ढलती हुई उम्र के
अठानवे पड़ाव में
एक बच्चे की किलकारियों सी मुस्कान लिए
जैसे फूल खिल जाता है
भोर के सूरज में
जैसे चिड़िया चाहकने लगती हैं
अपने घोंसलें से बाहर आकर
आप आये हो संघर्ष की कहानी कहने
वो संघर्ष जो उतना ही आपका है
जितना हनुमान का था सीता को बचाने में
जितना श्रीकृष्ण का था यशोदा को पाने में
वो संघर्ष जिसे
पूरी जवानी देकर सींचा गया
और वो भी किसी लालसा के बिना
केवल उस स्वप्न के लिए
जो कभी शिवाजी ने
हिन्दवी स्वराज के लिए देखा था
जो कभी श्यामा प्रसाद ने
भारतवर्ष के लिए देखा था
आप लड़ते लड़ते
मर भी सकते थे
जैसे अनेकोनेक योद्धा चल बसे
पर फिर..
संघर्ष को जीवित कौन रखता
फिर ये जीती जागती
कहानी कौन कहता
कौन बता पाता कि
निःस्वार्थ प्रेम किसे कहते हैं
एक कार्यकर्ता की ताकत को
भला कौन जान पाता
स्वयं से ज्यादा
उद्देश्यों की चिंता
परिणाम से ज्यादा
परिश्रम को महत्व
ये कोई आम बात नही
ये साक्ष्य है
उस आशा के दीपक का
जिसकी लौ को आपने जलाये रखा
आँधियों से तूफानों से
आपकी इस मुस्कान में
एक इतिहास छुपा है
साधना का
समर्पण का
और इसके लिए
ना तो जरूरत है
किसी उपहार की
ना ही किसी पुरस्कार की
पर ये जो कंधे पर
अंगवस्त्र मिला है पंतप्रधान के हाथों
ये जो नतमस्तक हुए हैं वो
आपके सम्मान में
ये जान लीजिये कि उनके साथ
एक सौ चालीस करोड़ जनता भी
आपके श्रीचरणों को
प्रणाम करती है
©कविराज तरुण
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