूठ कितना भी मीठा हो सुना जाता ही नही ।
तू है चंचल तेरी हँसी क़यामत है ।
तेरी खुशियाँ मेरे प्यार की अमानत हैं ।
बिना देखे तुझे पलभर भी रहा जाता ही नही ।
तेरे सिवा इन ख्वाबो में कोई और आता ही नही ।

कविराज तरुण

Wednesday, 22 April 2015

आओगी ना

मै मर जाऊँगा तो तुम आओगी ना ।
चंद आँसूं मेरी कब्र पर गिराओगी ना ।
या ज़माने के डर से फेर लोगी निगाहें ।
भूल जाओगी वो लम्हें वो बाहों मे बाहें ।
मेरी बचकानी हरकतो का सोचकर मुस्कुराओगी ना ।
मै मर जाऊँगा तो तुम आओगी ना ।
कई रिश्ते रोकेंगे मेरे पास आने को ।
दिखाई देंगे नही मेरे दर्द इस ज़माने को ।
कई सवालों के जवाब तुम दे ना पाओगे ।
अश्क आयेंगे तो शायद पलकों में छिपाओगे ।
अपनी यादों मे मुझको हमेशा पाओगी ना ।
मै मर जाऊँगा तो तुम आओगी ना ।

तरुण

Wednesday, 18 March 2015

तनहा रहा अकेला रहा

कल तक उनके दिलों का मेला रहा ।
आज तनहा रहा , अकेला रहा ।
बात कम हो गई , रात नम हो गई ।
होते होते मुलाक़ात खतम हो गई ।
मेरे सपने ही मुझसे जुदा हो गए ।
उनको खबर ही नही वो खुदा हो गए।
रूठ कर , टूट कर चल रहा हूँ अभी ।
थाम ले वो मुझे शायद आकर कभी ।
कलतक उनके बगीचे का फूल बेला रहा ।
आज तनहा रहा , अकेला रहा ।

कविराज तरुण

Sunday, 8 March 2015

तुम और मै

मै कैसा हूँ ये जानता नही हूँ ।
शक्ल अपनी शायद मै पहचानता नही हूँ ।
एक मासूम दिल है और ज़रा सी मुस्कान ।
बहुत तनहा रहा और ख़ुशी से अनजान ।
तलाशता रहा उस चेहरे को जो मुझे अपनाये ।
जिसकी बाते मेरे मन को एक शुकून दे जाये ।
जो समझे मुझे और मेरी चाहत को ।
रंग भर दे जो जिंदगी में अपनी मोहब्बत के ।
तुम ही हो अब मेरे ये तलाश कर दो पूरी ।
सारी दुनिया फरेब है और तुम ही जरुरी ।
साथ दो बस मेरा बहुत रो चूका हूँ ।
दुसरो की ख़ुशी में बहुत कुछ खो चूका हूँ ।
अब तुम पर यकीन है तुमपर ऐतबार है ।
इस जिस्म दिल धड़कन को बस तुमसे प्यार है ।

कविराज तरुण

Sunday, 1 March 2015

बेताबी

दिल बड़ा बेताब सा है
ये सच है या एक ख्वाब सा है
तुम बन गए हो मीत मेरे
कुछ कुछ ये नशा शराब सा है
मै अंजुमन मे खो गया हूँ शायद
तेरा असर महकते किसी गुलाब सा है
प्यार की बारिश मे भीग के ये जाना
मज़ा ज़िन्दगी का मेहताब सा है
कविराज तरुण

चितचोर

नाच रहा मन मेरा बनके चितचोर
चेहरा तेरा छा गया है मेरे सबओर
भींग रहा तन बदन ऐसे छोर छोर
जैसे बारिश की बूंदों मे घूमता मोर
जाने कैसे कब कहाँ तूने बाँधी दिल की डोर
शाम की खबर नही ना रात ना भोर
जिधर नज़र ये पड़े तू दिखे चहुओर
चल ही नही पा रहा अब मन पर जोर
तेरी बातों के सिवा जग में लगे सब शोर
कर न सकू तेरे अलावा अब कही भी गौर
खुद की खबर नही न डगर न ठौर
बन गए हो मीत मेरे प्रीत घनघोर
नाच रहा मन मेरा बनके चितचोर
चेहरा तेरा छा गया है मेरे सबओर

