Friday, 19 January 2018

ग़ज़ल 75 - मेरी बिटिया सयानी

२१२२ २१२२ २१२

जब मिरी बिटिया सयानी हो गई ।
लग रहा जैसे कि नानी हो गई ।।

रोज मुझको टोकती हर बात में ।
चाय से चीनी बे'गानी हो गई ।।

अब दवा को टाल पाता मै नही ।
वक़्त पे खा लूँ कहानी हो गई ।।

योग का रूटीन फॉलो जब किया ।
जिंदगी अपनी दिवानी हो गई ।।

वो हुकूमत कर रही यूँ प्यार से ।
रजकुमारी आज रानी हो गई ।।

है तरुण सच ! रूप माँ का बेटियां ।
देख गीली आबदानी हो गई ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Thursday, 18 January 2018

ग़ज़ल 74 प्यार कर

ग़ज़ल
२१२२ २१२२ २१२

दो मिरी नज़रें तू' दो से चार कर ।
ख़्वाब के ही दरमियां अब प्यार कर ।।

सींक जैसी जिंदगी बारीक है ।
पर्वतों सा तू मिरा आधार कर ।।

मुश्किलों से मामला तुझतक गया ।
कार्यवाही कुछ भली इसबार कर ।।

रात की काली सियाही तेज है ।
आँच से ही रौशिनी साकार कर ।।

मै नही कहता मुहब्बत झूठ है ।
सच मगर इसको कभी तो यार कर ।।

चादरों को भी पसीना आ गया ।
चाहतों की देर तक बौछार कर ।।

आप के आगोश में हैं हसरतें ।
इस *तरुण* को खार से गुलज़ार कर ।।

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Wednesday, 17 January 2018

बाल कथा

विषय - बालकथा

ढील दो ढील दो ढील दो... अरे कैसे पकड़े हो ? छोटा सा काम भी नही आता तुम्हे ... बेवक़ूफ़ ।

भईया बाकी सब तो ठीक है पर ये बेवक़ूफ़ न बोलिये ।

बड़ी जुबान चलने लगी है तेरी । आज पतंग तेरी वजह से कटी तो मैदान के सौ चक्कर लगवाऊंगा ।

... और पतंग कट गई ।

बुलेट की रफ़्तार से चरखी छोड़ मै घर को भागा और पीछे पीछे मेरे बड़े भाई साहब । मुझे पकड़ना मुश्किल ही नही नामुमकिन है और जब पीछे यमदूत पड़ा हो तो भागने में अलग ही मजा है ।

रानू ! रुक जा वर्ना इतना दौड़ा रहा है मुझे । बेटा डबल पिटाई होगी ।

पहले पकड़ो तो फिर मारना । - मैंने बोला और सीधा दीवार फांदके घर के अंदर । पहली मंजिल पर तीसरा कमरा और वहाँ यमदूत को भी झाड़ लगाने वाली मेरी प्यारी माँ ।

उनके पीछे जाकर छुप गया ।

क्या हुआ बेटा ! आज फिर पतंग कट गई और इल्जाम मेरे दुलारे पर आया है ।

हाँ माँ ! भईया जाने कब अपनी गलती का ठीकरा मुझपे फोड़ना छोड़ेंगे ।

ठन ठन ठन --  टिंग टोंग । - बेल की आवाज मेरी धड़कन की रफ़्तार बढ़ा रही थी ।

रुक मै गेट खोलती हूँ - माँ तो माँ है , उन्हें मेरे दिल की धड़कन या रक्तचाप नापने के लिए किसी मशीन की जरुरत नहीं । बुखार तो बिना सर छुये या नब्ज़ देखे बता देती है कि मुझे हुआ है या नही । फिर ये तो रोज का मसला है पर आज भईया अलग ही मूड में हैं । पिछली बार माँ नही थी तब तीन बेल्ट पड़ी थी मुझे और वो बात किसी को बताई भी नही थी । पर आज कोई डर नही है ।

बेल है ये , तुम्हारी मोटर साइकिल का हॉर्न नही है । - बड़बड़ाते हुए माँ ने गेट खोला ।

