Friday, 27 October 2017

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तुम मुझे कभी सुलाती नहीं हो
मैं पास आता हूँ तुम पास आती नही हो
ख़फ़ा बहुत हूँ तुमसे ऐ चाँदनी
चंदा को छोड़ कहीं भी जाती नही हो
***
चलो एक ऐसी रोली गाते हैं
आज इस रात को सुलाते हैं
***
वो ज़रा बन जाये दिलवाली
तो अपनी भी मन जाये दिवाली
***
जलाओ दीप कुछ इसतरह यारों
अँधेरा जग में कहीं रह न जाए
शुभ दीपावली
***
अगर ये है मुहब्बत तो मुहब्बत मान लेते हैं ।
चलो कुछ तुम कदम कुछ हम चलें ये ठान लेते हैं ।।
अदायें लाज़िमी हैं हुस्न की चौखट तले आयें ।
हया का तिल सजाकर वो हमेशा जान लेते हैं ।।
मिलावट हो नही पाती करूँ कोशिश भला मै क्यों ।
बिना कत्थे सुपारी के वो' मीठा पान लेते हैं ।।
०-कविराज तरुण-०
***
दुश्वारियां भी हैं ,बेकारियां भी हैं
मुहब्बत कर नही सकते, लाचारियां भी हैं
***
नींद को ख़बर नही है
मेरी आँख है , तेरा घर नही है
***
कुछ असर तो तुझे भी होगा
नजरे तुमने भी मिलाई थी

क.त.००१

कान दीवारों के सजग थे
खबर दराजों को भी थी जब तू आई थी

क.त. ००२
***
रवाँ हुस्न तेरा फलक का सितारा ।
तरुण जल न पाया जो बुझता दिया है ।।
***
जब ख़ामोश हूँ मै
तो होश मे हूँ मै
कुछ बोलूँगा तो राज़ खुल जायेंगे ।
***
कभी तकदीर हँसती है कभी तस्वीर हँसती है ।
मै' इनपर भी हँसूँ थोड़ा अगर तू साथ हँसती है ।।
कविराज तरुण
***
फर्क पड़ता नही कितने दुश्मन हैं लिफ़ाफ़े मे
कोशिश बस इतनी है दोस्त होते रहे इज़ाफ़े में
***
फिर वफ़ा का नूर आया है मुझे
चौक पर उसने बुलाया है मुझे

कविराज तरुण
***
शाम भी रात भी नाम भी बात भी
कुछ न मेरा रहा सब तेरा हो गया

कविराज तरुण
***
की एक सिफारिश और नींद आ गई
ख़्वाब तुमने अबतक मेरा साथ नही छोड़ा

कविराज तरुण
***
मत आना छत पर जुल्फ़े संवारने
भीड़ ज्यादा है
बड़ी लंबी कतार है
कविराज तरुण
***
आज के इस दौर में अफ़सोस यही होता है
कोई भी घटना हो जाये
जोश बस चार दिन का होता है
#ArrestRyanPinto
***

ऐ सूरज बादलों के पार हो जाओ
बारिश की सलाखों में गिरफ्तार हो जाओ
सुप्रभात
कविराज तरुण
***
दो चार आँसूं में लिपटकर रो जाऊँगा
याद करूँगा तुझे और सिमटकर सो जाऊँगा
💐शुभरात्रि 💐
कविराज तरुण 9451348935
***
मर गया प्रद्युम्न वो तो पढ़ने गया था
माँ के सपनो में दो कदम बढ़ने गया था
मासूमियत पर किसने चाकू चलाये
स्कूल में कैसे अब कोई जाये
***
कभी कोई , कभी कोई
कभी कोई खुदा से मांग लेता है
दुआ हो तुम कोई इंसान नही हो
कविराज तरुण
***
तुम गुल रहो मै गुलफाम हो जाऊँ
तेरे चौखट पर उतरी इक शाम हो जाऊँ
नही कुछ मांगूँ मै दुआ मे
रहो तुम ख़ास और मै आम हो जाऊँ
***
वो सरेआम लगाते रहे इल्ज़ाम
मैंने वफ़ा में मगर लफ्ज़ नही खोले

कविराज तरुण
***
न दिल न दुआ न जमीन है अबतक
जिंदगी फिरभी बेहतरीन है अबतक
सुप्रभात
कविराज तरुण
***
शायद यही दस्तूर था
उनका जाना एक सच
उनका आना मेरे मन का फितूर था
-कविराज तरुण
***
ख़्वाहिश है ,बारिश है ,मै हूँ और तुम
बंदिश है घरवालों की हुमतुम गुमसुम

