Friday, 24 June 2016

रूप घनाक्षरी मानसून

रचना क्रमांक 🅾2⃣
रूप घनाक्षरी का प्रयास
16-16 पर यति , अंत में गुरु-लघु

विषय - मानसून

गर्मी से झुलस गये नही कटे अब जून ।
हरदिल करे पुकार आ जाओ मानसून ।।
रात सुहानी ओझल है सूरज देता भून ।
देरी करके मत कर अरमानों का खून ।।
आँखें मेघा राह निहारे आसमान है सून ।
वर्षा बूँदों को तरसे मुरझाये से प्रसून ।।
गर्मी से झुलस गये नही कटे अब जून ।
हरदिल करे पुकार आ जाओ मानसून ।।

✍🏻कविराज तरुण

Thursday, 23 June 2016

कुंडलियां - पलायन

कुंडलियां

गीत विरह के बंद कर , गा खुशियों के गान ।
फूल सोहते शाख पर , मत तोड़ो श्रीमान ।
मत तोड़ो श्रीमान , अर्ज है इतनी मोरी ।
प्रेम डोर रे बाँध , सभी को एकहै डोरी ।
कहै तरुण कविराज , सीख फूलों सँग रह के ।
खुशियों की दो तान , छोड़ के गीत विरह के ।

✍🏻 कविराज तरुण

ग़ज़ल -ओ रे शहज़ादी

ग़ज़ल - ओ रे शहज़ादी

अपने शीश महल में मुझको इतनी सलामी दे ।
शहज़ादी बन जाओ तुम बेशक मुझे अपनी गुलामी दे ।
मिलना और बिछुड़ना खुदा के रहमोकरम पर है...
मै तुझको याद आऊँ बस इतनी सी कहानी दे ।

अपने शीश महल में मुझको इतनी सलामी दे ।
शहज़ादी बन जाओ तुम बेशक मुझे अपनी गुलामी दे ।।

नही मुमकिन है तुमसे दूर रहना ओ रे शहज़ादी ।
तड़पते दिल की है तूही राहत ओ रे शहज़ादी ।
मै तुझको प्यार करता हूँ खुद से भी कहीं ज्यादा ।
नमाज-ए-अर्ज़ मेरी तू इबादत ओ रे शहज़ादी ।

तू मुझको रूह-ए-अज़मत की ज़रा कोई निशानी दे ।
दिल गुलज़ार हो जाए जो तू वादा ज़ुबानी दे ।
नज़र भर के निगाहें मोड़ दे मेरी निगाहों को ...
ख़ार से चाँद बन जाऊँ जो रहमत बे-नियामी दे ।

अपने शीशमहल में मुझको इतनी सलामी दे ।
शहज़ादी बन जाओ तुम बेशक मुझे अपनी गुलामी दे ।।

✍🏻कविराज तरुण

Tuesday, 21 June 2016

कुंडलिया - काया

विषय-काया
छंद- कुंडलियां
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
काया मायामोह है , मन का रूप अपार ।
दीनन की पीड़ा मिटे , ऐसा कर उपकार ।।
ऐसा कर उपकार , कि ये दुनिया याद करे ।
नाम तेरा जीवित , ये मरण के बाद करे ।
कहे तरुण कविराज , यही है जग की माया ।
बाहर से न देखो , भीतर बेहतर काया ।।
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