रानू कहाँ है माँ ? उसने आज मुझसे जुबान लड़ाई है । आज उसे नही छोडूंगा । - भईया चिल्लाते हुए बोले ।

चल बैठ पहले यहाँ और बता ऐसा क्या कह दिया तेरे छोटे भाई ने जो इतना क्रोधित है । - माँ ने कहा

उसने मुझसे जुबान लड़ाई जब मैंने उसे बेवक़ूफ़ कहा और पतंग कटने पर भाग आया यहाँ । मैंने बोला भी कि भागेगा तो बहुत पिटाई होगी तो कहने लगा पहले पकड़ो तो । - एक साँस में भईया ने सब बोल दिया ।

तो इसमें क्या बुराई है रे

माँ उसे फर्जी न बचाओ । आज उसकी गलती है । सजा तो मिलेगी ।

गलती उसकी नही तेरी है । तूने उसे बेवक़ूफ़ बोला , जो वो है नही । क्योंकि अगर होता तो भाग के मेरे पास न आता । और रही बात पकड़ने की तो तुम उसे कभी पकड़ तो पाते नही फिर क्यों पीछा करते हो । मुझे तो लग रहा तुम बेवक़ूफ़ हो । - और माँ हँसने लगी ।

भईया एकदम चुप और तबतक मै भी माँ की हँसी सुनकर वहां आ गया ।

फिर भईया ने जो बोला वो आज भी मेरी आँखे नम कर देता है - माँ मै पीछे इसलिए भागा क्योंकि ये अपनी चप्पल छोड़कर वहाँ से भागा था और मुझे चिंता थी कि कहीं कोई कंकड़ या कांटा न चुभ जाए उसे । भईया के हाथ में अभी भी मेरी चप्पल थी ।

माँ ने मेरी तरफ देखा और उसदिन सच में मेरे पैर में कहीं से कट गया था और तलवे में से खून भी निकल रहा था ।

माँ और मेरी आँखों में आँसू आ गए ।

और भईया से मैंने सॉरी बोला और गले से लिपट गया ।

- कविराज तरुण 'सक्षम'

Monday, 15 January 2018

कवियों का रहस्यवाद

कवियों का रहस्यवाद

सिमट जाता है कभी पलकों में
कभी दरिया बन बह निकलता है
पर्वत लाँघ लेता है क्षण भर में
कभी रेंगता हुआ सा चलता है

काली स्याही ओस की बूँदें पीपल की छाँव
शहर की गलियां टेढ़ी मेढ़े सूना सा गाँव
दिन का उजास रात की कालिमा
चाँद की चाँदनी सूरज की लालिमा
सब देखता है एक ही नज़र से
लिख देता नए भाव इनके असर से
धूल पानी ईंट मिट्टी चहारदीवारी
पेड़ पौधे काँटे फूल ये हरियाली
कभी दरवाजे कभी दरारें
टिमटिमाते हुए नभ के तारे
नदी समंदर ताल ठिकाने
कविता में बनते कितने फ़साने
नायिका से मिलन का प्रेमप्रयाग
विरह में जलती सीने की आग
गोलबंद हुए रिश्तों की खटास
बर्फी लड्डू बताशे मिठास
शब्दो में समेटने को आतुर रहता है
जो कह नही सकता वो भी कहता है

बिदक जाता है खुद की भावनाओं में
तो कभी मुक्त कंठ से शोर करता है
अपनी एक अलग दुनिया बनाने वाला
वो कवि है जो शब्दो में रंग भरता है

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 73 चल दिया

2122 2122 212

आँख से सुरमा चुराकर चल दिया ।
रात फिर बातें बनाकर चल दिया ।।

मै तड़पती ही रही तब याद मे ।
बेरिया जब मुस्कुराकर चल दिया ।।

नींद आ जाये खुदा की खैर हो ।
ख़्वाब मे आके जगाकर चल दिया ।।

प्यार कम है ये नही मै मानती ।
यार मेरा घर बसाकर चल दिया ।।

आहटें दिल की जुबानी आ रहीं ।
धड़कनों मे गुनगुनाकर चल दिया ।।

लौट कर आये शिकायत फिर करूँ ।
हाथ क्यों ऐसे छुड़ाकर चल दिया ।।

कैद कर लूँगी मै' बाहों में तुझे ।
अब 'तरुण' जो पास आकर चल दिया ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