कविराज तरुण
***

Thursday, 19 October 2017

ग़ज़ल 57 दिवाली

1222 1222 1222 122

दिया बाती अभी से ही जलाने हम लगे हैं ।
दिवाली की कई रौनक लगाने हम लगे हैं ।।

सफेदी से दिवारें जगमगाई रात में भी ।
किवाड़ों को जतन से अब सजाने हम लगे हैं ।।

बढ़ा कुछ इसकदर अब धुंध मौसम खौफ़ मे है ।
पटाखे छोड़कर के गीत गाने हम लगे हैं ।।

मिठाई का रिवाजी पर्व जबसे आ गया है ।
जुबां पे चासनी के घोल लाने हम लगे हैं ।।

तरुण श्रीराम की उस जीत का अभिप्राय है ये ।
ख़ुशी अपनी जताकर फिर बताने हम लगे हैं ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Sunday, 15 October 2017

ग़ज़ल 55 हम लगे हैं

1222 1222 1222 122

तिरे आगोश में राते बिताने हम लगे हैं ।
हसीं सपने खुली आँखें सजाने हम लगे हैं ।।

ख़बर हो जाये' चंदा को यही सब सोचकर हम ।
दुप्पटे को फलक पर अब उड़ाने हम लगे हैं ।।

कभी आओ जमीने शायरी दहलीज पर तुम ।
बिना सोचे पलक अपनी बिछाने हम लगे हैं ।।

असर बस उम्र का है और कुछ भी है नही ये ।
तेरी बाते सनम खुद से छुपाने हम लगे हैं ।।

पिरोया हर्फ़ में हर हुस्न मोती जोड़कर के ।
तरुण के लफ़्ज़ बनकर बुदबुदाने हम लगे हैं ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Saturday, 14 October 2017

ग़ज़ल 54 - जब तुमसे मिलूँगा

1222 122

मै जब तुमसे मिलूँगा ।
लिपटकर रो ही' दूँगा ।।

मुहब्बत बेजुबां है ।
निगाहों से कहूँगा ।।

*मै' जब तुमसे मिलूँगा ...*

हसीं सपना संजोया ।
तिरे दिल में रहूँगा ।।

सफ़र में थाम बाहें ।
सितारों तक चलूँगा ।।

*मै' जब तुमसे मिलूँगा ...*

तू' जादू हुस्न का है ।
हया इसमें भरूँगा ।।

सजाकर मांग तेरी ।
तिरा शौहर बनूँगा ।।

*मै' जब तुमसे मिलूँगा ...*

ख़लिश हो या खता हो ।
तबस्सुम सा दिखूँगा ।।

तरुण की तू खुदाई ।
तिरा सजदा करूँगा ।।

*मै' जब तुमसे मिलूँगा ...*

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Tuesday, 10 October 2017

ग़ज़ल 53 आज़मा लो

1222 122

कदम आगे बढ़ा लो ।
खुदी को आजमा लो ।।

जो' नफ़रत की अगन है ।
उसे अब तो बुझा लो ।।

है' दिल में बेरुखी क्यों ।
हदें सारी हटा लो ।।

नई भाषा मुहब्बत ।
कभी तो गुनगुना लो ।।

अँधेरा कह रहा है ।
डरो मत मुस्कुरा लो ।।

चरागों को उठाकर ।
शमा कोई जला लो ।।

खलिश ऐसी भी' क्या है ।
कि पलकें ही गिरा लो ।।

चले आओ फ़िज़ा मे ।
हमे हमसे चुरा लो ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Wednesday, 4 October 2017

ग़ज़ल 52 प्यार की है

1222 1222 122

अभी दिल मे रवानी प्यार की है ।
अभी बाकी कहानी प्यार की है ।।

चिरागों से कहो जल जाये' अब वो ।
कई हसरत पुरानी प्यार की है ।।

कि गहरी हो चली है चोट दिल की ।
ज़रा देखो निशानी प्यार की है ।।

रवां हैं हुस्न की बारीकियां भी ।
जवां अबतक जवानी प्यार की है ।।

समझ मोती तरुण जो आँख नम है ।
यही अपनी ज़ुबानी प्यार की है ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Tuesday, 3 October 2017

ग़ज़ल 51 मै हमेशा

1222 1222 122

रुका था सर झुकाने मै हमेशा ।
कई बातें बताने मै हमेशा ।।

कि तुमने डोर छोड़ी बीच मे ही ।
लगा खुद को मनाने मै हमेशा ।।

उनींदी आँख से सपने हुये गुम ।
चला जब नींद लाने मै हमेशा ।।

तुम्हे समझा मुहब्बत ये खता की ।
न समझा ये कहानी मै हमेशा ।।

जो' रूठे हो तरुण से रूठ जाओ ।
नही आता रिझाने मै हमेशा ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Monday, 2 October 2017

