Saturday, 2 September 2017

ग़ज़ल 30- आजा रहबर मिरे

*आजा रहबर मेरे* कविराज तरुण 
212 212 212 212 212 212 212 212

आजा' रहबर मिरे , ख़्वाब के दरमियाँ ,
ये तो' अपनी मुहब्बत की' शुरुआत है ।
फेरी' तुमने जो' हैं , सरसरी सी निगह ,
दिल से' होने लगी दिल की' कुछ बात है ।

रा-स-तों से मिटे , खुद-ब-खुद फ़ासले ,
हम कदम को मिटाकर युं चलने लगे ।
शाम इक जाम सी हो गई है हसीं ,
मुस्कुराने लगे दिल के' हालात हैं ।।

पास में बैठकर, लफ्ज़ दो बोल दो ,
अपनी' आँखों से' पयबंद मय घोल दो ।
हो तुझी में फ़ना , कुछ न तेरे बिना ,
इन लबो पर लबो की ही' नगमात है ।।

दिल मुलाजिम तिरा, हो गया आजकल ,
इक इशारे पे' गुल रोज खिलने लगे ।
रूह की अस्ल में , तुझको' शामिल किया ,
बस मे' अपने नही आज जज़्बात हैं ।।

कह रहा ये तरुण , हमसफ़र तुम मिरे ,
देख लेंगे ज़माना फिकर क्यों करे ।
मै हूँ' तुम हो जहाँ , बस वही आसमां ,
साथ है ये फलक साथ दिनरात है ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Wednesday, 30 August 2017

ग़ज़ल 29- ऐ मिरे हमसफ़र

ग़ज़ल - ऐ मिरे हमसफ़र
बहर - 212x8

आँख की मस्तियाँ , बात की चासनी , ये न कहना तुझे , है मुहब्बत नही ।
हो फरेबी अगर , साफ़ ये बोल दो , दिल लगाने की' तुझको , जरूरत नही ।।

यूँ तिरे हुस्न की , हर तरफ है ख़बर , हाँ मुझे भी ज़रा , हो गया है असर ।
शरबती आँख का , हूँ मुरीदी सनम , और कोई तमन्ना , इबादत नही ।।

हर खिले फूल का , कोई' माली भी' है , है जवाबी अगर , तो सवाली भी है ।
तुम भी' समझो मुझे, राज़ सब खोल दो , चुप रहो जो हमेशा , शराफ़त नही ।।

सर झुकाउंगा मै , हाँ मनाऊंगा मै , दिल तिरा नेक हो , तो रिझाऊंगा मै ।
तुम बनो गीत सी , हाँ दिखो मीत सी , फिर युं जाने की' तुमको , इजाज़त नही ।।

तुम भरोसा करो , मै भरोसा करूँ , दो कदम तुम चलो , दो कदम मै चलूँ ।
कह रहा ये तरुण , ऐ मिरे हमसफ़र , भूलकर भी करूंगा , बग़ावत नही ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'
व्हाट्सएप- 9451348935

हमारी हिंदी

राष्ट्रभाषा ग़ज़ल
1222 1222 1222 1222

मुझे हिंदी ही' प्यारी है , बहुत भाषा विचारी है ।
मगर अफ़सोस है इतना , वो' अपनों से ही' हारी है ।।

बड़ी मासूम है हिंदी , सभी के साथ चलती है ।
मिले ताने हमेशा क्यों , रहे बनकर बिचारी है ।।

हमारी शान है हिंदी , हमारी जान है हिंदी ।
ये' चारो धाम हैं इसके , यही कन्याकुमारी है ।।

लगे की माँ बुलाती है , कि जब आवाज़ आती है ।
उदर के साथ ही निकली , जुबां इतनी ये' प्यारी है ।।

चलो छोड़ो भरम अपने , कभी ये गुनगुनाओ तो ।
तरुण हिंदी शरम कैसी , सभी पर ये ही' भारी है ।।

कविराज तरुण सक्षम

Tuesday, 29 August 2017

सुहाने पल

आज का विषय - सुहाने पल

दूरांत किसी कोने में
किसी स्याही सी काली रात में
सन्नाटे की अंतरिम ध्वनि
जो भँवरे की तरह ही
गूंजित हो रही थी कर्णपटल पर
पर चुभ रही थी
कोशिश तो यही थी
कि एकांत मिले
एक ऐसा एकांत जहाँ
सन्नाटे की भी ध्वनि न पहुँच पाये
पर मै असहाय
अपनी आँख बंद किये
मस्तिष्क की नसों की मंद किये
महसूस कर रहा हूँ
वायु-चापो को
जो कुछ सुना रही है
उसकी भी ध्वनि आ रही है
नही रोक सकता जिसे मै
चाहे कितने कोने में चला जाऊँ
खुद को कितना भी छुपाऊँ
प्रकृति व जीवन हैं अटल
रुकती नही है इनकी गति
करती रहेंगी ये हलचल
इस ध्वनि में ही खोजो नित संगीत
इसमें ही छुपे हैं
सुहाने पल