कविराज तरुण

Sunday, 15 February 2015

पाक की हार

ईंट ईंट जोड़कर जो बने उसे मकान कहते हैं ।
जो अदभुत और अनोखा हो उसे विज्ञान कहते हैं ।
जो दुनिया जीत ले उसे सिकंदर महान कहते हैं ।
और हारे हुए मुल्क को पकिस्तान कहते हैं ।
जहाँ मुर्दों की भीड़ हो उसे शमशान कहते हैं ।
जो गुड़ से भी मीठा हो उसे मिष्ठान कहते हैं ।
जिसकी चाहत हो एक अरसे से उसे अरमान कहते हैं ।
और हारे हुए मुल्क को पकिस्तान कहते हैं ।
आशा की किरण जो दिल में जगाये उसे भगवान् कहते हैं ।
जो किसी प्रहर घर चला आये उसे मेहमान कहते हैं ।
बारम्बार जीत का जो परचम लहराये उसे हिन्दुस्तान कहते हैं ।
और हारे हुए मुल्क को पकिस्तान कहते हैं ।

कविराज तरुण

Sunday, 18 January 2015

मै दरिया हूँ

पेश है वियोग रस मे लिखी मेरी अंतिम काव्य रचना ::
समंदर से मिलाने का , मै बस एक ज़रिया हूँ ।
रहो तुम मौज मे नदिया , मै बस एक दरिया हूँ ।
लहर मे डूब जाता हूँ ...
तपन मे सूख जाता हूँ ।
नही वजूद है कोई ...
तुमसे खुद को बनाता हूँ ।
तू अविरल छलकती जाये , तो फिर मै भी बढ़िया हूँ ।
रहो तुम मौज मे नदिया , मै बस एक दरिया हूँ ।
समंदर से मिलाने का , मै बस एक ज़रिया हूँ ।।

चली जब भी ये पुरवाई , तुम्हारी याद ले आई ।
मोहब्बत की ये तन्हाई , पुराना ख्वाब ले आई ।
ज़माना वो भी था अपना ...
सितारों से भरा सपना ।
गए तुम छोड़कर सबकुछ ...
नही अब कोई भी अपना ।
ख़ामोशी की चादर मे , मै सिमटी तंग गलिया हूँ ।
रहो तुम मौज मे नदिया , मै बस एक दरिया हूँ ।
समंदर से मिलाने का , मै बस एक ज़रिया हूँ ।।

ख़त्म होती कहानी का , आखिरी ज़ख्म है गहरा ।
नज़र दीदार को तरसे , ज़माने भर का है पहरा ।
कभी दिल तोड़कर रोया ...
कभी मुँह मोड़कर सोया ।
दर्द हिस्से मिला मुझको ...
जो मैंने प्यार को बोया ।
यही एक बात चुभती है , तू बोले कि मै छलिया हूँ ।
रहो तुम मौज मे नदिया , मै बस एक दरिया हूँ ।
समंदर से मिलाने का , मै बस एक ज़रिया हूँ ।।

सिफारिश थी मोहब्बत की , गुजारिश थी इबादत की ।
जुबां पर नाम ना आया , ये मेरी शराफत थी ।
मेरे ये ज़ख्म गहरे हैं ...
घने काले अँधेरे हैं ।
तमाम राहत तुम्हारी है ...
और ये अश्क मेरे हैं ।
किसी माली से रूठे पेड़ की , शायद मै कलिया हूँ ।
रहो तुम मौज मे नदिया , मै बस एक दरिया हूँ ।
समंदर से मिलाने का , मै बस एक ज़रिया हूँ ।।

कविराज तरुण

Monday, 12 January 2015

मिलन का अवसर कैसे होगा

मै पतझड़ का सूखा पत्ता
सावन की तुम पुष्प गुलाबी ।
मै सिगरेट की धुंध कालिमा
आँखों का मायाजाल शराबी ।
तुम स्वच्छ सुन्दरी काया हो
तुझमे तनिक भी नही खराबी ।
मै किस्मत का मारा यौवन
तुम खुल जा सिमसिम वाली चाबी ।
फिर मिलन का अवसर कैसे होगा
नही बनेंगे अब ठाट नवाबी ।।

