Thursday, 11 June 2026

सौ तितलियाँ

मनुष्य चाहे कितनी भी मजबूती से यथार्थ को स्वीकार कर ले, उसके भीतर आशा का बीज कभी पूरी तरह मरता नहीं। वह बस सोया रहता है। और जैसे ही मन की पहरेदारी कम होती है, उम्मीदें फिर से पंख फैलाकर उड़ने लगती हैं।

ये तो बड़ा आसान था सच को संभालना 
रातों को देर जाग कर ख्वाबों को टालना
लेकिन ये क्या हुआ जरा सी आँख लग गई
उम्मीद की सौ तितलियाँ एक साथ जग गईं

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