✍🏻कविराज तरुण

योग कलाधर छंद

बड़े प्रयास के बाद कलाधर छंद में लिखी रचना 🙏🏻
वर्ण गणना व मात्रा भार

2121212121212121= 16 वर्ण व 24 मात्रा
212121212121212 = 15 वर्ण व 23 मात्रा

रचना विषय - योग🏃🏻🏃🏻🏃🏻

पीड़िता पुकारती शरीर शोध कामनाय ।
जिंदगी बिगाड़ती उपासना सही नही ।।

भोर को उठो निरा समाज बोध भावनाय ।
योग के समान कोई साधना बनी नही ।।

छोड़ नींद खाब प्रीत योग ही सही उपाय ।
योग हो विचार भोग वासना सही नही ।।

रोग वामपंथ है नही कभी सुखी हिताय ।
योग भागवंत सी अराधना बनी नही ।।

✍🏻 कविराज तरुण

योगाहास्य

रचना 02 विषय योग
हास्य

योग का बुखार चढ़ा जबसे अर्धांगिनी को
कान्हा की जगह घर मे रामदेव हो गए ।
सुबह सुबह सिंह आसन का ऐसा रूप धरा
जिह्वा - आँख देखकर मेरे प्राण खो गए ।
जल्दी उठाकर मुझे आसन कराने लगी
स्वप्न लोक के दर्शन अब दुर्लभ हो गए ।
जोर जोर हँसती है मुझे हँसने को कहे
लबालब आँसुओं मे मेरे नैन रो गए ।
धनुर् मृग मयूर कपाल भारती अनुलोम विलोम
शवासन करते करते हम फिर से सो गए ।
योग का बुखार चढ़ा जबसे अर्धांगिनी को
कान्हा की जगह घर मे रामदेव हो गए ।

✍🏻कविराज तरुण

Monday, 20 June 2016

लुप्त होता वेद

रचना 01

तरुण एक यही खेद है
विचारो से लुप्त होता वेद है ।

वेदों ने दिए हमें संस्कार
सिखाया जनमानस का सत्कार
खोल दिए सत्य के द्वार
दिखाया प्रकृति का उपकार

तरुण कलुषित मन के मेघ हैं
विचारों से लुप्त होता वेद है ।

वेदों में ज्ञान के कोष अपार
जीवन का अतुलित संसार
कर्म काण्ड का विस्तार
मुक्ति मार्ग भव सागर पार

तरुण बाधित परहित के वेग हैं
विचारों से लुप्त होता वेद है ।

✍🏻कविराज तरुण

कौमी एकता

रचना 02 विषय- कौमी एकता

समस्या का जड़ से , निदान होना चाहिये।
सर्व धर्म सम्भाव , भान होना चाहिये ।।

धरती को माता बोलो , चाहे तो अम्मी कहो ।
पर अपनी माता का , मान होना चाहिये ।।

हाथ इक गीता दूजी , कुरान होना चाहिये ।
छल द्वेष ईर्ष्या का , दान होना चाहिये ।।

बँट बँट गया क्यों , अपना समाज आज ।
एक सुर में देश का , गान होना चाहिये ।।

भावना संस्कृति की , उदार है माना मैंने ।
देशहित का मगर , ज्ञान होना चाहिये ।।

जब कोई आँख लिए , घूरने लगे है माँ को ।
पग में गिरा उसका , प्रान होना चाहिये ।।

भान होना चाहिये ।
मान होना चाहिये ।
गान होना चाहिये ।
प्रान होना चाहिये ।

✍🏻कविराज तरुण

Saturday, 18 June 2016

मनहरण घनाक्षरी शासन

मनहरण घनाक्षरी 🙏 शासन

चाल यहाँ शासन की , नीतियां प्रशासन की ।
ओजवाले भाषण की , ताल ठोकने लगे ।।
खाली पड़े राशन की , भूखे पेट आसन की ।
ख़ुशी वाले भोजन की , राह खोजने लगे ।।
टीन गिरे आँगन की , पानी भरे नालन की ।
मेघ देख सावन की , छत जोड़ने लगे ।।
आस मन भावन की , दुख के पलायन की ।
सुख क्षण आवन की , बाँट जोहने लगे ।।

✍🏻कविराज तरुण

मनहरण घनाक्षरी - तपन

तपन

आस लिए सावन की , पीड़ा में तन मन की ,
आग सुलगने लगी , मृदुवात पीजिये ।।
प्रीत इन नैनन की , जा रही चिलबन की ,
रात सिमटने लगी , सुप्रभात लीजिये।।
लय मन भावन की , बिखरी है जीवन की ,
राग सिसकने लगी , मीठीबात दीजिये ।।
रीति हटी गायन की , सुर के पलायन की ।
ताल बिदकने लगी , दृगपात  कीजिये।।

✍🏻कविराज तरुण

Monday, 13 June 2016

हेरा फेरी

रचना - हेरा फेरी

हेरा फेरी क्यों करता है
जहाँ देश धर्म की बात
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
सब हैं एक ही जात
क्यों कलम से नही अपनी तू
मानवता का पाठ पढ़ाये
हेर फेर करके खबरों को
असहिष्णुता का राग दोहराये
देश की साख वतन की इज्जत
को मत कर यूँ मैला
भारतेंदु ने देश बचाने को था
भरा लेख से थैला
उनका अनुकरण करने में
मत कर तनिक भी देरी
एक बना ये भारत धरती
छोड़ दे हेरा फेरी