तुम विटामिन बी की गोली
मै बीज करेले वाला हूँ ।
तुम सहारा गंज का शोरूम
मै अमीनाबाद का गड़बड़झाला हूँ ।
मै कुरूप घनघोर धूप
काजल से भी गहरा काला हूँ ।
तुम साँझ सुहानी छाया हो
मै मकड़ी का बस जाला हूँ ।
फिर मिलन का अवसर कैसे होगा
मै बस काटों की वरमाला हूँ ।।

मै लंगड़ा बूढ़ा सांड सरफिरा
हिरनी सी तेरी चाल अनोखी ।
मै देशी ठर्रा पन्नी वाला
तू काजू वाला माल अनोखी।
मै ट्रेन की सीटी जैसा कर्कश
तुम जाकिर हुसैन की ताल अनोखी ।
मै आम की गुठली सा कठोर
तेरे मक्खन से कोमल गाल अनोखी ।
फिर मिलन का अवसर कैसे होगा
यूँही बुरे रहेंगे हाल अनोखी ।

कविराज तरुण

मै और मेरा जन धन

कई दिनो से एक कविता लिखने को कह रहा था ,
मेरा एक सहकर्मी चन्दन ।
चलो फिर सुनाता हूँ आप सबको ,
मै और मेरा जन धन ।।
पहले नही लगती थी , यूं खातों की कतारें ।
अब भीड़ उमड़ती है ऐसे , जैसे नभ मे सितारे ।
बस अंतर है इतना ...
सितारे रात मे आते हैं और खातो की कतारे दिन मे आती है ।
सितारों को देखकर नींद आती है और खातो से नींद गुम हो जाती है ।
मेरा सुख छीना चैन छीना इन्ही खातो ने ।
दिमाग की नसों को किया ढीला इनकी बातो ने ।
बारिश क्या सर्दी क्या झुलस गया सावन ।
सबक मिला जिंदगी का ,
मै और मेरा जन धन ।।
ऊपर से नौकरशाहो का दबाव कि सर्वे करा लो ।
किस किस का नही है खाता एक सूची बना लो ।
और ये भी रखो ध्यान दो बार खुले नही खाता ।
लगाते रहो नारा जन धन भाग्य विधाता ।
इन्शुरन्स करो इनको ओडी भी दो ।
दे दो सरकार इन्हें मोदी भी दो ।
थकान से चूर त्रस्त मेरा जीवन ।
दिन रात परेशान करे ,
मै और मेरा जन धन ।।
नीतियाँ सरकार की चले बैंक के रास्ते ।
पर देने को नही है फूटी कौड़ी अपने वास्ते ।
आधार लिंक करो गैस लिंक करो ।
आया कहा से इतना कैश लिंक करो ।
पर नही करो वेतन बढ़ाने की मांग ।
सरकार खीच लेगी वर्ना अपनी टांग ।
प्राइमरी टीचर रहीश है और गरीब बैंक स्केल वन ।
बहुत पछताता हूँ ,
मै और मेरा जन धन ।।

कविराज तरुण

Saturday, 27 December 2014

घर नही आये

वो भी किसी माँ के बेटे होंगे ।
उनके आँसू कभी आँचल ने लपेटे होंगे ।
उनकी ऊँगली वालिद ने थामी होगी ।
उनके घर मे भी मौसी और मामी होगी ।
जाने किसने सबक वैहशी ये सिखाया उनको ।
अपनी माटी का नमक याद ना आया उनको ।
खून के छींटे भी उनको नज़र नही आये ।
स्कूल गए थे वो बच्चे घर नही आये ।
दनादन गोलियाँ मासूमो पर बरसाई कैसे ।
चीख उनकी इनके कानो तक ना आई कैसे ।
उनकी आवाज़ मे रहम की गुजारिश ना देखी ।
या उनकी निगाहों मे आँसुओं की बारिश ना देखी ।
या दिल था पत्थर का या हैवान थे वो ।
मुझे यकीन है नही ज़रा भी इंसान थे वो ।
इतनी बेदर्दी से किसी ने कहर नही ढाये ।
स्कूल गए थे वो बच्चे घर नही आये ।

