Monday, 27 March 2017

ग़ज़ल- कर रहा हूँ

रदीफ़ - कर रहा हूँ
काफ़िया - अन
बहर 122 122 122 122

उजाला रहे ये जतन कर रहा हूँ ।
सवेरे सवेरे हवन कर रहा हूँ ।।

मुख़ातिब अ-धेरा ब-सेरा मुनासिब ।
यही सोच खुद को दफन कर रहा हूँ ।।

रिवाज़ो ज़रा लाँघने दो जजीरा ।
जलाकर जवानी तपन कर रहा हूँ ।।

बड़ी दूर जाना घने काम करने ।
मशालों से रौशन चमन कर रहा हूँ ।।

तरुण छोड़ दो अब ख-यालो मे' रहना ।
जमी पर सितारा चलन कर रहा हूँ ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Saturday, 25 March 2017

अलफ़ाज़ 1

लहजो में तौलकर अल्फाज़ो को रखिये
एक उम्र गुजरती है इज्जत कमाने में

खाली पड़े मकां में कभी नूर भी बरसे थे
एक चिंगारी ही काफी है घर को जलाने में

कहते हैं सब्र को अक्सर कड़ा इम्तेहान देना पड़ता है
कई कोस चलना पड़ता है बच्चों को चलना सिखाने मे

गर कोई करे मदद तो उसका एहतराम जरुरी है
एक जुगनू भी है काफी अँधेरे को मिटाने मे

चलो कोई ऐसा धर्म भी चलाये जहाँ इंसान मजहब हो
बड़ा मुश्किल नज़र आता है कोई रस्ता सुझाने मे

कविराज तरुण 'सक्षम'

Wednesday, 22 March 2017

भोजपुरी चाचा चाची लाय दा

चाचा ..चाची लाय दा हमके
होए बड़ी मेहरबानी
तू तो साठीयाइल बा बुढ़ऊ
पीछे छुटल जवानी
चाचा
लाय दा तू चाची ..हो

अरे बच्चन का कब आई नंबर
जब तुंही हा घर में कुंवारा
एक बित्ता की दाढ़ी लइके
तू तनिको नही लजाला
चाचा
लाय दा तू चाची.. हो

चाचा ..चाची लाय दा हमके
होए बड़ी मेहरबानी
तू तो साठीयाइल बा बुढ़ऊ
पीछे छुटल जवानी
चाचा
लाय दा तू चाची ..हो

जल्दी खोजा बुढ़िया कौनो
जो दिखत हो कमसिन सयानी
खेतन में हल कैसे जोतिबा
जब सूखे भीतर का पानी
चाचा
लाय दा तू चाची ..हो

इंटरनेट का चक्कर छोड़ा
न होइए कौनो सेटिंग
पाँव कबर में लटक गए हैं
करते करते वेटिंग
चाचा .. छोड़ दा ई मनमानी

चाचा
लाय दा तू चाची.. हो

चाचा ..चाची लाय दा हमके
होए बड़ी मेहरबानी
तू तो साठीयाइल बा बुढ़ऊ
पीछे छुटल जवानी
चाचा
लाय दा तू चाची ..हो

Tuesday, 21 March 2017

भोजपुरी जिंदगी एक सजा

जिंदगी एक सजा, बन गइल बा
तोहरा के देखिल ,बस ई कमी बा
जिंदगी एक सजा, बन गइल बा
तोहरा के देखिल, बस ई कमी बा

जिंदगी एक सजा ,बन गइल बा

ऐके मिटावे खातिर , तनिका तू आवा
संगे मुस्कुरावे खातिर , तनिका तू आवा

जिंदगी एक सजा, बन गइल बा
तोहरा के देखिल ,बस ई कमी बा

जिंदगी एक सजा, बन गइल बा

इहर ..हम हई अधूरा , ओहर..तू हउ अधूरी(२)
मिलन की भईल बा , सब ख्वाहिश अधूरी(२)

लावा ..कदमो मा रच्ची तू जमीं
लावा ..सावन के संगे तू नमी
तोहरे बिना ... हो
तोहरे बिना हम
जी न सकी है
आवा ..सूरज से लइके रोशिनी
आवा ..चंदा से लइके चाँदनी