✍🏻 कविराज तरुण

Sunday, 29 May 2016

व्यथा

व्यथा - व्याकुल मन

कितनी पीड़ा सहता हूँ
तुम क्या जानो पीर है क्यों
अपनी साँसों से खुद लड़ना
इतना लगता गंभीर है क्यों

न कहूँ जो कुछ तो मन व्याकुल
जो कह दूँ तो जीवन व्याकुल
सिसक रही है किसी कोने में
मेरे आँसूं की कतरन व्याकुल

घुट घुट के जीना पड़ता है
दिल हो जाता अधीर है क्यों
तुम शायद जान नही पाओगी
इन आँखों में इतना नीर है क्यों

कविराज तरुण

Tuesday, 24 May 2016

दान याचना

हे मालिक इतना दान दीजिये
इन पशुओं को इंसान कीजिये

सिंह ग़ुफ़ा में बंद पड़ा है
नरभक्षी बाहर घूम रहा है
डर है नही विषदंतो से
नरभुजंग गरल मुख चूम रहा है

इतना बस अहसान कीजिये
पशुओं को इंसान कीजिये

स्वानों का काटा बच जाता है
बाजों से कौन अब घबराता है
काट के खाने को आतुर नर
अब उपाय नजर नही आता है

भिक्षा बस यही भगवान् दीजिये
पशुओं को इंसान कीजिये

✍🏻 कविराज तरुण

भीख

किसी के लिए वो भीख है
किसी के लिए दान है ।
किसी के लिए जीविका
किसी का स्वाभिमान है ।

जब आत्मबल हार जाता है ।
या कोई रस्ता नजर नहीं आता है ।
खुद को कोई जब अतिसूक्ष्म समझ लेता है ।
तब परिस्तिथियों के आगे हाथ बिखेर देता है ।

पर किसी न किसी रूप में सब हैं भिखारी ।
जिसपे कुछ नहीं वो लोगो से दान माँगता है ।
जिसपे सबकुछ है विधाता से ध्यान माँगता है ।
कोई माँगता है आशीष तो कोई ज्ञान माँगता है ।
कोई मरने से पहले कर जोड़े प्रान माँगता है ।

विनती है मेरी छोड़ दो लाचारी ।
माँगने की अच्छी नही है बिमारी ।
खुद पर काबू करो हौसले से चलो ।
अपनी क्षमता का हक़ खुद ही हासिल करो ।

जिसको अपने आत्मबल पर मान है ।
वास्तव में वही इंसान है ।
उसके कदमो में जमीं आसमान है ।
उसको ही परमशक्ति से मिलता वरदान है ।

✍🏻 कविराज तरुण

कर्ता कर्महीन

कर्ता कर्म से विमूढ़ हो गया ।
सम्प्रदाय राजनीति का मूल हो गया ।
पैतृक धरोहर का अधिकार संविधान ,
लोकतंत्र का ढाँचा सारा उन्मूल हो गया ।
क्षेत्र धर्म जाति वर्ण में खंडित समाज आज,
राजनेताओं के चरणों में दबी धूल हो गया ।
लोग देने लगे माँ भारती को गाली
अमर्यादित भी खूब पाते हैं ताली
गरीब की आज भी सूनी है थाली
फूल जैसा वतन मुरझाया बिन माली
सुख का सपना मानो एक भूल हो गया ।
जिस जिसको सत्ता मिली वो नशे में चूर हो गया ।
कर्ता कर्म से विमूढ़ हो गया ।
सम्प्रदाय राजनीति का मूल हो गया ।

✍🏻 कविराज तरुण

Wednesday, 18 May 2016

राष्ट्र स्वाभिमान

राष्ट्र स्वाभिमान

वृस्तृत गरल के प्रबन्ध हो गए ।
रणबांकुर धरा पर आज चंद हो गए ।
कैसे बजेगी विजय की धुनि ।
छूते ही तार खंड खंड हो गए ।

मंद पद गया माँ  भारती का गान ।
कटघरे में खड़ा हुआ है स्वाभिमान ।
दाग लगने लगे शत्रु जगने लगे ।
ध्वज गिरा के कपूत आज हँसने लगे ।