कविराज तरुण 'सक्षम'

मृगनयनी

विषय - मृगनयनी

ओ मृगनयनी तेरे नेत्र सुहावन ।
अम्बर से नीले कजरी पावन ।
है पलकों के भीतर अल्हड़ रैन ।
निजभाषा में करते नित सैन ।

बंद रहकर भी तेरे बोलते हुए नैन ।
स्वप्न द्वार पलकों से खोलते हुए नैन ।
और कुटिल सी मुस्कान
जिसपर अर्क गुलाबी सा निशान
चुरा लेंगे अनगिनत दीवानों का चैन ।
बंद रहकर भी तेरे बोलते हुए नैन ।

इसकी आभा की उपमा कुछ भी नही
बंद हो तो नज़ाकत, जो खुले तो शरारत
एक टकी से जो देखे , तो फिर हो कयामत
घूर दे तो नसीहत , झपकी ले तो मोहब्बत
चौक कर जब ये देखे , तो फिर विस्मित अकीदत
कभी ये इबादत कभी ये शराफत
कभी ये हकीकत कभी ये मुहब्बत
इस खुदा की सबसे अनोखी ये देन ।
बंद रहकर भी बोलते हुए नैन ।

 
 कविराज तरुण 'सक्षम'

Monday, 28 August 2017

ग़ज़ल 27- मजा आ गया

212x8
मजा आ गया

जो न मैंने कहा , सुन लिया आपने ,दिल ने घंटी बजाई , मजा आ गया ।
साँस थमने लगी , आँख झुकने लगी , इक लहर दौड़ आई , मजा आ गया ।।

बरकते हुस्न की , शबनमी चाँदनी, क्या कहूँ खूब हो , दिलकशीं लाजिमी ।
बेसबर सा हुआ , बेखबर सा हुआ , बेअसर सब बुराई , मजा आ गया ।।

मै भटकता रहा , रोज बाज़ार में , प्यार बिकता दिखा , आज संसार मे ।
इक तुही पाक है , तेरा' अंदाज है, तुमसे' नजरें मिलाई , मज़ा आ गया ।।

बात बढ़ने लगी , साथ चलने लगी , ये जमीं वादियां , यार मिलने लगी ।
मेहमां अब नही , दिल के मालिक हुये , ये वसीयत लिखाई , मज़ा आ गया ।।

मौशिकी के लिये , आशिक़ी की लिये , तुम बने साहिबा , जिंदगी के लिये ।
है 'तरुण' आज खुश , रहनुमा तुम मिरे , धुन जो' ये गुनगुनाई , मज़ा आ गया ।।

कविराज तरुण सक्षम

Saturday, 26 August 2017

ग़ज़ल 26- नही मिलती

कभी साहिल नही मिलता , कभी मंजिल नही मिलती ।
मिरे ज़ख्मो को' जाने क्यों , दवा काबिल नही मिलती ।।

बड़ी तकरार होती है , ज़रा सी बात पर अब तो ।
नही रहबर मिले कोई कहीं महफ़िल नही मिलती ।।

जमीं है चाँद तारे भी , गवाही है मुहब्बत की ।
मगर वो ही ख़फ़ा हैं तो , ख़ुशी इस दिल नही मिलती ।।

भरम है आबदानी का , जहाँ आँसू ही' मोती हैं ।
तिरी चाहत न होती तो , पलक बोझिल नही मिलती ।।

'तरुण' बेबस तरानो का , नही हक़दार सौदाई ।
अदावत की मिलावट से , फ़िज़ा आदिल नही मिलती ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Thursday, 24 August 2017

ग़ज़ल 25- वो रूठ जाता है

1222 1222 1222 1222

ख़फ़ा होता है' जब मुझसे बहुत ही दूर जाता है ।
बिताये जो हसीं लम्हे , वक़त वो भूल जाता है ।।

ठहर जाऊँ कभी उसकी गली में और चौखट पे ।
चला जाता वो' छज्जे से मिरा दिल टूट जाता है ।।

