Wednesday, 12 October 2022

नही कोई

तेरे दर पे मेरा है बसर नही कोई
चल रहे हैं मगर है सफर नही कोई

लोग बेजान से मुर्दों की तरह जीते हैं
ये शहर है अगर तो शहर नही कोई

दाग़ हर रोज चहरे पे मेरे लगते हैं
ताब -ए -रुखसार पर है असर नही कोई

खार को गुल कहो ये भी क्या तमाशा है
हमको मालूम है ये शजर नही कोई

वो जिसे अपना कह करके मुस्कुराते हो
इल्म है , है कोई , है मगर नही कोई

Tuesday, 11 October 2022

होता है

चोट का बस निशान होता है
दर्द तो बेजुबान होता है
कौन कितना करीब है तेरे
वक्त पे इम्तिहान होता है

Wednesday, 14 September 2022

दोहावली 1-10

-//१//-
जीवन है उपहार ये , रखो अपना ध्यान
धरती पर अवतार को , तरसे हैं भगवान

-//२//-
जिसकी जैसी भावना , उसका वैसा रूप
कोई लागे छांव सा , कोई लागे धूप

-//३//-

जितनी होंगी मुश्किलें , उतना होगा काम
बाधाओं से जीतकर , आते हैं परिणाम

-//४//-

बाहर किसको दूंढता , अंदर हैं जब प्रान
दूजे को क्या देखना , अपने को पहचान

-//५//-

छोटी छोटी बात को , मत देना तुम तूल
अच्छी बातें छोड़कर , जाओ सबकुछ भूल

-//६//-

काम का ही मान है , काम का ही मोल
बाकी सब बकवास है , चाहे जितना बोल

-//७//-

बेमतलब की बात पर, करो नही अलगाव
छोटी सी इक चोट भी, बन जाती है घाव

-//८//-

राखो अपने आप को, सोने सा तुम साफ
जो बुरा तुमको कहे, कर दो उसको माफ

-//९//-

अपना मन यों साफ हो, नही किसी से बैर
ना कोई है आपका, ना ही कोई गैर

-//१०//-

मन की अपने कीजिए , कैसा है संकोच
अपनी हर इक चोट है , अपनी है हर मोच

हिंदी भाषा

हिंदी भाषा शक्ति है , हिंदी है अभिमान
हिंदी हरदम बोलिए , काहे का व्यवधान
हिंदी से ही हिंद है , हिंदी है गतिमान
हिंदी भाषा जोड़ती , सारा हिन्दुस्तान

Saturday, 10 September 2022

कविता - दो पैसे लाने का चक्कर

कविता - दो पैसे लाने का चक्कर

अपनी मर्जी से कब कोई, दूर शहर को जाता है
दो पैसे लाने का चक्कर , चक्कर खूब लगाता है
जब पिज्जा खाने की हसरत, मजबूरी बन जाती है
तब मां के हाथों की रोटी, उसको बड़ा सताती है
सोच सोचकर घर का खाना, भूखे ही सो जाता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

सपनों का मोहक आकर्षण, बातें चांद सितारों की
बेमानी हो जाती है जब, टोली अपने यारों की
सुध बुध खोने वाली चाहत, नेहप्रिया की बाहों में
धीरे धीरे थक जाती है, शामें ढलकर राहों में
तब उसको मखमल का बिस्तर, नींद कहां दे पाता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

रिश्तों की गर्माहट से जब, गंध जलन की आती है
सहकर्मी की मेल भावना, प्रायोजित रह जाती है
जब मीठी बातों का बादल, सच्चाई से टकराये
टूटा मन तब बारिश बनकर, इन आंखों में भर जाये 
झूठ कपट का मारा सावन, रोता ही रह जाता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

जब बूढ़ी मां, आ जाओ तुम, कह कह के थक जाती है
दीवारों की पपड़ी झड़कर, उम्र उसे बतलाती है
जब वो बूढ़ा बाप डपटकर, चुप होने को कहता है
बेटे की ना फिक्र करो तुम, वो लंदन में रहता है
फिर अपने कमरे में जाकर, वो आंसू पी जाता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

ढ़ेरों रुपया होने पर भी, खर्च नही कर पाते हैं
छुट्टी के दिन घर में बैठे, बैठे ही रह जाते हैं
मां से क्या ही बात करें वो, भावुक इतना होती है
'अच्छा' सुनकर रोती है वो, 'गड़बड़' सुनकर रोती है
जाने इतना प्यार कहां से, इस बेटे पर आता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