कल जो चौहान थे जयचंद हो गए ।
भ्रमित चेहरों के सर्वनेत्र बंद हो गए ।
दिल के छाले तरुण मात्र छंद हो गए ।
रणबांकुर धरा पर आज चंद हो गए ।

✍🏻 कविराज तरुण

Saturday, 30 April 2016

लखनवी पहचान

बड़ी अदब से आदाब करना
नज़ाकत से हर ख्वाब भरना
लफ्ज़ हििंदी के उर्दू ज़ुबानी
है शराफ़त की जिसमे निशानी
ये शहर ज़नाब तहजीबो का है
इसका हर रिवाज़ तमीजों का है
इसकी विरासत मे मोहब्बत पनहगार है
जंग-ए-आज़ादी में ये मददगार है
सहेज़ रखा है इसने कला का खज़ाना
लज़ीज़ है यहाँ की हर थाली का खाना
राजनीति ने सदा इसको दिल मे बसाया
अटल राज से लेकर यादव की माया
शुकून का आलम है उम्मीदों का असर है
हर मज़हब साथ चलते हैं ऐसा शहर है
रुपहले पर्दे ने नवाज़ी है इसकी फिदरत
इसकी मिट्टी से है हर शायरी को मोहब्बत
नवाबो की शानोशौकत उमराव की जान
लखनऊ है सभ्यता की अज़ब पहचान

कविराज तरुण

Sunday, 24 April 2016

ग़ज़ल चाँदनी रात

निशा को भी रोशिनी की जरुरत होगी
चाँदनी रात में कब तुमसे मोहब्बत होगी
अब तो खोजती है कश्ती भी साहिल का पता
माना पहले उसे इन लहरों की हसरत होगी
निशा को भी रोशिनी की जरुरत होगी
चाँदनी रात में कब तुमसे मोहब्बत होगी

उगा के फूल अरमानों के अपने गुलशन में
दिये जला के बैठा हूँ कबसे चिलबन में
ये घटा बरसी थी कई रोज जमाने के लिए
अपनी आँखों से भिगोया है फ़र्श आँगन में
अबके बारिश में संग भीगने की चाहत होगी
चाँदनी रात में कब तुमसे मोहब्बत होगी

मुख़्तसर सी थी तमन्ना अब वो भी न रही
बात होने लगी बेवज़ह जो हमने न कही
तुम दुनियां की घनी भीड़ की सुनते ही रहे
ग़लत तो होना ही था करूँ कितना भी सही
जाने कब दिल में तेरे इन बातो की बगावत होगी
चाँदनी रात में कब तुमसे मोहब्बत होगी

कविराज तरुण

Friday, 8 April 2016

बीत हुआ कल

छुपी हुई देखी तेरी नजरो में एक मोहब्बत,
कुछ अधूरे से उसमे अनकहे ख्वाब भी थे ।
काँटो की चुभन का दर्द था बेशक,
पर किसी कोने में महकते गुलाब भी थे ।
है यकीं हमें इस अँधेरे से बाहर ,
किसी की दुनियां के तुम आफताब भी थे ।
आज खुद के सवालो में गुम हो ,
कभी हर पहेली के तुम जवाब भी थे ।
उम्र दर उम्र बीते लम्हों पर मुस्कुराते ,
तुम हसीं ग़ज़ल की पहली रियाज़ भी थे ।
यूँ समेट रहे हो अपने दिल के पन्ने ,
कभी किसी के लिए पूरी किताब भी थे ।

