Monday, 14 April 2014

नजरिया

नज़र से देखोगे मेरी , तो नज़र आएगा।
दूर लगता जो तुम्हे , पास चला आएगा ।
नज़र का फेर है , नज़रिए का फरक ।
बात समझोगे तो ,नजरिया बदल जायेगा ।
जब भी किसो से वैचारिक मतबेध होता है तो अपनी ये पंक्तियाँ स्वतः ही स्मृति पटल पर दस्तक दे जाती हैं । आलोचनाओ , विरोधों और आरोपों से भरे इस लोकसभा चुनाव में वाणी की मधुरता और सहजता लुप्त होती नज़र आ रही है । परन्तु इस बात से कदापि संशय नही कि दुर्भावना से ग्रसित तर्क ... कुतर्क की श्रेणी में आता है जिससे सभी को सतर्क रहने की आवश्यकता है । कांग्रेस प्रवक्ता संजय झा द्वारा कही गई बात ( स्रोत ट्विटर) कि 'अटल जी देश के सबसे कमजोर प्रधानमन्त्री हैं ' अपने आप में कुतर्क की बड़ी मिसाल है । जिस व्यक्ति ने परिवार से ऊपर देश को , स्वयं से ऊपर जनता को और धर्म से ऊपर समन्व्यय को रखा उसके प्रति टिपण्णी से पहले पिछले दस साल का प्रशासन को भलीभांति देख लेना चाहिए था । खैर ! संजय झा को अटल जी की एक कविता का लिंक समर्पित कर रहा हूँ जिसमे कारगिल विजय के बाद अटल जी ने पाकिस्तान और अमेरिका को खुले तौर पर आईना दिखाया था । मुझे नही लगता इतना साहस किसी और प्रधानमन्त्री में अबतक रहा है ... कम से कम मेरी आँखों के सामने तो कदापि नही ---

Watch "Shri Atal Bihari Vajpayee awesome speech against Pakistan and America(must watch)" on YouTube - https://www.youtube.com/watch?v=SKbIlcN4jQQ&feature=youtube_gdata_player

- कविराज तरुण

Saturday, 12 April 2014

भारत निर्माण पर विचार

"दिशाविहीन पथभ्रमित व्याकुलित ... अचरज भरी निगाहों से ।
किस रस्ते जाऊं कुछ खबर नही ... क्या हाल हुए हैं युवाओं के । "
मै कविराज तरुण - वाकई में एक आम आदमी , कांग्रेस के 10 साल के कुशासन से तंग ... आज नए भारत के निर्माण के सपने देख रहा हूँ । ज़ाहिर है कि कांग्रेस को हटाना तो हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी है । पर प्रश्न ये आता है कि कैसे ? सपा बसपा या अन्य क्षेत्रीय दलों को वोट करके मै कांग्रेस को एक और मौका देने के पक्ष में नही हूँ । अब हमारे पास बचे दो विकल्प - भाजपा और आप ।
जहाँ एक ओर मोदी दस साल के कामो को अपना आधार बनाकर विकास के मुद्दे पर हमसे साथ देने की अपील कर रहे हैं । अपने अनुभव और कार्य को आगे रख रहे हैं वही दूसरी ओर केजरीवाल अपनी दिल्ली की ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए इस महासमर में त्रिशंकु की स्थिति बनाने का प्रयास कर रहे हैं जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को होगा । बड़ा दुःख होता है ये सुनकर कि जो व्यक्ति विकास को तरजीह देकर चुनाव लड़ रहा है उसे धर्म के नाम पर या फिर वैवाहिक स्थिति के नाम पर घेर जा रहा है । इस मामले में केजरी जी को भी कोई परहेज नहीं चाहे फिर अंसारी का ही समर्थन क्यों न मिले । चार साल के बच्चे को दसवी की परीक्षा में बैठाकर नक़ल या अन्य सहयोग से हम पास करा भी दें तो क्या वो अपना या दूसरों का भविष्य बना पायेगा । यहाँ पर तो इस बालक ने प्रथम कक्षा भी पूरी नहीं की । कांग्रेस को धूल चटाना है तो सिर्फ मोदी का कमल खिलाना है । केजरीवाल को एक सन्देश -अभी आप अधूरे काम को पूरा करने की सोचो । पांच साल बाद फिर अपने काम को लेकर वोट मांगने आना । सही रहा तो बिना मांगे ही मिल जायेगा । जय भारत ।
--- कविराज तरुण