नज़र मुददत से' मिलती है करूँ दीदार कैसे मै ।
पलक उठती नही उसकी हमेशा रूठ जाता है ।।

शिकायत हैं बड़ी शायद वफ़ा की बात मत पूछो ।
सफाई दे नही पाते ये' लम्हा छूट जाता है ।।

इनायत भी खुदा की रूबरू होती नही मुझसे ।
मिरे हिस्से की' ये दौलत , तरुण वो लूट जाता है ।।

कविराज तरुण

Tuesday, 22 August 2017

ग़ज़ल 24- मिल गया होता

1222 X 4

आरा
मिल गया होता

जो' मुझको प्यार का कोई इशारा मिल गया होता ।
नदी भी मिल गई होती किनारा मिल गया होता ।।

बड़ी बेचैन सी ये जिंदगी है आज राहों मे ।
कमी तेरी जो भर पाती गुजारा मिल गया होता ।।

मुझे बदनाम करने की वक़ालत कर रहे वो ही ।
जिसे शीशे मे' खुद अपना नज़ारा मिल गया होता ।।

हसीं हैं चाँद तारे ये हसीं है रात ख़्वाबो की ।
जो' आते पास लम्हा भी गवारा मिल गया होता ।।

करी हैं कोशिशें खुद से , यकीं तुमको नही होगा ।
'तरुण' को गर समझ लेते , दुबारा मिल गया होता ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Thursday, 17 August 2017

दुःख क्यों है : नारी प्रधान रचना

विषय - दुःख क्यों है : नारी प्रधान रचना

नारी ने नारी को जन्मा फिर उसको दुःख क्यों है ?
भूल गई क्या अपना बचपन फिर उसको दुःख क्यों है ?

सोचा करती थी वो अक्सर , मै सब सहती ही जाऊँगी ।
पर जब आएगी बेटी घर में , मै खुशियाँ खूब मनाऊंगी ।
खेल खिलौने खील बताशे , केवल लड़को के ही हिस्से क्यों ?
मै अपनी बिटिया को लड्डू , छप्पन भोग खिलाऊँगी ।

पढ़ा लिखा कर अफसर बेटी , जब द्वार खोल कर आयेगी ।
मेरे टूटे सपनो की गगरी , खुशियों से भर जायेगी ।
तब मै देखूँगी उसमे ही , अपने अतीत का स्वप्न प्रबल ।
सच्चे अर्थों में ये माँ उसदिन , अंदर से मुस्कायेगी ।

पर जब नन्ही कली जीवन में , खुशियां लेकर आई है
वो माँ दुःख से भरी हुई है , न जाने क्यों घबराई है
बचपन के सपने भूल के सारे , भूल के अपने किस्से
बेटी बेटी कहती थी पर , बेटे को अब ललचाई है

बेटी है अंचल में सुन्दर फिर भी उसको दुःख क्यों है ?
नारी ने नारी को जन्मा फिर भी उसको दुःख क्यों है ?

कविराज तरुण 'सक्षम'

Wednesday, 16 August 2017

ग़ज़ल 23- दुआयें साथ चलती हैं

1222 1222 1222 1222

बुलंदी पर बड़ी तीख़ी हवायें साथ चलती हैं ।
भटकने वो नही देती दुआयें साथ चलती हैं ।।

यूँ' ज़िल्लत की इजाज़त माँगती कब जिंदगी हमसे ।
कभी लंगड़ी कभी ठोकर सदायें साथ चलती हैं ।।

मै' गिरता हूँ सँभलता हूँ फ़क़त मै आदमी तो हूँ ।
जुबानी जंग में अक्सर फिजायें साथ चलती हैं ।।

मिरे असरार फीके हैं मगर ये हैं गलीमत है ।
बिना बोले कहाँ दिल की अदायें साथ चलती हैं ।।

'तरुण' रुकना मना है आज इस असफार में बेशक ।
जो' हिम्मत की क़वायद हो दिशायें साथ चलती हैं ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Thursday, 10 August 2017

ग़ज़ल 22- प्राण हिंदुस्तान हो

2122 2122 2122 212
ग़ज़ल - प्राण हिंदुस्तान हो

जब हथेली पर सजाकर मौत ही महमान हो ।
तो अमर है जान उसका प्राण हिंदुस्तान हो ।।

चैन में वो हद नहीं सरहद चले जब गोलियां ।
ख़ाक दुश्मन को करे ऐसा ही' मन में भान हो ।।