बाल कविता

*बाल कविता*

मेरे घर के अंदर मेरी , बेटी का भी इक संसार है ।
शिनचैन नोबिता डोरेमोन , सबसे उसको प्यार है ।।

अपनी डॉल को लेकर सोती , परवाह उसकी करती है ।
बचपन से ही अलख प्रेम की , देखो कैसे पलती है ।।

खेले खेल खिलौने हरदम , बोले मिशरी सी बोली ।
क्रिसमस ईद दीवाली लोहड़ी , उसके खुशियों की झोली ।।

मन में कोई विकार नही , हर जीव बराबर ही जाने ।
कोरे मन का सुन्दर दर्पण , एकभाव से सब माने ।।

कुछ भी देखे रूप नया , तो प्रश्न सहज ही आते हैं ।
मम्मी! रोज सवेरे उठकर , पापा ऑफिस क्यों जाते हैं।।

देख उसे मै कभी कभी , बचपन में खो जाता हूँ ।
पर खुद को मै पहले से , गिरा हुआ ही पाता हूँ ।।

धर्म जाति नफ़रत लालच , क्या क्या नही बटोरा है ।
मानवमूल्य का धीरे धीरे , खाली पड़ा कटोरा है ।।

काश ! मै बेटी जैसा ही , निःस्वार्थ प्रेम के भाव जगाऊँ ।
यही सोच आती रहती है , जब मै घर मे वापस आऊँ ।।

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Sunday, 14 January 2018

ग़ज़ल 72 धिक्कार है

*नारी की दशा/पीड़ा/अन्याय पर लिखी एक अधूरी ग़ज़ल*

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2122 2122 212

जो समझते प्यार को व्यापार हैं ।
मेरी नज़रों में सभी अय्यार हैं ।।

झाकियें मन में इलाही बोलकर ।
खुद कहेंगे आप भी मक्कार हैं ।।

क्या करूँगा मै फ़ज़ीयत आपकी ।
लोग दुनिया के बहुत होश्यार हैं ।।

लुट रही सड़कों पे' तनहा आबरू ।
छोड़ उसको चल रहे रहगार हैं ।।

आहटें जो दर्द की हैं आ रही ।
अनसुना करते इसे हरबार हैं ।।

खून से लथपथ जो' बेटी रो रही ।
उसकी चीखें आप को धिक्कार हैं ।।

फिर सजा का केस बरसो तक चले ।
सच यहाँ सिस्टम सभी बीमार हैं ।।

बेटियां जिनके घरों मे पूछिये ।
क्या सज़ा के वो सभी हकदार हैं ।।

औरतों पर उठ रही हैं उँगलियाँ ।
आज भी सीता कई लाचार हैं ।।

जीन्स निक्कर टॉप लहँगा साड़ियां ।
कटघरे में कुर्तियां सलवार हैं ।।

जो पहनना हो ये' पहने बोल मत ।
क्षेत्र मे तेरे नही अधिकार हैं ।।

लाडले जब देर से घर आ रहे ।
बाप को सारी हदें स्वीकार हैं ।।

रात जब निकलें किसी घर बेटियां ।
तो तमाशे कर रहे परिवार हैं ।।

भेद ये बोलो मिटेगा क्या कभी ।
किस दुराहे पे तिरे व्यवहार हैं ।।

क्रमशः जारी..... कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 71 देखिये

2122 2122 212

प्यार के किस्से सजाकर देखिये ।
गैर को अपना बनाकर देखिये ।।

बात इतनी सी गुजारिश मै करूँ ।
दिल मे' इक दीपक जलाकर देखिये ।।

वो ख़फ़ा हो जाये तो फिर गम नही ।
सामने से मुस्कुराकर देखिये ।।

कुछ भरोसा भाग्य पर होने लगे ।
हाथ दुश्मन से मिलाकर देखिये ।।

ताज कोई भी बना लेता मगर ।
पत्थरों को खुद उठाकर देखिये ।।

शायरी से बात भी हो जायेगी ।
लफ्ज़ से मोती चुराकर देखिये ।।

दाम इज्जत का नही लग पायेगा ।
हो सके तो अब कमाकर देखिये ।।

चल तरुण अब दर्द पे लिखना भी' क्या ।
है दवा तो फिर खिलाकर देखिये ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 70 पुरानी बात है

