Thursday, 15 June 2017

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

तवे पे आधी जली रोटियां
कुछ मुझ जैसा लिबास रखती हैं
बेटी के नाम पर जब छिन जाती है कोख
वो माँ उम्रभर इसका हिसाब रखती है

पति की इज्ज़त भी तब
टूटकर तार तार हो जाती है
जब अपनी रूह के टुकड़े से
एक माँ कभी मिल नही पाती है

शायद वो बोलती नही ये सोचकर
मेरी क़िस्मत को यही मंजूर था
या चुप हो जाती है ये मानकर
समाज का शायद यही दस्तूर था

पर ताज्जुब तो तब होता है
जब एक माँ ने दूसरी माँ की बेटी मारी
डुबाया खुद ही वजूद खुद का
मालूम तो होगा उसे वो भी है एक नारी

जाने जहन में कैसे
ऐसा पाप निकल के आता है
बच्चे को दो नज़र से देखने वाला
आखिर बाप ही क्यों बन पाता है

जरूरी है ऐसी सोच को
पैदा होने से पहले ही दफनायें
बेटी कई गुना बेहतर हैं बेटों से
आओ बेटी बचायें बेटी पढ़ायें

कविराज तरुण सक्षम
साहित्य संगम संस्थान

ग़ज़ल 11- आतंक

*ग़ज़ल - आतंक*

बहर - 122 122 122 12

शहर लाल सारा का' सारा हुआ ।
चमन से अमन बे-सहारा हुआ ।।

करे खून इंसानियत बे-वज़ह ।
मुजाहिद मुहब्बत से' हारा हुआ ।।

खुदा नेक रस्ता तू' इनको बता ।
जिहादी अकल से ये' मारा हुआ ।।

जहन पाक हो तो मिलेगा ख़ुदा ।
नही नाम से ही गुजारा हुआ ।।

न रोके रुके हैं 'तरुण' मुश्किलें ।
लहू उस फ़रेबी का खारा हुआ ।।

*कविराज तरुण सक्षम*
*साहित्य संगम संस्थान*

Wednesday, 14 June 2017

ग़ज़ल 10- किसान

ग़ज़ल - किसान

बहर - 122 122 122 12

सियासत मुबारक कफ़न कर रहा ।
किसानों को' यूँही दफ़न कर रहा ।।

मुखौटा लगा जो मुखालत करे ।
घरों को जला वो हवन कर रहा ।।

दुपहरी मे' निकला फसल नापने ।
उपज का मुनासिब जतन कर रहा ।।

मिले मूल्य थोड़ा खटे रात दिन ।
दलाली मे' हक़ वो गबन कर रहा ।।

उसे क्यों लपेटो हवस वोट मे ।
घुट घुट कर आधा बदन कर रहा ।।

खुदा से रहम की गुजारिश करूँ ।
सफेदी पहन वो हनन कर रहा ।।

तरुण हाथ जोड़े खड़ा सामने ।
बड़े भाव से अब नमन कर रहा ।।

कविराज तरुण सक्षम
साहित्य संगम संस्थान

ग़ज़ल 4-कर रहा

ग़ज़ल

122 122 122 12

सियासत मुबारक कफ़न कर रहा
किसानों को' यूँही दफ़न कर रहा

मुखौटा लगा जो मुखालत करे
घरों को जला वो हवन कर रहा

दुपहरी मे' निकला फसल नापने
उपज का मुनासिब जतन कर रहा

उसे क्यों लपेटो हवस वोट मे
घुट घुट कर आधा जो' तन कर रहा

तरुण कुछ रहम की गुजारिश करूँ
सफेदी पहन वो हनन कर रहा

*कविराज तरुण सक्षम*
*साहित्य संगम संस्थान*

Monday, 12 June 2017

हाँ! मै किसान हूँ

*हाँ! मै किसान हूँ*

हाँ! मै किसान हूँ
मेहनत करता हूँ और खुश रहता हूँ
पर आजकल थोड़ा परेशान हूँ
हाँ! मै किसान हूँ

बिना धूप की चिंता किये
सुबह निकल पड़ता हूँ काम पर
लेकर इन हाथों में हासिये
आता हूँ हर-एक घास काट कर

मौसम की मार भी झेल लेता हूँ
खेतों मे ही बच्चो संग खेल लेता हूँ
खरमेटाव मे चना गुड़ लाई खाकर
सत्तू संग पानी को मेल लेता हूँ