मौत से कहना तकल्लुफ छोड़ दे मै वो नही ।
सामने हथियार डाले जो नसल बेमान हो ।।

बुज़दिली आती नही बेबाकियां जाती नही ।
रूह अस्मत खून नस नस देश पर कुर्बान हो ।।

हिंद हूँ मै भारती सुत गंग सतलज धार हूँ ।
तोड़ बंधन चल पड़े गर सामने व्यवधान हो ।।

कविराज तरुण सक्षम

ग़ज़ल 20- मुहब्बत मर गयी

2122 2122 2122 212

ग़ज़ल - मुहब्बत मर गयी

सिलसिला कुछ यूँ चला मेरी शराफत मर गयी ।
छोड़ कर उसकी गली अब ये मुहब्बत मर गयी ।।

थाम कर था रख लिया मैंने हसीं जज़्बात को ।
आँख की कोरी सियाही की नियामत मर गयी ।।

मै पशो-उर-पेश मे वो रासता तकता रहा ।
कहकशों की दौड़ मे अहसास चाहत मर गयी ।।

सर्दियों की मौज मे अब बर्फ़ भी गिरने लगी ।
जम गये असरार मेरे तो अकीदत मर गयी ।।

मुन्तज़िर था मै कि वो आये वफ़ा के साथ मे ।
गैर के कंधे दिखा सिर सारी' हसरत मर गयी ।।

जब तराशा हाथ को हमने ज़िगर की आंच पे ।
ख़्वाब पाने का भरोसा और क़ूवत मर गयी ।।

मुफ़लिसी दिल की करी तुम दिलरुबा हो ही नही ।
मै तरुण ख़ामोश बैठा और दौलत मर गयी ।।

*कविराज तरुण सक्षम*

Tuesday, 25 July 2017

ग़ज़ल 19- कहानी ढह गई

ग़ज़ल - कहानी ढह गई
2122 2122 212

दरमियां बातें जुबां जो सह गई ।
बन खलिश वो आंसुओं सी बह गई ।।

जब उकेरा आसमां पर ये निशां ।
शक्ल तेरी इस जमीं पर रह गई ।।

आरजू जीने समझने का हुनर ।
उम्र ये गुजरी कहानी ढह गई ।।

हम मिले कुछ पल जमाना जल गया ।
और फिर नींदे हवा में लह गई ।।

सिलसिला ये चल पड़ा था जब तरुण ।
होंठ तेरी बद-जुबानी कह गई ।।

कविराज तरुण सक्षम

Monday, 24 July 2017

ग़ज़ल 18- हसीं हादसा

ग़ज़ल - हसीं हादसा
२१२२ २१२२ २१२

"रंग सब मुझमे फ़ना सा हो गया ।
जब हसीं ये हादसा सा हो गया ।।

इश्क़ की आदत मुझे जबसे हुई ।
मै जुदा सा वो खुदा सा हो गया ।।

आँख झुकती अब नही दरपेश मे ।
शाम में शामिल शमा सा हो गया ।।

अब न पूछो हाल क्या अब हाल है ।
ख़्वाब में मिलना अदा सा हो गया ।।

लाज़िमी था बर्फ का गिरना तरुण ।
गर्म साँसों का धुआँ सा हो गया ।।

-कविराज तरुण✍
साहित्य संगम संस्थान


ग़ज़ल 16- बुलाया है मुझे

ग़ज़ल - बुलाया है मुझे
2122 2122 212

फिर वफ़ा का नूर छाया है मुझे ।
चौक पर उसने बुलाया है मुझे ।।
हर घड़ी करता फिरा था इंतज़ा ।
उस खुदा का गौर आया है मुझे ।।
ताल सुर से ही गया था मै बिदक ।
राग फिर तूने सिखाया है मुझे ।।
चल रहा था भीड़ में तनहा मगर ।
साथ में अपने उड़ाया है मुझे ।।
रोशिनी आने लगी है ज़र्द से ।
बादलों ने खुद बताया है मुझे ।।
हर्फ़ ये निकले हैं' जिसकी अर्ज़ पर ।
उस हसीं ने खुद सिखाया है मुझे ।।
वक़्त तेरा फैसला अब मै करूँ ।
कितने' दिन तूने नचाया है मुझे ।।
धुंध थी जो छट गई वो प्यार मे ।
इस तरह से आजमाया है मुझे ।।
था गमो की ढ़ेर पर बैठा तरुण ।
उस फलक पर अब बिठाया है मुझे ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Saturday, 22 July 2017

ग़ज़ल 15- दिलरुबा

ग़ज़ल - दिलरुबा
बहर- 2212 2212 2212 2212

ये प्यार की तन्हाइयां , आघात बनकर दिलरुबा ।
शामिल हुई जहनो जिगर , नगमात बनकर दिलरुबा ।।