Tuesday, 8 April 2014

Punch line


हर किसी से
मिल जाने को
तैयार नहीं है ।
   ये दिल है
   मेरा दिल
कोई 'आप ' की
सरकार नही है ।।

कमल का फूल

भ्रष्टाचार नहीं क़ुबूल
अबकी बार कमल का फूल
झूठे वादों की बातें भूल
अबकी बार कमल का फूल ||

सच्चाई का नकाब पहन कर
और जनता को बहला फुसलाकर
दुश्मन झोकेंगे आँखों में धूल
अबकी बार कमल का फूल ||

शिक्षा का हक़ , हक़ रहने खाने का
दस साल नही था होश निभाने का
बातें इनकी है बड़ी फ़िज़ूल
अबकी बार कमल का फूल ||

केंद्र की जल्दी में राज्य गया
ख़ासी सुनकर मत करना दया
मुफरल के भीतर चालाकी का शूल
अबकी बार कमल का फूल ||

मुलायम - माया की बात गलत सब
नितीश का था सारा साथ गलत तब
पर इन सबको करदो जड़ से उन्मूल
अबकी बार कमल का फूल ||

--- कविराज तरुण

Wednesday, 26 March 2014

हमें याद करेंगे

जो हमें चाहते हैं वो हमेशा याद करेंगे ।
कुछ सक्श ऐसे भी मिल जायेंगे ...
जो नाम हमारा जी भरकर बर्बाद करेंगे ।
खैर हमें क्या ...
खैर हमें क्या , क्या लेना इनसे ।
शम-ए-मोहब्बत के हम परवाने ...
जल जायेंगे मगर रोशिनी बेहिसाब करेंगे ।
कुछ लोग मेरे वजूद का सुबूत मांगेंगे ,
कुछ लोग सहेजने को मेरा ताबूत मांगेंगे ,
कुछ कह देंगे-गया जो उसे जाना ही था ,
कफ़न तो उसका एकदिन यहाँ आना ही था
उसके आँसू मगर फिरभी ये सवालात करेंगे
बिन तुम्हारे भला कैसे जहां आबाद करेंगे
जो हमें चाहते हैं वो हमेशा याद करेंगे ।
दिल से निकली ,पंहुची दिल तक
दिल की बातें ...
फरक नही है , लफ्जों की
क्या थी सौगातें ...
नाम उसके हर ज़र्रा हर अल्फाज़ करेंगे
बंद पलकों में छुपा हर ख्वाब करेंगे ।
जो हमें चाहते हैं वो हमेशा याद करेंगे ।

-कविराज तरुण

Friday, 14 March 2014

अहसासों के मोती

अहसासो के मोती चुनकर,
रिश्तों की एक डोर बनाई ।
तेरे माथे का श्रृंगार किया तब,
प्रेमसुधा ने अमृत पाई ।।
स्वतः अखंडित प्यार हमारा ...
स्वतः उज्जवलित संसार हमारा ...
सूरज का प्रतिमान बना जब ,
तेरे चक्षु-किरण से दृष्टि लगाई ।।
कदम कदम का साथ हमारा ...
पल पल का विश्वास हमारा ...
दिशाविहीन पथहीन था अबतक ,
तुम जो साथ चली तो गति पाई ।।
अन्तः की अनसुलझी बातें ...
वृहत समाज की सब सौगातें ...
शांत हुई स्पष्ट हुई सब ,
तुमसे मिलकर जब सुधि पाई ।।
व्यथा के कितने गीत लिखे हैं ...
आंसू पर संगीत लिखे हैं ...
पर प्यार की कुमकुम झलक गई जब ,
तुम आकर इस जीवन मे मुस्काई ।।