कविराज तरुण
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Monday, 18 July 2022

ये दिल हसरतों के सिवा और क्या है

ये दिल हसरतों के सिवा और क्या है
लुटा और क्या है बचा और क्या है
नही और कोई दुआ काम आये
तूही बता दे दवा और क्या है 

Monday, 27 June 2022

युद्ध जब तांडव कराता

चित्र आधारित कविता - युद्ध जब तांडव रचाता 

युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता
रक्त के बीजाणु लेकर, नेत्र से क्रन्दन कराता

है अहम् के नाम पर जब, युद्ध तो फिर अंत क्या है
न्याय की सत्ता पुकारे, विश्व तेरा पंथ क्या है
त्रस्त हैं सबलोग इससे, युद्ध ये किसको सुहाता
युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता

हे! नये जग के पुरोधा, शक्ति अपनी थाम लो तुम
हो रही धरती अकिंचन, धैर्य से अब काम लो तुम
क्षेत्र के विस्तार में क्यों, तू रचे संहार गाथा
युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता

मर रहें लाखों सिपाही, मर रहें सब आमजन हैं
ये मनुजता के मरण का, काल शर्पित आगमन है
मन व्यथित हो सोचता है, काश! कोई रोक पाता
युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता

चोट की चादर लपेटे, लोग कितना रो रहे हैं
मृत्यु तेरा भय समेटे, सब तमस में खो रहे हैं
मान जा दमराज किलविश, क्यों प्रलय को यूँ बुलाता
युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता

तरुण कुमार सिंह
प्रबंधक
यूको बैंक, लखनऊ 
कर्मचारी संख्या - 57228

Friday, 3 June 2022

ग़ज़ल कहाँ से रास्ता होगा

मुझे मालूम है दिल का कहाँ से रास्ता होगा
ज़रा नज़रेँ मिला लो तुम वहीँ से दाखिला होगा

अगर तुम हो सके तो देख लो फिर आज सीने मे
तिरा ही नाम इसके हरतरफ सच में लिखा होगा

ये दुनिया प्यार की दुश्मन इसे दिल से नही मतलब
लगेगा जब सही सबकुछ तभी कुछ अटपटा होगा

कहानी हीर राँझा की सबक देती यही हमको
के सच्चा प्यार होगा तो हमेशा फलसफा होगा

किसी के लाख कहने पर रुका कब है 'तरुण' आशिक
ये दुनिया जबतलक होगी मुहब्बत का सिला होगा

Friday, 8 April 2022

होता है

22   22   22   22   22   2

दिल का लगना बेहद मुश्किल होता है
किस्मत से ही मौका हासिल होता है

जितनी भी कोशिश करके तुम पिघला लो
पत्थर दिल तो बस पत्थर दिल होता है

फिरते हैं आवारा सड़कों पर आशिक
ये किस्सा हर महफिल महफिल होता है

उससे कह पाता तो कबका कह देता
दिक्कत है हर आशिक बुझदिल होता है

जिसको अपने राज़ बताकर रखते हैं
अक्सर वो ही अपना कातिल होता है

कविराज तरुण

Sunday, 13 March 2022

गजल - संवर जाए मेरी

तुमको पा लें तो ये उम्र गुजर जाए मेरी
दिन संभल जाए ये रात संवर जाए मेरी

अपने होंठों पे तराजू लिए फिरता हूं
बात निकले तो तेरे दिल में उतर जाए मेरी

वो जो रौशन है जिसे लोग चांद कहते हैं
तेरे होते हुए क्यों उस पे नजर जाए मेरी

इसी फिराक में राहों पे तेरी बैठा हूं
तू जो देखे तो तबियत सुधर जाए मेरी

और ये इंस्टा एफबी के होने का तभी मतलब है
के जब प्रोफाइल तेरी फोटो से भर जाए मेरी

कविराज तरुण

Friday, 4 March 2022

आत्मचिंतन

घोर तिमिर जो छाया है तुम उसका तो संहार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

अभी समय है कर्मयुद्ध का अभी समय है तपने का
अभी समय है पूर्ण करो तुम हर इक हिस्सा सपने का
मिले कष्ट जो तुम्हे राह में तुम उनको स्वीकार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