थी साहिलों की सोच ये , कश्ती भँवर के पार है ।
आई कहाँ तूफ़ान सी , बरसात बनकर दिलरुबा ।।

बेशक मिलन मुमकिन नही , तेरा मिरा ये जानते ।
होंठो पे' आई फिर भी' क्यों , जज़्बात बनकर दिलरुबा ।।

कहते सुना है आशिक़ी , जन्नत ख़ुदा का नूर है ।
इन दिलजलों से पूछना , तुम रात बनकर दिलरुबा ।।

संगीन था ये जुल्म तुमने , मुखबिरी की जब तरुण ।
हद से बुरे तब कर दिये , हालात बनकर दिलरुबा ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'
साहित्य संगम संस्थान

ग़ज़ल 17- खबरदार चीन

ग़ज़ल - खबरदार चीन
बहर - २२१२ २२१२ २२१२ २२१२

जहनो जिगर की आग से वाक़िफ़ नही असरार तू ।
माफ़ी मुहब्बत प्यार के बिलकुल नही हकदार तू ।।
चीनी पता क्या घोलते हैं हम यहाँ पर चाय मे ।
दो चुस्कियों में हो हज़म बेशक यही किरदार तू ।।
क्यों बात बेमतलब करे ऐसी अकड़ किस काम की ।
हम तोड़ते हर सोच वो जिसका असल आधार तू ।।
चल छोड़ पीछे जो हुआ भाई बनाकर साथ मे ।
खंजर चुभा कर पीठ मे जीता मगर है हार तू ।।
मुमकिन नही है अब तिरा यूँ सामना करना मिरा ।
कहना तरुण का मान लो वर्ना ख़तम इसबार तू ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'


Wednesday, 19 July 2017

ग़ज़ल 13-ज़माना हो गया

2212 2212 2212 2212

फिर नाम मेरा साहिबा वर्षों पुराना हो गया ।
गुजरे हुये दिल की जमीं से अब जमाना हो गया ।।

कुछ कम न थी ये चाहतें ,कहते सभी थे ये मगर ।
बातों ही' बातों मे रफ़ू सारा फ़साना हो गया ।।

थी मंजिले था कारवां भी ,तुम नहीं थे हम नही ।
वो दौर ही कुछ और था जो अब बहाना हो गया ।।

मैंने लिखा फिर नज़्म मे कतरा लहू का घोलकर ।
तेरी जुबां की चासनी मिलकर तराना हो गया ।।

चल छोड़ उसको तू तरुण जो गैर की चाहत हुई ।
बहकी घटा को देखकर क्यों यूँ दिवाना हो गया ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Thursday, 13 July 2017

ग़ज़ल 7-मुहब्बत करेंगे

122 122 122

नही हम शिकायत करेंगे ।
नही फिर बगावत करेंगे ।।

नज़र को झुकाकर के' यूँही ।
फ़क़त हम इबादत करेंगे ।।

ज़माना फरेबी है' माना ।
वफ़ा की हिमायत करेंगे ।।

जमीं पर बिछाकर सितारे ।
गुलिस्तां नियामत करेंगे ।।

तरुण नाम प्रेमी सदा मै ।
अदब से मुहब्बत करेंगे ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

दामाद

दामाद

अगर ससुराल में दामाद है
तो ये भी एक विवाद है
कुछ दिन तो विलायती उर्वरक सा
बाद में गोबर की खाद है
अगर ससुराल में दामाद है

पत्नी को तोहफा दिया
तो साली उदास है
साली को तोहफा दें तो
फिर पत्नी नाराज है
तंखाव्ह का हाल न पूछो
बड़ा गड़बड़ सारा हिसाब है
अगर ससुराल में दामाद है

उधर सासू की तबियत का
बीवी देती है उल्हाना
साले के खर्चे का फ़र्ज़
अक्सर पड़ता है निभाना
और आइसक्रीम खाने में
यहाँ हर कोई उस्ताद है
अगर ससुराल में दामाद है

सास खुश तो ससुर दुखी
ससुर खुश तो साला परेशान
साला खुश तो साली हैरान
साली खुश तो बीवी व्यवधान
सबको खुश रखने के चक्कर मे
जिंदगी हो गई बर्बाद है
अगर ससुराल में दामाद है

कविराज तरुण 'सक्षम'