--- कविराज तरुण

Saturday, 11 January 2014

बदलाव

बदलाव

केजरी ने पहना आज केसरी बाना
बेदी ने भेदा है आज फिर निशाना
अन्ना तमन्ना के बीज फिर से बो रहे
भूषण के भाषण से भ्रष्ट आज रो रहे
प्रशांत शांत भाव से कर रहे हैं प्रार्थना
उठो तरुण आज कर दो सिंह की गर्जना
दिला दो देश जो आज फिर आज़ादी
जय हिन्द के नारों से भर दो सारी वादी
अग्निवेश के संग देश कदम कदम मिला रहा
संतोष का जोश संसद को हिला रहा
हम भी खड़े कतार में
चाहे भेज दो तिहाड़ में
रूक न पाएगी आवाज़ ये देश तिलमिला रहा
जावान खून सड़को पे आज अन्ना संग आ रहा

--- कविराज तरुण

Friday, 10 January 2014

पथ प्रदर्शक

पथ प्रदर्शक

पथ शूल समेत निर्जन प्रतिपल ।
पदचिन्ह रचा तू पथिक अविरल ।।
घनघोर दिशायें तूफां हर पल
चट-चाटती राहें ह्रदय कल कल
रोये निकले तब अख से जल
कर दे ये सब बस भाव विह्वल
पथवृक्ष लगे कांटो का घर
पर फिर भी नित तू चलता चल
पथ शूल समेत निर्जन प्रतिपल ।
पदचिन्ह रचा तू पथिक अविरल ।।
रणभेरी कुंजो की धार है तू
शक्ति सन्लगित हथियार है तू
माँ का पावन निर्मल प्यार है तू
पिता की वाणी और संस्कार है तू
नभ शून्य बना दे भर दे तल
द्वेष राग को तू कर निर्बल
पथ शूल समेत निर्जन प्रतिपल ।
पदचिन्ह रचा तू पथिक अविरल ।।
जो गिरे कहीं तूफानों मे
उठ जा और फिर से कोशिश कर
ज्यों अभ्यासों को कर कर कर
जड़मति भी बन जाता बुधिधर
तो फिर क्यों तू निर आसित हो
यूं आँख मूदता रो रो कर
पथ शूल समेत निर्जन प्रतिपल ।
पदचिन्ह रचा तू पथिक अविरल ।।

--- कविराज तरुण

प्रिय वियोग गीत

प्रिय वियोग गीत

प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।
ये निश दिन बरसा करते हैं ,
व्यर्थ निकल ही आते हैं ।
प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।।

विरह वेदना क्षणिक नही ,
जीवन भर साथ निभाते हैं ।
विछोभ तुम्हारा सह सह कर ,
नित आँखों से अश्रु लुटाते हैं ।
प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।।

वो दिन बचपन के अब भी ,
प्रतिबिम्ब से मन मे छाते हैं ।
और आँखों से बाहर आने को ,
पलकों मे होड़ मचाते हैं ।
प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।।

हमसे दूर गए तुम जबसे ,
ना हम हँसते हैं ना मुस्काते हैं ।
तुमसे बिछुड़कर सच कह दूँ ,
हम एक पल भी ना रह पाते हैं ।
प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।।

सावन के झूले बिन तेरे ,
हमको नही लुभाते हैं ।
बारिश क्या बादल करते हैं ,
इन आँसू से ये डर जाते हैं ।
प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।।

हम पिस पिस कर ये रिस रिस कर ,
अंगो को मेरे भिगाते हैं ।
हवा के झोंके फूलों के रंग ,
हमें मन ही मन तड़पाते हैं ।
प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।।

याद तेरी धड़कन पर भारी ,
हम अक्सर रोये जाते हैं ।
विरह के दिन ये कब गुजरेंगे ,
ये नैना तुम्हे बुलाते हैं ।
प्रिय तुम नयनो में बस जाओ ,
ये अश्क बहुत सताते हैं ।।

