Friday, 21 September 2018

ग़ज़ल - रह गया

मै उसे देखकर देखता रह गया
बाण नैनों का फिर फेंकता रह गया

वो भी नजरें झुका मुस्कुराने लगी
और मै ये हँसी सोखता रह गया

पास आकर कहा उसने कुछ कान में
साँस की आँच मै सेंकता रह गया

कुछ जवाबी बनूँ तो कहूँ मै भी कुछ
लफ्ज़ की मापनी तोलता रह गया

वो गई सामने रोकना था 'तरुण'
दिल ही दिल में उसे रोकता रह गया

कविराज तरुण

Thursday, 20 September 2018

ग़ज़ल - तुझको पाया है

मैंने खुद को खोया है तो तुझको पाया है
सारी दुनिया तज के मैंने इश्क़ कमाया है

अब तेरे बिन जीना कितना भारी भारी सा
लगता है सीने पर जैसे बोझ उठाया है

टूटा कोना कोना मन का पलभर मे ऐसे
खुशियों को खुद अर्थी देकर श्राद मनाया है

बेबस हैं आंखें नींदों मे ख़्वाब नही आते
चाँद सितारों को अम्बर ने रोज बुलाया है

खो के तुझको जाना कितना इश्क़ 'तरुण' तुमको
धड़कन ने अब दिल से सब अधिकार गँवाया है

कविराज तरुण

Monday, 10 September 2018

कुंडलियां - माखन


कुंडलियां

माखन देखो खा रहे , मेरे नंदकिशोर ।
फूटी है सब गागरी , बैठे माखनचोर ।।
बैठे माखनचोर, मनोहर मुख लिपटाया।
सुंदर शोभित श्याम, सलोनी सुंदर काया ।।
कहे तरुण कविराज,किसी को मत दो चाखन ।
खाओ मन भर आज , श्याम मटकी का माखन ।।

कविराज तरुण

Friday, 17 August 2018

अटल जी

पूज्यनीय अटल जी को समर्पित शब्द श्रद्धांजलि-  कविराज तरुण

ये मृत्यु तुम्हे क्या मारेगी
    तुम देवलोक के प्राणी हो ।
जड़-चेतन का भेद बताते
    तुम अटल भाव की वाणी हो ।।

जीवन का सारांश यही है
    तुमसा कोई संत नही है ।
किया कूच धरती से माना
    नया सफर है अंत नही है ।।

अजातशत्रु हो आप सदा ही
    हृदय जीत कर चले धाम को ।
मन मस्तक में स्मृति विशेष में
    याद रहोगे जीव आम को ।।

राजनीति की हो मर्यादा
    तुम धर्मराज के स्वामी हो ।
बीते कल के दीप नही हो
    तुम सूर्यताप आगामी हो ।।

गली दधीचि की अस्थि जहाँ पे
    जहाँ सिंधु का पानी बहता ।
जहाँ हिमालय शीश उठा के
    अटल इरादों की छवि कहता ।।

उस भारत से देह त्याग के
    परमब्रह्म में लीन हो गये ।
माँ रोयी है बेटा खोके
    वैभव सारे दीन हो गये ।।

तुमने तो ये कहा मृत्यु से
    फिरसे तुम वापस आओगे ।
मौन दिशा से ज्योति जलाके
    ये धुंध तिमिर हटवाओगे ।।

हमसब तेरे प्रेमभाव को
    समावेश करते हैं मन में ।
मृत्यु तुम्हारा क्या कर लेगी
    आज बसे तुम हर जीवन में ।।

*कविराज तरुण 'सक्षम'*
*9451348935*

Wednesday, 15 August 2018

क्यों इसकदर मायूस है तू

*सुप्रभात लिए एक आस एक प्रश्न*

क्यों इसकदर मायूस है तू
दहलीज पर क्यों गुमसुम खड़ी है

शिकन संकोच की अनगिनत रेखाएँ
आखिर क्यों तेरे माथे जड़ी हैं

क्यों ये नियम ये रश्में तेरे हवाले
क्यों हाथों में तेरे उदासी के छाले

तेरे रास्तों में क्यों बंदिश बड़ी है
दहलीज पर क्यों गुमसुम खड़ी है

तोड़ दे सब भरम छीन ले माँग मत
कोई रोकेगा कैसे जो तेरा है हक़

तू स्वयंप्रभा है तू उज्ज्वला है
तू आदि-शक्ति तू निर्भया है

तू पूर्ण है तुझको है किसकी जरूरत
तू शुद्ध है पतित पावन तुम्हारी है सीरत

फिर क्यों निराशा की तिमिर शेष है
परमब्रह्म का जीवित तू अवशेष है

पोंछ ले अब ये आँसूँ घर से बाहर निकल
आकाश है तू ये धरती अग्नि वायु जल

सब तुझमे समाहित
सब तुझसे प्रवाहित

तोड़ दे तू उसे जो बंधी हथकड़ी है
दहलीज पर क्यों तू गुमसुम खड़ी है

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*कविराज तरुण' 'सक्षम' । 9451348935*