किसे पता है कल क्या होगा वर्तमान है साथ अभी
तुझे कोशिशों से भरना है अपना खाली हाथ अभी
समय की रेखा पर चलकर तुम सारी बाधा पार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

घोर अंधेरा तो आयेगा डरने की है बात नही
सूर्य उदय तो होगा फिर से रही हमेशा रात नही
अपने मन की किरणों से तुम थोड़ा सा उजियार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

जीत सदा ही मिले सत्य को झूठ सदा ही हारा है
निर्भय जीवन जीने का बस मात्र यही इक चारा है
इसी सत्य को जीवन का तुम अब अपने आधार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

Thursday, 30 December 2021

ग़ज़ल - ठीक है

हरकतें भी ठीक हैं और ये नज़र भी ठीक है
इक दफ़ा हो घूमना तो ये शहर भी ठीक है

सुब्ह-शामों पर लिखी नज़्में मुबारक हो तुम्हें
हम मिजाजी हैं ज़रा तो दोपहर भी ठीक है

तल्ख़ काँटों से भरी है ये डगर तो क्या हुआ
साथ है तेरी दुआ तो ये सफर भी ठीक है

वो पुरानी तख्तियों पर दिल बने हैं आज भी
वो पुरानी चिट्ठियों का डाकघर भी ठीक है

इश्क़ तेरी चाह में भटका रहा मै उम्रभर
दरबदर मै ठीक हूँ वो बे-खबर भी ठीक है

इक दफ़ा हो घूमना तो ये शहर भी ठीक है

Wednesday, 18 August 2021

थोड़ी थोड़ी गलती है

मेरी है या तेरी है या किसकी है
हर हिस्से की थोड़ी थोड़ी गलती है

आँखों में सैलाब छुपाकर क्या होगा
रो लेने दो दिल की जबतक मर्जी है

हर कोई तेरे जैसा हो बात गलत
सबकी अपनी रागें अपनी ढपली है

जो जैसा हो उसको वैसा ही मानो
दुनिया अपने ढर्रे पर ही चलती है

उम्मीदों का भार 'तरुण' जब ज्यादा हो
कुछ हटकर करने की जिद तब अच्छी है

Sunday, 18 July 2021

याद आओगे बहुत

जिंदगी का फलसफा दोहराने से पहले
याद आओगे बहुत याद आने से पहले

ये गलियां ये सड़कें बुलाएंगी तुमको
देख लेना इन्हें भूल जाने से पहले

दिल का क्या है कहीं न कहीं तो लगेगा
याद रखना हमें दिल लगाने से पहले

मुस्कुराता हुआ एक चेहरा यहाँ है
सोच लेना यही मुस्कुराने से पहले

हाथ रखना जरूरी है सीने पे अपने
बातें यहाँ की सुनाने से पहले

Sunday, 4 July 2021

मंज़िल नही मिलती

कभी साहिल नही मिलता कभी मंजिल नही मिलती
मेरे ज़ख्मों को जाने क्यों दवा काबिल नही मिलती

कि उसका नाम लेता हूँ तो अपने रूठ जाते हैं
किसी पत्ते की तरहा रोज सपने टूट जाते हैं

इसी इक बात से हिम्मत जुटा लेता हूँ रातों में
अँधेरों के मुसाफिर को कहीं मुश्किल नही मिलती

ख़फ़ा है या रज़ा है वो मुझे कोई तो बतलाओ
अगर मुझसे तुम्हे मतलब तो फिर उसकी खबर लाओ

बिना उसके लिखूँ मै क्या कहूँ मै क्या करूँ मै क्या
मेरी ग़ज़लें हुईं तन्हा इन्हें महफ़िल नही मिलती

वफ़ा के नाम पर कितने सितम अब और सहने हैं
ज़रा कह दो समंदर से ये आँसूँ और बहने हैं

जहाँ पर कत्ल होता है 'मुहब्बत' का 'मुहब्बत' से
वहाँ किस्से तो मिलते हैं मगर क़ातिल नही मिलती

कविराज तरुण 'सक्षम'
साहित्य संगम संस्थान

Thursday, 1 July 2021

संशय

शीर्षक - संशय

संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है
अच्छा खासा व्यक्ति कदम आगे करने से घबराता है