--- कविराज तरुण

आज के संत

आज के संत

मै यही सोचता रह रह कर
ये कैसे आज के संत
वेद कोई पढ़ा नही
व्यर्थ बोलते मन्त्र
ये कैसे आज के संत ।
एक बात कुछ रोज की है
जब मेला लगा विशाल
सामने प्रचल वाहिनी गंगा
पीछे लगी कतार
कोई बूढ़ा था कोई
बच्चा और जवान
कुछ अधमरे पड़े हुए थे
कुछ की बाकी नही थी जान
मै भी था कुंभ की इस अथाह भीड़ मे
वीडियोग्राफी के संग
कुछ साधू बैठे बजा रहे थे
अनगिनतो सुंदर शंख
पर उनका ध्यान हटा उन्होंने
जब देखा मेरा यंत्र
चकित भाव से पास आ गए
छोड़ के सारे तंत्र
बोले ये बच्चा क्या है
जीव या अवतार
मैंने फिर ये बोला बाबा
ये है विज्ञान का चमत्कार
फिर बाबा लोगो ने खिचातानी मे
उसमे आँख लगाई
देख कर वे सब दंग हो गए
गंगा निकट थी आई
जब देखी बंद कैमरे मे ये
अखिल सृष्टि सुकड़ाई
और लाखो ने एक पल मे ही
डुबकी खूब लगाई
तो प्रभु की महिमा ख़त्म हुई
विज्ञान ने फूंका मन्त्र
कुछ साधू संतों ने किया तुरत ही
धर्म का सुन्दर अंत
मै यही सोचता रह रह कर
ये कैसे आज के संत
वेद कोई पढ़ा नही
व्यर्थ बोलते मन्त्र
ये कैसे आज के संत ।।

--- कविराज तरुण

प्रथम कविता

प्रथम कविता

क्या हुआ अचानक मनु को
जिसने प्रथम कविता थी बनाई
क्या हृदय मे उसके अथाह पीड़ा
विषसम थी भर आई
भरे नेत्र से उसके
और थी शीथलता सी छाई
या विरह वियोग ने उसके
हिय की गति बढ़ाई
उसके मन मे अनजान एक क्यों
भाव अमिट सा जागा
वह कल्प तरन्नुम मे गोते खाने
आखिर क्यों था भागा
यह विषम प्रश्न मेरे कानों मे
देने लगा सुनाई
समझ नही मुझे आ रहा
मनु ने कविता क्यों उपजाई
ये गहन बात चिंतन की अब
नैनों में आई रुलाई
कह दो कोई कारण क्या
जो पहली कविता बन पाई ।।

--- कविराज तरुण

बचपन की यादें

बचपन की यादें

वो सालो साल पहले जब मै पैदा हुआ था
कुछ लोग कहते गेंहू कुछ कहते मैदा हुआ था
पर मुझे क्या पता , थी मुझे क्या खबर
कि मै ऐसा हुआ था कि कैसा हुआ था ।
कुछ वर्ष बीते मुझे याद आ रहा है
वो बचपन के लड्डू का स्वाद भा रहा है
वो माँ का आँचल , वो आँखों का पानी
सुर्ख होंटो से वो मेरे गालों पर निशानी
पापा का मेरे दफ्तर से आना
वो लोरी गाना वो सिर सहलाना
कंधो पर अपने मुझको घुमाना
उँगली पकड़कर चलना सिखाना
वो लम्हे आज क्यों यूं याद आ रहे
वो किस्से आज क्यों यूं हमें सता रहे ।
पहली बार जब टीचर ने माँ से हाथ छुड़ाया था
कोई तो बताये मै कितना चिल्लाया था
क्लास में पहला दिन मै मायूस हो रहा था
टीचर से छुपकर मै कितना रो रहा था
इंतज़ार में था ये आँखें माँ से कब मिलेगी
मुरझाये फूलों की ये बगिया फिरसे कब खिलेगी
फिर छुट्टी हुई मै घर को गया
माँ से लिपटा , रूठा और ना जाने कब सो गया ।
फिर धीरे धीरे वक़्त बीते माह और साल बीते
समय खिसकता गया मैंने कई पुरस्कार जीते
था एहसास मुझे मै बड़ा हो रहा हूँ
और अब माँ के तकिये से दूर सो रहा हूँ
पर फिर भी एक कोने में मेरा बचपन दबा हुआ है
जवानी की दस्तक ने आज इसको ठगा हुआ है
कोई आकर कर जाए मुझसे ये वादे
कोई तो मजबूत करे मेरे इरादे
माँ के हाथो से मिल जाए चावल वो सादे
कोई आज लौटा दे मुझे बचपन की यादें ।