2122 2122 212

आज निकली जो पुरानी बात है ।
इन सितारों को दिखानी रात है ।।

बादलों में छुप गया जब चाँद भी ।
इस दिले नादान की वो मात है ।।

मै तमाशे कर न पाया सोचकर ।
वो तमाशे कर कहें शुरुआत है ।।

आस्तीनों में छुपे थे यार कुछ ।
मै समझ बैठा सुखी हालात है ।।

हाल-ए-दिल ना तौलिये यूँ खामखाँ ।
अब किराये पर गया जज्बात है ।।

बोल कौड़ी भाव से यूँ बिक रहे ।
भावना का पेड़ ही बिन पात है ।।

गुनगुनाती धूप क्यों चुप है भला ।
भीगते गम मे तरुण ख्यालात है ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Wednesday, 10 January 2018

हास्य कविता - दामाद (मनहरण घनाक्षरी)

हास्य- दामाद

चाल ढाल ठीक ही थे
देख भाल नीक ही थे
बात बात पे मगर
वो शोखी बघारते ।

आता मेहमान कोई
या फिर सामान कोई
घूर घूर देखकर
कमियां निकालते ।।

एकबार दाल मिली
सास के मकान पर
कुछ काला सा गिरा है
चीख के पुकारते ।

दौड़ी दौड़ी सासू आई
क्या हुआ कहो जमाई
जीरा भुन के यहाँ पे
संग घी के डालते ।।

क्या आये हो विदेश से
या हो किस प्रदेश के
माँ के हाथों का ये खाना
शक से निहारते ।

सम्मान है महान है
जमाई से ही जान है
बेटे से ज्यादा तुमको
प्रिय हम मानते ।।

गुण बड़े बहुत हैं
एक और राख लो जी
दूसरों से पहले ही
खुद में झाँक लो जी ।

देखना फिर तुम्हारा
काम जगमगायेगा
देवता के बाद नाम
आपका ही आयेगा ।।

Friday, 5 January 2018

ग़ज़ल 69 कहानी है

221 1222 221 1222

आँखों के' दुरस्तों से गिरता हुआ' पानी है ।
कोई तो' ये' समझाये कैसी ये' कहानी है ।।

हम जोड़ के' रिश्तों का मुँह मोड़ नही पाये ।
वो छोड़ के' खुश हैं तो बेकार जवानी है ।।

जो घर था' मुहब्बत का फूलों से' सजा मेरे ।
काँटो सी' हुई अब ये दीवार गिरानी है ।।

ऐसा न हो रो दूँ मै पर अश्क़ तेरे निकलें ।
गर प्यार था' लफ्ज़ो मे कीमत तो' चुकानी है ।।

जो ख़्वाब चला मेरा रातों के' अँधेरों मे ।
चौखट पे' तिरी उसको अब रात बितानी है ।।

ताबूत मे' रख लेना ख़त यार मिरे बेशक ।
जो शब्द पुकारेंगे आवाज़ तो' आनी है ।।

दिलदार *तरुण* कोई हर बार नही बनता ।
इन वक़्त की' शाखों से तकदीर चुरानी है ।।

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Saturday, 23 December 2017

मेरे बालाजी महाराजे

मेरे बालाजी महाराजे

महाकाय तुम परमवीर हे पवनपुत्र अविनाशी
परविद्या परिहार करो तुम जामवंत वनवासी

कपिसेना-नायक , रामदूत तुम , वज्रकाय बलशाली
हुई स्वर्ण नगर की ईंटे तेरे क्रोधरूप से काली

दैत्य विघातक मुद्रप्रदायक अंजनि के मारुति लाला
आगे तेरे कौन टिका प्रभु तू जग का रखवाला