कविराज तरुण

मै

मै चला गया तो वापस नही आऊंगा ।
कितना भी बुला लो मुड़ के ना देख पाउँगा ।
आँसू बहेंगे दर्द भी होगा
सूनी रातो मे मेरा हमदर्द ना होगा
तन्हा रहूँगा अकेला रहूँगा
तुम कितना भी पूछो कुछ ना कहूँगा
याद कितना भी करूँ पर नही मै बताऊंगा ।
मै चला गया तो वापस नही आऊंगा ।
बहुत दिल लगाकर मोहब्बत करी है
नब्ज़ जितनी चली बस इबादत करी है
तेरी खुशियों को खुदा से बढ़कर ही माना
साथ तेरा दिया कुछ भी कह ले ज़माना
बिन कहे बिन सुने यही दोहराऊंगा।
मै चला गया तो वापस नही आऊंगा ।

कविराज तरुण

Friday, 26 December 2014

व्यर्थ है जीवन

कभी कभी सोचता हूँ
व्यर्थ है जीवन ।
कभी किसी का हो न सका
अनर्थ है जीवन ।
कभी खुद की नादानियों से
कभी छोटी मोटी बेइमानियो से
कभी अपनी हरकतों से हँसाकर
जाने अनजाने तुझको रुलाकर
अपनी नासमझी मे
बर्बाद किया यौवन ।
कभी कभी सोचता हूँ
व्यर्थ है जीवन ।।
हम ना सो जाए कहीं
इसलिए पलकों को जगाये रखा
वो ना आ जाए कहीं
इसलिए दामन को बिछाये रखा
इन्तेहा नही थी मेरी चाहत की
वो ना घबराये कही
इसलिए अश्कों को छिपाये रखा
उनकी खुशियों को नज़र ना लगे
यही सोचकर इन नज़रों को झुकाये रखा
पतझड़ स्वीकार है अगर
उन्हें मिले सावन ।
कभी कभी सोचता हूँ
व्यर्थ है जीवन ।।

कविराज तरुण

Thursday, 25 December 2014

आयतें इश्क की

तुम बोलती रहो मै सुनता रहूँ ।
प्यार की तह्मते यूँही बुनता रहूँ ।
तुमसे अलग कुछ भी सोचा नही ...
आयतें इश्क की यूँही लिखता रहूँ ।।
चल ज़रा साथ चल
ना इधर ना उधर
ये बता दिल तेरा
मुझको सोचे अगर
तो भला क्या मेरा
प्यार आये नज़र ।
तू हसीं मै नही
और अदा लाज़मी
मंद मुस्कान है
और लबों पर नमी
तू सुबह ओस की
अब्र सी सादगी ।
छू के देखूँ तुझे या मै तकता रहूँ ।
पास आऊ तेरे या भटकता रहूँ ।
शाम की शबनमी वादियां कह रही ...
आयतें इश्क की यूँही लिखता रहूँ ।।

कविराज तरुण

Monday, 15 December 2014

तिरंगा झलक रहा

इस ओर तिरंगा झलक रहा ।
उस ओर तिरंगा झलक रहा ।
सरहद के काँटो से देखा
सब ओर तिरंगा झलक रहा ।
तुम दिल्ली पर आँख गड़ाए हो
यहाँ लाहौर तिरंगा झलक रहा ।
सियाचीन की बर्फ पे चढ़कर देखा
घनघोर तिरंगा झलक रहा ।
तुम साजिश करके हार गये ।
आतिश बाज़ी करके हार गये ।
भारत का बाल नही उखड़ा
हर कोशिश करके हार गये ।
सावधान पड़ोसी मेरे
अब चहुओर तिरंगा झलक रहा ।
रात मे सपने देख लो कितने
पर अब भोर तिरंगा झलक रहा ।
इस्लामाबाद की धरती पर फिरसे
है शोर तिरंगा झलक रहा ।
हवा महल से बाहर सच है
कर गौर तिरंगा झलक रहा ।