Monday, 13 August 2018

ग़ज़ल 100 किधर गई

212 1212 212 1212

ऐ नदी नहर तेरी कश्तियां बिखर गईं ।
हम जवां तो गए मस्तियां किधर गईं ।।

दिन उदास हो गया चाँद भी तो खो गया ।
भागते रहे सभी हाय क्या ये हो गया ।।

शाम की ख़बर नही रात मे भी घर नही ।
लोग दिख रहे मगर ये मेरा शहर नही ।।

उम्र इसतरह मेरी जीते जी गुजर गई ।
हम जवां तो हो गए मस्तियां किधर गई ।।

बिन पतंग आसमाँ आज फिरसे रो रहा ।
भोर का उजास भी बादलों में खो रहा ।।

छत पे गिट्टियां नही खेल छूटने लगे ।
खुद-ब-खुद ही बाग़ से फूल टूटने लगे ।।

और शाख से सभी पत्तियां भी झर गई ।
हम जवां तो हो गए मस्तियां किधर गई ।।

देखता हिसाब हूँ झूठ की किताब में ।
क्या मजा मिले भला बोतलों शराब में ।।

यार सारे मतलबी साथ में फरेब भी ।
बेफिजूल खर्च में झर रही है जेब भी ।।

मूसकों की भीड़ से नोट भी क़तर गई ।
हम जवां तो हो गए मस्तियां किधर गई ।।

कविराज तरुण

Saturday, 11 August 2018

ग़ज़ल 99 बड़ी बेबसी थी

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बड़ी बेबसी थी बड़ी बेकली थी ।
मुहाने ख़ुशी के वो देखो चली थी ।।

वो चलने लगी पाँव अपने उठाकर ।
सजी सामने आज सारी गली थी ।।

थी तैयार वो संग काँटो पे चलने ।
बड़े नाज से जो अभी तक पली थी ।।

मगर कुछ हुआ मान के मकबरे में ।
ये दुश्मन ज़माना मची खलबली थी ।।

बना फिर वहाँ इस मुहब्बत का मलबा ।
रिवाजों के चलते वो धूं धूं जली थी ।।

कविराज तरुण

Thursday, 9 August 2018

वंदेमातरम्

वंदेमातरम्

रक्त नसों में बहता कहता वंदे माँ भारती
मन का दीप जलाकर करता तेरी मै आरती
तूही आचमन ..तू आगमन
तूही जीवनम ..तू प्राणसम
वंदे वंदे वंदे वंदे ..वंदे रे मातरम्

ध्यान तेरा ही मस्तक में है साँस चली तुझसे
दिन का सूर्य तुम्ही से निकला साँझ ढली तुझमे
तेरी मिट्टी बनकर सोना हमको पाल रही हैं
मेरी दिशायें सारी तेरा पल्लू थाम रही हैं
तूही मोहनम ..तू माधवम
तूही जीवनम ..तू प्राणसम
वंदे वंदे वंदे वंदे ..वंदे रे मातरम्

कौन भला तुझसे बढ़कर है कौन विकल्प है तेरा
जीवन तेरे नाम किया है ये संकल्प है मेरा
शीश चढ़ा दूँ कदमो में पर कर्ज नही उतरेगा
जी करता मै करता रहूँ माँ बस तेरी ही सेवा
तूही साधनम ..तू भावनम
तूही जीवनम ..तू प्राणसम
वंदे वंदे वंदे वंदे ..वंदे रे मातरम्

कविराज तरुण

Saturday, 4 August 2018

चौपाई गीत - छंद

छंद बिना है ज्ञान अधूरा ।
छंद बिना कुछ भी नहि पूरा ।।

ज्यूँ गंगा का बहता पानी ।
छंद बने जनजन की बानी ।।
छंद अलौकिक छंद गेय है ।
हिंदी सेवा परम ध्येय है ।।

बाकी सब है चूरा चूरा ।
छंद बिना कुछ भी नहि पूरा ।।

कविता का उत्थान इसी में ।
ऋषि मुनियों का ध्यान इसी में ।।
देवलोक का वो अनुयायी ।
जिसने इसकी महिमा गायी ।।