लावा ..हमके तनी तू जिंदगी(२)
जिंदगी
जिंदगी
जिंदगी...हो

जिंदगी एक सजा, बन गइल बा
तोहरा के देखिल ,बस ई कमी बा
जिंदगी एक सजा, बन गइल बा

जिंदगी एक सजा ,बन गइल बा

कविराज तरुण

Sunday, 19 March 2017

शहरे लखनऊ

ये शहरे लखनऊ है
ज़रा एहतराम करिये
बाहों में इसको भरके
खुशियां तमाम करिये

हिंदी से ये बना है
उर्दू मे ये खिला है
लफ्ज़ो में है सलीखा
यहाँ प्यार सिलसिला है

आके ज़रा यहाँ पर
मदहोश शाम करिये
ये शहरे लखनऊ है
ज़रा एहतराम करिये

बोली है अवधी मीठी
लब पर बसा है 'भईया'
आँखों में इसकी खोजो
भूला हुआ भुलईया

मुख़्तार है हुसन का
'हज़रत महल' नज़ारा
गोमती के तट पर
प्रेमी युगल किनारा

'उमराव' की है महफ़िल
झुककर सलाम करिये
ये शहरे लखनऊ है
ज़रा एहतराम करिये

अंदाजे हो बयां या
अल्फ़ाजे गुफ्तगू हो
अहदे अदब की ख़्वाहिश
चैनो-अमन की आरजू हो

शामें रूहानी 'गंजिंग'
सुबहे रूमानी कर लो
नवाबी शहर मे तुमभी
ज़रा ताज-पोशी कर लो

रंगीन है शहर ये
कुछ इंतजाम करिये
ये शहरे लखनऊ है
ज़रा एहतराम करिये

कविराज तरुण

Wednesday, 15 February 2017

माँ की तस्वीर

मैंने देखा है माँ की आँखों में
    तस्वीर-ए-हयात को ।
वो जगती है हमें सुलाकर
    इस काली रात को ।।

खुद से ही बनाती है , मेरे ख़्वाबों का शहर ।
अपनी कुछ खबर ही नही , रहती वो बेखबर ।।

ढक लेती है अपने आँचल से , वो हर रश्मो-रिवाज़ को ।
मेरे उस कल के लिए , कुर्बान करती वो अपने आज को ।।

जतन से सही करती है पूरी
   मेरी हरेक बात को ।
मैंने देखा है माँ की आँखों में
    तस्वीर-ए-हयात को ।

Friday, 27 January 2017

ग़ज़ल 2122x4 हो गयी हो

बहर 2122 2122 2122 2122 पर प्रथम प्रयास
रदीफ़ - हो गयी हो
काफ़िया- आरी

हम हुए हैं आपके औ तुम हमारी हो गई हो ।
आँधियों के बाद वाली रात प्यारी हो गयी हो ।।

चंद लफ़्ज़ों में बनाया आपको अपना ख़ुदा है ।
फ़ासलों को तोड़ के मेरी दुलारी हो गयी हो ।।

कश्तियों को ही पता है मौज क्या है साहिलों की ।
मंजिलों की चाह में अब तुम खुमारी हो गयी हो ।।

आशियाँ ये प्यार का मेरे दिली व्यापार का है ।
पान से लिपटी हुयी भींगी सुपारी हो गयी हो ।।

चाहतों की रेख से तुमको बनाया शौख से है ।
जीवनी मेरे लिये एक चित्रकारी हो गयी हो ।।