--- कविराज तरुण

Sunday, 5 January 2014

यादों की तिजोरी

यादों की तिजोरी

यादों की तिजोरी को खोला तो पाया
तेरे लिखे हुए ख़त वैसे ही धरे हैं
जिसपर मेरे आंसुओं के मोती साबुत बचे हैं
तेरा दिया कोई फूल मुरझाया नहीं है
हाँ ये सच है एक अरसे से ये मुस्कुराया नहीं है
तेरी शोखी तेरा अंदाज़ बंद इस तिजोरी मे
संग जीने मरने का भी ख्वाब बंद इस तिजोरी मे
तेरे कदमों की आहट इसके दरवाज़े को पता है
इसके आईने मे तेरा चेहरा अब भी सजा है
तेरी हँसी से रंगा है मैंने इसकी दीवारों को
अपनी उदासी से भरा है इसकी दरारों को
तेरी महक आज भी सलामत है इसमे
तेरी कसमे तेरे वादे अमानत हैं इसमे
आरज़ू हसरतो की इसमे एक चाभी लगाईं है
इस ज़माने से कहीं दूर ये तिजोरी छुपाई है
यादों की तिजोरी को खोला तो पाया ...

--- कविराज तरुण

Saturday, 4 January 2014

मुझे सुला दो माँ

मुझे सुला दो माँ

मुझे सुला दो बाँहों में माँ नींद नहीं आती है ।
शाम गुजरती चिंता मे माँ रात निकल जाती है।।
छोटा था मै कितना चंचल और कितना प्यारा था ,
ना मेरा तेरी करता था सबकी आँखों का तारा था ।
अब दुनिया भर की बातों ने कैसे मुझे बदल डाला है ,
तुमने तो माँ बोला था ये जीवन फूलों की माला है ।
पर कांटो की चुभन से मेरी साँसे रुक सी जाती है ।
मुझे सुला दो बाँहों में माँ नींद नहीं आती है ।।
जब भी मै गलती करता था तुम नाराज़ नही होती थी ,
पापा की धमकी देती थी पर फिरभी कुछ ना कहती थी ।
बस प्यार से मुझको समझाकर थी लेती मेरी बलायें ,
माँ सारी बातें आज भी मेरे मन मंदिर में छा जायें ।
पर दफ्तर में गलती करने पर आफत सी आ जाती है ।
मुझे सुला दो बाँहों में माँ नींद नहीं आती है ।।
इस अफरा तफरी भागा दौड़ी में मेरा बचपन बिदक गया ,
माँ तुझसे दूर किया पैसों ने मै कितना सिसक गया ।
लगन लगाकर पढ़कर मैंने तेरी उम्मीदों को थाम लिया ,
घर से निकला सांस भरी एक और माँ का नाम लिया ।
पर अब माँ उम्मीदों की बोरी सिर पर अब भारी सी पड़ जाती है ।
मुझे सुला दो बाँहों में माँ नींद नहीं आती है ।।

--- कविराज तरुण

रंग केसरी कर देना

रंग केसरी कर देना

ऐ मौला मेरे कभी देश पर दाग नही लगने  देना
चाहे देना न तुम रंग गुलाबी पर रंग केसरी कर देना
किस्से कसमे शहादत की घर घर को याद जुबानी है
माथे पर हिन्द की अस्मत है हाथो में गंगा का पानी है
इस पानी सा पावन निर्मल हर कोना कोना भर देना
चाहे देना न तुम रंग गुलाबी पर रंग केसरी कर देना
उसपार ज्वाल की लपट बहे तो सरहद पर मै अंगार भरूँ
इस मातृभूमि की मिट्टी से मै अपना श्रृंगार करूँ
कि जबतक रुधिर शेष छिद्रों मे तुम लड़ने का ही बल देना
चाहे देना न तुम रंग गुलाबी पर रंग केसरी कर देना
सन्नाटों में दरबार लगाकर दुश्मन नित कितनी चाल चले
बैसाखी पर चलने वाले ये हम तूफानों से क्या खाक लड़ें
अब अर्थी बन जाएगी इनकी मुझे हिम्मत और असर देना
चाहे देना न तुम रंग गुलाबी पर रंग केसरी कर देना
हम मित्र बना लेते बेशक पर तेरी रूह मे गद्दारी है
पीठ में खंजर भोंकने की तुझको  बड़ी बीमारी है
इस बीमारी को काट के दूर करूँ मौला ऐसा खंजर देना
चाहे देना न तुम रंग गुलाबी पर रंग केसरी कर देना
हम राजनीति से शोषित हैं पर है देशप्रेम की कमी नही
हिन्दुस्तान हमारी माता है केवल ये एक जमीं नही
जो इसको आँख दिखायेगा उसको बिन धड़ के सर देना
चाहे देना न तुम रंग गुलाबी पर रंग केसरी कर देना

