Monday, 21 July 2014

अदला बदली

एक आह निकल जाती है
जब भी दूर चला जाता हूँ ।
शायद पागलपन है मेरा
कह भी नहीं पाता हूँ ।
मुट्ठी बिन खोले निकल रही हैं
रेत सी तेरी यादें ।
अश्कों में डूबी सिसक गई हैं
वो अपनी बीती बातें ।
चल लुक्का छुप्पी करते हैं
मै खोजूँ तू छुप जाए ।
पर जो पल भी ना देखूँ तुमको
मेरा दिल कितना घबराए ।
तू पास नही अब
एहसास नही अब
रब साथ नही अब
विश्वास नही अब
कि बिन तेरे ये कोरा जीवन
किस पत्थर से चमकाएं ।
सुन ! अदला बदली कर ले शायद
मेरा प्यार नज़र कुछ आये ।।

--- कविराज तरुण

Monday, 23 June 2014

सनम

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याद करेंगे


जो हमें चाहते हैं वो हमेशा याद करेंगे ।
कुछ सक्श ऐसे भी मिल जायेंगे ...
जो नाम  जी भरकर बर्बाद करेंगे ।
खैर हमें क्या ...
खैर हमें क्या , क्या लेना इनसे ।
शम-ए-मोहब्बत के हम परवाने ...
जल जायेंगे मगर रोशिनी बेहिसाब करेंगे ।
कुछ लोग मेरे वजूद का सुबूत मांगेंगे ,
कुछ लोग सहेजने को मेरा ताबूत मांगेंगे ,
कुछ कह देंगे-गया जो उसे जाना ही था ,
कफ़न तो उसका एकदिन यहाँ आना ही था
उसके आँसू मगर फिरभी ये सवालात करेंगे
बिन तुम्हारे भला कैसे जहां आबाद करेंगे
जो हमें चाहते हैं वो हमेशा याद करेंगे ।
दिल से निकली ,पंहुची दिल तक
दिल की बातें ...
फरक नही है , लफ्जों की
क्या थी सौगातें ...
नाम उसके हर ज़र्रा हर अल्फाज़ करेंगे
बंद पलकों में छुपा हर ख्वाब करेंगे ।
जो हमें चाहते हैं वो हमेशा याद करेंगे ।

-कविराज तरुण

तबाह

तबाह हो जाने दे सनम आज , कसम आज तुम्हे ।
इस अँधेरे मे हो जाने दे , दफ़न आज मुझे ।
खुद को तुझसे , तुझ को खुद से अलग कैसे करूँ ।
मेरी उम्मीदों का तू दे दे , कफ़न आज मुझे ।
कि गम से गुम हुआ , गुम से गुमनामी की तरफ ।
हँसते गाते जो कटे दिन , वो बदनामी की तरफ ।
जो मुझे मुझसे बेहतर समझते थे , हैं हैरानी की तरफ ।
बिखरे सपने पहुँच पाए नही , किसी कहानी की तरफ ।
अपने हाथो से ही करना था , खुशियों का दमन आज मुझे ।
तुझमे खोया था अबतक , तुझको खोया हूँ अब जब ।
तेरा चेहरा नही आँखों से हटता , सनम आज मुझे ।
तबाह हो जाने दे सनम आज , कसम आज तुम्हे ।
--- कविराज तरुण

शायद बचपन इसी का नाम

शाम सुहाने बचपन की
फिर बात पुराने बचपन की
कागज़ की कस्ती पानी मे
परियों की शादी कहानी मे
कुत्ते के पिल्ले छोटे से
हलवाई चाचा मोटे से
पिंकी बिल्लू नंदन चम्पक
बांकेलाल की हरदम बकबक
साबू और राका की धूम-धड़ाम
नागराज का इन्तेकाम
जंगल की मस्ती मोगिली संग
टॉम को कर दिया जेरी ने तंग
चन्द्रकान्ता श्रीकृष्णा शक्तिमान
शायद बचपन इसी का नाम

--- कविराज तरुण

Friday, 30 May 2014

पापा

ऊँगली पकड़कर चलना सीखा
विपदाओं से लड़ना सीखा
पापा की राहों पर कदम बढ़ाकर
मैंने शिखर पर चढ़ना सीखा
आदर्श मेरे बस आप ही हो
खुशियों का स्रोत सदा बस आप ही हो
आप की छाया सदा रहे बस
फूल सा मैंने खिलना सीखा
नमन आपको पापा मेरे
भगवान से बढ़कर पापा मेरे
भवबाधा से मैंने उबरना सीखा
जीवन में कुछ करना सीखा
उंगली पकड़कर चलना सीखा