छंद स्वर्ण ये नही धतूरा ।
छंद बिना कुछ भी नहि पूरा ।।

कविराज तरुण

Friday, 3 August 2018

चौपाई गीत - उमड़ घुमड़ जब सावन आया

चौपाई

उमड़ घुमड़ जब सावन आया ।
यादों    ने     बहुतै  तड़पाया ।।

अँखियाँ टपक टपक के बरसी ।
दरस  तुम्हारी  को  ये   तरसी ।।
झूले    हमको    लगे    बुलाने ।
कोयल  गीत   लगी  है   गाने ।।

काहें    तुमने    हमे    भुलाया ।
उमड़ घुमड़ जब सावन आया ।।

कामदेव  भी  डालें  डोरे ।
फूल गिरे आँगन में मोरे ।।
पवन सुहानी खूब सताये ।
विरह वेग में अंग जलाये ।।

ऐसे   में   ये    दिल    घबराया ।
उमड़ घुमड़ जब सावन आया ।।

हमसे खींज रहीं हैं सखियाँ ।
चुप्पे चुप अब बीते रतियाँ ।।
आकर अब तो गले लगाओ ।
सावन  में  यूँ मत तरसाओ ।।

मिलने  को  ये  मन  ललचाया ।
उमड़ घुमड़ जब सावन आया ।।

कविराज तरुण

Friday, 13 July 2018

सीजन नही होता

प्यार का कोई कभी सीज़न नही होता
दिल लगाने का सही रीज़न नही होता
हाल-ए-दिल अपना सुनाना आप ही पड़ता
आज के इस दौर मे पीजन नही होता

कविराज तरुण

Tuesday, 10 July 2018

ग़ज़ल 99 प्यार पाना चाहता हूँ

बहुत दिनों बाद कुछ लिख पाया

उम्र के हर मोड़ पर मै प्यार पाना चाहता हूँ
तेरी साँसों में कहीं अधिकार पाना चाहता हूँ

बंद लफ्ज़ो से तराना इश्क़ का छिड़ता नही है
दिल की खिड़की खोलकर विस्तार पाना चाहता हूँ

फूल की रंगत है तुमसे चाँद की ये चांदिनी है
माँग में सजकर तेरे श्रृंगार पाना चाहता हूँ

हाय उल्फ़त की कहानी किस्मतों की मेड़ पर है
संग तेरे लाज़िमी घरबार पाना चाहता हूँ

काम कर इतना अभी बस देख ले मेरी तरफ तू
तेरी आँखों में छुपा संसार पाना चाहता हूँ

कविराज तरुण

Thursday, 5 July 2018

एक मतला एक शेर - जिंदगी के सलीखे

एक मतला एक शेर

जिंदगी के सलीखे यूँ कम हो गये

तुम तो तुम ही रहे हम भी हम हो गये

मोड़ कर पाँव अपने गली से तेरी

वक़्त के साथ किस्से ख़तम हो गये

सुप्रभात

कविराज तरुण

Saturday, 16 June 2018

ग़ज़ल 98 - सफर भी है

11212 11212 11212 11212

है दुआ तेरी तो सफर भी है , इन मंजिलों की ख़बर भी है ।
है नज़र नज़र मे चिराग ये , इक रौशिनी मे शहर भी है ।।

दिल हसरतों के दबाव में , जब आशिक़ी करने चला ।
घर के तेरे हर मोड़ पर , ठहरी हुई ये नजर भी है ।।

न दुआ मिले न दवा मिले , न तो मर्ज का ही पता मिले ।
मै बचूं कहाँ बतलाइये , मदहोश सा ये असर भी है ।।

ये उठी गिरी फिर मिल गई , लो खिली खिली फिर खिल गई ।
ये निगाह का ही कसूर है , सब ओर इसका कहर भी है ।।

है बची कहीं फिर आग ये , जो धुआँ उठा है मकान से ।
अरमान के इस हर्फ़ मे , उलझी मेरी ये बहर भी है ।।

कविराज तरुण

Friday, 15 June 2018

घनाक्षरी - ग्रीष्म

*ग्रीष्म*

ताप धुआँधार हुआ
  सीमा लाँघ पार हुआ
    गल रहा रोम रोम
      कोई तो बचाईये ।

शुष्कता की रीत चली
  पाती होके पीत जली
    जल गया व्योम व्योम
      आग ये मिटाईये ।।

ग्रीष्म हाहाकार करे
  आंकड़ों को पार करे
    देह ये बनी है मोम
      और न गलाईये ।