--- कविराज तरुण

Tuesday, 31 December 2013

नववर्ष आगमन

नववर्ष आगमन

रश्मियाँ भोर की कल भी आएँगी पर
रात स्वप्निल सुधा से अमर कर दो
सोच लो ठान लो मन का संज्ञान लो
इस हिमालय से ऊँचा ये सर कर दो
काल के द्वार पर हिय का दरबार है
आत्म मंथन से संभव ही उद्धार है
नेत्र अंजलि पर दीप की रोशिनी
वाणी इतनी सहज शक्कर की चासनी
तेज माथे पर और होंटो पर मुस्कान हो
सुख समृद्धि सुयश का नववर्ष पहचान हो
इन विचारों का ह्रदय में आज घर कर दो
रात स्वप्निल सुधा से अमर कर दो

--- कविराज तरुण

Thursday, 26 December 2013

तुमसे है

तुमसे है.........

इस दिल की चाहत ,
मन की हसरत,
तन की कुदरत,
तुमसे है...
धड़कन में आहट,
हर लम्हा फुरसत,
काबा कुरबत,
तुमसे है...
इस सरजमीं पर,
हर रोशिनी पर,
सारी नूरी सिरकत,
तुमसे है...
कैसे बताये हम,
क्या छुपाये हम,
अब सारी रहमत,
तुमसे है ...
तू यकीन है,
तू शुकून है,
तू खुदा इबादत,
तुमसे है...
मेरे दिल की ज़न्नत,
रूहानी अस्मत,
मेरा वजूद हिम्मत,
तुमसे है...
आँखों की हरकत,
होंटो की फिदरत,
हाथों की किस्मत,
तुमसे है ।
मेरी अंतर्मुरत,
साँसों की जरुरत,
सूरत और सीरत,
तुमसे है...
दिलनशी तू दिलकशी तू,
है तू अकीदत,
और मोहब्बत,
तुमसे है।।।

---कविराज तरुण

Friday, 13 December 2013

गई उम्मीद तुमको पाने की

गई उम्मीद तुमको पाने की

गई उम्मीद तुमको पाने की ...
करूं क्यों चाहत तुम्हे बुलाने की ...
  मौत से बढ़कर तेरे जाने का पैगाम लगा
  जिंदगी हर घड़ी लगती है बस एक सज़ा
  ये रूह हँसती है और दर्द झलकने लगता है
  भीगी आँखों से ये अश्क छलकने लगता है
क्या वजह थी मुझे यूँ रुलाने की ...
गई उम्मीद तुमको पाने की ...
करूं क्यों चाहत तुम्हे बुलाने की ...
  यकीन न था कभी ये दिन भी आयेगा
  बन के आंसू मेरी पलकों को तू भिगायेगा
  गुजरे लम्हे तेरी डोली संग गुजर ही गये
  यूँ तो जिंदा हैं पर जीते जी हम मर ही गये
कोशिशें करता हूँ अक्सर तुम्हे भुलाने की ...
गई उम्मीद तुमको पाने की ...
करूं क्यों चाहत तुम्हे बुलाने की ...
  था अदब मुझको तेरी वफ़ा पर इतनी हद तक
  बैठा के रखा था तुझे खुदा के पद तक
  पर तूने तोड़ा ये दिल और मेरा भरोसा भी
  खुद को कई बार तभी मैंने कोसा भी
थी गलती तुझसे दिल लगाने की ...
गई उम्मीद तुमको पाने की ...
करूं क्यों चाहत तुम्हे बुलाने की ...