--- कविराज तरुण

Friday, 23 May 2014

कुछ कह सकूँ

या तो शहर दो कोई दूसरा
या वजह दो दूसरी कि मै यहाँ रह सकूँ
या तो ख़ुशी दो कोई दूसरी
या हौसला दो मुझे कि ये गम सह सकूँ
आवाज़ नज़रंदाज़ करके देख चुका
एक नया आगाज़ करके देख चुका
तस्वीर से नज़रें फिरा के देख चुका
खुद से तुमको चुरा के देख चुका
अब तो बस उमर दो कोई दूसरी
या इस दिल में असर दो कि कुछ कह सकूँ
या तो शहर दो कोई दूसरा
या वजह दो दूसरी कि मै यहाँ रह सकूँ

--- कविराज तरुण

Monday, 19 May 2014

कैसे तुम अपना मुँह छिपाओगे

न दिल मिला न दिल्ली
'आप' की उड़ गई खिल्ली
अब भाग के कहाँ जाओगे
कैसे तुम अपना मुँह छिपाओगे ।
गंगा में लुटिया डूबी
गायब दिल्ली और यू पी
जमानत अब कैसे दिलवाओगे
कैसे तुम अपना मुँह छिपाओगे ।
पंजाब में खुल गया खाता
बाकी जगहों पर चाटा
मीडिया को क्या बतलाओगे
कैसे तुम अपना मुँह छिपाओगे ।
विश्वास का ड्रामा फ़िल्मी
सांप्रदायिक शाजिया इल्मी
गुल पनाग को फिर लड़वाओगे
कैसे तुम अपना मुँह छिपाओगे ।
पाने दिल्ली का शासन
थामके कांग्रेस का दामन
एकबार फिर तुम पछताओगे
कैसे तुम अपना मुँह छिपाओगे ।
--- कविराज तरुण

Wednesday, 16 April 2014

असहाय बेबस

उसको मिलती नही छत कहीं
सिर छुपाने के लिए ।
और हम आज़ाद हैं उसपर
मुस्कुराने के लिए ।
दो रोज़ रोटी की भी मिन्नत
बिन हाथ के बिन पैर के ...
बासी खाना डालते हम
बड़े गर्व से ...
खाने के लिए ।
अर्द्धनग्न अपने वस्त्र मे
खुद को ढके या शर्म को ...
दो चार सिक्को में कहाँ
मिलती है चादर ...
तन छुपाने के लिए ।
मंदिरों में दूध की गंगा बहाने चल पड़े ।
आज भी मज़ार में चद्दर चढ़ाने चल पड़े ।
रास्ते में दिख रहें हैं इसके जरुरी हक़दार कुछ...
पर पैसो से भगवान् को हम रिझाने चल पड़े ।
असहाय बेबस को मिला कब बोलने का हक कभी ...
बस इसलिए ही आज हम उलटी गंगा बहाने चल पड़े ।
एक उम्र लग जाती है हमको
घर बनाने के लिए ।
जवानी घिस जाती है अक्सर
पैसे जुटाने के लिए ।
दिख जाये फिरभी असहाय कोई
तो कुछ मुस्कुरा के बोल दो...
हो सके तो दो चार सिक्के ही
उसे अनमोल दो ...
मिलते हैं अवसर कहाँ अब
पूण्य कमाने के लिए ।
उसको मिलती नही छत कहीं
सिर छुपाने के लिए ।
और हम आज़ाद हैं उसपर
मुस्कुराने के लिए ।

--- कविराज तरुण

Monday, 14 April 2014

नजरिया

नज़र से देखोगे मेरी , तो नज़र आएगा।
दूर लगता जो तुम्हे , पास चला आएगा ।
नज़र का फेर है , नज़रिए का फरक ।
बात समझोगे तो ,नजरिया बदल जायेगा ।
जब भी किसो से वैचारिक मतबेध होता है तो अपनी ये पंक्तियाँ स्वतः ही स्मृति पटल पर दस्तक दे जाती हैं । आलोचनाओ , विरोधों और आरोपों से भरे इस लोकसभा चुनाव में वाणी की मधुरता और सहजता लुप्त होती नज़र आ रही है । परन्तु इस बात से कदापि संशय नही कि दुर्भावना से ग्रसित तर्क ... कुतर्क की श्रेणी में आता है जिससे सभी को सतर्क रहने की आवश्यकता है । कांग्रेस प्रवक्ता संजय झा द्वारा कही गई बात ( स्रोत ट्विटर) कि 'अटल जी देश के सबसे कमजोर प्रधानमन्त्री हैं ' अपने आप में कुतर्क की बड़ी मिसाल है । जिस व्यक्ति ने परिवार से ऊपर देश को , स्वयं से ऊपर जनता को और धर्म से ऊपर समन्व्यय को रखा उसके प्रति टिपण्णी से पहले पिछले दस साल का प्रशासन को भलीभांति देख लेना चाहिए था । खैर ! संजय झा को अटल जी की एक कविता का लिंक समर्पित कर रहा हूँ जिसमे कारगिल विजय के बाद अटल जी ने पाकिस्तान और अमेरिका को खुले तौर पर आईना दिखाया था । मुझे नही लगता इतना साहस किसी और प्रधानमन्त्री में अबतक रहा है ... कम से कम मेरी आँखों के सामने तो कदापि नही ---