कविराज तरुण सक्षम

Saturday, 7 January 2017

ग़ज़ल सजा लीजियेगा

ग़ज़ल
रदीफ़ - लीजियेगा
काफिया- आ
बहर 122 122 122 122

अगर रूठ जाऊँ मना लीजियेगा ।
सबक प्यार का ये बना लीजियेगा ।।

झलकती अगर हो हया की पियाली ।
निगाहों से' अपने हटा लीजियेगा ।।

मुझे प्यार की बात सरगम की' चाहत ।
मुताबिक जहन के गुनगुना लीजियेगा ।।

सनम तुम दुआ हो दवा भी तो' तुम हो ।
पनाहों मे' भरकर सजा लीजियेगा ।।

गवारा नही पास आकर के' जाना ।
मुझे आज अपना बना लीजियेगा ।।

*कविराज तरुण सक्षम*

Thursday, 5 January 2017

ग़ज़ल लीजिये जी

एक प्रयास

ग़ज़ल : लीजिये जी
बहर : 122 122 122 122
रदीफ़ : लीजिये जी
काफिया : थ

हिमालय से' ऊँचा ये' कद कीजिये जी ।
बदलने समय की शपथ लीजिये जी ।।

अगर हो सुराही भी' पानी की' प्यासी ।
डुबोकर के' पनघट मे' मथ लीजिये जी ।।

नही है मुनासिब यूं' घुट घुट के मरना ।
गिराकर दिवारों से' पथ लीजिये जी ।।

गिरें जो इरादों से' अपने हवाले ।
मुमकिन अगर हो तो' रथ लीजिये जी ।।

कविराज तरुण सक्षम

Wednesday, 4 January 2017

ग़ज़ल दुबारा

*ग़ज़ल -- मुहब्बत दुबारा*

बहर -122 122 122 122
रदीफ़ - दुबारा
काफिया - त

मिलेगी नही ये मुहब्बत दुबारा ।
करेंगे नही फिर इबादत दुबारा ।।

ये' माना सफर में कई हमसफ़र हैं ।
चलेंगे नही पर नसीहत दुबारा ।।

है' मिलता कहाँ अब शरीफो को' मौका ।
करेंगे नही हम शराफ़त दुबारा ।।

अगर दिल की' बाते ये' तुम जान जाती ।
न करती ज़रा भी बगावत दुबारा ।।

न समझा सकूँगा मै' कुछ भी यहाँ पर ।
जुबां से समझ लो ये' चाहत दुबारा ।।

मिलेगी नही ये मुहब्बत दुबारा ।
करेंगे नही फिर इबादत दुबारा ।।

कविराज तरुण सक्षम

Tuesday, 3 January 2017

ग़ज़ल अजी आप भी

ग़ज़ल (बहर 122 122 122 122)

अजी आप भी आके इस दिल मे रहिये ।
जुबां के बिना ही निगाहों से कहिये ।।
नहीं और कुछ भी है मुझको सहारा ।
मेरी धड़कनों को ज़रा आप सुनिये ।।

अजी आप भी आके इस दिल मे रहिये ।

मुलाक़ात की कोई सूरत नही है ।
ये माना हमारी जरूरत नही है ।।
घनी भीड़ लगती सदा ही तुम्हारे ।
मगर पास आके दो पल ठहरिये ।।

अजी आप भी आके इस दिल मे रहिये ।

कविराज तरुण सक्षम

Monday, 2 January 2017

धुंध

धुंध

इस धुंध को थोड़ा हट जाने दो
राह नज़र भी आयेगी
पाती पाती पग पोछेगी
पाथर की पीर मिटायेगी

हो विस्मित क्यों अँधियारे से
सूरज की रश्मी आने दो
निष्काम निवृत्ति निराशित नर
आशाओं का दीप जलाने दो

है छलनी मन बिनरस जीवन
तिमिर रेख में धुँधला आँगन
संकल्प साध सुरमय सावन
कर निर्भय हो तनमन पावन

फिर ओस जमेगी पल्लव पर
तरु डाली थोड़ा झुक जायेगी
इस धुंध को थोड़ा हट जाने दो
राह नज़र भी आयेगी

कविराज तरुण सक्षम
9451348935

Sunday, 1 January 2017

सुनहरे पल

शीर्षक - सुनहरे पल

मधुर मन की मधुर हलचल
सुनहरे पल
कभी बारिश कभी बादल
सुनहरे पल
थकते नही जब पाँव चल चल कर
सुनहरे पल
हो प्यार के अविरल भाव निश्छल
सुनहरे पल

तबियत बोलती है
खोलती है नयनो के विराम
होंठो की सहज प्याली
घोलती है कुसुमरस के विधान
गालों पर खिली लाली
आतुर मन के देती है प्रमाण
हर एक कृत्य मे खुशहाली
भरे पावन छलकते हैं निशान

नजर आता अनोखा क्षितिज व तल
सुनहरे पल
सीमित दायरे को मिलता असीमित बल
सुनहरे पल
मानव के जीवन का है संबल
सुनहरे पल
मधुर मन की मधुर हलचल
सुनहरे पल

कविराज तरुण सक्षम
9451348935

Tuesday, 20 December 2016

अफीमो का नशा


गाना - अफ़ीमो का नशा

देखे तुझे पल पल दर्पण
हलचल ,सी करे दिल रह रह कर
जाने हुआ क्या मुझे बावरी
बाँस बिन ही बजे बाँसुरी
मै तो झूमने लगा
फर्श चूमने लगा
प्यार तेरा क्यों लगे
अफीमो का नशा
नशा नशा
अफ़ीमो का नशा

***slow rap***
*****************
Love के कॉकपिट पे बैठा
दिल की feeling high
ये भी एक नशा है baby
No beer no wine
Just Perfect and fine
I am yours you are mine
Mine mine mine mine
I am yours you are mine