--- कविराज तरुण


केजरी की लीला

केजरी की लीला

दिल्ली के प्रांगण में केजरी की लीला ...
कमल मुरझा गया पस्त हुई शीला ...
मेट्रो के नाम का बहुत दिया झांसा ...
आम जनता को था बहुत दिन से फांसा ...
गरीबो को इन्होने कही का न छोड़ा ...
उन्नति के रास्ते में प्रलोभन का रोड़ा ...
कॉमन को होती रही वेल्थ की प्रोब्लम ...
कॉमनवेल्थ में दिखा दिया अपना तुमने आचरण ...
नारी की इज्ज़त भी तार तार हो गई ...
तुमको लगा जनता सब देख कर भी सो गई ...
इतने अनशन इतनी भीड़ तुम्हे समझा रहे थे ...
पर सत्ता के मद में तुम बहुत मुस्कुरा रहे थे ...
तभी मतदाता ने किया पेंच सारा ढीला ...
कांग्रेस का हाथ सारा आंसुओ से गीला ...
दिल्ली के प्रांगण में केजरी की लीला ...
कमल मुरझा गया पस्त हुई शीला ...

---कविराज तरुण

जिन्दगी

जिंदगी

न जाने कैसी रफ़्तार में है जिंदगी
कश्ती डूब रही मंझधार में है जिंदगी
या तो संभाले खुद को या उन्हें हौसला दे
वक्त की अजीब मार में है जिंदगी
सुना था राह आसान बना देती है
साथ चलने वाले के जब प्यार में है जिंदगी
पर हर मोड़ पर हो जब अंतर्मन की उलझने
खुशियों से वंचित तिरस्कार में है जिंदगी
डूब जाता है सूरज भी अपनी रोशिनी लेकर
ऐसे अँधेरे के आज गुबार में है जिंदगी
न हँसी न ठिठोली न खुशियों की कोई झोली
सन्नाटे से भरे किस संसार में है जिंदगी

--- कविराज तरुण

Monday, 18 November 2013

याद आने लगे



फूल गुलशन के फिर मुस्कुराने लगे...
शाम ढलने लगी वो याद आने लगे ...
हाँ मुमकिन है ख्वाबो में इश्क करना,
नींद आँखों में हम अपने सजाने लगे ।

चाँद की रोशिनी मेरे घर पर पड़ी ...
रातरानी की डाली पर कलिया खिली...
हम उन्हें पास अपने बुलाने लगे ,
शाम ढलने लगी वो याद आने लगे ।

दुपहरी में अपनी मुलाक़ात में...
लम्हे लम्हे में शामिल हर बात में ...
याद है कैसे वो शर्माने लगे ,
शाम ढलने लगी वो याद आने लगे ।

एक पल वो भी था, थे खफा वो बहुत...
पास तो खूब थे पर, थे जुदा वो बहुत...
रूठते वो गए हम मनाने लगे ,
शाम ढलने लगी वो याद आने लगे ।

इस गलीचे पर कदमो की आहट को लेकर...
अपने चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट 
को लेकर...
प्यार की नई दुनिया हम बसाने लगे,
शाम ढलने लगी वो याद आने लगे ।

- कविराज तरुण

कोई तो रोको


कोई तो रोको ...
    मेरी बस्ती जल रही है ।
गाँधी सुभाष भगत सिंह...
    हर हस्ती पिघल रही है ।।
इस वतन का कोना-कोना
    बना राजनीति का खिलौना
मौन है क्यूँ राजा...
    जनता उबल रही है ।
कोई तो रोको ...
    मेरी बस्ती जल रही है ।।
हो पंजाब सिंध मराठी
    या क्षत्रिय ब्रह्म या भाटी
जाति धरम से हिन्द की...
    अब आत्मा बिखल रही है ।
हिमखंडो का हिमालय
    बंगाल की या खाड़ी...
पूरब की सरजमीं हो
    या फिर हो कन्याकुमारी...
विभक्त टुकड़ो में भारती की...
    इज्जत उछल रही है ।
और साख इस वतन की ...
    देखो फिसल रही है ।।
कोई तो रोको ...
    मेरी बस्ती जल रही है ।
गाँधी सुभाष भगत सिंह...
    हर हस्ती पिघल रही है ।।


--- कविराज तरुण





रंग तिरंगे का


रंग तिरंगे का एक दिन पूछेगा हमसे...