कविराज तरुण

Monday, 24 November 2014

मिल गया होता

तारों को चमकने का बहाना मिल गया होता ।
जो बादल को फलक से दूर ठिकाना मिल गया होता ।
मै आवारा 'तरुण' हूँ दुनिया की बेबाक नज़रों मे ...
जो मेरे दर्द ना होते तो अफ़साना मिल गया होता ।
बड़ी बद्सलूखी की मेरे दिल ने तेरे दिल से ...
अज़ब सी दिलकशी की मेरे दिल ने तेरे दिल से ...
समझ लेती अगर दिल को तो दिवाना मिल गया होता ।
ज़िन्दगी खुल के जीने का बनामा मिल गया होता ।
अब तो आँख से आँसू भी कतरा कतरा रोते हैं ।
बची शायद नही बूँदें ये बस पलकें भिगोते हैं ।
इन्हें आँसू भरा कोई खज़ाना मिल गया होता ।
तो मेरे लफ्ज़ को बेहतर तराना मिल गया होता ।
वो बोले दिन तो है ये दिन , वो बोले तो शाम है ये ।
जो सूरज को कहें चन्दा तो बेशक नाम है ये ।
अगर जिद थोड़ी रख लेते तो आशियाना मिल गया होता ।
मेरी इस अब्र को बारिश का नज़राना मिल गया होता ।
ना अब तो नींद आँखों मे , ना है अब चैन एक पल का ।
धड़कन को सुने कोई तो जाने हाल हलचल का ।
बेसुध मन की हालत को फ़साना मिल गया होता ।
जो तुम मिलती तो मुझको ये ज़माना मिल गया होता ।
चलो अब खैर जाने दो ये बिन सिर - पैर की बातें ।
नही आता मुझे करना , किसी भी गैर की बातें ।
जो तुम पहचान लेती अक्स तो फिर बेगाना मिल गया ।
है जो अब भीड़ का हिस्सा वो किस्सा पुराना मिल गया होता ।

कविराज तरुण

Thursday, 20 November 2014

नैन

बंद रहकर भी बोलते हुए नैन ।
स्वप्न द्वार पलकों से खोलते हुए नैन ।
और कुटिल सी मुस्कान
जिसपर अर्क गुलाबी सा निशान
चुरा लेंगे अनगिनत दीवानों का चैन ।
बंद रहकर भी बोलते हुए नैन ।
इसकी आभा की उपमा कुछ भी नही
बंद हो तो नज़ाकत, जो खुले तो शरारत
एक टकी से जो देखे , तो फिर हो कयामत
घूर दे तो नसीहत , झपकी ले तो मोहब्बत
चौक कर जब ये देखे , तो फिर विस्मित अकीदत
कभी ये इबादत कभी ये शराफत
कभी ये हकीकत कभी ये इबारत
इस खुदा की सबसे अनोखी ये देन ।
बंद रहकर भी बोलते हुए नैन ।

--- कविराज तरुण

Wednesday, 5 November 2014

बेवजह

अपनों की भीड़ मे, मुझे भूल जाना बेवजह ।
मै हँसता सा दिखूँ , तुम रुलाना बेवजह ।
बाँध कर रखा है मुझे, मेरे ज़ज्बातो की कसम ।
प्यार गैरों के लिए, मेरी किस्मत मे बस सितम ।
करूँ जो मै शिकायत, तो नसीहत हर कदम ।
तोड़ दे दिल मेरा अब, कर दे एक ज़रा सा रहम ।
प्यार का अब ठिकाना , क्यों बनाना बेवजह ।
अपनों की भीड़ मे, भूल जाना बेवजह ।
था भरोसा इश्क पर, झूठा गुरूर था ।
बस नशे की रात सा, एक शुरूर था ।
उतर जाना थी फिदरत, नही तेरा कसूर था ।
मगर तुझको ही किस्मत, हमने माना जरूर था ।
बची इज्ज़त को महफ़िल मे, क्यों लुटाना बेवजह ।
अपनों की भीड़ मे, मुझे भूल जाना बेवजह ।

