- कविराज तरुण
मैं वही मिट्टी का प्याला हूँ,
जो अमृत पीता अमृत देकर;
मैं वही मिट्टी का प्याला हूँ,
जो रस देता नीरस होकर।
तो चलो आज बतलाता हूँ,
अपने जीवन की आत्मकथा;
कैसे जन्मा इस धरती पर,
कैसे गुज़री आयु-व्यथा॥
मैं सूत्रपात हूँ समन्वय का,
एकल मेरा अस्तित्व नहीं;
अनगिनत धूलकणों का वैभव हूँ,
पृथक मेरा व्यक्तित्व नहीं।
वैसे भी एकल में शक्ति नहीं होती,
ये कहते सभी, सिर्फ मैं नहीं कहता;
एकल जीवन तन्हाई भरा है व्यर्थ,
ये सहते सभी, सिर्फ मैं नहीं सहता॥
मैं बना हूँ पानी गले लगाकर,
खुद को चक्के पर नचवाकर;
इस वायु ने मुझको सुखाया,
फिर अग्नि ने मुझको पकाया।
तब कहीं जाकर मैं पूर्ण हुआ,
पंचतत्त्वों से निर्मित स्थूल हुआ॥
धरती, जल, वायु, अग्नि, आकाश,
में हुआ मेरा विकास;
तो कहो भला मैं इंसान नहीं,
बस! इसलिए कि मुझमें जान नहीं॥
पर जब गर्म रस अभिभूत हुआ,
रुधिर-सा तब महसूस हुआ;
फिर जाना ये जीवन क्या है,
दुख में भी कितनी खुशियाँ हैं।
पर इस खुशी को मैंने त्याग दिया,
सिर्फ मृदुल होठों का स्पर्श पाने को;
अपने जीवन-रस को प्रस्तुत किया,
बस प्यार से हाथ लगाने को॥
परन्तु!
तुमने मुझे तिरस्कृत किया,
जब जीवन मेरा नीरस हुआ;
देखो सीता त्यागी गई,
उनका भी ऐसा हश्र हुआ।
अग्नि-परीक्षा उन्होंने भी दी,
अग्नि-परीक्षा मैंने भी दी;
जीवनभर प्रीति निभाई उसने,
जीवनभर प्रीति निभाई मैंने।
पर फिर क्यों ये परिणाम मिला,
धरती में हमको विश्राम मिला॥
क्या यही है तुम्हारी परम्परा?
यही है संस्कार!
मूल्य ही नहीं कुछ उसका,
जो तुम्हें कुछ देने में है बेकार॥
वाह रे ऐसी संस्कृति!!
जब तक काम, तब तक प्रणाम;
वरना...
प्रत्यक्ष है तिरस्कृति!!
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