चाह नही है पिज्जा बर्गर की
चैन से जो मिले वही खाता हूँ
अनवरत श्रमसाध्य करता हूँ
रेडियो सुनकर रात मे सो जाता हूँ

कभी सेठ की चालाकी से पीड़ित
कभी भगवान के प्रोकोपो से ग्रसित
कभी राजनीति की लाचारी पे आश्रित
वोटबैंक बनने पर भी बाध्य हूँ कथित

मत कहो हत्यारा, चोर या बेईमान हूँ
खून पसीने की एकत्रित पहचान हूँ
सीधा सादा श्रमिक बेहतर इंसान हूँ
हाँ! मै किसान हूँ

*कविराज तरुण 'सक्षम'*
*साहित्य संगम संस्थान*

ग़ज़ल 3- मुस्कुराया करो

ग़ज़ल - मुस्कुराया करो
बहर - 122 122 122 12

हमें पास आकर बताया करो
नही इसतरह से छुपाया करो

फरेबी नही हैं फिदरत हमारी
ज़रा हाल-ए-दिल दिखाया करो

न समझे ज़माना दिलों की फ़िज़ा
युं आँसू न खुलके बहाया करो

नज़र ही नज़र मे मुनासिब मुहब्बत
नज़र बेधड़क तुम मिलाया करो

तरुण नाम है रहगुजर हूँ तिरा
चलो साथ मे मुस्कुराया करो

*कविराज तरुण सक्षम*
साहित्य संगम संस्थान

Saturday, 10 June 2017

विश्वास

*शीर्षक - विश्वास*

वो लड़ सकती है अपनी लड़ाई खुद
उसे नही कुछ ख़ास चाहिए
ज़माने का बस थोड़ा सा विश्वास चाहिए ।

जो मौलाना लगाते हैं फतवे सरेआम
उनकी सीरत का थोड़ा कयास चाहिए
ज़माने का बस थोड़ा विश्वास चाहिए ।

चाहे *'सना'* हो *'सानिया'* या *'हसीं जहां'*
उनके कपड़ों पर नही कोई बकवास चाहिए
ज़माने का बस थोड़ा सा विश्वास चाहिए ।

मज़हब की बातें करते हो
अगर तीन तलाक़ मर्दों का हक़ है
तो यकीनन तुम्हारी अस्ल पर
नस्ल पर और सोच पर मुझे शक है
तुम होते कौन हो आख़िर
हमें जीना सिखाने वाले
वो ख़ुदा दिल में है मेरे
और मेरी ख़ुदाई है उसके हवाले
हमारे दरम्यां आने वाले
ओ मज़हब के हवलदार
नही चाहिए तुम्हारी रायशुमारी
नही चाहिए तुम्हारी जिम्मेदारी

इक्कीसवीं सदी की उम्मीद हैं हम
हमे हर-ओर प्यार और विकास चाहिए
ज़माने का बस थोड़ा विश्वास चाहिए ।

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Tuesday, 6 June 2017

ग़ज़ल 2- गुजरना क्या

ग़ज़ल

गली से जो न हम गुजरें , निखरना क्या सवरना क्या ।
उनींदी हो अगर आँखें , ये' सूरज का निकलना क्या ।।

बड़े बेताब हो फिर से , मुहब्बत आजमाने को ।
डरो असफार से जो तुम , तो' चलना क्या टहलना क्या ।।

सलीखा भी जरूरी है , नही केवल अदब दिल मे ।
रिवाज़ो के चलन कुछ हैं , बिना वजहें मुकरना क्या ।।

चलो ये मान लेते हैं , जहन है पाक तेरा भी ।
मगर रुसवाई देते हो , हमे जब तो समझना क्या ।।

मुनासिर हूँ सदा तेरा , हमें जब भी बुला लेना ।
'तरुण' आवाज़ दे देना , बिना बोले गुजरना क्या ।।

*कविराज तरुण सक्षम*

Monday, 5 June 2017

ग़ज़ल 1-जिंदगानी में

*जिंदगानी मे*
(ग़ज़ल - मुफाईलुन x4)

सनम जो रेख खींची थी ज़माने ने जवानी मे
उसे तुम पार कर लो तो मजा आये कहानी मे

कभी चाहत का' दामन थाम कर घर से कदम रखना
अगर दिल आशिकाना हो लगे है आग पानी मे

ज़रा इस बेदिली को बेदखल कर दो नज़ाक़त से
नज़र आये हमें भी कुछ छुपा जो आबदानी मे

कलम चोटिल बड़ी मुश्किल हया की चादरें भी हैं
उमर बीती चली है आज फिरसे पासबानी मे

*तरुण* असरार है इतना अलम से खुशनसीबी में
अकीदत सी हलावत हो कि जैसे जिंदगानी मे

*कविराज तरुण सक्षम*

अकीदत - भरोसा
हलावत - मिठास
अलम - दुःख
असरार - भेद
पासबानी - देखरेख करना
आबदानी - पानी का पात्र (आँखें)