--- कविराज तरुण

Sunday, 2 November 2014

जरुरी था

मै टूट जाऊंगा
बर्बाद भी हो जाऊंगा ।
तू नज़र आयेगी
पर मै नज़र नही आऊंगा ।
मेरा ना तो जीना जरुरी था ।
ना ही मेरा मरना जरुरी था ।
सिर्फ अपने आपसे मेरा अभी...
लड़ना जरुरी था ।
इसी कश्मोकश मे
पानी सा बिखर जाऊंगा ।
तू नज़र आयेगी
पर मै नज़र नही आऊंगा ।
सिलसिला सवालों का तुझे बदलना जरुरी था ।
मोहब्बत मे एक उमर अपनी गुजरना जरुरी था ।
ख़त्म कर देती भले कहानी बिन कहे तुम ...
पर एक दुसरे से एक दफा अभी मिलना जरुरी था ।
इस कहानी से बैरंग
मै गुजर जाऊँगा ।
तू नज़र आयेगी
पर मै नज़र नही आऊंगा ।
सावन के फुहारों का ज़रा जलना जरुरी था ।
कि हल्की आँच पर अहसास का पिघलना जरुरी था ।
हुई जब बात तो ज़ज्बात की नौबत नही आई...
इसी हालात का अपने अभी बदलना जरुरी था ।
ना बदल पाया तो मै
खुद से मुकर जाऊंगा ।
तू नज़र आयेगी
पर मै नज़र नही आऊंगा ।

--- कविराज तरुण

Saturday, 18 October 2014

राजभाषा हिन्दी

राजभाषा हिन्दी

उठो , जागो ... निज भाषा को अपना लो |
हिन्दी बुला रही है ... ऐ हिन्दुस्तानी लाज बचा लो ||
मै पुरखों की अतुल्य धरोहर ...
और संस्कृत की बेटी हूँ |
सिंहासन पर मै पली – बढ़ी ...
पर आज चिता पर लेटी हूँ |
सहज , सरस और सरल सा ...
मेरा ये इतिहास बड़ा |
काश मुझे आकार कर दे तू ...
अपने इन पैरों पर फिरसे खड़ा |
विस्मित माँ की आँखों से ... आँसू की हर बूँद हटा लो |
हिन्दी बुला रही है ... ऐ हिन्दुस्तानी लाज बचा लो ||

--- कविराज तरुण

Wednesday, 24 September 2014

नही आता

हसरतो पर लगाम लगाना नही आता ।
मै खुश हूँ मगर मुस्कुराना नही आता ।।
जो मिला जब मिला और जैसे मिला ...
ना किसी से शिकवा ना कोई गिला ...
अश्क आये तो उन्हें पलको में छिपाना नही आता ।
झूठे सपने इन आँखों मे सजाना नही आता ।
हसरतो पर लगाम लगाना नही आता ।
मै खुश हूँ मगर मुस्कुराना नही आता ।।
लोग कहते हैं इश्क छिपाए नही छिपता ...
सावन के अंधे को कुछ और नही दिखता ...
उतर जाती है हिना भी हथेली पर चढ़कर ...
रंग मोहब्बत का दिल से यार नही रिसता ...
बिक जाते हैं शहंशाह भी मुफलिसी में अक्सर ...
किसी कीमत मे मगर ये प्यार नही बिकता ...
पर फिरभी इस प्यार को आजमाना नही आता ।
जो है वो दिल मे है यूँ सरेआम दिखाना नही आता ।
सच है हमे रूठों को मनाना नही आता ।
ये भी सच है किसी को रुलाना नही आता ।
हो जाए गलती तो बस सुधार लेते हैं ।
बेवजह किसी को समझाना नही आता ।
हसरतो पर लगाम लगाना नही आता ।
मै खुश हूँ मगर मुस्कुराना नही आता ।।
--- कविराज तरुण