ग़ज़ल 50 गम में काफ़िया

122 122 122 122

किवाड़ों की' उलझन को' हमने जिया है ।।
दरारों को' भीतर से' हमने सिया है ।

फ़कीरी उदासी परेशानियां थी ।
रदीफ़े बहर ग़म मे' ये काफ़िया है ।।

मिला बंदिगी में खुदा का सहारा ।
तभी नाम जीवन ये' उसके किया है ।।

रहम की गुज़ारिश करे भी तो' कैसे ।
ज़हर अपने हाथों से' हमने पिया है ।।

रवाँ हुस्न तेरा फलक का सितारा ।
'तरुण' जल न पाया जो' बुझता दिया है ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 49 भगत

122 122 122 122

भगत ये चरण में कदा चाहता है ।
नही और कोई दुआ चाहता है ।।

दुखों की दुपहरी विदा चाहता है ।
किरण में घुली हर अदा चाहता है ।।

कपूरी कहानी नही ज्यादा' दिन की ।
बिखरने से' पहले हवा चाहता है ।।

घने हैं अँधेरे बड़ी मुश्किलें हैं ।
उजाला हो' इतनी दया चाहता है ।।

किधर पुन्य छूटा किधर पाप आया ।
मगर साथ तेरा सदा चाहता है ।।

माँ' अम्बे भवानी कहूँ क्या कहानी ।
'तरुण' खूबसूरत फ़िजा चाहता है ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 48 प्रेमी प्रेमिका

संशोधित

प्रतियोगिता हेतु ग़ज़ल
बहर- १२२ १२२ १२२ १२२

प्रेमी-
कभी है मुहब्बत कभी है बगावत ।
बता कैसे' दिल की मिलेगी युं राहत ।।
प्रेमिका-
कभी तुम फरेबी कभी हो हक़ीक़त ।
मिलेगी नही दर्द-ए-दिल को इनायत ।।

प्रेमी-
कभी पास आते कभी दूर जाते ।
अधूरी कहानी अधूरी सी' चाहत ।।
प्रेमिका-
नही तुम रिझाते नही तुम मनाते ।
हैं' बातें पुरानी तुम्हारी नज़ाक़त ।।

प्रेमी-
दिया लेके' खोजो न हमसा मिलेगा ।
शरीफो ने' सीखी है' हमसे शराफ़त ।।
प्रेमिका-
अजी झूठ बोलो न सबको पता है ।
तिरे यार ही मुझको' देते नसीहत ।।

प्रेमी-
नही दोस्त समझो वो' दिल के बुरे हैं ।
रखी जहन मे है अजब ही अदावत ।।
प्रेमिका-
चलो ठीक है मानती तेरी' बातें ।
मगर ध्यान रखना मिले ना शिकायत ।।

प्रेमी-
भरोसा करो मै न तोडूंगा' इसको ।
मिरे दिल की' रानी मै' तेरी रियासत ।।
प्रेमिका-
न अब हो हिमाकत न कोई शरारत ।
बड़े प्यार से हम करेंगे मुहब्बत ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 47 फ़साना है

1222 1222

न समझो तो बहाना है ।
जो' समझो तो फ़साना है ।।

गुले गुलज़ार की चाहत ।
सजोये आबदाना है ।।

खलिश किसको नही मिलती ।
रिवाज़ो में ज़माना है ।।

चलो देखो कुहासे मे ।
अगर इसपार आना है ।।

मुहब्बत बुलबुला जल का ।
इसे तो फूट जाना है ।।

करो कोशिश कभी तुम भी ।
जवानी इक तराना है ।।

नही सुरताल से मतलब ।
अदा से गुनगुनाना है ।।

मिले दुश्वारियां सच है ।
मज़ा फिरभी पुराना है ।।

'तरुण' घायल बहुत ये दिल ।
मगर किस्सा बनाना है ।।

कविराज तरुण सक्षम

ग़ज़ल 46 मन मेरा

1222 1222

दिखे उसको जतन मेरा ।
बड़ा मासूम मन मेरा ।।

दराजो से निहारूँ मै ।
करे कोशिश नयन मेरा ।।

चली आना दुआरे पे ।
नही करना हनन मेरा ।।

सजी है सेज फूलों की ।
सजे जो तू चमन मेरा ।।

मिरी सीरत मिरी चाहत ।
अदम बेशक बदन मेरा ।।

निकलते हर्फ़ दिल भारी ।
तरुण समझो वजन मेरा ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 45 रिश्ते निभाऊँगा