Sunday, 4 June 2017

मेरी माँ

*मेरी माँ*

बूढ़ी हो चली है मेरी माँ
फिरभी उसे काम का भूत सवार रहता है
सोचती है ज्यादा बोलती है कम
पर आँखों का गहरा रंग बहुत कुछ कहता है

वो पीढ़ी अलग थी
जब डोली में सजकर वो आई थी
गाँव वालों ने भी उसदिन
पहली ग्रेजुएट बहू पाई थी

उसके आँखों में अनेक सपने थे
जिन्हें ये रीति रिवाज दबा ले गये
सेकती रही इन चूल्हों में रोटियाँ
जल जल के ख़्वाब हवा हो गये

याद है मुझे
माँ ने मेरे होने के बाद बी.एड. किया था
कई लोगो के व्यंग बाण सहकर
पापा के पास शहर जाने का फैसला लिया था

कभी हिंदी के मुहावरे
कभी संस्कृत के श्लोक सुनाती थी
सरकारी शिक्षिका वो बन न सकी
पर हमें हर रोज पढ़ाती थी

भोली है वो नादान है
बच्चे दूर हैं इसलिए परेशान है
पर अब भी अपना दुखड़ा हमसे छुपाती है
मुझे अपने बाबा की कही एक बात याद आती है
*कि तुम्हारी माँ कोई साधारण नही .. देवी है*
*नित इनकी सेवा करना ये गाय से भी सीधी है*

चला जाऊँ उसके पास
यही सोच अक्सर पानी इन आँखों से बहता है
बूढ़ी हो चली है मेरी माँ
फिरभी उसे काम का भूत सवार रहता है
सोचती है ज्यादा बोलती है कम
पर आँखों का गहरा रंग बहुत कुछ कहता है

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Wednesday, 31 May 2017

माँ शारदे वंदन

🕉🙏🏼🕉🙏🏼🕉🙏🏼🕉🙏🏼🕉🙏🏼🕉

शुद्ध पवित्र विचार दीजे
मन में अमृत तार दीजे

वाणी मधुरम चित्त सरगम
भाव में विस्तार दीजे

लेखनी हो सत् समर्पित
सद-आचरण व्यवहार दीजे

हो हृदय नव तरु-मंजरि सा
दल-कमल मुख पर खिले

ये नेत्र देखे बस वहीं
जहाँ सभ्यता आकर मिलें

देह माटी का कलश है
माँ रस सुधा संचार कीजे

वाणी मधुरम चित्त सरगम
भाव में विस्तार दीजे

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Tuesday, 30 May 2017

माँ शारदे वंदना

*माँ शारदे वंदना*

जय जय जय माँ वीणा वाली
अति मोहक छवि और निराली
हंसवाहिनी बुद्धि प्रदात्री
ज्ञानकोष के तिमिर मिटाती

वर दे भर दे नवगुण की थाली
जय जय जय माँ वीणा वाली

है विकार जो मन के द्वारे
माँ तू उनको सहज सुधारे
देवी सुरसा वसुधा भामा
पुंज अलौकिक तेरे नामा

कर दे तर दे ये जीवन खाली
जय जय जय माँ वीणा वाली

सुवासिनी तू विद्यारूपा
महाभुजा हे दिव्य अनूपा
चरण पखारूं शीश झुकाऊँ
तेरे वंदन में सुधि पाऊँ

मिट जायेगी किस्मत काली
जय जय जय माँ वीणा वाली

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Tuesday, 23 May 2017

प्रेमवृष्टि

*प्रेमवृष्टि*

सावन की ओस से बूँद बूँद पानी
बदरा उलास करे भीगती जवानी
मन की लपट अग्नि बड़ी विकराल सी
लोभ द्वेष तृष्णा से भरे हुए ताल सी
बहकती दहकती चले पग पग धरे
वैर भाव क्रोध मद अतिशोषण करे
ऐसे मे प्रेमवृष्टि से भरी हुई बाल्टी
खग-विहग जीव-जंतु के समक्ष उतार दी
भीग के अपार तर तार-तार कोना
मानवता के बिना धिक्कार नर का होना
छोड़ व्यर्थ ताप छोड़ दे मनमानी
सावन की ओस से बूँद बूँद पानी
बदरा उलास करे भीगती जवानी

