Tuesday, 1 May 2018

अभ्युदय काव्यमाला

*अभ्युदय काव्यमाला*

जलतरंग का कलकल करता स्वर
नीले दर्पण में लालिमा का प्रादुर्भाव
जिसमे स्वर्ण सा चमकता सूर्य का रूप
और आशा की किरण का असीम प्रभाव

खगस्वरों से गूंजित संपूर्ण वायुमंडल
पानी में पुष्प का बिखरता स्वभाव
जिसमे तरु-पल्लव का निःस्वार्थ समर्पण
जैसे तैरती है नदी में बहकी हुई नाँव

इन्ही संवेदनाओं की अतुलित भाव भंगिमा
जब कागज़ पर उतरकर उदघोष करती है
तब उदित होता है एक नवीन प्रकाश
कलम नए जोश में तब प्राण भरती है

इन्ही भावों का प्रमाण है अभ्युदय काव्यमाला
इन्ही विचारों का प्राण है अभ्युदय काव्यमाला

कविराज तरुण 'सक्षम'

Saturday, 28 April 2018

ग़ज़ल 94 - स्वावलंबन


विषय - स्वावलंबन

1222 1222 1222 1222

कभी बिन बात के हँसना कभी बिन बात के क्रंदन ।
यही कोशिश रहे मेरी महकता ही रहे चन्दन ।।

मै रश्मो को निभाता हूँ किसी माली के फूलों सा ।
नही कोई शिकायत है कि बचपन हो या हो यौवन ।।

जुड़ी जब ईंट से ईंटें तभी दीवार बन पाई ।
यही इक सीख लेकर के सँवरता ही रहा जीवन ।।

न महनत से बड़ा कोई न किस्मत से गिला कोई ।
कमाई खूँ पसीने की सजी बहतर मेरे आँगन ।।

सितारों से फलक अपना सजाने की नही चाहत ।
लिखूं खुद की कहानी यूँ *तरुण* पतझड़ मे ज्यों सावन ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Monday, 23 April 2018

प्रिय मिलन

प्रियमिलन

कोटि कोटि देख द्वार
नख शिख है श्रृंगार
दृष्टि में असीम प्यार
प्रिय को पुकारती ।

एकटक ही वो नार
पट खोल बार बार
दूर तक आर पार
पंथ को निहारती ।।

नैन जो हुये हैं चार
ख़ुशी अगम अपार
प्रेमरस की फुहार
आँख से निकालती ।

हृदय के तंतु तार
तनमन के विचार
रक्त की प्रत्येक धार
जैसे करें आरती ।।

कविराज तरुण

Saturday, 21 April 2018

ग़ज़ल 93- दुनिया

ग़ज़ल - दुनिया

122 122 122 122
सुबह शाम रंगत बदलती है दुनिया
कलेवर नये रोज गढ़ती है दुनिया

कभी हार तो जीत मिलती यहाँ पर
ये अपने हिसाबो से चलती है दुनिया

कमाया है क्या औ लुटाया है कितना
इसी कश्म-ओ-कश में उलझती है दुनिया

है चित और पट दोनो इसके हवाले
अचानक ही पासा पलटती है दुनिया

दिली बेदिली हो वफ़ा बेवफा हो
ये बिन बादलों के बरसती है दुनिया

लिफ़ाफ़े मे खत इसके कितने तरह के
बुरा वक़्त आते ही पढ़ती है दुनिया

कभी साथ देती कभी छोड़ देती
'तरुण' सब तमाशे ये करती है दुनिया

कविराज तरुण

Saturday, 7 April 2018

बैंककर्मी

सवाल तो ये चौंकाता है , जब कोई पूँछ बैठता है कि बैंक में आपकी छुट्टी का टाइम क्या है ?

एक उम्र बीत गई घर पे शाम बिताये हुए
और वो कहते हैं आज मौसम सुहाना है
काम काम और सिर्फ काम में जिंदगी है
हमसे बेहतर तो परिंदों का ठिकाना है
लौट आते है हर शाम वो अपने घोंसलों में
दिन की थकान को बच्चों संग मिटाना है
अब तो लोगों ने इंतज़ार हमारा छोड़ दिया
घूमने जाने का सपना परिवार ने छोड़ दिया
नियम क्या बनायें अपना समय कैसे बतायें
खुद ही मालूम कहाँ कि वापस कब जाना है
एक उम्र बीत गई घर पे शाम बिताये हुए
और वो कहते हैं आज मौसम सुहाना है