कविराज तरुण

रूपवर्णन

जब भी देखता हूँ तेरे आँखों की गहराई में
वो बहका समंदर जिसमे डूबने को जी चाहता है
क्या रखा है आखिर इस दुनिया पराई में ।
इन पलकों की मासूमियत सी अदा
अधरों पर अर्क गुलाबी सा नशा
जो बुदबुदाते हैं तो झरती स्वरांजलि
जैसे बागों में नवपुष्प की कलियाँ खिली
भीगे केशों का बिखर के चेहरे पर आना
सुर्ख गालो का जैसे स्वतः भींग जाना
और होंटों से टपकते पानी की आहट
पी जाए कोई तो मिल जाए जन्नत
भीगी गर्दन से जवाँ हुस्न की नमी दिख गई है
भाँप बनकर हवाओं में ताजगी बिक गई है
केशो की बूँदों से तेरे सीने पर सावन
संग तुम्हारे इन नजारों की दास्ताँ लिख गई है
तेरे यौवन से मादक महक आ रही है
जिसको मिल जाए उसको खबर क्या सही है
चुन चुन के उभारा है हर बदन का कोना
इससे बेहतर कोई जग में मूरत नहीं है
जिस्म जैसे तराशी हुई एक गागर
रस इतना कि कम पड़ जाए सागर
उसमे अदाओं की ऐसी मिलावट
गीले लबो पर जैसे कोई मुस्कराहट
सर से पाँव तक तू एक अप्सरा है
खबर क्या तुझे कि तू चीज क्या है
शायर की ग़ज़लें सारंगी की सरगम
चातक का मोती नदियों का संगम
तू दिलकश हसीं तू है नाजिमी
दिल का बहकना तो हो गया लाजिमी
पर हक़ीक़त में तू जिस्म का है खज़ाना
तेरे हुस्न का रब भी होगा दीवाना ।

कविराज तरुण

Tuesday, 22 March 2016

होली 2016

तेरे रंग मे ही खुद को रंग लूँ
तेरी यादों को मै अपने संग लूँ ।
दो चुटकी गुलाल की लाली
तेरे माथे पर आजा मै भर दूँ ।

तेरे नयनों का नीला अम्बर
अधरों पर आभास गुलाबी
श्वेत वर्ण की अनुपम रचना
संदेह मात्र भी नही खराबी

हर रंग छुआ मेरे चित्तपटल ने
इन प्यार के रंगों से मै दंग हूँ ।
बिन तेरे होली कैसे होगी अब
भीतर ही भीतर इस बात से तंग हूँ ।

तेरे रंग मे ही खुद को रंग लूँ ।
तेरी यादों को मै अपने संग लूँ ।।

कविराज तरुण

Sunday, 6 March 2016

विजय स्वर

विजय-स्वर

मत रोको ... उड़ने दो ।
सपनों को ... दीवानों को ।
पथ पर पत्थर पड़ने दो ,
आने दो तूफानों को ।

माना असहज मन का कोना
माना अनीति का वार प्रबल
माना तम का है अनंत द्वार
पर इन आँखों मे है ज्वाल प्रजल
माना विस्मित अल्हड़ गान
माना कुंठित है स्वाभिमान
माना प्रश्नों के तीर अनंत
भीतर बैठे हैं जो नर भुजंग
है विष में इनके शक्ति अपार
माना डसने को खड़े तैयार
पर सत्य को कैसा भ्रांतिमान
वीरों की धरती आसमान

मत चौको ... बढ़ने दो ।
उम्मीदों को ... अरमानों को ।
शूल को थोड़ा चुभने दो ।
जलने दो परवानों को ।

कविराज तरुण

Tuesday, 16 February 2016

देशद्रोही

देशद्रोही

खेद है अपनी इस काव्य अभिव्यक्ति पर
जो लिखनी पड़ रही है देशद्रोही शक्ति पर
मेरी सम्मत में देशद्रोह चर्चा का विषय नही
जो देशद्रोही है उसका मृत्यु ही विकल्प सही

पर...

असहिष्णुता पर ताल पीटने वाले सब ध्यानी कहाँ है ?
पुरस्कार वापस करने वाले सब ग्यानी कहाँ हैं ?
इन देशविरोधी नारों की आवाज़ उनको आती नही
अरे ये देश है नादानों ... कोई धर्म या जाति नही

अब क्यों मुखस्वरो पर अकिंचन मौन प्रस्तुत
बोलने की सामर्थ्य है फिर रोड़ा कौन प्रस्तुत
या सियासत ने कलम को बाध्य साबित कर दिया है
या सियासत को कलम ने साध्य साबित कर लिया है

पर...

माँ भारती के विरोध मे वाणी मुखरित करने वालों
सभ्यता का पाठ अपने भाल मस्तक पर उतारो
राजनेता सेक लेंगे रोटियाँ हर बात मे
लेकिन तुम्हे रखना पड़ेगा जिह्वा को औकात मे

पक्ष और विपक्ष के तुम अधिनायक हो भले
पर देशभक्ति का कोई सूरमा ज्यूँ ही मिले
रक्तरंजित दृष्टि वाला दम ठोकता अपनी छातियों का
तो समझना अंत आया तेरा और इन साथियो का

फिर न हिन्दू सिख ईसाई या मुसलमान होगा ...
देशद्रोही का सिर्फ और सिर्फ कत्लेआम होगा ...