Wednesday, 12 July 2017

सहायता

सहायता

वो मजबूर है
बेसहारा भी है
कुछ समाज का कसूर है
वो किस्मत का मारा भी है

नही मिला परिवार का सुख
पैदा हुआ तो माँ भी चल बसी
उसकी झोली में आता रहा दुःख
मिल न सकी एक अरसे से ख़ुशी

ऐसा नही है उसने कोशिश नही की
घरों में बर्तन धोये
साईकिल के पंचर लगाये
ढाबे पर कई बार गालियां सुनी
जख्म कई बार बारिश में पकाये
वो लड़ता रहा
खुद से भी खुदा से भी
पेट भर लेता था
कभी कभी हवा से भी

अब वो चाहता है सबकुछ बदलना
सीख गया है अपने पैरों पर चलना
खोज लिया है उसने काम को
बढ़ाने चला है अपनी दुकान को

दुकान जिसमे सजाता है
मिट्टी के खिलौने
सोचता है हो जायेगा सफल
जगता है रोज सपने बोने

पर

फिरभी तिरस्कार
मिट्टी के दियों की किसे दरकार
दिवाली भी आ कर चली जाती है
चाइनीज़ बत्ती से उम्मीदें हार जाती हैं

वो सोचता है आखिर
उसकी क्या है खता
क्यों लोग खरीदकर
करते नही उसकी सहायता

कविराज तरुण 'सक्षम'

Sunday, 9 July 2017

गाना तेरी चाल (चाल तुरु तुरु की तर्ज पर)

गाना तेरी चाल (चाल तुरु तुरु की तर्ज पर)

तेरी चाल मध्धम मध्धम
खुलते बालों के बंधन
लट गालों पर आ बिखरी
करे घास में किलोलें
अहि कानन में डोले
नभ सूरज की हुई रोशिनी (2)

न कोय तुमसा है हसीं
झलक मिलेगी क्या कहीं
बोले तो दिल को हो ख़ुशी
घोलो लबों से रस यहीं

मीठी बोली सी भाषा
कुछ और नहीं भाता
सुनके कानो में स्वर रागिनी
करे घास में किलोलें
अहि कानन में डोले
नभ सूरज की हुई रोशिनी

सोचे जो मुझसे बोले न
लबों की डिबरी खोले न
नज़रें ज़रा भी फेरे न
शर्मो हया को तोड़े न

हो ऐसे काम न चलेगा
कुछ तो कहना पड़ेगा
अजी छोड़ो भी ये दिल्लगी
करे घास में किलोलें
अहि कानन में डोले
नभ सूरज की हुई रोशिनी

तेरी चाल मध्धम मध्धम
खुलते बालों के बंधन
लट गालों पर आ बिखरी
करे घास में किलोलें
अहि कानन में डोले
नभ सूरज की हुई रोशिनी

कविराज तरुण सक्षम

ग़ज़ल 9- हमसफ़र चाहिये

बहर -212 212 212 212

हाँ मिरी जिंदगी को बसर चाहिये।
आप जैसा को'ई हमसफ़र चाहिये ।।

ताश के ढ़ेर ये कह रहे आजकल ।
जोड़ दो अब मुझे एक घर चाहिये ।।

ख़्वाब आने लगे जो हुई आशिक़ी ।
नींद आँखों में' अब तो ख़बर चाहिये ।।

दिल नही जो मिरा धड़कनों की सुने ।
तू इसे रात दिन उम्र भर चाहिये ।।

है तरुण आज शायर तिरे हुस्न का ।
प्यार की राह में अब गुजर चाहिये ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Saturday, 1 July 2017