जो भी काम मिले उसको ना कहने की आदत लगती है
सीधी सादी बात उसे तब हिय के भीतर तक चुभती है
लोगों के फिर मानचित्र वो अनायास ही बनवाता है
संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है

निराधार विषयों पर चिंतन कारण बनता है दुविधा का
मार्ग उसे मुश्किल लगता है फिर चाहे वो हो सुविधा का
आड़ी तिरछी रेखाओं में उलझा अपने को पाता है
संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है

चित्त व्यथित हो जाता उसका घोर निराशा छा जाती है
मन की पीड़ा उछल उछल कर अश्रु हृदय से बरसाती है
दूर अकेलेपन का कोहरा चित्र भयानक दर्शाता है
संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है

अच्छा होगा यदि हम केवल कर्मभाव को अपनायेंगे
चिंता शंका वहम छोड़कर मनोयोग से लग जायेंगे
कोशिश करने वाला ही तो अपनी मंजिल को पाता है
संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है

तरुण कुमार सिंह
प्रबंधक-विपणन विभाग
लखनऊ अंचल

Monday, 21 June 2021

कवि कौन ?

फिर वही प्रश्न कौन हूँ मै
शब्द मूर्छित हैं मौन हूँ मै

कवि को समझने से पहले कविता को समझना बेहद जरूरी है । हम अक्सर शब्दों के फेरों में लिपटी खूबसूरत कविता को देखते हैं , पढ़ते हैं और आगे बढ़ जाते हैं । पर वह कविता कैसी है इससे कहीं ज्यादा ये प्रश्न गंभीर है कि वह कविता क्यों लिखी गई है । हम-आप सब लोग ये जानते हैं कि भावों का लयबद्ध सम्प्रेषण ही कविता है , परंतु कविता इससे कहीं ज्यादा गहरी होती है । कवि ने किन परिस्थितियों में कविता लिखी, उसे आखिर क्या जरूरत पड़ी अपनी भावनाओं को शब्दों में गढ़ने की, उसने क्या कहा और वो कहना क्या चाह रहा था । इन्ही सब बातों में तो कविता का सच छुपा है और कवि का भी । मै नही मानता कि कवि या कविता की तुलना उसकी लय , गति अथवा शिल्प के आधार पर होनी चाहिए , अपितु उसमे निहित भाव ठीक उसी प्रकार दिखे जैसा कवि दिखाना चाहता है तो कविता सफल है ।

हर कहानी में कविता हो न हो पर हर कविता में एक कहानी होती है । बस वही कहानी अपनी कविता में दर्शाना कवि का धर्म है । कवि कभी भी बंधनों में बँधा नही हो सकता । मुक्त भाव ही कवि का सबसे कारगर साधन है । प्रशंसा मनोबल के लिए आवश्यक है परंतु कवि तो वही है जो इन सबसे मुक्त हो । 'कवि कौन' ये प्रश्न कठिन भी है और आसान भी । प्रकृति को देखेंगे तो पशु, पक्षी, पेड़, वायु , अम्बर, बादल सब कवि लगेंगे क्योंकि ये मुक्त होकर अपना भाव प्रकट करते हैं । मनुष्य में कवि को खोजना कठिन है क्योंकि हम जो हैं वो स्वीकारते नही, जैसा होना चाहते हैं वैसा प्रयास करते नही और जो हो सकते हैं वो हो नही पाते । अपने आप को पहचानना ही कवि होना है , अपने अंदर झाँकना ही कविता है ।

एक कहानी सुनाता हूँ - एक व्यवसायी था जिसने वर्षों तक अथक परिश्रम करके अच्छी संपत्ति बना ली। सोते-जागते उसे अपने व्यवसाय की ही धुन सवार रहती। अपने व्यस्त जीवन में उसने महसूस किया कि उसे कढ़वेपन की बीमारी लग गई है। उसे कोई भी मीठी चीज फीकी या कढ़वी लगती । डॉक्टर को दिखाया, वैद्य, हकीम सभी के चक्कर लगा लिए फ़िरभी कोई फर्क नही पड़ा। विज्ञान समाधान खोजने में असमर्थ दिखा। बहुत परेशान होकर उसने एक आश्रम में शरण ली, वहां बैठे गुरूजी से अपना दुखड़ा कहा। वो कहते-कहते रो पड़ा कि बिना मिठास के जीवन का फायदा ही क्या है? गुरूजी हँस पड़े और कहा कि सब सही हो सकता है पर उसके लिए कुछ कठिन कार्य करने होंगे। वह झटपट सब कार्य के लिए तैयार हो गया।