सालासर से घूम बनारस पंचमुखी तुम स्वामी
मेहंदीपुर और चित्रकूट संकटमोचन की निशानी

हनुमानगढ़ी में सीढ़ी चढ़कर दर्शन पाया तेरा
बेट द्वारका दंडी मंदिर में तेरा ही बसेरा

यंत्रोद्धारक बालचंद्र हे महावीर अति भोले
गिरजाबंध में रूप माधुरी मन को मेरे मोहे

रुद्र रूप मे शिव अवतारी बालाजी महाराजे
नाम से तेरे भूत प्रेत भी थरथर करके कांपे

मै शीश नंवाकर करता वंदन भिक्षा दे दो न
यही सत्य हे अमरदेव तू जग का हर कोना

तू जग का हर कोना
मेरे बालाजी ... महाराजे
मेरे बालाजी ... महाराजे

कविराज तरुण

Thursday, 21 December 2017

ग़ज़ल 68 कहाँ कहाँ

1212 1212 1212 1212

कहाँ कहाँ चलूँ ज़रा कहाँ कहाँ रुका करूँ ।
कहाँ कहाँ तनूं भला कहाँ कहाँ दबा करूँ ।।

ये' जिंदगी ही' जानती कि ठौर है कहाँ कहाँ ।
किवाड़ पर खड़ा खड़ा डरा डरा लुका करूँ ।।

गली-गली जली-जली कली-कली लुटी हुई ।
मै' मूक ही दिवार की दरार मे पिसा करूँ ।।

शनै शनै कदम बढ़े शनै शनै प्रयास हो ।
मै' तलहटी मे' डूबकर उभार ले उठा करूँ ।।

नमी मिली कमी मिली निगाह भी थमी मिली ।
गये तरुण वो' इसतरह कहो कहाँ वफा करूँ ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Tuesday, 19 December 2017

बालाजी

ओ मेरे बालाजी मुझको आपकी दरकार है ।
तूही मालिक रूह का तूही असल सरकार है ।।
ओ मेरे बालाजी मुझको
ओ मेरे बालाजी मुझको
आपकी दरकार है ।
तूही मालिक रूह का तूही असल सरकार है ।।

रश्म-ए-उल्फ़त को निभाते जिस्म पत्थर हो गया ।
जो मिले तेरी कृपा हर ज़ख्म फिर स्वीकार है ।।
ओ मेरे बालाजी मुझको आपकी दरकार है ।
हाँ आपकी दरकार है
जी आपकी दरकार है
तूही मालिक रूह का तूही असल सरकार है ।।

बालाजी ओ मेरे बालाजी (2)
बालाजी बालाजी बालाजी
बालाजी बालाजी बालाजी

बालाजी मेरे मन के द्वारे आला जी
बालाजी बालाजी बालाजी
मेरी खुशियों का बस इक तू निवाला जी
बालाजी बालाजी बालाजी
बालाजी मेरे मन के द्वारे आला जी
बालाजी बालाजी बालाजी
मेरी खुशियों का बस इक तू निवाला जी
बालाजी बालाजी बालाजी

ऊँची कोठी बनाई मेरे किस काम की
कागज़ों की कमाई मेरे किस काम की

ऊँची कोठी बनाई मेरे किस काम की
कागज़ों की कमाई मेरे किस काम की

बालाजी बालाजी बालाजी

मैंने खोटे किये हैं सारे दिनरात भी
कितनी चोटे लगी हैं और आघात भी

बालाजी बालाजी बालाजी

बस तेरा सहारा खोजता फिर रहा
तूने जितना चलाया मै बस उतना चला
चल रहा बालाजी
चल रहा बालाजी
बालाजी बालाजी बालाजी

बालाजी मेरे मन के द्वारे आला जी
बालाजी बालाजी बालाजी
मेरी खुशियों का बस इक तू निवाला जी
बालाजी बालाजी बालाजी