कविराज तरुण । 9451348935

Sunday, 18 March 2018

भावगीत

भाव हों पुनीत गीत
प्रेम वायु कोश हो ।
आचमन से पहले वाला
न ही कोई दोष हो ।।

साथ में कदम बढ़े
समर्थ फिर प्रयास हो ।
दिल की तेरे तलहटी में
मेरा ही निवास हो ।।

चाहतों के पुन्य दीप
जल गये तो मौज हो ।
भाव हों पुनीत गीत
प्रेम वायु कोश हो ।।

चंद्र चाँदनी चपल
चले कहाँ ये रात मे ।
दर्प यामिनी नवल
है बादलों के साथ मे ।।

है मिलन सटीक मीत
इंद्रियों मे जोश हो ।
भाव हों पुनीत गीत
प्रेम वायु कोश हो ।।

श्याम संग राधिका
हैं बाँसुरी बजा रहीं ।
वृंद की लतायें पुष्प
गीतिका सी गा रहीं ।।

ओर छोर भीगे प्रीत
लुप्त सा ही होश हो ।
भाव हों पुनीत गीत
प्रेम वायु कोश हो ।।

नेत्र के विशाल पट
खोल के कयास लो ।
स्वप्न के परे चलो
यतार्थ प्रेम बाच लो ।

वाणी हो मधुर हृदय
न कोई गतिरोध हो ।
भाव हों पुनीत गीत
प्रेम वायु कोश हो ।।

देखा देखी और दिखावा
कुछ न काम आयेगा ।
शुद्ध है जो मन नही
तो प्यार टूट जायेगा ।

हो सत्य निष्ठ कर्म नीति
न कलश न रोष हो ।
भाव हों पुनीत गीत
प्रेम वायु कोश हो ।।

Sunday, 4 March 2018

ग़ज़ल 92 अब फ़िजा में बहार कौन करे

2122 1212 22/112

अब फ़िजा में बहार कौन करे
इसकदर इंतज़ार कौन करे

छोड़ के जा रहे तुम्हें अब हम
बेवज़ा प्यार व्यार कौन करे

ग़ज़ल 91 गली तेरी पकड़ के हम कभी जब भी गुजरते हैं

1222 1222 1222 1222

गली तेरी पकड़ के हम कभी जब भी गुजरते हैं ।
जुबां ख़ामोश रहती है कदम अक्सर फिसलते हैं ।।

नही नजरें मिलाते हम डरें शायद ज़माने से ।
मगर चाहत लिये भीतर जवां दो दिल मचलते हैं ।।

इनायत देख हूँ हैरां मुहब्बत के खुदा तेरी ।
इधर वो घर से चलते हैं उधर बादल बरसते हैं ।।

ये शोखी और उसपर गाल में तेरे पड़ा डिम्पल ।
मेरे अरमा उसी में डूबकर बाहर निकलते हैं ।।

तरुण मुझको यकीनी बात पे भी है यही मसला ।
वो मेरा नाम लेने में भरी महफ़िल हिचकते हैं ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Saturday, 3 March 2018

नेता हास्य

हास्य/व्यंग - नेता

न इत था न उत था
लंगोटी में बुत था
जुबां चल रही थी
नशे में भी धुत था

वो ऊपर मै नीचे
गनर दो ठौ पीछे
बोलूँ तो डर हो
जुबां को न खींचे

कहा उसने भाया
कि क्या काम आया
क्यों इतने हो व्याकुल
चढ़ा कोई साया ?

न साया न प्रेत
सूखा है खेत
बिजली नही है
गमो की चपेट

मै बोला ओ मालिक
रहम की सिफारिश
न सुविधा न बारिश
करूँ क्या गुजारिश

करो कुछ तो बेहतर
सड़क भी नही है
न दवा का ठिकाना
क्या ये सही है

विद्यालय की दूरी
कई मील पर है
सर तो कई हैं
नही कोई घर है

झल्लाकर के नेता
गुस्से से देखा
मेरे गाल पे फिर
पड़ा एक चपेटा

वो बोला मै कोई
विधाता नही हूँ
बिना कुछ दिये
सीट पाता नही हूँ

चुनाव के चक्कर मे
उधारी हुई है
जन्नत की तब ये
सवारी हुई है

मै बोला वहीं
दोनों हाथ जोड़े
इंसां भी बन लो
ज़रा थोड़े थोड़े

बड़े प्यार से तुम
वोट हमसे चुराते
और जब काम आये
तो हमको डराते

नही होगी अब ये
गलती दोबारा
खुदा भी न देंगे
अब तुमको सहारा

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 90 देखिये इस शहर में , सबका अलग किरदार है