1222 1222

कभी मै सर झुकाउंगा ।
कभी पलकें बिछाऊँगा ।।

हथेली पर सजा रातें ।
फलक पर भी बिठाऊंगा ।।

नही यूँही बना शायर ।
ग़ज़ल तुझपर बनाऊंगा ।।

चली जिस ओर पुरवाई ।
वहाँ तुमको घुमाउंगा ।।

अदब दिल मे मिरे हसरत ।
कई किस्से सुनाऊंगा ।।

तरुण है नाम प्रेमी हूँ ।
सभी रिश्ते निभाऊंगा ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 44 असर देखो

1222 1222

हुआ दिल पर असर देखो ।
मिला तुमको ये' घर देखो ।।

कहाँ जाओ ख़फ़ा हो के ।
बिछी मेरी नज़र देखो ।।

कमल क्यों खिल उठा है ये ।
गुलाबों के अधर देखो ।।

अगर मुमकिन जवानी में ।
निकल मेरा शहर देखो ।।

जुबां से आदमी हूँ मै ।
खुदा अंदर ठहर देखो ।।

मुहब्बत की इनायत है ।
तरुण देखो ब-हर देखो ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 43 दिल टूटा

1222 1222

वफ़ा छूटी ये' दिल रूठा ।
सनम तुमने बहुत लूटा ।।

करी कोशिश सदा मैंने ।
मिला बस दर्द मन टूटा ।।

बढ़े बेशक कदम तेरे ।
मगर मेरा ही' दर छूटा ।।

खुदा नाराज़ था मुझसे ।
मिला जो सच वही झूठा ।।

तरुण लो सीख अब इससे ।
गुबारा प्यार का फूटा ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 42 कसम से


1222 1222 122

चलो चल दे बहारों में कसम से ।
हो' अपना घर सितारों में कसम से ।।

नही वो बात आती है अकेले ।
मुहब्बत के दुआरों में कसम से ।।

तपिश हो साँस में औ रूह प्यासी ।
मज़ा है तब शरारों में कसम से ।।

बता कर दिल्लगी की है तो' क्या है ।
समझ लेना इशारों में कसम से ।।

तुम्हे मालूम पड़ जाये हक़ीक़त ।
ज़रा देखो दरारों में कसम से ।।

भँवर के बीच आओ और जानो ।
नही मोती किनारों में कसम से ।।

तरुण तेरी ख़बर मिलती नही कुछ ।
चुना है किन दिवारों में कसम से ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Wednesday, 27 September 2017

चौपाई - उजियाला

जल थल अम्बर जीवन माना ।
भीतर से हिय तब पहचाना ।।

भाव खिले मन कुटिर छवाई ।
बोध तत्व की मिली बधाई ।।

रिपु दल बढ़कर आगे आये ।
दूर हुए सब भ्रम के साये ।।

सहज अलौकिक जीवनधारा ।
प्रभु कृपा सहित जब उजियाला ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Tuesday, 26 September 2017

बेबस माँ

विषय - बेबस माँ

खाना परोसा है थाल सजाये हैं
उसने अपने दिल सब हाल छुपाये हैं
बेटा तो अब लौटकर आयेगा नही
उसकी तस्वीर को छप्पन भोग लगाये हैं ।

बेबस है बहुत लाचार भी है
आंसुओं से भीगी दीवार भी है
शाम आती है और आकर चली जाती है
कुछ रोज से वो बहुत बीमार भी है ।

टूटी ख़्वाहिश के बादल बरसने आये हैं
जिसे समझा अपना वो निकले पराये हैं
बह जायेगा घरोंदा कुछ आयेगा न हाथ
चूल्हे की आँच में जज़्बात जलाये हैं ।

बस की सीटी लगती बेकार भी है
झूठी दिलासा का रोज प्रहार भी है
जो गया वो वापस आयेगा नही
फिर भी दहलीज को उसका इंतज़ार भी है ।

बेसुध आँखों में लिपटे गमो के साये हैं
खाना परोसा है थाल सजाये हैं
उसने अपने दिल सब हाल छुपाये हैं ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

चौपाई - ईमानदारी

चौपाई

१९.०९.२०१७
विषय - ईमानदारी

नेक राह पर चल रे पगले ।
भाग्य उदय हो जाये अगले ।।

तृष्णा लालच ये सब माया ।
छोड़ सको तो छोड़ो भाया ।।

कर्म साध्य तो धर्म सही है ।
नेकी बिन पुरुषार्थ नही है ।।

क्यों दूजे का हक है खाना ।
अपनी नीयत अपना दाना ।।

सर वो ऊँचा तान सकेगा ।
नेकी का जो पाठ पढ़ेगा ।।

मत भूलो सच ने जग जीता ।
प्रेमकुटिर मे जीवन बीता ।।

रामलला की हो संताने ।
कपटी रावण की क्यों माने ।।

जो मिला प्रभू से मान धरो ।
निश्छल होकर के काम करो ।।

चहुँओर खिले तब उजियाला ।
नेकभाव जब दीपक डाला ।।

सज्जन का है जग हितकारी ।
ईमान बिना क्या नर-नारी ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