तेरे कदमो में झुकाकर शीश अब मै गा रहा ।
है तरुण अखिलेश चोटिल तू रहम संसार है ।।

ओ मेरे बालाजी मुझको आपकी दरकार है ।
तूही मालिक रूह का तूही असल सरकार है ।।
ओ मेरे बालाजी मुझको
ओ मेरे बालाजी मुझको
आपकी दरकार है ।
तूही मालिक रूह का तूही असल सरकार है ।।

तूही असल सरकार है ।
मुझे आपकी दरकार है ।।

बालाजी ओ मेरे बालाजी (2)
बालाजी बालाजी बालाजी
बालाजी बालाजी बालाजी

Saturday, 16 December 2017

ग़ज़ल 67 लुट गयी

212 212 212 212

चाँद खामोश था चाँदनी लुट गयी ।
साथ तेरा छुटा जिंदगी लुट गयी ।।

कह न पाये कभी दिल मिरा कह रहा ।
इन लबों की कसम रागिनी लुट गयी ।।

हाल फिलहाल मे हाल मिलता नही ।
वो ख़फ़ा यूँ हुये आशिक़ी लुट गयी ।।

सीरतें जब दिखी बात ही बात मे ।
नूर झड़ सा गया सादगी लुट गयी।।

चल तरुण छोड़ दे जो वहम पल रहा ।
चश्म-ए-दिल खुल गया रोशिनी लुट गयी ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Wednesday, 6 December 2017

ग़ज़ल 66 दम निकले

1222 1222 1222 1222

बहारे हुस्न के आखिर दिवाने कब ही' कम निकले ।
जिसे सोचा शराफत की इमारत वो' हरम निकले ।।

यही हम सोचते थे वो कभी कुछ कर नही सकते ।
सलीखे जिंदगी में आज आगे दस कदम निकले ।।

फरेबी दिल की आदत को कभी मै भाँप ना पाया ।
सियारो के लिबासों में मुजाहिद बेशरम निकले ।।

बना कर ताल बादल से मै' पानी मांगकर लाया ।
जली यों आग सीने मे सभी मौसम गरम निकले ।।

नही ऊँचा हुआ है कद उन्हें नीचा दिखाने से ।
करो कुछ इसकदर कोशिश तरुण मंजिल पे' दम निकले ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Tuesday, 5 December 2017

ग़ज़ल 65 सनम निकले

1222 1222 1222 1222

गली मेरी पकड़के जब लिये डोली सनम निकले ।
किसी मय्यत के' जैसे ही मिरे सारे वहम निकले ।।

किधर से ख़्वाब आये थे किधर जाने चले हमदम ।
नमी आँखों मे' लेकर के बड़े मायूस हम निकले ।।

सदाकत औ नज़ाक़त में नही उनका कोई सानी ।
न जाने किस खुमारी में वो' इतने बेरहम निकले ।।

बिना वजहें उन्हें मै दोष देता ही चला आया ।
खुली जब आँख दिन में तो मिरे सारे करम निकले ।।

सुराही प्यार की फूटी चुराने जब लगे नजरें ।
तरुण बेबस ठिकानों पे सिसकते से ही' गम निकले ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 64 तीन तलाक और हलाला

विषय - तीन तलाक और हलाला

1222 1222 1222 1222

उगा जो फूल गुलशन में शरारा हो गया होता ।
अगर जागे नही होते हलाला हो गया होता ।।

करो घुसपैठ रिश्ते में शरम तुमको नही काजी ।
बनाते रश्म ना ऐसी बहारा हो गया होता ।।

पता है तीन लफ्ज़ो मे हया के तार हिलते हैं ।
सियासी खेल से कबका किनारा हो गया होता ।।

कुहासे में घने तुम हो तुम्हारी सोच बेगैरत ।
नही करते जो' ये हरकत उजाला हो गया होता ।।

तरुण बोले कहा ये मान लो बीवी करो इज्जत ।
खुदा का फिर तुम्हे बेशक सहारा हो गया होता ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Monday, 4 December 2017

ग़ज़ल 63 किरदार

2122 2122 2122 212

देखिये इस शहर में , सबका अलग किरदार है ।
दिख रहा है ठीक जो, वो ही असल बीमार है ।।