Tuesday, 23 September 2014

बँटवारा

पहले बड़े प्यार से हम रोटी बांटा करते थे ।
आज देखो हम अपना ये घर बाँट रहे हैं ।
किसी के हिस्से मे आ जाए ना ज्यादा
इसी उधेड़बुन मे हर एक कोना नाप रहे हैं ।
आज देखो हम अपना ये घर बाँट रहे हैं ।।
ये आँगन जिसमे सीखे सब खेल खिलवाड़ ...
आज इसके बीच खिच गई है दीवार ...
और वो छज्जे जिसपर लटक कर गुलाटी मारते थे ...
अब उसे हथियाने के लिए लाठी मार रहे हैं ।
आज देखो हम अपना ये घर बाँट रहे हैं ।।
चाँदनी रातों का पहरा...
भाइयों का प्यार गहरा...
तारों मे शक्ल बनाना...
एक दुसरे से लड़ना-मनाना...
अब जब समझदार हुए हैं तो छत की ऊँचाई भांप रहे हैं ।
आज देखो हम अपना ये घर बाँट रहे हैं ।।
लुकाछुपी करते थे दीवारों के पीछे...
टॉफ़ी छुपा देते थे बिस्तर के नीचे...
खीर किस प्लेट मे कम है किसमे है ज्यादा ...
हालाँकि छीनने का किसी का नही था इरादा ...
पर सबकुछ भूलकर हम अपनी जड़े काट रहे हैं ।
आज देखो हम अपना ये घर बाँट रहे हैं ।।

--- कविराज तरुण

Saturday, 6 September 2014

फ़लसफ़ा

अंधेरों को चीरता आया हूँ मै
फिर एक फ़लसफ़ा लाया हूँ मै
मुद्दतें गुजर गई जिसको जलाने मे
वो चिराग-ए-रोशिनी तेरे दिल मे सजाया हूँ मै ।
वो रुक रुक के लेती रहती वफ़ा का इम्तेहां
मै बुझ बुझ के देता रहा जलने का निशां
तब कहीं जाकर तुमको मुकद्दर बनाया हूँ मै
अंधेरों को चीरता आया हूँ मै ।
हाँ मगर वक़्त लगा दिल में जगह बनाने मे
कसर ही कहाँ छोड़ी तुमने हमे आजमाने मे
और अब देखो हँसते हुए कैसे निखर आया हूँ मै
अंधेरों को चीरता आया हूँ मै ।

--- कविराज तरुण

Wednesday, 3 September 2014

online

तेरे online होने का इंतज़ार किया करता हूँ ।
watsapp को रोज मै घड़ी घड़ी तकता हूँ ।
न जाने कब आ जाए तेरा प्यार भरा message ...
इसी उम्मीद मे data को off नही करता हूँ ।
जब भी notification की ringtone बजती है ।
मेरे दिल की घंटी⏰ भी trinn trinn करती है ।
जवाब क्या भेजूँ तेरे question का हरदम...
इसी उधेड़बुन मे मेरी battery�� सुलगती है ।
मेरे थोक भरे messages से जब होती हो hyper ।
autostart हो जाता है आँखों का wiper ।
और दिल मे viberation सी alert होने लगी ...
हालत हो जाती है जैसे बच्चा बिन dyper ।
पर smiley तेरी जब kiss वाली आती है ।
मेरी profile pic तब ख़ुशी से इतराती है ।
और status की शब्दावली झट से बदल जाती है ...
sweet भरे message मे यूँही रात�� गुजर जाती है ।।

--- कविराज तरुण

Thursday, 14 August 2014

एक गरीब लड़की

उसकी सूरत ने मुझे कुछ हैरान कर दिया ।
जो 'तरुण' मनमौजी था उसे परेशान कर दिया ।
सियासत करते रहे लोग उस तबके को ऊपर लाने की ...
जिसको बासी रोटी देकर एक रहीस ने अहसान कर दिया ।
वो पूछती रही बताओ ये हिन्दुस्तान कहाँ है ।
मेरे माथे पर तिरंगे का निशान कहाँ है ।
ना इल्म है न वजूद ना वजह न सबूत ...
मैंने जीना नही सीखा... मेरा इंसान कहाँ है ।
मै निशब्द खामोश कुछ व्याकुल कुछ अबोध ...
खोजता रहा इन सवालों को पर फिर भी अफ़सोस ...
बिना कोई जवाब दिए इन कदमो ने प्रस्थान कर दिया ।
उसकी सूरत ने मुझे कुछ हैरान कर दिया ।
जो 'तरुण' मनमौजी था उसे परेशान कर दिया ।।