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Tuesday, 16 May 2017

पिता

*पिता*

निष्ठा की अद्भुत पहचान होता है
घर के लिए वो ही भगवान होता है

काकर पाथर जोड़कर आशियां बनाता है
हर जरुरत पर वही बस याद आता है
होते हैं ये विद्यालय जमाने के लिए
हमारे लिए तो वो ही संस्थान होता है
घर के लिए वो भगवान होता है

बनता है छतरी बारिश की बूंदों में
बन जाता है दीवार तूफ़ान आने पर
अकेले अपने दम पर झेल लेता मुसीबत
परिवार अक्सर आफत से अंजान होता है
घर के लिए वो भगवान होता है

सख्त रहता है बाहर से पर अंदर से मोम
वो निगाहों से कहता है पर दिखता है मौन
बेटी की विदाई में उसका दर्द जान पाया कौन
पानी के छींटों मे आँसू छुपाकर रोता है
घर के लिए वो भगवान होता है

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Wednesday, 19 April 2017

शुभ प्रभात

*🙏🏼--० शुभ नमन ०--🙏🏼*

मिले हालात जैसे भी ,
कटे ये रात कैसे भी ।
चलो हम भी जरा समझें ,
मोहब्बत राज वैसे भी ।।

सुबह की रौशनी के संग
लिखें हम गीत मन भावन ।
तुम्हारे प्यार की गीता ,
करे फिर आज अब पावन ।।

कभी काली सियाही सी ,
कभी कड़वी दवाई सी ।
मिली थी रात बातों को ,
बिना उसके गँवाई सी ।।

मगर अब चाँद भी गायब ,
छटा सूरज लिये अनुपम ।
उजाला ही बिखेरे अब ,
सुबह इस भोर की सरगम ।।

बड़ा गुमसुम नज़ारा था ,
अँधेरे का पिटारा था ।
कहीं इक लौ दिखी जुगनूं,
वही अपना सहारा था ।।

सुबह आई मिटी स्याही,
करी आशाओं ने थिरकन ।
कदम उठने लगे मेरे ,
और खुलने लगे बंधन ।।

घना काला अँधेरा था
बादलों का भी पहरा था
वो अपने आसमा में गुम
जमीं पर मै अकेला था

हुआ जब दिन किरण आई
मिला एक दर्द को जीवन
चिड़िया भी हमारे द्वार पर
मधुर करने लगी चहकन

उनींदी थी पलक मेरी
उठाकर बोझ सावन का
अमावस द्वार पर बैठा
जिया में लोभ साजन का

रवि कर-कुञ्ज लेके पुंज
आया और दिखा चिलबन
जवानी के दिये चुप हैं
मगर है आस मन ही मन

धुआँ काजल सरीखी थी
यही जो रात बीती थी
नहीं पहचान थी उसकी
हमें जो घात देती थी

उजाले के कुबेरों में
उकेरा जो कुटिल दर्पण
हुआ मै रूबरू सच से
सनम ये प्यार है बंधन

*कविराज तरुण 'सक्षम'*
*साहित्य संगम संस्थान*

Monday, 27 March 2017

ग़ज़ल- कर रहा हूँ

रदीफ़ - कर रहा हूँ
काफ़िया - अन
बहर 122 122 122 122

उजाला रहे ये जतन कर रहा हूँ ।
सवेरे सवेरे हवन कर रहा हूँ ।।

मुख़ातिब अ-धेरा ब-सेरा मुनासिब ।
यही सोच खुद को दफन कर रहा हूँ ।।

रिवाज़ो ज़रा लाँघने दो जजीरा ।
जलाकर जवानी तपन कर रहा हूँ ।।

बड़ी दूर जाना घने काम करने ।
मशालों से रौशन चमन कर रहा हूँ ।।

तरुण छोड़ दो अब ख-यालो मे' रहना ।
जमी पर सितारा चलन कर रहा हूँ ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Saturday, 25 March 2017

अलफ़ाज़ 1

लहजो में तौलकर अल्फाज़ो को रखिये
एक उम्र गुजरती है इज्जत कमाने में

खाली पड़े मकां में कभी नूर भी बरसे थे
एक चिंगारी ही काफी है घर को जलाने में

कहते हैं सब्र को अक्सर कड़ा इम्तेहान देना पड़ता है
कई कोस चलना पड़ता है बच्चों को चलना सिखाने मे