बेसबर गरजा किये, उन बादलों को क्या पता ।
जो बरस कर झर गये, वो मेघ ही स्वीकार है ।।

जीत के उन्माद में , वो दावतें करता रहा ।
हार अपनों को मिली , तो जीत भी वो हार है ।।

नफरतों के दौर मे जब सरफ़रोशी हो रही ।
तो गुलामी की हदों का आज भी अधिकार है ।।

व्यर्थ क्रंदन के स्वरों का डाकिया बनकर लगा ।
हर उदासी का मुखौटा बेहुदा मक्कार है।।

था तमाशा यार का भी , था भरोसा प्यार पर ।
उलझनों से बच निकल तो , आशिक़ी साकार है ।।

हसरतों का खामियाजा , तब भुगतना आप को ।
जब किराये पर खड़ी हर , रश्म ही व्यापार है ।।

मै जुलूसे इश्क़ की फिर , पैरवी करने चला ।
हर मुलाजिम हुस्न का ये जानिये गद्दार है ।।

इन गुलों गुलफ़ाम को माना मुहब्बत आपसे ।
कंटको से हो गये हम सुर्ख शाखें यार है ।।

आरजू भी इसतरह से कर रहे वो भोर की ।
लग रहा है रोशिनी की सूर्य को दरकार है ।।

गर इजाज़त माँगती तो जिंदगी शिकवे करूँ ।
बिन इजाज़त बात कहना भी यहाँ दुश्वार है ।।

जश्न का ये सिलसिला घर में चला जो रातदिन ।
कर भलाई दूसरों की जश्न फिर संसार है ।।

भूख जाने किस गली से आज दस्तक दे रही ।
वो सड़क पर ही ठिठुर के मौत को तैयार है ।।

इन गरीबों की रे' किस्मत चाख दिल हैं एक सब ।
सिसकियाँ ही हर्फ़ हैं औ हिचकियाँ अशआर है ।।

वो दिखावे को बसा के जाप मंतर यूँ करें ।
उस खुदा के ठौर का जैसे वही हक़दार है ।।

मै किराया जिस्म का इस रूह से लेता रहा ।
था अचंभा जिंदगी को मौत ही फनकार है ।।

जो खुदा के नाम पर खुद का भला करने लगा ।
शक्ल कैसी भी हो' उसकी नस्ल तो अय्यार है ।।

बादशाही कब रही इंसान की इंसान पे ।
वो हि मालिक वो प्रदाता वो असल सरकार है ।।

ग़ज़ल 62

ग़ज़ल - छीन लेती है
1222 1222 1222 1222

सनम अक्सर मिरे दिल की शराफत छीन लेती है ।
चली आती है' ख्वाबों मे मुहब्बत छीन लेती है ।।

जुबां की चासनी जब अर्क सी होंठो तले आये ।
किसी दिलकश मिठाई सी हलावत छीन लेती है ।।

गुज़ारिश और बारिश की अदा है एक जैसी ही।
बरसते हैं बिना मौसम इजाज़त छीन लेती है ।।

सिफारिश कर नही सकते रजामंदी नही मिलती ।
कि छत पे चाँद आ जाये इनायत छीन लेती है ।।

तरुण बेख़ौफ़ लिखता है मगर कुछ कह नही पाता ।
निगाहों की रुबाई को नज़ाकत छीन लेती है ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 61 प्यार है

ग़ज़ल - प्यार है
2122 2122 2122 212

क़िस्त में मिलता रहा जो उस हसीं का प्यार है ।
देखिये कबतक जुड़ेगा हाल-ए-दिल का तार है ।।

मै मुहब्बत थोक मे उसपर लुटाता फिर रहा ।
खार मे जब पाँव है तो सामने गुलजार है ।।

बेअदब है बेमुरव्वत बेहया पर है नही ।
उस सनम का जानिये कुछ तो अलग किरदार है ।।

चौक पर घंटो बिताये चाँदनी गिरने लगी ।
नूर जब वो दिख गया लगने लगा उपहार है ।।

हो 'तरुण' कुछ इसतरह उसकी इनायत रात मे ।
ख़्वाब आँखों पर सजे यों मानिये श्रृंगार है ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Friday, 17 November 2017