खुद को किस रंग में हमने रंग लिया है

सफेदपोशो ने देखो सफेदी को इसके

नित किस तरीके से मैला किया है

खून खराबे ने केसरिया पट्टी को इसके

आज बदलकर रक्तरंजित किया है

रंग हरा है इसमें पर हरियाली कहाँ है

चक्र खामोश है खुशहाली कहाँ है

ये तो लहराता है पर न कह पाता है

राष्ट्र-सम्मान का ये क्या सिलसिला है

रंग तिरंगे का एक दिन पूछेगा हमसे...

खुद को किस रंग में हमने रंग लिया है


--- कविराज तरुण




Tuesday, 12 November 2013

वाह वाह मेरे आसाराम


सुबह भजन शाम को जाम ...
वाह वाह मेरे आसाराम ।
धर्म संस्कृति हुई बदनाम ...
वाह वाह मेरे आसाराम ।
कथनी करनी में भेद के पोषक !!
बाल-बालाओं के आदि शोषक !!
विकृत मनोवृति के साक्षात द्योतक !!
समाज निर्माण के गति अवरोधक !!
कुकर्मी कषुलित कर दिया नाम...
वाह वाह मेरे आसाराम ।
धर्म का कर दिया काम तमाम...
वाह वाह मेरे आसाराम ।
काम क्रोध मद लोभ के साधक !!
सभ्य सोच के अतुलित बाधक !!
दुष्कर्म चरित्र नवरस मादक !!
संकीर्ण बुद्धि और कुकृत्य व्यापक !!
गलती का भुकतो अंजाम...
वाह वाह मेरे आसाराम ।
बुरे कर्म का बुरा परिणाम ...
वाह वाह मेरे आसाराम ।

-कविराज तरुण

Sunday, 27 October 2013

izhaar

 इज़हार ...

 वही भाव जो शून्य पड़े थे 
 छुपे थे झुरमुट की ओट में ...
 आज जूही के पीछे से चले आ रहे हैं |
 कहने को रखा है बहुत कुछ यहाँ पर ...
 पर ये अधर हैं की जैसे , एक - दुसरे पर सिले जा रहे हैं |
 ना समझा सकूँगा मै कुछ भी यहाँ पर ...
 कर्ण बाधिर हुए हैं , चेतन अचेतन की दशा पा रहे हैं |
 पर इस बेशरम दिल की हिमाकत तो देखो ...
 स्थिर कोषों में प्रेम की धुन , निरंतर गुनगुना रहे हैं |
 जब भी करता हूँ कोशिश
 बोल दूं दिल की बातें 
 शब्द मूर्छित हुए हैं , लफ्ज़ घबरा रहे हैं |
 आज फिर ना कहूँगा और चुप ही रहूँगा ...
 तुम खुद ही समझना , दो नैना मेरे जो समझा रहे हैं ||


 एक नज़्म -

 " वो सदियों पुराना रिवाज़ कुछ बदला नहीं है ..
   हर कहानी में मोहब्बत , और मोहब्बत में दुश्मन जगह पा रहे हैं |"


 --- कविराज तरुण 

  



Sunday, 1 September 2013

वोट बैंक

जब जब चौराहे पर मेरी लाज उतारी जाती है |
संसद में बैठे सफेदपोश को तनिक लाज न आती है ||
कभी निर्भया कहकर मुझको झूठी आस दिखाते हैं |
ये चरित्रहीन और मर्म विहीन " बेटी की इज्ज़त " पे दांव लगाते हैं ||
मेरी अस्मत भी वोट बैंक ...
हर जुर्म की हरकत वोट बैंक ...
काबा और कुर्बत वोट बैंक ...
जाति और मजहब वोट बैंक ...
इसी निति के राज में सारी , राजनीति खेली जाती है |
संसद में बैठे सफेदपोश को तनिक लाज न आती है ||

--- कविराज तरुण