2122 2122 2122 212

देखिये इस शहर में , सबका अलग किरदार है ।
दिख रहा है ठीक जो, वो ही असल बीमार है ।।

बेसबर गरजा किये, उन बादलों को क्या पता ।
जो बरस कर झर गये, वो मेघ ही स्वीकार है ।।

जीत के उन्माद में , वो दावतें करता रहा ।
हार अपनों को मिली , तो जीत भी वो हार है ।।

नफरतों के दौर मे जब सरफ़रोशी हो रही ।
तो गुलामी की हदों का आज भी अधिकार है ।।

व्यर्थ क्रंदन के स्वरों का डाकिया बनकर लगा ।
हर उदासी का मुखौटा बेहुदा मक्कार है।।

था तमाशा यार का भी , था भरोसा प्यार पर ।
उलझनों से बच निकल तो , आशिक़ी साकार है ।।

हसरतों का खामियाजा , तब भुगतना आप को ।
जब किराये पर खड़ी हर , रश्म ही व्यापार है ।।

मै जुलूसे इश्क़ की फिर , पैरवी करने चला ।
हर मुलाजिम हुस्न का ये जानिये गद्दार है ।।

इन गुलों गुलफ़ाम को माना मुहब्बत आपसे ।
हम खिजां से हो गये हम सुर्ख शाखें यार है ।।

आरजू भी इसतरह से कर रहे वो भोर की ।
लग रहा है रोशिनी की सूर्य को दरकार है ।।

गर इजाज़त माँगती तो जिंदगी शिकवे करूँ ।
बिन इजाज़त बात कहना भी यहाँ दुश्वार है ।।

जश्न का ये सिलसिला घर में चला जो रातदिन ।
कर भलाई दूसरों की जश्न फिर संसार है ।।

भूख जाने किस गली से आज दस्तक दे रही ।
वो सड़क पर ही ठिठुर के मौत को तैयार है ।।

इन गरीबों की रे' किस्मत चाख दिल हैं एक सब ।
सिसकियाँ ही हर्फ़ हैं औ हिचकियाँ अशआर है ।।

वो दिखावे को बसा के जाप मंतर यूँ करें ।
उस खुदा के ठौर का जैसे वही हक़दार है ।।

मै किराया जिस्म का इस रूह से लेता रहा ।
था अचंभा जिंदगी को मौत ही फनकार है ।।

जो खुदा के नाम पर खुद का भला करने लगा ।
शक्ल कैसी भी हो' उसकी नस्ल तो अय्यार है ।।

बादशाही कब रही इंसान की इंसान पे ।
वो ही मालिक वो ही कुदरत वो असल सरकार है ।।

Thursday, 22 February 2018

यादों की तिजोरी

यादों की तिजोरी

यादों की तिजोरी को खोला तो पाया
तेरे लिखे हुए ख़त वैसे ही धरे हैं
जिसपर मेरे आंसुओं के मोती साबुत बचे हैं
तेरा दिया कोई फूल मुरझाया नहीं है
हाँ ये सच है एक अरसे से ये मुस्कुराया नहीं है
तेरी शोखी तेरा अंदाज़ बंद इस तिजोरी मे
संग जीने मरने का भी ख्वाब बंद इस तिजोरी मे
तेरे कदमों की आहट इसके दरवाज़े को पता है
इसके आईने मे तेरा चेहरा अब भी सजा है
तेरी हँसी से रंगा है मैंने इसकी दीवारों को
अपनी उदासी से भरा है इसकी दरारों को
तेरी महक आज भी सलामत है इसमे
तेरी कसमे तेरे वादे अमानत हैं इसमे
आरज़ू हसरतो की इसमे एक चाभी लगाईं है
इस ज़माने से कहीं दूर ये तिजोरी छुपाई है
यादों की तिजोरी को खोला तो पाया ...

--- कविराज तरुण

ग़ज़ल 89 आप आये तो आशिक़ी आई

ग़ज़ल 89- चली आई

2122 1212 22

आप आये तो आशिक़ी आई ।
चाँद से मिलने चाँदनी आई ।।

फूल खिलने लगे दिलों के भी ।
साथ बारिश भी दिलनशी आई ।।

राह से मुश्किलें फ़ना करके ।
मंजिलें खुद-ब-खुद चली आई ।।

खामखाँ जी रहे अँधेरे में ।
तुम जो आये तो रोशिनी आई ।।

तार उलझे हमारी नजरो के ।
तो जवां दिल में सरसरी आई ।।

उम्र कुछ इसतरह बढ़ी मेरी ।
मुद्दतों बाद जिंदगी आई ।।

हाँ *तरुण* इश्क़ ये मुबारक हो ।
छोड़ के आसमाँ परी आई ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 88 - करो न करो