चौपाई - पुकारूँ रे

चौपाई - पुकारूँ रे

मन का अंतर अंतर तेरा ।
छाया मुझपर माँ का घेरा ।।

हो मै आसक्त निहारूँ मै।
माँ तुझको आज पुकारूँ मै।।

माँ तुझको आज पुकारूँ मै ।।

हूँ दीन हीन माँ दुखियारा ।
तेरा बालक तेरा प्यारा ।।

छल दोष कपट सब काम किये ।
पापों के सन्मुख शाम किये ।।

कैसे अब भूल सुधारूँ मै ।
माँ तुझको आज पुकारूँ मै ।।

माँ तुझको आज पुकारूँ मै ।।

अब निश्छल है कोना कोना ।
माँ तुम हो क्या रोना धोना ।।

अवगुण मेरे नाश करोगे ।
सद्गुण से आकाश रोगे ।।

मै शरण तुहारी आया हूँ ।
माँ तुमको शीश नवाया हूँ ।।

निज अंचल आज पखारूँ रे ।
माँ तुझको आज पुकारूँ रे ।।

माँ तुझको आज पुकारूँ रे ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 41 फ़साना है

1222 1222

लगे तुमको बहाना है ।
जो' समझो तो फ़साना है ।।

गुले गुलज़ार की चाहत ।
सजोये आबदाना है ।।

खलिश किसको नही मिलती ।
रिवाज़ो में ज़माना है ।।

चलो देखो कुहासे मे ।
अगर इसपार आना है ।।

मुहब्बत बुलबुला जल का ।
इसे तो फूट जाना है ।।

करो कोशिश कभी तुम भी ।
जवानी इक तराना है ।।

नही सुरताल से मतलब ।
अदा से गुनगुनाना है ।।

मिले दुश्वारियां सच है ।
मज़ा फिरभी पुराना है ।।

'तरुण' घायल बहुत ये दिल ।
मगर किस्सा बनाना है ।।

कविराज तरुण सक्षम

Tuesday, 19 September 2017

ग़ज़ल 40 - वफ़ा कीजिये

212 212 212 212

हाल-ए-दिल देखिये फिर वफ़ा कीजिये ।
यूँ न शर्मा के' आहें भरा कीजिये ।।

रोज ग़फ़लत मे' नजरें मिलाते रहे ।
अब निगाहों मे' आके रहा कीजिये ।।

रोग ये इसकदर जान पर आ गई ।
जब दवा ना मिले तो दुआ कीजिये ।।

आशिक़ी को उमर की जरूरत नही ।
हाथ मे हाथ लेकर चला कीजिये ।।

दिल्लगी की कदर कुछ करो भी 'तरुण' ।
उल्फ़ते जिंदगी को दफ़ा कीजिये ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 39 - कलम के सिपाही

122 122 122 122

कलम के सिपाही यही मानते हैं ।
सियाही मिलाकर ही' सच छानते हैं ।।

नही बैर कोई ज़माने रिवाजी ।
सही क्या गलत क्या वही ठानते हैं ।।

सुराही से' कह दो रहे और प्यासी ।
ये' बारिश के' मोती जमीं सानते हैं ।।

रकम से खरीदो न कुछ होगा' हासिल ।
लिखावट ये' झूठी नही जानते हैं ।।

फरेबी हो' फितरत कहीं और जाओ ।
न-सल की अ-सल को ये' पहचानते हैं ।।

तरन्नुम की' आहट तरुण कम न होगी ।
न जाने कि क्या क्या कवी फानते हैं ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Monday, 18 September 2017

ग़ज़ल 38 - वो ही जाने

122 122 122 122

छुपा क्या दिखा क्या समंदर ही जाने ।
लहर ने किया क्या ये' पत्थर ही जाने ।।

ये' बारिश की' बूँदे जवां हो गये हम ।
बिना बूँद क्या हाल बंजर ही जाने ।।

नही और कोई खलिश अब बची है ।
अदा बेवफाई की' रहबर ही जाने ।।

अमानत मिली या जमानत मिली है ।
निगाहों के' आंसू ये' अंदर ही जाने ।।

लहू को खबर खुद की' मिलती नही है ।
किया क़त्ल कैसे ये' खंजर ही जाने ।।

चलो बात छेड़े तरुण आज ऐसी ।
न उसको पता हो न अकबर ही जाने ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Saturday, 16 September 2017

ग़ज़ल 37 - शैतान बैठे हैं

एक प्रयास

1222 1222 1222 1222

कभी इज्जत कभी दौलत कभी ईमान बेचे हैं ।
गुफा से दूर ही रहना बड़े शैतान बैठे हैं ।।