सुबह हवन के लिए लकड़ी काटकर लाना, आश्रम में आये लोगों के लिए भोजन बनाना, आश्रम की सफाई करना और भोजन के नाम पर दिनभर खाली पेट रहने के बाद रात्रि में करेले की सब्जी एक रोटी के साथ खाकर सो जाना। कई दिन बीत गए, उसने मीठेपन की कल्पना करना तक छोड़ दिया।

पर इस नियमावली से तंग आकर आखिरकार वो गुरूजी के पास गया और बोला - गुरुदेव कई दिन से ठीक से भोजन तक नही किया। करेले की सब्जी इतने दिन से खाते-खाते परेशान हो गया हूँ। पहले तो मीठी चीज ही फीकी लगती थी पर अब तो करेला भी फीका लगने लगा है। बिना स्वाद के क्या जिंदगी गुरुदेव?
गुरुदेव ने कहा अभी ये कार्य कुछ दिन और करो।
पर कबतक गुरुदेव? - झुंझलाकर वो बोल पड़ा
जबतक करेले की सब्जी मीठी न लगने लगे - इतना कहकर गुरुदेव मुस्कुरा दिए
उस रात उसने यही सोचकर करेले की सब्जी खाई कि उसे वह मीठी लगे और यकीन मानिये हुआ भी ऐसा ही। वो भागकर गुरुदेव के पास गया और बोला - गुरुदेव आज तो करेला भी मीठा लगने लगा
गुरुदेव हँसकर उसे देखे और फिर बिना कुछ कहे सोने चले गए

सुबह जब वह उठा तो वो समझ चुका था कि अपने स्वाद को पुर्नजीवित करना उसी के हाथ में था पर वो अनायास ही दवाओं और डॉक्टरों की शरण में चला गया। उसने अपने दिनचर्या की व्यस्तताओं और अनिश्चिताओं में उलझकर जीवन के साथ-साथ, जिह्वा के स्वाद को भी कढ़वा कर लिया था। उसने खाने की मिठास को ही नजरअंदाज करना शुरू कर दिया था और शिकायतों के मकड़जाल में खुद को ही बीमार समझ लिया था परन्तु अब उसे सत्य की अनूभूति हो चुकी थी, संवेदना का परिचय हो चुका था, भावनाओं की महत्ता पता चल चुकी थी। उसे जीवन के हर स्वाद की उपयोगिता समझ आ चुकी थी। उसे यह पता चल चुका था कि हम जैसा महसूस करते हैं वैसे ही बन जाते हैं। अपने अंदर बसे जीव को पहचानना उसे आ चुका था, उसे यह पता चल चुका थे कि भावशून्य व्यक्ति स्वादहीन हो जाता है। अब वो भावप्रधान हो चुका था। उसे अपने अंदर की भावनाओं को पढ़ना और उसे प्रकट करना आ चुका था। वास्तव में अब स्वयं के लिए वो एक कवि बन चुका था।

कविराज तरुण

Friday, 18 June 2021

ग़ज़ल - तुम हो

मेरी जिंदगी की ग़ज़ल खास तुम हो
मेरी हर दुआ मेरी अरदास तुम हो

मै जब भी गुजरता हूँ तेरी गली से
मेरी धड़कनों की अहसास तुम हो

नही है किसी की मुझे अब जरूरत
ये दुनिया मेरी है अगर पास तुम हो

बनाया है तुमने बिगाड़ा है तुमने
मेरी इस कहानी का इतिहास तुम हो

समंदर तुम्ही हो ये दरिया तुम्ही हो
मेरी इन निगाहों की हर प्यास तुम हो

कविराज तरुण

Sunday, 6 June 2021

श्रीराम दिखाता सीने में

रघुनंदन की उस महिमा का गुणगान दिखाता सीने में
मै देवधरा के कण कण का अभिमान दिखाता सीने में

हाँ ! मुझमें अंश समाहित है उस मर्यादा पुरुषोत्तम का
हनुमान नही हूँ वर्ना मै भगवान दिखाता सीने में

भगवान दिखाता सीने में श्रीराम दिखाता सीने में