*****fast rap*****
********************
ज़रा शर्म को रखो side में
और बैठो मेरी bike पे
कमर पकड़ के love you love you
मेरे कानों में सुनाई दे
उड़ता है दुपट्टा तेरा
छोड़ो उसको उड़ने दो
हंसो का जोड़ा बनो तुम
मुझको मोती चुगने दो
है Turn ...वो देखो
गाड़ी full speed में
चीपक के बैठो डरो न
इस भीड़ से
कभी left तो right
झम से ये निकल जाती है
Baby long drive तेरे संग
ये करने को ललचाती है
Go zoom
Go vroom
Zoom zoom zoom zoom

(Rap end and pause)

मै तो झूमने लगा
फर्श चूमने लगा
प्यार तेरा क्यों लगे
अफीमो का नशा
नशा नशा
अफ़ीमो का नशा

बावरी
बाँस बिना ही बजे बाँसुरी
बावरी ,,,,बावरी

कविराज तरुण
9451348935

Monday, 21 November 2016

अच्छे दिन आयेंगे

सब्र करो
और थोड़ा करो
इंतज़ार
फल मीठा मिलेगा
कड़वे दर्द
मिट जायेंगे
अच्छे दिन फिर आयेंगे

जैसे अमावस के बाद
होता है सुप्रभात
जैसे बादलो के बाद
होती है बरसात

जैसे पतझड़ के बाद
आता है सावन
जैसे सोमवार के उपवास से
मिलता है साजन

ठीक वैसे ही
बुरे दिन
कट कट के
कट जायेंगे
अच्छे दिन फिर आयेंगे ।

*कविराज तरुण*

Thursday, 17 November 2016

अपना cash

बंद iPhone बंद है nexus
कभी short कभी excess
अपना cash
कैसे करेंगे हम ऐश ।

न oaac न ही laps
बस tm और noteex
Tally होता नहीं क्यों cash
कैसे करेंगे हम ऐश ।

कभी दस कभी ग्यारह
लटका day end बेचारा
नोटों का bundle है missmatch
कैसे करेंगे हम ऐश ।

*कविराज तरुण*

Wednesday, 16 November 2016

सोनम गुप्ता

Atm की लाइन में क्या लगाया
सोनम गुप्ता बेवफा हो गई ।
आधी रात को हज़ार का नोट देकर
मेरी 100 की गड्डी ले गई ।
सोनम गुप्ता बेवफा हो गई ।।

भूल गई वो सारी कसमे
भूली वो पिज़्ज़ा बर्गर
मुझको भी भूली अब तो
दिल से हुआ मै बेघर

मालूम नहीं काला धन
पर काला दिल नजर तो आया
जिन नोटों की दीवानी थी वो
वो सब तो बस थी माया

पॉकेट का जबसे हाल बताया
सोनम गुप्ता बेवफा हो गई ।
आधी रात को हज़ार का नोट देकर
मेरी 100 की गड्डी ले गई ।
सोनम गुप्ता बेवफा हो गई ।।

कविराज तरुण
https://m.facebook.com/KavirajTarun/

उर में विराजो महाराज

उर में विराजो महाराज
तुमसे शुरू है हर काज
उर में विराजो महाराज

सूना लगे है दिन आज
सुने से ही पड़े सब साज
उर में विराजो महाराज

जीवन क्या है न जाना मैंने
खुद को भी न पहचाना मैंने
चलता रहा जाने किस धुन पे
तेरी बातो को न माना मैंने

तुमसे छुपा कब ये राज
मेरे छिन ही चुके हैं सब ताज
उर में विराजो महाराज

*सुप्रभात*
*कविराज तरुण*

Tuesday, 15 November 2016

तांडव

आज के सामयिक हालातो पर लिखी एक रचना

जब शिव जी करते हैं तांडव
तब चीख सुनाई देती है ।
असुरों की सत्ता हिल जाती
रंगत झल्लाई रहती है ।।

कलयुग के काले कौवों का
काले धन का अंबार लगा ।
नष्ट हुआ सब भ्रान्तिमान
जब हंसो का दरबार लगा ।।

जब हो जाती अति अमावस की
सूरज तब और चमकते हैं ।
जो इतराते थे नोटों की गड्डी पर
अब ठिठक ठिठक कर चलते हैं ।।

अब फिर से मोती चुन चुनकर
हंसो के हिस्से आयेगा ।
भारत से कलयुग दूर हटेगा
सतयुग अब फिरसे छायेगा ।।