लगाते हुस्न का डेरा खुदा की आड़ मे बेशक ।
दबे कुचले समझ लेते यहीं भगवान रहते हैं ।।

जरूरत क्या है' जाने की भला कुछ भी नही होता ।
हवस अपनी दिखाते और इसको ध्यान कहते हैं ।।

बड़ी 'आशा' करी 'निर्मल' 'रहीमी' और 'राधे माँ' ।
तुम्हारी बात मे अक्सर गुलाबी ज्ञान बहते हैं ।।

'तरुण' सब देख के जाना बुराई छिप नही सकती ।
खलिश इतनी मुझे शह क्यों इन्हें इंसान देते हैं ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Friday, 15 September 2017

चौपाई - कलयुग

चौपाई पर एक प्रयास

काला कौवा बड़ा सयाना ।
चुग डाला है सारा दाना ।।
कोयल देखे और लजाये ।
कलयुग घर के भीतर आये ।।

पाई जोड़ी कौड़ी कौड़ी ।
तब जीवन की गाड़ी दौड़ी ।।
भ्रष्ट मजे से लूट रहा है ।
सीधे का बस रक्त बहा है ।।

बोलो हल्ला कौन मचाये ।
घर का भेदी लंका ढाये ।।
खाली गगरी खाली थाली ।
बिन लक्ष्मी अब कहाँ दिवाली ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 36 - मेरे यार तू

212 212 212 212
ग़ज़ल - मेरे यार तू

हो रहा है दिवाना मेरे यार तू ।
दिल्लगी का फ़साना मेरे यार तू ।।

गैर-ए-उल्फ़त मे' शिरकत करूँ क्यों भला ।
हाल-ए-दिल का ठिकाना मेरे यार तू ।।

फूल भी बाग़ भी चाँद भी रात भी ।
साथ में ये ज़माना मेरे यार तू ।।

अब हदों में बसर और मुमकिन नही ।
मंजिलों का तराना मेरे यार तू ।।

चल सितारों के' उसपार चलते तरुण ।
जिंदगी का बहाना मेरे यार तू ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Thursday, 14 September 2017

ग़ज़ल 35 काश तुम होते

ग़ज़ल -काश तुम होते

ख़्वाबों से हक़ीक़त काश तुम होते ।
हाथों की लिखावट काश तुम होते ।।

जुल्फों की पनाहों मे जी' लेते हम ।
कदमो की भी' आहट काश तुम होते ।।

परछाई समेटे रात क्यों आती ।
बाँहों की ये' आदत काश तुम होते ।।

घर दीवार सबकुछ चाह छोड़ी है ।
इस दिल की बगावत काश तुम होते ।।

नफ़रत की इनायत से 'तरुण' बेबस ।
फिर मेरी मुहब्बत काश तुम होते ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

गाना- तू मेरे मन की बीट

गाना- तू मेरे मन की बीट

शाम सबेरे (eco)
दिल में मेरे (eco)
करता तुझे रिपीट...
(music)
कांगो जैसे (eco)
बजती है तू (eco)
मेरे मन की बीट...

शाम सबेरे दिल में मेरे
करता तुझे रिपीट
कांगो जैसे बजती है
तू मेरे मन की बीट
मै करता तुझे रिपीट
तू मेरे मन की बीट

ये बादल हल्के हल्के , मै चल दूँ तू चल दे ।
माय हर्ट इज इन यो वेटिंग , आजा न कुछ कर दे ।

वेदर कूलिंग कूलिंग डिअर
बढ़ने लगी है हीट
(बढ़ने लगी है हीट)
कैंडी जैसी आँखों वाली
तेरी बातें कितनी स्वीट
(बातें कितनी स्वीट)

तू मेरे मन की बीट(2)
(music)

शाम सबेरे दिल में मेरे
करता तुझे रिपीट
कांगो जैसे बजती है
तू मेरे मन की बीट
मै करता तुझे रिपीट
तू मेरे मन की बीट

सुन ले सितारा वारा तोड़ लाऊँगा ।
आसमा बेचारा सारा ओढ़ आऊंगा ।
कदमो मे बिछा विछा के जन्नत ये ।
रोमियो से आगे अब जाऊंगा मै ।

तेरे लिए ही दिनरात जगूँ ।
फोटो से तेरी मै बात करूँ ।
अरमानो के हीटर से
प्यार का बढ़ा है मीटर ये

फॉलो fb पर करता हूँ
ट्विटर पर मै ट्वीट
पहचाने हैं मुझको सब
जब जाऊँ तेरी स्ट्रीट
(जाऊँ तेरी स्ट्रीट)

तू मेरे मन की बीट(2)
(music)