मै चाहता हूँ

ग़ज़ल - मै चाहता हूँ
१२२ १२२ १२२ १२२
रदीफ़ - चाहता हूँ
काफ़िया - अ स्वर

सुबह कर सके वो किरण चाहता हूँ ।
सबेरे सबेरे ग़ज़ल चाहता हूँ ।।

ये' बनती व मिटती लहर हैं बहुत पर ।
न मिट जो सके वो लहर चाहता हूँ ।।

फिरंगी जो खुद को खुदा कह रहे हैं ।
हक़ीक़त मे' उनकी दखल चाहता हूँ ।।

हवा आज नम खून के भी हैं' छींटे ।
मै' इसमे मुनासिब बदल चाहता हूँ ।।

हुई दूर इंसानियत आज माना ।
दिलों ही दिलों मे पहल चाहता हूँ ।।

फ़िज़ा हो गुलों सी ज़माना हसीं हो ।
हाँ' रंगत भरा वो शहर चाहता हूँ ।।

अदा हो असर ये गुजारिश खुदा से ।
तरुण बात में फिर अमल चाहता हूँ ।।

कविराज तरुण सक्षम

Friday, 30 June 2017

कौन हूँ मै

कौन हूँ मै

फिर वही प्रश्न कौन हूँ मै
शब्द मूर्छित हैं मौन हूँ मै

सागर की तलहटी मे खोजता गहराई हूँ
पानी की चादरों में तलाशता परछाई हूँ

सत्य क्या असत्य क्या नित सोचता हूँ
धर्म में निहित कर्म भावों को टोहता हूँ

हूँ धरातल या भला ये व्योम हूँ मै
फिर वही प्रश्न कौन हूँ मै
शब्द मूर्छित हैं मौन हूँ मै

महफ़िल मिले जब तो चाहता तन्हाई हूँ
दुःख मिले तो प्रभु से माँगता शहनाई हूँ

बाट पलपल सुख क्षणों की जोहता हूँ
पुष्प करलव लालसा को मोहता हूँ

अर्थ हूँ मै स्वयं का या विलोम हूँ मै
फिर वही प्रश्न कौन हूँ मै
शब्द मूर्छित हैं मौन हूँ मै

*कविराज तरुण सक्षम*

ग़ज़ल - हुआ सा है

1212  1122 1212 22
आ ,  सा है

मिरा खुदा मुझसे ही ख़फ़ा ख़फ़ा सा है ।
रवां अकीदत सब कुछ उड़ा उड़ा सा है ।।

असास का इक पत्थर हिला के' जाना ये ।
वजूद-ए-हम वहशत अलम खला सा है ।।

मलाल ये है' कि उसने मुझे नही समझा ।
मलाल ये भी' कि अब वो जुदा जुदा सा है ।।

ख़ुलूस था कद जिसका किताब के जैसे ।
हरेक हर्फ़ उसी का धुआँ धुआँ सा है ।।

तरुण ये' चाहत की सरहदें छू' के देखा ।
मिज़ाज-ए-उलफ़त अब फ़ना फ़ना सा है ।।

*कविराज तरुण सक्षम*

ख़फ़ा - नाराज
रवां - जिंदगी
अकीदत - भरोसा
असास - नींव
वहशत - पागलपन
अलम - दुःख
खला - खाली
मलाल - अफ़सोस
ख़ुलूस - स्पष्ट
हर्फ़ - अक्षर
उलफ़त - प्यार
फ़ना - अंत

Thursday, 29 June 2017

आय है ग़ज़ल

1212 1122 1212 22

लिपट लिफ़ाफ़े' में' उनका पयाम आया है ।
जिसे खुदा ने' बहुत खूब ही बनाया है ।।

दुआ सलाम नही लफ्ज़ कुछ अलग सा है ।
बड़ी नज़ाक़त से उसने' सितम ढाया है ।।

बिना मिले मुमकिन हो मिरा बसर यूँही ।
बिठा पलक पर ख़्वाबो को' आजमाया है ।।

यकीं नही अब चाहत ये' चीज ऐसी है ।
डुबाता' खुद जिसने तैरना सिखाया है ।।

तरुण सबक कुछ लेता नही मुहब्बत से ।
हरेक हर्फ़ कई ज़ख्म साथ लाया है ।।

कविराज तरुण सक्षम

Saturday, 24 June 2017

अर्ज़ है 25.06.17

अर्ज़ है -

गौर फरमाईयेगा ...