कविराज तरुण

Friday, 4 November 2016

शुक्रिया जवान

*शुक्रिया जवान*

इन करों के बंद मुख से शुक्रिया तुझको अदा है ।
माँ भारती तू धन्य है जो वीर ऐसा तुमने जना है ।

बर्फ की चादर मे लिपटा सो गया तूफ़ान मे ।
आँख निगरानी में थी कुछ बात थी उस जान मे ।

कर्मबेदी पर चढ़ा के जान की वो बोलियाँ ।
दिवाली तीज होली पर भी खाई गोलियाँ ।

फिर भी टस से मस हुआ न वीर फौलादी जवां ।
कर-नमन आँख-नम उस माँ को जिसने पुत्र जना।

राजनेता बात करते शहीदों का कितना मोल है ।
जो कोख सूनी हो गई उसका भी क्या कोई तोल है ।

दूर रखो है निवेदन शहादत को सियासत की दौड़ से ।
और ये सुन लो बात मीडियाकर्मियों भी गौर से ।

सैनिक जीवन ज़रा भी प्रश्नों का है विषय नहीं ।
बस नमन और नमन और नमन ही विकल्प सही ।

*कविराज तरुण*

Tuesday, 25 October 2016

प्यार की मौन व्याख्या

प्यार की मौन व्याख्या 

ये कैसा शीर्षक हुआ ? अभी बस लिखने ही बैठा था कि मेरे एक परम मित्र ने एकाएक मुझसे पूछ लिया |
फिर मेरे मन में भी यही प्रश्न घूमने लगा कि किसी विषय की व्याख्या मौन रहकर भी क्या संभव है ?

पर बात जब प्रेम की हो तो यह बताना आवश्यक है कि प्यार एक अहसास है... एक अनुभूति जिसके लिए शब्दों के तंतु पर भावनाओ कि सारंगी बजाने कि तनिक भी आवश्यकता नहीं अपितु ये तो वह ओस की बूँद है जिसमे ह्रदय के ओर - छोर स्वतः ही भीग जाते हैं |

मौन स्पर्श ,  मौन स्वीकृति और मौन समर्पण ही सच्चे प्रेम की पृष्ठिभूमि हैं ।अपनी पद्यावली से कुछ पंक्ति यहाँ पर समर्पित करना अपना कर्त्तव्य समझता हूँ :

" जो भाव असीमित दृश्यपटल पर , व्याकुल हैं बाहर आने को...
  दस्तक देते हैं अधरों पर अक्सर , कितना कुछ है बताने को...
  पर अधरों की दशा तो देखो , किस भांति परस्पर सिले जा रहे हैं ।
  मानो शब्द मूर्छित हुए हैं ... और चेतन अचेतन की दशा पा रहे हैं || "

वास्विकता भी यही है ...शब्दों को निमंत्रण देने से पहले प्रेम आँखों के माध्यम से अपनी बात कह चुका होता है । और यकीन मानिये प्रेम अगर सच्चा है तो कुछ कहने की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी । इस अनुभूति का असल स्वाद मौन रहकर ही प्राप्त किया जा सकता है । शायद गीतकारो ने यही भांपकर ये गीत लिखे -
' ना बोले तुम ना मैने कुछ कहा ...'

' कुछ ना कहो कुछ भी ना कहो....' आदि ।

वैसे भी "मौनं स्वीकृतिम लक्षणं " ...

तो दोस्तों मौन रहकर प्रेम की तलहटी में छुपे आनंद की प्राप्ति कीजिये... बहुत अच्छा लगेगा ।

धन्यवाद ।

आपका ...
कविराज तरुण

दम्भ

न्यायोचित है दम्भ अगर तो
मै कौशल दिखलाता हूँ ।
तोड़ भुजाओं का साहस
तुमको परलोक सिधाता हूँ ।।

पर विवेक मेरा कहता है
क्यों असुरों से संग्राम करूँ ।
कर दूं अलग थलग दुनियाँ से
बस इतना ही काम करूँ ।।

तुम आग जलाये बैठे दिल में
मुझे सौहार्द का दीप जलाने दो ।
मत छेड़ो कालदर्प को मेरे
मुझे विकास का रथ चलाने दो ।।

इस अश्वमेध के यज्ञ में मेरे
व्यवधान कोई मत कर देना ।
गलती से भी मित्र पड़ोसी
मेरे विवेक को मत हर लेना ।।

वर्ना रण का बिगुल बजा
बलिवेदी पर शीश उतारूंगा ।
घर के भीतर घुसकर तेरे
चुन चुनकर दानव मारूँगा ।।