ग़ज़ल 88 - करो न करो

2122 1212 22

ऐ सनम प्यार तुम करो न करो ।
मुझपे एतबार तुम करो न करो ।।

सच तो इकदिन नज़र ही आयेगा ।
झूठे अशआर तुम करो न करो।।

धागा टूटे तो जुड़ नही पाये ।
गाँठ हरबार तुम करो न करो ।।

इश्क़ में रूह मोल रखती है ।
चाहे श्रृंगार तुम करो न करो ।।

ये मुहब्बत है आइना दिल का ।
मुझको बेज़ार तुम करो न करो ।।

जो *तरुण* होगा दिख भी जायेगा ।
वादे दो चार तुम करो न करो ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

विषय - कर्म और भाग्य

विषय - कर्म और भाग्य

कर्म कांड को जो नहि माने , जीवन उसका है धिक्कार ।
आलस निद्रा मोह बेकारी , सपनो का करता परिहार ।।

जिजीविषा जो मन में नाही , जीना उसका घोर उधार ।
भाग्य वही हाथन में सोहे , श्रम का जो करता श्रृंगार ।।

अभ्यासों का मोल अनोखा , कर लो भाई तनिक विचार ।
कर कर के ही सफल सितारा , आसमान करता है पार ।।

छोड़ो थकन भरी बीमारी , कर्म करो उज्ज्वल साकार ।
जीत तुम्हारी सहभागी है , साथी सारा ये संसार ।।

बढ़े चलो तुम लक्ष्य बनाकर , पथ को अपने दो विस्तार ।
यही सत्य जीवन का वीरे , कर्म बिना सब है बेकार ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Sunday, 18 February 2018

ग़ज़ल 86 कहानी कहानी है बिखरी हुई

212 212 212 212 212 212 212 212

ख़्वाब आये सनम और हवा हो गये , बस कहानी कहानी है बिखरी हुई ।
हाथ उनका सम्हाला किसी और ने , ये जवानी जवानी है बिखरी हुई ।।

साथ दे दो मेरा यूँ न जाओ सनम , साहिलों की रवानी है बिखरी हुई ।
फूल रुसवा हुये बाग़ भी जल गये , अब मेरी बागबानी है बिखरी हुई ।।

बारिशों में करीं बात गुम हो गई , पत्थरों पे मुलाकात गुम हो गई ।
जो खुरच के बनाये थे हमने निशां , वो निशानी निशानी है बिखरी हुई ।।

तुम तो कहते थे होगे जुदा अब नही , पास मे ही रहोगे उमर भर यहीं ।
छोड़ कर चल दिये बीच ही राह मे , सारी बातें पुरानी है बिखरी हुई ।।

चाँद पर था बिठाया तुझे प्यार मे , और कुछ भी नही मेरे संसार मे ।
आज ओझल सितारा तरुण हो गया , चांदिनी ये दिवानी है बिखरी हुई ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Wednesday, 7 February 2018

ग़ज़ल 87 मुमताज

221 2122 221 2122

वो बनके मेरी रानी मुमताज हो न जाये ।
ढपली बना कहीं वो फिर साज हो न जाये ।।

बेमेल की मुहब्बत माना तेरी हमारी ।
जो मै करूँ शिकायत नाराज हो न जाये ।।

परिवार ने बिछाया सिर पर मेरे बिछौना ।
मै दब रहा हूँ इसमें अब खाज हो न जाये ।।

किस्मत में ये लिखा था आयेगा वक़्त खोटा ।
बस डर यही है साहब ये आज हो न जाये ।।

मुँह बाँध कर ही आना घर में तरुण हमारे ।
ऐसा न हो तमाचे आगाज हो न जाये ।।

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

मिलन का अवसर कैसे होगा

प्रसिद्द हास्य कविता ' मुश्किल है अपना मेल प्रिये , ये प्यार नही है खेल प्रिये ' की तर्ज पर लिखी मेरी ये हास्य रचना-
   मिलन का अवसर कैसे होगा
-------------------------

मै पतझड़ का सूखा पत्ता
सावन का तुम पुष्प गुलाबी ।
सिगरेट की मै धुंध कालिमा
आँखों का मेरे हाल शराबी ।।
चंचल चितवन यौवन तेरा
तुझमे कोई नही खराबी ।
किस्मत से मै बेघर बेचारा
तुम खुलजा सिमसिम वाली चाबी ।।

