अनवरित एहसासों की असंख्य अठखेलियाँ भ्रमित चेहरे की भी मानसदशा पलट देती हैं | जो बात निकलती हैं एक बार जुबान से इतिहास के पन्नो को सहसा बदल देती है || उन्मुक्त विचारो की बहती हवा ही अक्सर संकुचित दायरों को वृस्तित महल देती है | रुको नहीं... कुछ सोचो ... कुछ लिखो या कहो कुछ बात बिगड़ भी जाये तो नयी उम्मीद को पहल देती है ||
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