*कविराज तरुण*

Thursday, 29 September 2016

कबर खोद ली तुमने खुद

*कबर खोद ली तुमने खुद*

कबर खोद ली तुमने खुद
जाने और अनजाने में
कौन बचायेगा तुमको अब
जाओ यूएन के थाने में
दुत्कार दिए जाओगे और
ये भूल नहीं पाओगे तुम
गाली और गोली मिलेगी दोनो
सुबह शाम अब खाने में
*कबर खोद ली तुमने खुद*
*जाने और अनजाने में*

तेरे एके 47 का जवाब
अब छप्पन इंची सीना है
मूक नहीं अब नेता अपना
वो शमशीर नगीना है
मारेंगे तुमको घर में घुसकर
बचोगे नहीं किसी ठिकाने में
छोड़ी नहीं कसर ही तुमने
हम जाबांजो को उसकाने में
*कबर खोद ली तुमने खुद*
*जाने और अनजाने में*

✍🏻कविराज तरुण
तरुण कुमार सिंह
यूको बैंक , सोमलवाड़ा
9451348935

Friday, 23 September 2016

आतंक का कुनबा

*आतंक का कुनबा*

है लाज अगर इस्लाम की
गर पढ़ा  है तुमने कुरान को ।
आतंक का कुनबा कह दो तुम
इस समूचे पाकिस्तान को ।

डरते यहाँ आका सेना से
कहीं तख्तापलट न हो जाये ।
पनाह न दे जो आतंकी को
सर धड़ से अलग न हो जाये ।

इंसानियत के खून की ट्रेनिंग
भले क्यों देता है ये इंसान को ।
आतंक का कुनबा कह दो तुम
इस समूचे पाकिस्तान को ।

कलम छोड़ कर हाथों से ये
बम बनाना सीख गये ।
घर की जिम्मेदारी को भूल फरेबी
हथियार उठाना सीख गये ।

लानत है दोजख की तुमको
बच्चों मे न देखा भगवान को ।
आतंक का कुनबा कह दो तुम
इस समूचे पाकिस्तान को ।

तुम इतराते हो जिसके दम पर
उनका भी हाल वही होगा ।
जिद पर आ जायेंगे तो
फिर कोई सवाल नही होगा ।

कम पड़ जायेगी मिट्टी भी
तरसेगा तू खाली शमशान को ।
आतंक का कुनबा कह दो तुम
इस समूचे पाकिस्तान को ।

बलूच - सिंध को दूर किया है
नित अपने दूषित संवादों से ।
अजमल सईद ओसामा को
पाला है नापाक इरादों से ।

हैवानियत की रूह तेरी ये
समझेगी भला क्या इंसान को ।
आतंक का कुनबा कह दो तुम
इस समूचे पाकिस्तान को ।

तुम आतंकी को नेता कहते हो
हाँ ये सच है हमें गुरेज नही ।
और तुम जैसा नेता आतंकी है
ये कहने में हमें परहेज नही ।

*शरीफ* शराफत का इल्म हो तो
नष्ट करो इन आतंकी फरमान को ।
या आतंक का कुनबा कह दो तुम
इस समूचे पाकिस्तान को ।

✍🏻कविराज तरुण

Friday, 29 July 2016

अभिनन्दन देश का

🙏🏻🙏🏻🙏🏻सुप्रभात🙏🏻🙏🏻🙏🏻

चाहे रोली चन्दन कर डालो
चाहे क्रीडा क्रंदन कर डालो
अतुलित भूमि पुराणों की है ये
तुम इसका अभिनंदन कर डालो
🌹🌸🌹🌸🌹🌸🌹🌸🌹
मत भूलो लोगों ने प्राण तजे
तब आजादी हमने पाई है
हर एक मत को साथ लिया साथी
तब भारत की रीति बनायी है
🌹🌸🌹🌸🌹🌸🌹🌸🌹
यूँ बाँटो न इसे जात धरम में
चाहे कितनी अनबन कर डालो
अतुलित भूमि पुराणों की है ये
तुम इसका अभिनंदन कर डालो

🙏🏻🙏🏻🙏🏻सुप्रभात🙏🏻🙏🏻🙏🏻
🙏🏻🙏🏻कविराज तरुण🙏🏻🙏🏻

छत्रपति शिवाजी

रचना - छत्रपति शिवाजी महाराज
🛡⚔🛡⚔🛡⚔🛡⚔🛡

लिख डाले कई गीत ग़ज़ल पर ,
इतना सम्मान नहीं आया ।
वीर शिवाजी छत्रपति सा अबतक,
कोई इंसान नहीं आया ।।