तिरे सवाल का जवाब लाज़िमी सा है ।
जहन खुदा सा' है लिबास आदमी सा है ।।

सुप्रभात

कविराज तरुण सक्षम

ग़ज़ल 28-नाम आया

ग़ज़ल प्रतियोगिता हेतु

बहर - 212 212 212 2
रदीफ़ - आया
काफ़िया - आम

आज फिर गैर मे नाम आया ।
मै कहाँ सच तिरे काम आया ।।

रात असफार में चाँद नम है ।
मै सुबह निकला' तो शाम आया ।।

कौन कहता खलिश आख़िरी ये ।
मौत का ख़त सरेआम आया ।।

वो दगाबाज़ थे फिर भी' खुश हैं ।
गम में' डूबा मुझे जाम आया ।।

मै ख़रीदा करूँ ख़्वाब बेशक ।
खुद से भी जबर दाम आया ।।

बेवफा ख़त तिरा भी अजब है ।
खार गुल साथ पैगाम आया ।।

चल 'तरुण' छोड़ दे अब मुहब्बत ।
मन मुताबिक न अंजाम आया ।।

*कविराज तरुण 'सक्षम'*
*साहित्य संगम संस्थान*

Wednesday, 21 June 2017

ग़ज़ल12- बनाना पड़ेगा

212 212 212 2

नाम तुझको बनाना पड़ेगा ।
काम करके दिखाना पड़ेगा ।।

भव्यता भाव मे गर निहित हो ।
भव्य करके बताना पड़ेगा ।।

मुश्किलों की दवा है पसीना ।
खूब इसको बहाना पड़ेगा ।।

आसमां भी समझता इरादे ।
कोशिशों से झुकाना पड़ेगा ।।

कर सके जो न खुल के इबादत ।
उनका' सिर भी उठाना पड़ेगा ।।

प्यास बादल को' लगने लगी है ।
तुझको दरिया बढ़ाना पड़ेगा ।।

काम चुप होके' चलता कहाँ है ।
बोल के ही हँसाना पड़ेगा ।।

कहकशों की कहानी नही है ।
चाँद तारे सजाना पड़ेगा ।।

है *तरुण* जिस्म में गर रवानी ।
जिंदगी को लुभाना पड़ेगा ।।

*कविराज तरुण सक्षम*
*साहित्य संगम संस्थान*

Tuesday, 20 June 2017

योगदान महादान

*योग-दान , महा-दान*
(मनहरण घनाक्षरी)

दुराचार दूर करे
  सदविचार प्रदाता
    कुछ न काम आये तो
      योग अपनाइये ।।

रोग को समेटकर
  क्यों हो जीवनयापन
    निरोगता की पुष्टि है
      योग आजमाइये ।।

योग के समान कोई
  है उपाय नही दूजा
    नित्य आधे घंटे योग
      और मुस्कुराइये ।।

प्राणायाम है महान
  सूर्य नमस्कार करो
    वज्र , मृग , सिंहासन
     करिये कराइये ।।

*योग-दान महा-दान*
  इसमें छुपा है ज्ञान
    प्रातःकाल नित्य ध्यान
      चित्त को लुभाइये ।।

वासना को त्याग दो
  साधना में भाग लो
    शुद्धता का है प्रमाण
      योग दोहराइये ।।

*कविराज तरुण 'सक्षम'*
*साहित्य संगम संस्थान*

ग़ज़ल - नहीं है

212 212 212 2
एक प्रयास

तीर दिल पे ये' खाना नही है ।
कुछ हमे आजमाना नही है ।।

बेरुखी दिल्लगी का असर है ।
और रोना रुलाना नही है ।।

डूब जाते मुहब्बत मे अक्सर ।
तैरने का ठिकाना नही है ।।

खार गुल से हुआ जब मुख़ातिब ।
जान पाया ज़माना नही है ।।

रहगुज़र दूर कर दो नज़र ये ।
हाथ कुछ आज आना नही है ।।

*कविराज तरुण सक्षम*

Monday, 19 June 2017

ग़ज़ल 14-चलेंगे

212 212 212 2

हाल-ए-दिल सुनाते चलेंगे ।
ख़्वाब अपने सजाते चलेंगे ।।

है अँधेरा घना क्यों डरे हो ।
दीप मन में जलाते चलेंगे ।।

मुश्किलें सामने आ गई तो ।
हम सनम मुस्कुराते चलेंगे ।।

साहिलों को पता है इरादा ।
नाव यूँ ही चलाते चलेंगे ।।

नाम तेरा जवानी तरुण है ।
दिल से दिल हम मिलाते चलेंगे ।।

कविराज तरुण सक्षम

Saturday, 17 June 2017

ग़ज़ल 6- असर

ग़ज़ल - असर
रदीफ़ - बाखुदा
काफ़िया - अर
122 122 122 12

हुआ प्यार का यूँ असर बाखुदा ।
नही कुछ भी' आता नज़र बाखुदा ।।

इशारे मिले दिल मुबारक हुआ ।
नया सा लगे अब शहर बाखुदा ।।

कदम दर कदम पास आते गये ।
मिला इक हसीं फिर सफर बाखुदा ।।

इनायत हुई जो मुहब्बत हुई ।
लदा गुल से' मेरा शज़र बाखुदा ।।

बरसने लगे लफ़्ज़ कुछ इसतरह ।
ग़ज़ल की मुकम्मल बहर बाखुदा ।।

अजब हुस्न है रौशिनी सी फ़िज़ा ।
'तरुण' थाम ले ये पहर बाखुदा ।।

*कविराज तरुण सक्षम*
*साहित्य संगम संस्थान*