गर कोई करे मदद तो उसका एहतराम जरुरी है
एक जुगनू भी है काफी अँधेरे को मिटाने मे

चलो कोई ऐसा धर्म भी चलाये जहाँ इंसान मजहब हो
बड़ा मुश्किल नज़र आता है कोई रस्ता सुझाने मे

कविराज तरुण 'सक्षम'

Wednesday, 22 March 2017

भोजपुरी चाचा चाची लाय दा

चाचा ..चाची लाय दा हमके
होए बड़ी मेहरबानी
तू तो साठीयाइल बा बुढ़ऊ
पीछे छुटल जवानी
चाचा
लाय दा तू चाची ..हो

अरे बच्चन का कब आई नंबर
जब तुंही हा घर में कुंवारा
एक बित्ता की दाढ़ी लइके
तू तनिको नही लजाला
चाचा
लाय दा तू चाची.. हो

चाचा ..चाची लाय दा हमके
होए बड़ी मेहरबानी
तू तो साठीयाइल बा बुढ़ऊ
पीछे छुटल जवानी
चाचा
लाय दा तू चाची ..हो

जल्दी खोजा बुढ़िया कौनो
जो दिखत हो कमसिन सयानी
खेतन में हल कैसे जोतिबा
जब सूखे भीतर का पानी
चाचा
लाय दा तू चाची ..हो

इंटरनेट का चक्कर छोड़ा
न होइए कौनो सेटिंग
पाँव कबर में लटक गए हैं
करते करते वेटिंग
चाचा .. छोड़ दा ई मनमानी

चाचा
लाय दा तू चाची.. हो

चाचा ..चाची लाय दा हमके
होए बड़ी मेहरबानी
तू तो साठीयाइल बा बुढ़ऊ
पीछे छुटल जवानी
चाचा
लाय दा तू चाची ..हो

Tuesday, 21 March 2017

भोजपुरी जिंदगी एक सजा

जिंदगी एक सजा, बन गइल बा
तोहरा के देखिल ,बस ई कमी बा
जिंदगी एक सजा, बन गइल बा
तोहरा के देखिल, बस ई कमी बा

जिंदगी एक सजा ,बन गइल बा

ऐके मिटावे खातिर , तनिका तू आवा
संगे मुस्कुरावे खातिर , तनिका तू आवा

जिंदगी एक सजा, बन गइल बा
तोहरा के देखिल ,बस ई कमी बा

जिंदगी एक सजा, बन गइल बा

इहर ..हम हई अधूरा , ओहर..तू हउ अधूरी(२)
मिलन की भईल बा , सब ख्वाहिश अधूरी(२)

लावा ..कदमो मा रच्ची तू जमीं
लावा ..सावन के संगे तू नमी
तोहरे बिना ... हो
तोहरे बिना हम
जी न सकी है
आवा ..सूरज से लइके रोशिनी
आवा ..चंदा से लइके चाँदनी

लावा ..हमके तनी तू जिंदगी(२)
जिंदगी
जिंदगी
जिंदगी...हो

जिंदगी एक सजा, बन गइल बा
तोहरा के देखिल ,बस ई कमी बा
जिंदगी एक सजा, बन गइल बा

जिंदगी एक सजा ,बन गइल बा

कविराज तरुण

Sunday, 19 March 2017

शहरे लखनऊ

ये शहरे लखनऊ है
ज़रा एहतराम करिये
बाहों में इसको भरके
खुशियां तमाम करिये

हिंदी से ये बना है
उर्दू मे ये खिला है
लफ्ज़ो में है सलीखा
यहाँ प्यार सिलसिला है

आके ज़रा यहाँ पर
मदहोश शाम करिये
ये शहरे लखनऊ है
ज़रा एहतराम करिये

बोली है अवधी मीठी
लब पर बसा है 'भईया'
आँखों में इसकी खोजो
भूला हुआ भुलईया

मुख़्तार है हुसन का
'हज़रत महल' नज़ारा
गोमती के तट पर
प्रेमी युगल किनारा

'उमराव' की है महफ़िल
झुककर सलाम करिये
ये शहरे लखनऊ है
ज़रा एहतराम करिये

अंदाजे हो बयां या
अल्फ़ाजे गुफ्तगू हो
अहदे अदब की ख़्वाहिश
चैनो-अमन की आरजू हो

शामें रूहानी 'गंजिंग'
सुबहे रूमानी कर लो
नवाबी शहर मे तुमभी
ज़रा ताज-पोशी कर लो

रंगीन है शहर ये
कुछ इंतजाम करिये
ये शहरे लखनऊ है
ज़रा एहतराम करिये

कविराज तरुण

Wednesday, 15 February 2017

माँ की तस्वीर

मैंने देखा है माँ की आँखों में
    तस्वीर-ए-हयात को ।
वो जगती है हमें सुलाकर
    इस काली रात को ।।