मुगलों को विस्मित करते थे वो
रणकौशल चालाकी से ।
छापामार के निर्माता थे वो
लड़ते थे बेबाकी से ।।

धर्म का संबल साथ में लेकर
हिंदुत्व का सच्चा प्रमाण दिया ।
मुगलों को कई बार हराया
मराठ वंश का निर्माण किया ।।

कल्याण से लेकर पोंडा तक
दुर्ग चालीस का विस्तार हुआ ।
हिन्दू स्वराज की नींव पड़ी
छत्रपति का अधिकार हुआ ।।

युद्ध के ज्ञानी कुशल प्रशासक सा
दूजा यजमान नही आया ।
वीर शिवाजी छत्रपति सा अबतक
कोई इंसान नही आया ।।

🛡⚔🛡⚔🛡⚔🛡⚔🛡

✍🏻कविराज तरुण
9451348935
https://m.facebook.com/KavirajTarun/

Wednesday, 27 July 2016

मेरा प्यार

मेरा प्यार
🌹❤🌹❤🌹❤🌹❤🌹
रेशमी धागे से महीन था
मेरा प्यार
मेरे लिए आसमाँ-जमीन था
मेरा प्यार
उसकी चेहरे की यासमीन था
मेरा प्यार
दुनिया में सबसे बेहतरीन था
मेरा प्यार

पर नज़र लग गई ... आया तूफ़ान
टूटा दिल में छुपा ... सारा अरमान
बेरहम सा दिखा ... मेरा भगवान
आग उगलने लगा ... काला आसमान

रेशम का धागा जला
रुक गया सिलसिला
छोड़ के वो चले
सितम जमकर मिला

फिरभी वो मेरे लिए एक यकीन था
मेरा प्यार
मेरी कविताओं में शब्दों में विलीन था
मेरा प्यार
सावन की बूँदों से भी हसीन था
मेरा प्यार
दुनिया में सबसे बेहतरीन था
मेरा प्यार
🌹❤🌹❤🌹❤🌹❤🌹

✍🏻कविराज तरुण

Tuesday, 26 July 2016

महाराणा प्रताप

रचना 01
महाराणा प्रताप
⚔🛡⚔🛡⚔🛡⚔🛡⚔

एक ही ऐसा वीर है जिसने
घास की रोटी खाई है ।
एक ही ऐसा वीर है जिसने
मुगलों को धूल चटाई है ।

मेवाड़ की धरती ने मिट्टी में
कितने शेरों को है पाला ।
जिनका आभूषण बनता है
खड्ग चमकता और भाला ।

महावीर महाराणा प्रताप
रुधिर नही ..था अग्निचाप ।
थर थर काँप उठे दुश्मन
जब पड़ता था दृष्टिपात ।

इनकी गाथा का वर्णन करती
धन्य हर एक चौपाई है ।
एक ही ऐसा वीर है जिसने
घास की रोटी खाई है ।

🙏🏻जय महाराणा🙏🏻

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✍🏻कविराज तरुण

लिखना छोड़ दूँ

लिखना छोड़ दूँ

कहो जो तुम तो मै लिखना छोड़ दूँ
या यूँ सरेआम बिकना छोड़ दूँ
पहले जब कुछ चुभता था तो कलम उठती थी
अब जब कलम उठती है तो कुछ चुभता है
तेरे ख्वाबो में बेवजह यूँ मै दिखना छोड़ दूँ
कहो जो तुम तो मै लिखना छोड़ दूँ
असर होता नही जब भी सुनाता गीत मै प्यारा
न कश्ती ही मिली न मिल पाया ही किनारा
तुम क्या समझ पाओगे मेरी चाहत का ईशारा
कल भी आवारा था आज भी हूँ मै आवारा
तेरी गलियों से कहो तो गुजरना छोड़ दूँ
कहो जो तुम तो मै लिखना छोड़ दूँ