कविराज तरुण

Friday, 22 January 2016

प्रेमगीत

प्रेमगीत

मै जोगी तेरा मै रोगी तेरा
मै तेरा मनमीत सदा ।
लिखता जाऊँ चित्त पटल पर
तेरे सुन्दर गीत सदा ।
मै हूँ दीवाना मै परवाना
मन में तेरी प्रीत सदा ।
मन दर्पण के हर बिम्ब मात्र में
तेरे चेहरे की आकृति सदा ।

स्वप्न सुधा के साथ तेरे
वो बीते क्षण आज मेरे
तुमको पास बुलाते हैं ।
एक मीठी आस जगाते हैं ।
वर्षा से हर्षित मयूर खग
अरुणोदय से उज्जवल ये जग
तेरे चेहरे की याद दिलाते हैं ।
मुझे आकर्षित कर जाते हैं ।
पुष्प पर अल्हड़ भँवर गान
तितली का सतरंगी विमान
तेरी चंचल छवि दिखाते हैं ।
हमे आनन्दित कर जाते हैं ।
शीतल थाप पवन की लेकर
महकती भाप उपवन की लेकर
हम तेरी बातो में खो जाते हैं ।
और बस मंद मंद मुस्काते हैं ।
ओस में भीगा विपुल पात
उजियारे की ये दिव्य रात
सिरहन सी कर जाते हैं ।
हम उस चंदा से नैन मिलाते हैं ।

मै प्रेमी सावन का प्यासा
तू कजरी का है संगीत सदा ।
इन स्वासों को ठंडक देने वाली
तू पर्वत की मोहक शीत सदा ।
हारा हूँ दुनियां की रश्मो से
पर प्यार तेरा है मेरी जीत सदा ।
मै जोगी तेरा मै रोगी तेरा
मै तेरा मनमीत सदा ।

कविराज तरुण

Tuesday, 19 January 2016

मोहब्बत की नही जाती

मोहब्बत की नही जाती

खिफायत के जमाने में मोहब्बत की नहीं जाती ।
वाट्सएप के संदेशो में ख़त सी खुशबू नही आती ।
आशिक़ो का ज़माना नेटवर्क के करम पर है।
सिग्नल जब नही आते तो नींदे भी नही आती ।
चल जाता है सारा काम अब GN और SD से ।
मिलने की नही फुरसत pic भेजी है hd से ।
काम पहली मुलाकात में गुलाबो से नही चलता ।
एप्पल के बिना अब कोई लड़की मिलने नही आती ।
मै तंग हूँ इन डेटिंग ऑनलाइन वालो से ।
ये ऐसा दौर आया है बगावत की नही जाती ।
खिफायत के जमाने में मोहब्बत की नहीं जाती ।
वाट्सएप के संदेशो में ख़त सी खुशबू नही आती ।

कविराज तरुण

Monday, 18 January 2016

शर्मिंदा हूँ

शर्मिंदा हूँ इस बात से
तू आज भी मेरा प्यार है ।
तेरी एक ख़ुशी के लिए
कुर्बान गम हज़ार हैं ।
शर्मिंदा हूँ इस बात से
तुझसे ही मेरी बहार है ।
तेरी एक झलक के लिए
नींद आँखों को नागवार हैं ।
शर्मिंदा हूँ इस बात से
तू इस दिल का ज़मीदार है ।
जीने के लिए मरने के लिए
साँसों को तेरा इन्तेज़ार है ।

कविराज तरुण

खंडित इंसान

खंडित इंसान

मुझको मेरा पर्याय दो
ज्ञान नही तो राय दो
खंडित वर्गित बंटा हूँ कबसे
इतिहास का वो अध्याय दो

पहले धर्म की धार चली
जाति चली नर नारि चली
उम्र का फिर व्यवधान मिला
काले गोरे का ज्ञान मिला
जो धनी है उसको मान मिला
खाली को अपमान मिला
जो बंट न सका हैवानो से
उसे क्षेत्रवाद का पैगाम मिला

दे सको तो ऐसा न्याय दो
भाषा से मुक्त संप्रदाय दो
इंसानो का अभिप्राय दो
मुझको मेरा पर्याय दो