खुद से ही बनाती है , मेरे ख़्वाबों का शहर ।
अपनी कुछ खबर ही नही , रहती वो बेखबर ।।

ढक लेती है अपने आँचल से , वो हर रश्मो-रिवाज़ को ।
मेरे उस कल के लिए , कुर्बान करती वो अपने आज को ।।

जतन से सही करती है पूरी
   मेरी हरेक बात को ।
मैंने देखा है माँ की आँखों में
    तस्वीर-ए-हयात को ।

Friday, 27 January 2017

ग़ज़ल 2122x4 हो गयी हो

बहर 2122 2122 2122 2122 पर प्रथम प्रयास
रदीफ़ - हो गयी हो
काफ़िया- आरी

हम हुए हैं आपके औ तुम हमारी हो गई हो ।
आँधियों के बाद वाली रात प्यारी हो गयी हो ।।

चंद लफ़्ज़ों में बनाया आपको अपना ख़ुदा है ।
फ़ासलों को तोड़ के मेरी दुलारी हो गयी हो ।।

कश्तियों को ही पता है मौज क्या है साहिलों की ।
मंजिलों की चाह में अब तुम खुमारी हो गयी हो ।।

आशियाँ ये प्यार का मेरे दिली व्यापार का है ।
पान से लिपटी हुयी भींगी सुपारी हो गयी हो ।।

चाहतों की रेख से तुमको बनाया शौख से है ।
जीवनी मेरे लिये एक चित्रकारी हो गयी हो ।।

कविराज तरुण सक्षम

Saturday, 7 January 2017

ग़ज़ल सजा लीजियेगा

ग़ज़ल
रदीफ़ - लीजियेगा
काफिया- आ
बहर 122 122 122 122

अगर रूठ जाऊँ मना लीजियेगा ।
सबक प्यार का ये बना लीजियेगा ।।

झलकती अगर हो हया की पियाली ।
निगाहों से' अपने हटा लीजियेगा ।।

मुझे प्यार की बात सरगम की' चाहत ।
मुताबिक जहन के गुनगुना लीजियेगा ।।

सनम तुम दुआ हो दवा भी तो' तुम हो ।
पनाहों मे' भरकर सजा लीजियेगा ।।

गवारा नही पास आकर के' जाना ।
मुझे आज अपना बना लीजियेगा ।।

*कविराज तरुण सक्षम*

Thursday, 5 January 2017

ग़ज़ल लीजिये जी

एक प्रयास

ग़ज़ल : लीजिये जी
बहर : 122 122 122 122
रदीफ़ : लीजिये जी
काफिया : थ

हिमालय से' ऊँचा ये' कद कीजिये जी ।
बदलने समय की शपथ लीजिये जी ।।

अगर हो सुराही भी' पानी की' प्यासी ।
डुबोकर के' पनघट मे' मथ लीजिये जी ।।

नही है मुनासिब यूं' घुट घुट के मरना ।
गिराकर दिवारों से' पथ लीजिये जी ।।

गिरें जो इरादों से' अपने हवाले ।
मुमकिन अगर हो तो' रथ लीजिये जी ।।

कविराज तरुण सक्षम

Wednesday, 4 January 2017

ग़ज़ल दुबारा

*ग़ज़ल -- मुहब्बत दुबारा*

बहर -122 122 122 122
रदीफ़ - दुबारा
काफिया - त

मिलेगी नही ये मुहब्बत दुबारा ।
करेंगे नही फिर इबादत दुबारा ।।

ये' माना सफर में कई हमसफ़र हैं ।
चलेंगे नही पर नसीहत दुबारा ।।

है' मिलता कहाँ अब शरीफो को' मौका ।
करेंगे नही हम शराफ़त दुबारा ।।

अगर दिल की' बाते ये' तुम जान जाती ।
न करती ज़रा भी बगावत दुबारा ।।

न समझा सकूँगा मै' कुछ भी यहाँ पर ।
जुबां से समझ लो ये' चाहत दुबारा ।।

मिलेगी नही ये मुहब्बत दुबारा ।
करेंगे नही फिर इबादत दुबारा ।।

कविराज तरुण सक्षम

Tuesday, 3 January 2017

ग़ज़ल अजी आप भी

ग़ज़ल (बहर 122 122 122 122)