शाम सबेरे दिल में मेरे
करता तुझे रिपीट
कांगो जैसे बजती है
तू मेरे मन की बीट
मै करता तुझे रिपीट
तू मेरे मन की बीट

रस्ता कबसे देख रहा
करना है तुझको ग्रीट
(करना है तुझको ग्रीट)

कांगो जैसी बजती है
तू मेरे मन की बीट
शाम सबेरे दिल में मेरे
करता तुझे रिपीट
कांगो जैसे बजती है
तू मेरे मन की बीट
मै करता तुझे रिपीट
तू मेरे मन की बीट

कविराज तरुण
9451348935

Tuesday, 12 September 2017

ग़ज़ल 34 - हो गया

ग़ज़ल - हो गया

212 212 212 212

इश्क में मै तिरे क्या से' क्या हो गया ।
जब से' देखा तुझे मै फ़िदा हो गया ।।

शाम भी रात भी नाम भी बात भी ।
कुछ न मेरा रहा सब तिरा हो गया ।।

मै पलटता रहूँ सर्द मे करवटें ।
हाल मेरा सनम वक़्त सा हो गया ।।

रोशिनी दूर जाओ कि आना नही ।
नूर मुझपर किसी चाँद का हो गया ।।

कागज़ी है नही हर्फ़ की रागिनी ।
वो तरुण हाल-ए-दिल की सदा हो गया ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

*कहानी - ४ / सुगंध*

*कहानी - ४ / सुगंध*

आज फिर भोर हुई , चाय की चुस्की के साथ अखबार में अपना भविष्य तलाशने लगा । तभी हवा की हल्की बयार आई । एक महीन सी मीठी सुगंध ,अलग सी कशिश लिए और कुछ जानी पहचानी सी । बरबस ही मन व्याकुल हो उठा , कौतुहल हुआ और मेरी लालसा मुझे बगीची तक ले आई । मेरे घर की छोटी सी बगीची के एकदम कोने में रखे गमले में आज एक फूल खिला था ..गुलाब का फूल । अचरज था ये पेड़ तो मैंने नहीं लगाया । तिरस्कृत गमले की सूखी मिट्टी मे भी जीवन की संभावना साकार रूप ले ले तो उस परमशक्ति की महिमा पर कोरा यकीन होना स्वाभाविक है । अचरज इसलिए भी था क्योंकि फूल गुलाब का था , गुलाब जिसे देखकर उसका चेहरा याद आता है । उसे भी तो गुलाब पसंद थे । वो कहती थी अगर भगवान मुझे कहें कि इंसान के बदले तुम्हे क्या बनाऊँ तो मै गुलाब बनती । उसकी तरह सुन्दर , अपनी पंखुड़ियों के आँचल में लिपटकर , ओस की बूँद से नहाकर ,अपनी महक से भौरों को दीवाना बनाती । पगली थी वो । कहती कि तुम ओस की बूँद बन जाना । ओस की बूँद ! वो तो हल्की सी गर्मी में जल जाती है , हवा चली तो उड़ जाती है । मुझे अलग नहीं होना तुमसे , मै तो भौरा बनूँगा और हमेशा तुम्हारे करीब आकर तुम्हारी सुगंध से अपनी अंतरात्मा को तृप्त करूँगा ।
आँखे बंद थी और मै अपनी उस दुनिया के मध्य जहाँ गुलाब की सुगंध में संपूर्ण वातावरण था और उस गुलाब से भी सुन्दर मेरी प्रेयसी । सहसा आँख खुली , किसी ने आवाज दी शायद । देखा तो मै बिस्तर पर लेटा था । उठकर भागा पर बगीची में न तो गुलाब का फूल मिला न ही उसकी *सुगंध* ।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Monday, 11 September 2017

ग़ज़ल 33 - सनम

बहर - 212 212 212 212
ग़ज़ल - सनम

212 212 212 212

चाँद के पार मंजिल वफ़ा की सनम ।
क्यों मुखालत करे है सजा की सनम ।।

मशवरे काम आते नही प्यार में ।
खुद से' कर तू मिलावट अदा की सनम ।।

शायरी दिलकशी या ग़ज़ल की तरह ।
हुस्न को भी जरूरत हया की सनम ।।

तिल हो' रुख़सार पे आँख हो जाम सी ।
और इक शाम हो बस दुआ की सनम ।।

साँस मिलती अगर यार दीदार से ।
हो जरूरत किसे अब हवा की सनम ।।

कह रहा ये तरुण बात भी मान लो ।
जख्मी' दिल को तमन्ना दवा की सनम ।।

कविराज तरुण सक्षम

Friday, 8 September 2017

ग़ज़ल 32 - मुहब्बत है

ग़ज़ल 32 - मुहब्बत है

221 1222 221 1222

कीमत न लगा दिल की , अरमान-ए-मुहब्बत है ।
बाहों में' अजब राहत , अफसान-ए-मुहब्बत है ।।