*अब मिलन का अवसर कैसे होगा*
*नही बनेंगे अब ठाट नवाबी ।।*

तुम विटामिन बी की गोली
मै बीज करेले वाला हूँ ।
तुम शोरूम ऑडी वाला हो
मै पानठेला मतवाला हूँ ।।
मै कुरूप घनघोर धूप
काजल से भी गहरा काला हूँ ।
तुम मदनमोहिनी नवल कामिनी
मै मकड़ी का जाला हूँ ।।

*अब मिलन का अवसर कैसे होगा*
*मै काटों की वरमाला हूँ ।।*

मै बूढ़ा सा सांड सरफिरा
तेरी हिरनी जैसी काया है ।
मै देशी ठर्रा पन्नी वाला
तू काजू कतली की माया है ।।
मै गर्मी से बेहाल पसीना
तू साँझ सुहानी छाया है ।
श्रृंगार बिना ही तू जँचती
मेरी हर कोशिश ही जाया है ।।
*अब मिलन का अवसर कैसे होगा*
*क्या अम्बर धरती पर आया है ।।*

मै ट्रेन की सीटी जैसा कर्कश
अरिजीत का गाना तुम हो ।
पहचान कुपोषण वाली मेरी
काजू किसमिस का दाना तुम हो ।।
मै पेट बाँध के सोने वाला
और होटल का खाना तुम हो ।
कभी कभी मै हँसने वाला
जो हँस दे वो रोजाना तुम हो ।।

*अब मिलन का अवसर कैसे होगा*
*मै मुजरिम और थाना तुम हो ।।*

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Tuesday, 6 February 2018

ग़ज़ल 84 गये हैं

221 2122 221 2122

कुछ इसतरह वो आकर दिल में उतर गये हैं ।
हालात प्यार वाले लगता सुधर गये हैं ।।

फिर रात की सियाही खुद गुमशुदा हुई है ।
गम के गुबार देखो जाने किधर गये हैं ।।

मै जी गया हूँ फिर से हँसने लगी फिजायें ।
दरबार-ए-जिंदगी में जबसे ठहर गये हैं ।।

तुम तिशनगी से कहना अब प्यास भी नही है ।
लहरों की मौज में हम भीतर गुजर गये हैं ।।

आगाज़ खुशनुमा है अंदाज़ भी तरुण है ।
इस जिस्म जान में वो आके सँवर गये हैं ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Monday, 5 February 2018

ग़ज़ल 85- क्या गुजरी 2

ऑनलाइन मुशायरे हेतु दूसरी प्रस्तुति

1222 1222 1222 1222

गये तुम छोड़ के तन्हा तो पैमानों पे क्या गुजरी ।
कभी सोचा नही तुमने कि मैखानों पे क्या गुजरी ।।

बदन मेरा तड़पता ही रहा बेशक मुहब्बत में ।
निगाहों की खलिश कहती निगहबानों पे क्या गुजरी ।।

मै गिरता और उठता हूँ मगर मै चल नही सकता ।
कदम खुद रोक दें रस्ता तो अरमानों पे क्या गुजरी ।।

चमकती धूप सा रौशन तिरा मेरा फ़साना था ।
घिरे शक के घने बादल तो अफसानों पे क्या गुजरी ।।

तरुण से पूछ लेना तुम अगर खुद को समझना हो ।
जब इंसानो के दिल बदले तो इंसानों पे क्या गुजरी ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Saturday, 3 February 2018

ग़ज़ल 83 क्या गुजरी

1222 x 4

बड़ी देखी तिरी दौलत निगहबानों पे क्या गुजरी ।
कुचलते ही रहे हरदम ये अरमानों पे क्या गुजरी ।।

बहुत इज्जत कमाते थे निगाहों ही निगाहों मे ।
जब इंसानों के दिल बदले तो इंसानों पे क्या गुजरी ।

कि ग़म को पेश करता था ख़ुदा तेरे हवाले मे ।
मगर ये ग़म मिला तुझसे शहर-थानों पे क्या गुजरी ।।

बिसाते जिंदगी के दाँव तू चलता रहा छिपकर ।
नही मालूम हो शायद कदरदानो पे क्या गुजरी ।।

मै घर की दाल चीनी में रहा उलझा रहा पिसता ।
मेरी किस्मत लकीरों के कतलखानों पे क्या गुजरी ।।

यही कारण नही करता महर कोई ज़माने में ।
जो देखा हाल फुरसत में महरबानों पे क्या गुजरी ।।

हुआ कुछ भी नही उनको जिसे दावत नही तेरी ।
'तरुण' अफ़सोस बस इतना कि महमानों पे क्या गुजरी ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'