--- कविराज तरुण

Monday, 21 July 2014

अदला बदली

एक आह निकल जाती है
जब भी दूर चला जाता हूँ ।
शायद पागलपन है मेरा
कह भी नहीं पाता हूँ ।
मुट्ठी बिन खोले निकल रही हैं
रेत सी तेरी यादें ।
अश्कों में डूबी सिसक गई हैं
वो अपनी बीती बातें ।
चल लुक्का छुप्पी करते हैं
मै खोजूँ तू छुप जाए ।
पर जो पल भी ना देखूँ तुमको
मेरा दिल कितना घबराए ।
तू पास नही अब
एहसास नही अब
रब साथ नही अब
विश्वास नही अब
कि बिन तेरे ये कोरा जीवन
किस पत्थर से चमकाएं ।
सुन ! अदला बदली कर ले शायद
मेरा प्यार नज़र कुछ आये ।।

--- कविराज तरुण

Monday, 23 June 2014

सनम

pfa

याद करेंगे


जो हमें चाहते हैं वो हमेशा याद करेंगे ।
कुछ सक्श ऐसे भी मिल जायेंगे ...
जो नाम  जी भरकर बर्बाद करेंगे ।
खैर हमें क्या ...
खैर हमें क्या , क्या लेना इनसे ।
शम-ए-मोहब्बत के हम परवाने ...
जल जायेंगे मगर रोशिनी बेहिसाब करेंगे ।
कुछ लोग मेरे वजूद का सुबूत मांगेंगे ,
कुछ लोग सहेजने को मेरा ताबूत मांगेंगे ,
कुछ कह देंगे-गया जो उसे जाना ही था ,
कफ़न तो उसका एकदिन यहाँ आना ही था
उसके आँसू मगर फिरभी ये सवालात करेंगे
बिन तुम्हारे भला कैसे जहां आबाद करेंगे
जो हमें चाहते हैं वो हमेशा याद करेंगे ।
दिल से निकली ,पंहुची दिल तक
दिल की बातें ...
फरक नही है , लफ्जों की
क्या थी सौगातें ...
नाम उसके हर ज़र्रा हर अल्फाज़ करेंगे
बंद पलकों में छुपा हर ख्वाब करेंगे ।
जो हमें चाहते हैं वो हमेशा याद करेंगे ।

-कविराज तरुण

तबाह

तबाह हो जाने दे सनम आज , कसम आज तुम्हे ।
इस अँधेरे मे हो जाने दे , दफ़न आज मुझे ।
खुद को तुझसे , तुझ को खुद से अलग कैसे करूँ ।
मेरी उम्मीदों का तू दे दे , कफ़न आज मुझे ।
कि गम से गुम हुआ , गुम से गुमनामी की तरफ ।
हँसते गाते जो कटे दिन , वो बदनामी की तरफ ।
जो मुझे मुझसे बेहतर समझते थे , हैं हैरानी की तरफ ।
बिखरे सपने पहुँच पाए नही , किसी कहानी की तरफ ।
अपने हाथो से ही करना था , खुशियों का दमन आज मुझे ।
तुझमे खोया था अबतक , तुझको खोया हूँ अब जब ।
तेरा चेहरा नही आँखों से हटता , सनम आज मुझे ।
तबाह हो जाने दे सनम आज , कसम आज तुम्हे ।
--- कविराज तरुण

शायद बचपन इसी का नाम

शाम सुहाने बचपन की
फिर बात पुराने बचपन की
कागज़ की कस्ती पानी मे
परियों की शादी कहानी मे
कुत्ते के पिल्ले छोटे से
हलवाई चाचा मोटे से
पिंकी बिल्लू नंदन चम्पक
बांकेलाल की हरदम बकबक
साबू और राका की धूम-धड़ाम
नागराज का इन्तेकाम
जंगल की मस्ती मोगिली संग
टॉम को कर दिया जेरी ने तंग
चन्द्रकान्ता श्रीकृष्णा शक्तिमान
शायद बचपन इसी का नाम

--- कविराज तरुण