मंदिर के' लिये फेरे , मस्जिद का' नमाजी भी ।
इतना ही' खुदा जाना , रमजान-ए-मुहब्बत है ।।

तफ़्तीश-ए-जवानी में , जिस्मो की' नुमाइश है ।
मन साफ़ नज़र वाज़िब , उनवान-ए-मुहब्बत है ।।

कुदरत की' फरस्ती मे , रौनक यही' है साहिब ।
खुशियों की' खियाबां मे , महमान-ए-मुहब्बत है ।।

ज़ाहिर है' हक़ीक़त है , बेज़ान मुसीबत है ।
जिसका न तरुण कोई , तूफ़ान-ए-मुहब्बत है ।।

उनवान - प्रस्तावना
खियाबां - फूलों की बगिया

कविराज तरुण 'सक्षम'

Monday, 4 September 2017

खो गया बचपन

बस्तों किताबों के बोझ तले
रो गया बचपन
इस टू बीएचके फ्लैट में कहीं
खो गया बचपन

सिर पर हाथ माँ फिराये भी कैसे
टच स्क्रीन वाला फोन
हो गया बचपन
जिसपर एक अलग पैटर्न लॉक लगा है
क्या क्या है अंदर अब किसको पता है
चाँद तारों से जगमग आसमां के परे
टू जी थ्री जी की दुनिया मे
सो गया बचपन

हम डाँट खाया करते थे बाहर जाने पर
अब डाँटा करते हैं प्लेस्टेशन लगाने पर
खो-खो कबड्डी गेन्दताड़ी कहाँ अब
सात इंच के गोरिल्ला ग्लास के पीछे
लूडो शतरंज जाने क्या क्या
बो गया बचपन

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 31 बचपन खो गया

ग़ज़ल - बचपन खो गया
बहर - २२१ १२२२ २१२ १२२२

है कागज़ की कश्ती , बारिश का' भी पानी है ।
बचपन तिरी' यादों की , बस इतनी' निशानी है ।।

ये ढ़ेर जो' मिट्टी का , अब हमने' बना डाला ।
गुमनाम हुई इसमें , परियों की' कहानी है ।।

वो पेड़ तिरी डाली , झूमे थे' बहारों मे ।
काले से' अँधेरे मे , सिसकी ये' जवानी है ।।

गुड्डे गुड़िया से अब, हम खेल नही पाते ।
किस मोड़ रुकी आके, सपनो की' रवानी है ।।

हर रात यही सोचे , सूरज कल निकलेगा ।
ओझल इन आँखों से , वो सुबहे' सुहानी है ।।

झगड़े अब बचपन के , वो हमसे' नही होते ।
इकबार ख़फ़ा हो तो , सुननी न मनानी है ।।

पहले सब अपना था , दीवार नही कोई ।
पैसों की' लिखावट में , तक़दीर गँवानी है ।।

उलझन सुलझाने को , थे यार तरुण मेरे ।
हर चोट पे' रो पड़ते , वो बात पुरानी है ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Saturday, 2 September 2017

ग़ज़ल 30- आजा रहबर मिरे

*आजा रहबर मेरे* कविराज तरुण 
212 212 212 212 212 212 212 212

आजा' रहबर मिरे , ख़्वाब के दरमियाँ ,
ये तो' अपनी मुहब्बत की' शुरुआत है ।
फेरी' तुमने जो' हैं , सरसरी सी निगह ,
दिल से' होने लगी दिल की' कुछ बात है ।

रा-स-तों से मिटे , खुद-ब-खुद फ़ासले ,
हम कदम को मिटाकर युं चलने लगे ।
शाम इक जाम सी हो गई है हसीं ,
मुस्कुराने लगे दिल के' हालात हैं ।।

पास में बैठकर, लफ्ज़ दो बोल दो ,
अपनी' आँखों से' पयबंद मय घोल दो ।
हो तुझी में फ़ना , कुछ न तेरे बिना ,
इन लबो पर लबो की ही' नगमात है ।।

दिल मुलाजिम तिरा, हो गया आजकल ,
इक इशारे पे' गुल रोज खिलने लगे ।
रूह की अस्ल में , तुझको' शामिल किया ,
बस मे' अपने नही आज जज़्बात हैं ।।

कह रहा ये तरुण , हमसफ़र तुम मिरे ,
देख लेंगे ज़माना फिकर क्यों करे ।
मै हूँ' तुम हो जहाँ , बस वही आसमां ,
साथ है ये फलक साथ दिनरात है ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'