✍🏻कविराज तरुण
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हिंदी

रचना 01

भाल मस्तक पर सजे ज्यों बिंदी
माँ भारती के लिए स्थान है वह हिंदी

रोली चन्दन का जांच ज्यों टीका
बस वही अभिप्राय है हिंदी का

अब ये अस्मत ये ही इज्जत मान दो
संभव जितना हो सके हिंदी का ज्ञान दो

भाषा है ये वेद की पुराण की
भाषा है ये नवभारत निर्माण की

हिंदी जननी है समस्त संस्कार की
द्योतक है यह सभ्यता व्यवहार की

उर में बसा के सन्मुख विस्तार दो
अपने हर कार्य में हिंदी उदगार दो

✍🏻 कविराज तरुण

Friday, 22 July 2016

सुप्रभात 230716

🙏🏻😊🌹सुप्रभात🌹😊🙏🏻

भोर भई खग कुल विस्मित है
सोया अबतक क्यों है इंसान
क्यों न जाने मर्म प्रकृति का
क्यों बनता है धर्म से अन्जान

सब ग्रन्थ कहें उठो सुबह ही
हो मात-पिता-गुरु-धरा प्रणाम
सब है अल्लाह-ईश्वर के बंदे
हर जीव जंतु का करो सम्मान
मीठी वाणी मुख पर रखकर
पूरे दिल से करो सब काम
दुःख में आस लगाओ प्रभु की
पर सुख में भी मन में लो हरिनाम

हर्षित मन में दया के भाव लिए
हर कार्य का रखो हिय से ध्यान
भोर भई खग कुल विस्मित है
सोया अबतक क्यों है इंसान

🙏🏻😊🌹सुप्रभात🌹😊🙏🏻

कविराज तरुण
9451348935
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Saturday, 16 July 2016

दायित्व

रचना 01
दायित्व
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

दायित्व का निर्वाह जरुरी है
जरुरी है कर्म का बोध ।
मन कुण्ठित हो जाता है अक्सर
जब आता अहम् व लोभ ।
चाहे जीवन ब्रह्मचर्य हो गृहस्थ हो
या हो सन्यास ।
चाहे राह कठिन हो सख्त हो
या हो बिंदास ।
अनुशासन के बिन संभव कुछ नहीं
बस इतना कर पाया शोध ।
दायित्व का निर्वाह जरुरी है
जरुरी है कर्म का बोध ।

🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

✍🏻क. तरुण

Thursday, 14 July 2016

आतंकवाद

त्वरित रचना 01
विषय आतंकवाद
💣🇮🇳💣🇮🇳💣🇮🇳💣🇮🇳💣
आतंकी के मौन समर्थक अब आवाज उठाकर आये ।
देशप्रेम तज इस माटी की फिरसे लाज गिराकर आये ।

जो मरा बता वो किसी सूरत में मानव जैसा था ।
आतंकी था हत्यारा केवल वो दानव जैसा था ।

उसके मरने पर भी तुम आँखों में गाज बहाकर आये ।
आतंकी के मौन समर्थक अब आवाज उठाकर आये ।

गम तुम्हे नही उन शहीदों का जो नित  कुर्बानी देते हैं ।
हम खिले फूल जैसे इसलिए जो खून का पानी देते हैं ।

ऐसे ही गद्दारों के कारण हम सिर से ताज लुटाकर आये ।
आतंकी के मौन समर्थक अब आवाज उठाकर आये ।

तुमने जंग करी है चारो बारी हुए चौखाने चित्त ।
भूल हुई तो कोशिश की और तुमको माना मित्र ।

घर में आग लगाने का बेशक तुम राज दबाकर आये ।
आतंकी के मौन समर्थक अब आवाज उठाकर आये ।

पर नर्क पहुंचना है तुम सबको यूँ हथियार उठाने वालो ।
माँ भारत के बेटो से अब करो पुकार बचाने वालो ।

ऐसे आतंकी तेवर को धूल जाबाज़ चटाकर आये ।
आतंकी के मौन समर्थक अब आवाज उठाकर आये ।
💣🇮🇳💣🇮🇳💣🇮🇳💣🇮🇳💣

✍🏻कविराज तरुण
9451348935
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Monday, 11 July 2016

दोहा - रिश्ता

दोहा -

रिश्ते सरल बनाइये , हिय में तनिक न लोभ ।
मन का दर्पण साफ़ तो , मिट जायेंगे दोष ।
🙏🏻🌹🙏🏻🌹🙏🏻🌹🙏🏻🌹🙏🏻
बिना प्रेम के भाव से , संभव तरुण विक्षोभ ।
एक दूजे को समझिये , होगा मन का बोध ।
🙏🏻🌹🙏🏻🌹🙏🏻🌹🙏🏻🌹🙏🏻
रिश्तों की उपमा नही , रिश्तों का नहि मोल ।
माला सहज बनाइये , इक इक दाना तोल ।।

🙏🏻🌹क. तरुण🌹🙏🏻