अजी आप भी आके इस दिल मे रहिये ।
जुबां के बिना ही निगाहों से कहिये ।।
नहीं और कुछ भी है मुझको सहारा ।
मेरी धड़कनों को ज़रा आप सुनिये ।।

अजी आप भी आके इस दिल मे रहिये ।

मुलाक़ात की कोई सूरत नही है ।
ये माना हमारी जरूरत नही है ।।
घनी भीड़ लगती सदा ही तुम्हारे ।
मगर पास आके दो पल ठहरिये ।।

अजी आप भी आके इस दिल मे रहिये ।

कविराज तरुण सक्षम

Monday, 2 January 2017

धुंध

धुंध

इस धुंध को थोड़ा हट जाने दो
राह नज़र भी आयेगी
पाती पाती पग पोछेगी
पाथर की पीर मिटायेगी

हो विस्मित क्यों अँधियारे से
सूरज की रश्मी आने दो
निष्काम निवृत्ति निराशित नर
आशाओं का दीप जलाने दो

है छलनी मन बिनरस जीवन
तिमिर रेख में धुँधला आँगन
संकल्प साध सुरमय सावन
कर निर्भय हो तनमन पावन

फिर ओस जमेगी पल्लव पर
तरु डाली थोड़ा झुक जायेगी
इस धुंध को थोड़ा हट जाने दो
राह नज़र भी आयेगी

कविराज तरुण सक्षम
9451348935

Sunday, 1 January 2017

सुनहरे पल

शीर्षक - सुनहरे पल

मधुर मन की मधुर हलचल
सुनहरे पल
कभी बारिश कभी बादल
सुनहरे पल
थकते नही जब पाँव चल चल कर
सुनहरे पल
हो प्यार के अविरल भाव निश्छल
सुनहरे पल

तबियत बोलती है
खोलती है नयनो के विराम
होंठो की सहज प्याली
घोलती है कुसुमरस के विधान
गालों पर खिली लाली
आतुर मन के देती है प्रमाण
हर एक कृत्य मे खुशहाली
भरे पावन छलकते हैं निशान

नजर आता अनोखा क्षितिज व तल
सुनहरे पल
सीमित दायरे को मिलता असीमित बल
सुनहरे पल
मानव के जीवन का है संबल
सुनहरे पल
मधुर मन की मधुर हलचल
सुनहरे पल

कविराज तरुण सक्षम
9451348935

Tuesday, 20 December 2016

अफीमो का नशा


गाना - अफ़ीमो का नशा

देखे तुझे पल पल दर्पण
हलचल ,सी करे दिल रह रह कर
जाने हुआ क्या मुझे बावरी
बाँस बिन ही बजे बाँसुरी
मै तो झूमने लगा
फर्श चूमने लगा
प्यार तेरा क्यों लगे
अफीमो का नशा
नशा नशा
अफ़ीमो का नशा

***slow rap***
*****************
Love के कॉकपिट पे बैठा
दिल की feeling high
ये भी एक नशा है baby
No beer no wine
Just Perfect and fine
I am yours you are mine
Mine mine mine mine
I am yours you are mine

*****fast rap*****
********************
ज़रा शर्म को रखो side में
और बैठो मेरी bike पे
कमर पकड़ के love you love you
मेरे कानों में सुनाई दे
उड़ता है दुपट्टा तेरा
छोड़ो उसको उड़ने दो
हंसो का जोड़ा बनो तुम
मुझको मोती चुगने दो
है Turn ...वो देखो
गाड़ी full speed में
चीपक के बैठो डरो न
इस भीड़ से
कभी left तो right
झम से ये निकल जाती है
Baby long drive तेरे संग
ये करने को ललचाती है
Go zoom
Go vroom
Zoom zoom zoom zoom

(Rap end and pause)

मै तो झूमने लगा
फर्श चूमने लगा
प्यार तेरा क्यों लगे
अफीमो का नशा
नशा नशा
अफ़ीमो का नशा

बावरी
बाँस बिना ही बजे बाँसुरी
बावरी ,,,,बावरी

कविराज तरुण
9451348935

Monday, 21 November 2016

अच्छे दिन आयेंगे

सब्र करो
और थोड़ा करो
इंतज़ार
फल मीठा मिलेगा
कड़वे दर्द
मिट जायेंगे
अच्छे दिन फिर आयेंगे