बचपन और जवानी संशोधित

बचपन और जवानी (संशोधित)

सावन के झूले बारिश का पानी
पतझड़ के पत्ते, किस्‍से-कहानी

ओस की बूंदों पर किरणों का नाच
भारी पतंगों पर मांझे का कांच

उंगली के इशारों पर नाच रहा कंचा
गली के नुक्कड़ पर चाक़ू-तमंचा

बतरस के लट्टू में नाच रहे बच्चे
नमक से खा डाले आम कई कच्चे

नरमी पुरवाई की, ऋतुऍं सुहानी
बचपन सवालों का उत्‍तर जवानी

बे-परवाही में खूब जिया जीवन
आवारापन में ही मस्‍त रहा यौवन

चंदा की चांदनी में छत पर उजास
मिलने पर भारी है मिलने की आस

लैलाओं की गलियों मजनू के मेले
भीड़ में रहकर भी सब हैं अकेले

कौन है चंदा कौन है चकोर
समझ नहीं पाए और हो गई भोर

सुनहरे सपनों की ऊँची उड़ान
ऑंखों में हरदम नीला आसमान

लेकिन जब धरती पर नजरें झुकाईं
पर्वतों के बीच दिखी गहरी सी खाई

माँ के आँचल में दुखों का पहाड़
ऑंखों के पानी से गल रहा हाड़

वोटों के बैंक या ताशों की गड्डी
बच्‍चों के गालों पर उभर आई हड्डी

रिश्‍तों और नातों में आई खटास
ऐसे निभाते ज्‍यों ढोते हों लाश

कितनी घिनौनी है सच की कहानी
झूठा है बचपन और झूठी जवानी

Monday, 6 November 2017

ग़ज़ल 60 बेजुबाँ

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महफिलों में रहा बेजुबाँ की तरह ।
बादलों से ढके आसमाँ की तरह ।।

कोई' तस्वीर तेरी दिखाता नही ।
जिंदगी हो गई अब धुआँ की तरह ।।

कहकशे खूब लगते थे' हर बात पे ।
आज बातें हुई खामखाँ की तरह ।।

सुन के आता रहा चीख़ दीवार पर ।
दिल हुआ खंडहर के मकाँ की तरह ।।

उन निगाहों ने' रुसवा किया यूँ *तरुण* ।
ख़ुश्क सा फिर हुआ मै खिजाँ की तरह ।।

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Saturday, 4 November 2017

ग़ज़ल 59 इश्क़ की दौलत


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जो भी' दिल की' दौलत है इश्क़ की बदौलत है ।
आ ज़रा निगाहों में इसमे' बस मुहब्बत है ।।

खामखाँ करे बातें अपने आप से ही हम ।
नूर सा हसीं चहरा फूल सी नज़ाकत है ।।

है ख़फ़ा ख़ुदा मुझसे तुझको जो खुदा माना ।
इश्क़ है मिरा मज़हब इश्क़ ही इबादत है ।।

बेदिली न दिल समझे बेरुखी न हो पाये ।
हर अदा नवाजी है आशिक़ी इनायत है ।।

नाम तेरा' ले लेकर जी रहा *तरुण* ऐसे ।
साँस मुझको' लेने की अब कहाँ जरूरत है ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Wednesday, 1 November 2017

ग़ज़ल 58 बेतुकी मुहब्बत

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बेतुकी मुहब्बत का आज ये जमाना है ।
खामखाँ हसीनो से क्यों नज़र मिलाना है ।।

टूटकर बिखरते हैं ख़्वाब आशियानें के ।
दिल लुटाके' गैरों पे घर कहाँ बनाना है ।।

आशिक़ी फरेबी है जान पर भी' आ जाये ।
अश्क़ से भरा रहता इसमे' आबदाना है ।।

राह मुश्किलों की है हरतरफ सवाली हैं ।
घूरती निगाहों का रोज ही फ़साना है ।।

जो तरुण मुनासिब हो इश्क़ में नही होता ।
डूबकर के' दरिया मे पार तुझको' जाना है ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'