कविराज तरुण

Friday, 15 January 2016

हो गया है

मन अब कमजोर सा हो गया है
राग रंग एक शोर सा हो गया है
वो भूले मुझे और भूलते ही गये
हाल मेरा गुजरे दौर सा हो गया है ।

किसी कोने में दिल के तू रह गई
जैसे बचपन मे सुनी कहानी कोई
थक गया रात भर मै जाग कर
सूरज बिना भोर का हो गया है ।

मन अब कमजोर सा हो गया है ।।

मेरी बातें तुझे याद आती नही
मेरी फ़रियाद खुदा तक जाती नही
खुद से ख़फ़ा रहूँ मै बेवज़ह
कदमो से ओझल ठौर सा हो गया है ।

चेहरे की रंगत सिलवट मे सिमटी
मेरी हसरते तेरी आहट से लिपटी
जो हो ना सकेगा ऐसी चाहत मे जीवन
सावन के अंधे मोर सा हो गया है ।

मन अब कमजोर सा हो गया है ।।

कविराज तरुण

Saturday, 9 January 2016

ज़रा ज़रा सा इश्क़

कुछ खाली खाली सा
कुछ भरा भरा सा है ।
इस मन को इश्क़ का ये
अहसास ज़रा ज़रा सा है ।

तुम शर्मा के देखो
मै घबरा के देखूँ ।
ये लुका छिपी का खेल
लगे कुछ नया नया सा है ।

तेरी बाते मीठी मीठी सी
ये रातें फीकी फीकी सी ।
ये स्वाद मोहब्बत का
कुछ खरा खरा सा है ।

मेरा ना मे हाँ करना
तेरा हाँ में ना करना ।
मेरी आँखें खुद पढ़ ले
इसमें सब धरा धरा सा है ।

कुछ खाली खाली सा
कुछ भरा भरा सा है ।
इस मन को इश्क़ का ये
अहसास ज़रा ज़रा सा है ।

कविराज तरुण

हमारी अधूरी कहानी

न छीना मैंने कुछ न उसने कुछ पाया
दो कदम मोहब्बत के चलने में वो घबराया
मेरे घर में भी बंदिश थी रश्मो के हवालों से
मै भी डर सकता था लोगों के सवालों से
कुछ अपने मेरे भी नाराज बहुत होते
कुछ पल जीवन के यूँही अनबन में खोते
घर छोड़ के जाने को कबसे मै राज़ी था
दूल्हा दुल्हन खुश रहते क्या करना क़ाज़ी का
पर तुमने न जाने क्यों चुप्पी नही तोड़ी
अपनी प्रेमकहानी का एक लफ्ज़ नही बोली
न मुझसे कहा ही कुछ न खुद को समझाया
दो कदम मोहब्बत के चलने में वो घबराया

कविराज तरुण

Friday, 8 January 2016

खामोश सज़ा

एक उम्र मोहब्बत की जो तुमसे रज़ा होती ।
फिर मेरी ज़िन्दगी न खामोश सज़ा होती ।।

जो ज़िक्र फकीरो का कभी हमने सुना होता ।
बेशक इन साँसों ने न तुमको चुना होता ।
इस दर्द की स्याही की जो एक छींट पड़ी होती ।
न मै ही ख़फ़ा रहता न तुम ही ख़फ़ा होती ।

एक उम्र मोहब्बत की जो तुमसे रज़ा होती ।
फिर मेरी ज़िन्दगी न खामोश सज़ा होती ।।

मेरे ज़हन के लफ़्ज़ों ने जो तुमको छुआ होता ।
मुमकिन है कि गलती का तुमको अहसास हुआ होता ।
गर प्यार के मालिक ने की कबूल दुआ होती ।
तो मेरी खुशियों की न तासीर धुँआ होती ।

एक उम्र मोहब्बत की जो तुमसे रज़ा होती ।
फिर मेरी ज़िन्दगी न खामोश सज़ा होती ।।

वीराने की दस्तक को पहचान गया होता ।
दहलीज़ पे तेरी मै वापस न गया होता ।
जीने की अपनी फिर एक ख़ास अदा होती ।
महफ़िल में सितारो सी धाक जमा होती ।