Watch "Shri Atal Bihari Vajpayee awesome speech against Pakistan and America(must watch)" on YouTube - https://www.youtube.com/watch?v=SKbIlcN4jQQ&feature=youtube_gdata_player

- कविराज तरुण

Saturday, 12 April 2014

भारत निर्माण पर विचार

"दिशाविहीन पथभ्रमित व्याकुलित ... अचरज भरी निगाहों से ।
किस रस्ते जाऊं कुछ खबर नही ... क्या हाल हुए हैं युवाओं के । "
मै कविराज तरुण - वाकई में एक आम आदमी , कांग्रेस के 10 साल के कुशासन से तंग ... आज नए भारत के निर्माण के सपने देख रहा हूँ । ज़ाहिर है कि कांग्रेस को हटाना तो हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी है । पर प्रश्न ये आता है कि कैसे ? सपा बसपा या अन्य क्षेत्रीय दलों को वोट करके मै कांग्रेस को एक और मौका देने के पक्ष में नही हूँ । अब हमारे पास बचे दो विकल्प - भाजपा और आप ।
जहाँ एक ओर मोदी दस साल के कामो को अपना आधार बनाकर विकास के मुद्दे पर हमसे साथ देने की अपील कर रहे हैं । अपने अनुभव और कार्य को आगे रख रहे हैं वही दूसरी ओर केजरीवाल अपनी दिल्ली की ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए इस महासमर में त्रिशंकु की स्थिति बनाने का प्रयास कर रहे हैं जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को होगा । बड़ा दुःख होता है ये सुनकर कि जो व्यक्ति विकास को तरजीह देकर चुनाव लड़ रहा है उसे धर्म के नाम पर या फिर वैवाहिक स्थिति के नाम पर घेर जा रहा है । इस मामले में केजरी जी को भी कोई परहेज नहीं चाहे फिर अंसारी का ही समर्थन क्यों न मिले । चार साल के बच्चे को दसवी की परीक्षा में बैठाकर नक़ल या अन्य सहयोग से हम पास करा भी दें तो क्या वो अपना या दूसरों का भविष्य बना पायेगा । यहाँ पर तो इस बालक ने प्रथम कक्षा भी पूरी नहीं की । कांग्रेस को धूल चटाना है तो सिर्फ मोदी का कमल खिलाना है । केजरीवाल को एक सन्देश -अभी आप अधूरे काम को पूरा करने की सोचो । पांच साल बाद फिर अपने काम को लेकर वोट मांगने आना । सही रहा तो बिना मांगे ही मिल जायेगा । जय भारत ।
--- कविराज तरुण

Tuesday, 8 April 2014

Punch line


हर किसी से
मिल जाने को
तैयार नहीं है ।
   ये दिल है
   मेरा दिल
कोई 'आप ' की
सरकार नही है ।।

कमल का फूल

भ्रष्टाचार नहीं क़ुबूल
अबकी बार कमल का फूल
झूठे वादों की बातें भूल
अबकी बार कमल का फूल ||

सच्चाई का नकाब पहन कर
और जनता को बहला फुसलाकर
दुश्मन झोकेंगे आँखों में धूल
अबकी बार कमल का फूल ||

शिक्षा का हक़ , हक़ रहने खाने का
दस साल नही था होश निभाने का
बातें इनकी है बड़ी फ़िज़ूल
अबकी बार कमल का फूल ||

केंद्र की जल्दी में राज्य गया
ख़ासी सुनकर मत करना दया
मुफरल के भीतर चालाकी का शूल
अबकी बार कमल का फूल ||