जैसे अमावस के बाद
होता है सुप्रभात
जैसे बादलो के बाद
होती है बरसात

जैसे पतझड़ के बाद
आता है सावन
जैसे सोमवार के उपवास से
मिलता है साजन

ठीक वैसे ही
बुरे दिन
कट कट के
कट जायेंगे
अच्छे दिन फिर आयेंगे ।

*कविराज तरुण*

Thursday, 17 November 2016

अपना cash

बंद iPhone बंद है nexus
कभी short कभी excess
अपना cash
कैसे करेंगे हम ऐश ।

न oaac न ही laps
बस tm और noteex
Tally होता नहीं क्यों cash
कैसे करेंगे हम ऐश ।

कभी दस कभी ग्यारह
लटका day end बेचारा
नोटों का bundle है missmatch
कैसे करेंगे हम ऐश ।

*कविराज तरुण*

Wednesday, 16 November 2016

सोनम गुप्ता

Atm की लाइन में क्या लगाया
सोनम गुप्ता बेवफा हो गई ।
आधी रात को हज़ार का नोट देकर
मेरी 100 की गड्डी ले गई ।
सोनम गुप्ता बेवफा हो गई ।।

भूल गई वो सारी कसमे
भूली वो पिज़्ज़ा बर्गर
मुझको भी भूली अब तो
दिल से हुआ मै बेघर

मालूम नहीं काला धन
पर काला दिल नजर तो आया
जिन नोटों की दीवानी थी वो
वो सब तो बस थी माया

पॉकेट का जबसे हाल बताया
सोनम गुप्ता बेवफा हो गई ।
आधी रात को हज़ार का नोट देकर
मेरी 100 की गड्डी ले गई ।
सोनम गुप्ता बेवफा हो गई ।।

कविराज तरुण
https://m.facebook.com/KavirajTarun/

उर में विराजो महाराज

उर में विराजो महाराज
तुमसे शुरू है हर काज
उर में विराजो महाराज

सूना लगे है दिन आज
सुने से ही पड़े सब साज
उर में विराजो महाराज

जीवन क्या है न जाना मैंने
खुद को भी न पहचाना मैंने
चलता रहा जाने किस धुन पे
तेरी बातो को न माना मैंने

तुमसे छुपा कब ये राज
मेरे छिन ही चुके हैं सब ताज
उर में विराजो महाराज

*सुप्रभात*
*कविराज तरुण*

Tuesday, 15 November 2016

तांडव

आज के सामयिक हालातो पर लिखी एक रचना

जब शिव जी करते हैं तांडव
तब चीख सुनाई देती है ।
असुरों की सत्ता हिल जाती
रंगत झल्लाई रहती है ।।

कलयुग के काले कौवों का
काले धन का अंबार लगा ।
नष्ट हुआ सब भ्रान्तिमान
जब हंसो का दरबार लगा ।।

जब हो जाती अति अमावस की
सूरज तब और चमकते हैं ।
जो इतराते थे नोटों की गड्डी पर
अब ठिठक ठिठक कर चलते हैं ।।

अब फिर से मोती चुन चुनकर
हंसो के हिस्से आयेगा ।
भारत से कलयुग दूर हटेगा
सतयुग अब फिरसे छायेगा ।।

कविराज तरुण

Friday, 4 November 2016

शुक्रिया जवान

*शुक्रिया जवान*

इन करों के बंद मुख से शुक्रिया तुझको अदा है ।
माँ भारती तू धन्य है जो वीर ऐसा तुमने जना है ।

बर्फ की चादर मे लिपटा सो गया तूफ़ान मे ।
आँख निगरानी में थी कुछ बात थी उस जान मे ।

कर्मबेदी पर चढ़ा के जान की वो बोलियाँ ।
दिवाली तीज होली पर भी खाई गोलियाँ ।

फिर भी टस से मस हुआ न वीर फौलादी जवां ।
कर-नमन आँख-नम उस माँ को जिसने पुत्र जना।

राजनेता बात करते शहीदों का कितना मोल है ।
जो कोख सूनी हो गई उसका भी क्या कोई तोल है ।

दूर रखो है निवेदन शहादत को सियासत की दौड़ से ।
और ये सुन लो बात मीडियाकर्मियों भी गौर से ।

सैनिक जीवन ज़रा भी प्रश्नों का है विषय नहीं ।
बस नमन और नमन और नमन ही विकल्प सही ।

*कविराज तरुण*