एक उम्र मोहब्बत की जो तुमसे रज़ा होती ।
फिर मेरी ज़िन्दगी न खामोश सज़ा होती ।।

कविराज तरुण

Wednesday, 6 January 2016

वात पत्र

वात पत्रों पर लिखा जब मैने सुरीला गान
तेरी याद का होने लगा इसमे आगमन प्रस्थान
पर अकिंचित मन तेरा है आज भी अंजान
वात पत्रों पर लिखा जब मैने सुरीला गान ।

झीनी झीनी पुष्प जैसी तेरी स्वरांजली
भीनी भीनी ऋतु मे क्रीडा करती तरु मंजरी
धीमे धीमे तू बनी इन अधरों की मुस्कान
वात पत्रों पर लिखा जब मैने सुरीला गान ।

सत्य से हूँ मै वंचित स्वप्न का है ज्ञान
इस हृदय के धड़कनों की तूही अब पहचान
वायु जल सर्वत्र फैला तेरा ही सोपान
वात पत्रों पर लिखा जब मैने सुरीला गान ।

मन मयूरा चल पड़ा प्रेमपग उद्यान
खग भी विस्मित देखते हैं कैसी ये उड़ान
जो कल्पनाओं के परे खोजे आसमान
वात पत्रों पर लिखा जब मैने सुरीला गान ।

पर नही ये चाह तुझपर आये कोई व्यवधान
हूँ अतः कुछ मौन प्रत्यक्ष तुम मेरे भगवान
बस नयन से नयन की भेंट का है अरमान
वात पत्रों पर लिखा जब मैने सुरीला गान ।

कविराज तरुण

Tuesday, 29 December 2015

हुआ क्या है

उनको चाहा तो जाना खुदा क्या है ।
और वो कहते हैं तुझको हुआ क्या है ।।

ज़र्रे ज़र्रे मे खनक उनके पायल की
ज़ुल्फ़ जैसे झलक हो बादल की
फूल के खिलते यौवन सी उनकी हँसी
दिल का बहकना हो गया लाज़िमी

उनकी खुशियों ने सिखाया दुआ क्या है ।
और वो कहते हैं तुझको हुआ क्या है ।।

बंद पलकों मे काजल छिपा लेने वाले
अपने होंठो से कभी कुछ न कहने वाले
जान के अंजान बनते हो फिदरत तुम्हारी
हूँ ख़्यालो मे गुम है ये सीरत हमारी

अब्र सा ऐहसास है हमने छुआ क्या है ।
और वो कहते हैं तुझको हुआ क्या है ।।

कविराज तरुण

Saturday, 12 December 2015

दहेज़

दुनिया भी गज़ब का बाज़ार है ।
यहाँ हर कोई बिकने को तैयार है ।
जो खरीद नही सकते स्कूटर भी जेब से ...
अपने लड़के के लिए दहेज़ में उन्होंने मांगी कार है ।
दुनिया भी गज़ब का बाज़ार है ।
अपनी इसी किस्मत को रोती हैं बेटियाँ ...
उनका दहेज़ जमा करने के लिए बाप ने छोड़ी है रोटियाँ ...
माँ ने भी सपनो से कबसे किया है किनारा ...
बेटी की शादी के लिए अपना गहना उतारा ...
और भाई भी धन जुटाने में कितना लाचार है ।
ये दुनिया भी गज़ब का बाज़ार है ।
ये प्रलोभन है या लालच या मन की तृष्णा ...
रुक्मणी को बिना दहेज़ नही मिलेगा कृष्णा ...
दूषित समाज मे आज कितना दूषित विचार है ।
दहेजलोभी है जो वो सच मे बीमार है ।
दुनिया भी गज़ब का बाज़ार है ।

कविराज तरुण

Friday, 4 December 2015

दर्द की शायरी

उम्र दो चार दिन की मोहलत मुझे दे दे ,
अभी कुछ आँसुओं का क़र्ज़ मुझको चुकाना है ।

इस मुशगुली मे वक़्त कुछ कम ही रहा ,
अपनों को हँसाना है ग़ैरों को रुलाना है ।

नही तेरे सितम का कोई भी शानी नज़र आया ।
ये कतरा आँख मे भरकर समंदर को हराना है ।

मेरे हमदर्द कहते हैं ज़ख्म भर जायेगा सब मेरा ,
इश्क़ में बेवफाई का चलन सदियों पुराना है ।

कविराज तरुण