मुलायम - माया की बात गलत सब
नितीश का था सारा साथ गलत तब
पर इन सबको करदो जड़ से उन्मूल
अबकी बार कमल का फूल ||

--- कविराज तरुण

Wednesday, 26 March 2014

हमें याद करेंगे

जो हमें चाहते हैं वो हमेशा याद करेंगे ।
कुछ सक्श ऐसे भी मिल जायेंगे ...
जो नाम हमारा जी भरकर बर्बाद करेंगे ।
खैर हमें क्या ...
खैर हमें क्या , क्या लेना इनसे ।
शम-ए-मोहब्बत के हम परवाने ...
जल जायेंगे मगर रोशिनी बेहिसाब करेंगे ।
कुछ लोग मेरे वजूद का सुबूत मांगेंगे ,
कुछ लोग सहेजने को मेरा ताबूत मांगेंगे ,
कुछ कह देंगे-गया जो उसे जाना ही था ,
कफ़न तो उसका एकदिन यहाँ आना ही था
उसके आँसू मगर फिरभी ये सवालात करेंगे
बिन तुम्हारे भला कैसे जहां आबाद करेंगे
जो हमें चाहते हैं वो हमेशा याद करेंगे ।
दिल से निकली ,पंहुची दिल तक
दिल की बातें ...
फरक नही है , लफ्जों की
क्या थी सौगातें ...
नाम उसके हर ज़र्रा हर अल्फाज़ करेंगे
बंद पलकों में छुपा हर ख्वाब करेंगे ।
जो हमें चाहते हैं वो हमेशा याद करेंगे ।

-कविराज तरुण

Friday, 14 March 2014

अहसासों के मोती

अहसासो के मोती चुनकर,
रिश्तों की एक डोर बनाई ।
तेरे माथे का श्रृंगार किया तब,
प्रेमसुधा ने अमृत पाई ।।
स्वतः अखंडित प्यार हमारा ...
स्वतः उज्जवलित संसार हमारा ...
सूरज का प्रतिमान बना जब ,
तेरे चक्षु-किरण से दृष्टि लगाई ।।
कदम कदम का साथ हमारा ...
पल पल का विश्वास हमारा ...
दिशाविहीन पथहीन था अबतक ,
तुम जो साथ चली तो गति पाई ।।
अन्तः की अनसुलझी बातें ...
वृहत समाज की सब सौगातें ...
शांत हुई स्पष्ट हुई सब ,
तुमसे मिलकर जब सुधि पाई ।।
व्यथा के कितने गीत लिखे हैं ...
आंसू पर संगीत लिखे हैं ...
पर प्यार की कुमकुम झलक गई जब ,
तुम आकर इस जीवन मे मुस्काई ।।

--- कविराज तरुण

Saturday, 11 January 2014

बदलाव

बदलाव

केजरी ने पहना आज केसरी बाना
बेदी ने भेदा है आज फिर निशाना
अन्ना तमन्ना के बीज फिर से बो रहे
भूषण के भाषण से भ्रष्ट आज रो रहे
प्रशांत शांत भाव से कर रहे हैं प्रार्थना
उठो तरुण आज कर दो सिंह की गर्जना
दिला दो देश जो आज फिर आज़ादी
जय हिन्द के नारों से भर दो सारी वादी
अग्निवेश के संग देश कदम कदम मिला रहा
संतोष का जोश संसद को हिला रहा
हम भी खड़े कतार में
चाहे भेज दो तिहाड़ में
रूक न पाएगी आवाज़ ये देश तिलमिला रहा
जावान खून सड़को पे आज अन्ना संग आ रहा

--- कविराज तरुण

Friday, 10 January 2014

पथ प्रदर्शक

पथ प्रदर्शक

पथ शूल समेत निर्जन प्रतिपल ।
पदचिन्ह रचा तू पथिक अविरल ।।
घनघोर दिशायें तूफां हर पल
चट-चाटती राहें ह्रदय कल कल
रोये निकले तब अख से जल
कर दे ये सब बस भाव विह्वल
पथवृक्ष लगे कांटो का घर
पर फिर भी नित तू चलता चल
पथ शूल समेत निर्जन प्रतिपल ।
पदचिन्ह रचा तू पथिक अविरल ।।
रणभेरी कुंजो की धार है तू
शक्ति सन्लगित हथियार है तू
माँ का पावन निर्मल प्यार है तू
पिता की वाणी और संस्कार है तू
नभ शून्य बना दे भर दे तल
द्वेष राग को तू कर निर्बल
पथ शूल समेत निर्जन प्रतिपल ।
पदचिन्ह रचा तू पथिक अविरल ।।
जो गिरे कहीं तूफानों मे
उठ जा और फिर से कोशिश कर
ज्यों अभ्यासों को कर कर कर
जड़मति भी बन जाता बुधिधर
तो फिर क्यों तू निर आसित हो
यूं आँख मूदता रो रो कर
पथ शूल समेत निर्जन प्रतिपल ।
पदचिन्ह रचा तू पथिक अविरल ।।