एक ही उपाय शेष
  जीव जंतु व विशेष
    कह रहा नित्य सोम
      पेड़ तो लगाईये ।।

कविराज तरुण

बैंक आय वृद्धि माँग

दो आय अगर तो पूरी दो,
पर, इसमें भी मज़बूरी हो,
तो दे दो केवल उचित दाम,
रक्खो अपने पैसे तमाम।
हम वही खुशी से खायेंगे,
कोई प्रश्न नही उठायेंगे!
सत्तादल वह भी दे ना सका,
आशीष समाज की ले न सका,
उलटे, हमको बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।
तब नाश समाज पर छाता है,
जब बैंकर सड़कों पे आता है ।
बैंकर ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
कर्मचारी कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ सत्तादल ! बाँध मुझे।
देखो जनधन मुझमें लय है,
अटल पेंशन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन हैं लोन सकल,
मुझमें लय है उत्थान सकल।
ये देश जानता है कबसे,
ये देश मानता है कबसे ।

याचना नहीं, अब रण होगा,
हिसाब यहां कण कण होगा ।
हम सड़को पर आ जायेंगे,
तो अर्थजगत हिल जाएंगे ।
सिस्टम ये भूषायी होगा,
हिंसा का परदायी होगा ।
तुम हमे रोक न पाओगे,
कैसे ये देश चलाओगे ।

सुनो जरा सा ध्यान धरो,
अब अनुसंशा का संज्ञान करो ।
तब सब अच्छा हो जाएगा,
बैंकर निज कर्म निभाएगा ।

कविराज तरुण

काजल

*काजल*

काजल सी ये काली रैना
जी अतिशय घबराये ।
घोर अमावस में जाने क्यों
चंद्र नजर नही आये ।।

काजल सी काली कोयल
गीत मधुरतम गाये ।
कौवा काला फिर जाने क्यों
कर्कश ही रह जाये ।।

काजल सा काला मेघ जगत में
वर्षा की बूँदें लाये ।
पर चिमनी की धुंध कालिमा
क्यों केवल प्राण सुखाये ।।

काजल सा काला जामुन देखो
शक्कर सा स्वाद दिलाये ।
पर ये काली मिर्च बता क्यों
तीखापन बहुताये ।।

काजल सा काला पत्थर ये
मंदिर में सुधि पाये ।
काला कोयला पर चुनचुन कर
भट्टी में झोंका जाये ।।

काजल से काली आँखें प्रिय की
प्रेमसुधा बरसाये ।
काला मन भीतर का फिर क्यों
पल पल आग लगाये ।।

इस काले का कोई भेद नही
काजल हमको बतलाये ।
चक्षुपटल पर चुभता काजल
श्वेत अश्रु संग लाये ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

गीतिका - चाहता हूँ

1222 1222 122

स्वयं को आज पाना , चाहता हूँ
कई रश्में निभाना , चाहता हूँ

कहीं खोया हुआ है , मीत मेरा
उसे वापस बुलाना , चाहता हूँ

रुका था प्रेम भीतर , आँख मे ही
गिरा आँसूँ छुपाना , चाहता हूँ

दबी बातें तनिक सा , शोर आया
जिसे कबसे बताना , चाहता हूँ

पलक बोझिल अलक है , आज गुमसुम
तड़पकर गीत गाना , चाहता हूँ

श्लोगन - बीजेपी 2019

*श्लोगन*

एक ही नारा एक आवाज़
बीजेपी का फिर से राज
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गधे बैल सब एक हो गए
पाप सभी के नेक हो गए
शेर को फिर ललकारोगे
तो झुण्ड सुनो तुम हारोगे
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स्वच्छ देश की अलख जगाई
मोदी जी हो तुम्हे बधाई

देश की इज्जत खूब बढ़ाई
मोदी जी हो तुम्हे बधाई

भ्रष्टाचार की जड़ें मिटाई
मोदी जी हो तुम्हे बधाई

जनधन जीवन उन्नति छाई
मोदी जी हो तुम्हे बधाई
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सब दल मिलकर दलदल करते
कमल के फूल वहीँ पर खिलते
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है विजन यही और यही प्रयास
हो सबका साथ सबका विकास
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आचार शुद्ध और खरा विचार
फिर से हो मोदी सरकार
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जगह जगह बस एक प्रचार
फिर से हो मोदी सरकार
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देश की जनता करे पुकार
फिर से हो मोदी सरकार
-----
कमल खिलेगा फिर एक बार
फिर से हो मोदी सरकार

ग़ज़ल - 97 मिटाता रहा

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मै जिसे रोज लिख के मिटाता रहा
तू वही गीत क्यों गुनगुनाता रहा

शेर दर शेर पन्नों मे खोते गये
तू खड़ा दूर से मुस्कुराता रहा

मौत है बेरहम मुझपे आती नही
जिंदगी से ये रिश्ता निभाता रहा

प्यार तबतक सलामत रहा बीच मे
चाँद ये दाग जबतक छुपाता रहा

छोड़ दे आज दामन ग़ज़ल का तरुण
दिल लगा जिससे दिल वो लगाता रहा

कविराज तरुण