--- कविराज तरुण

प्रिय वियोग गीत

प्रिय वियोग गीत

प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।
ये निश दिन बरसा करते हैं ,
व्यर्थ निकल ही आते हैं ।
प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।।

विरह वेदना क्षणिक नही ,
जीवन भर साथ निभाते हैं ।
विछोभ तुम्हारा सह सह कर ,
नित आँखों से अश्रु लुटाते हैं ।
प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।।

वो दिन बचपन के अब भी ,
प्रतिबिम्ब से मन मे छाते हैं ।
और आँखों से बाहर आने को ,
पलकों मे होड़ मचाते हैं ।
प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।।

हमसे दूर गए तुम जबसे ,
ना हम हँसते हैं ना मुस्काते हैं ।
तुमसे बिछुड़कर सच कह दूँ ,
हम एक पल भी ना रह पाते हैं ।
प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।।

सावन के झूले बिन तेरे ,
हमको नही लुभाते हैं ।
बारिश क्या बादल करते हैं ,
इन आँसू से ये डर जाते हैं ।
प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।।

हम पिस पिस कर ये रिस रिस कर ,
अंगो को मेरे भिगाते हैं ।
हवा के झोंके फूलों के रंग ,
हमें मन ही मन तड़पाते हैं ।
प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।।

याद तेरी धड़कन पर भारी ,
हम अक्सर रोये जाते हैं ।
विरह के दिन ये कब गुजरेंगे ,
ये नैना तुम्हे बुलाते हैं ।
प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।।

--- कविराज तरुण

आज के संत

आज के संत

मै यही सोचता रह रह कर
ये कैसे आज के संत
वेद कोई पढ़ा नही
व्यर्थ बोलते मन्त्र
ये कैसे आज के संत ।
एक बात कुछ रोज की है
जब मेला लगा विशाल
सामने प्रचल वाहिनी गंगा
पीछे लगी कतार
कोई बूढ़ा था कोई
बच्चा और जवान
कुछ अधमरे पड़े हुए थे
कुछ की बाकी नही थी जान
मै भी था कुंभ की इस अथाह भीड़ मे
वीडियोग्राफी के संग
कुछ साधू बैठे बजा रहे थे
अनगिनतो सुंदर शंख
पर उनका ध्यान हटा उन्होंने
जब देखा मेरा यंत्र
चकित भाव से पास आ गए
छोड़ के सारे तंत्र
बोले ये बच्चा क्या है
जीव या अवतार
मैंने फिर ये बोला बाबा
ये है विज्ञान का चमत्कार
फिर बाबा लोगो ने खिचातानी मे
उसमे आँख लगाई
देख कर वे सब दंग हो गए
गंगा निकट थी आई
जब देखी बंद कैमरे मे ये
अखिल सृष्टि सुकड़ाई
और लाखो ने एक पल मे ही
डुबकी खूब लगाई
तो प्रभु की महिमा ख़त्म हुई
विज्ञान ने फूंका मन्त्र
कुछ साधू संतों ने किया तुरत ही
धर्म का सुन्दर अंत
मै यही सोचता रह रह कर
ये कैसे आज के संत
वेद कोई पढ़ा नही
व्यर्थ बोलते मन्त्र
ये कैसे आज के संत ।।

--- कविराज तरुण

प्रथम कविता

प्रथम कविता

क्या हुआ अचानक मनु को
जिसने प्रथम कविता थी बनाई
क्या हृदय मे उसके अथाह पीड़ा
विषसम थी भर आई
भरे नेत्र से उसके
और थी शीथलता सी छाई
या विरह वियोग ने उसके
हिय की गति बढ़ाई
उसके मन मे अनजान एक क्यों
भाव अमिट सा जागा
वह कल्प तरन्नुम मे गोते खाने
आखिर क्यों था भागा
यह विषम प्रश्न मेरे कानों मे
देने लगा सुनाई
समझ नही मुझे आ रहा
मनु ने कविता क्यों उपजाई
ये गहन बात चिंतन की अब
नैनों में आई रुलाई
कह दो कोई कारण क्या
जो पहली कविता बन पाई ।।

--- कविराज तरुण