छोटी आंखों में अंबर सा सपना पल भी सकता है
आज नहीं है कुछ भी, तो क्या, वक्त बदल भी सकता है
इक काम पकड़ तू चलता चल, रुकना तेरा काम नहीं
रुका हुआ जो काम है पगले, आगे चल भी सकता है
जगत चराचर जीव अचंभित, कुछ भी तेरे हाथ नही
डरता क्यों है अनहोनी से, खतरा टल भी सकता है
इतना मुश्किल जो होता, कर पाता कोई और नही
पर्वत के उस पार क्षितिज से, सूर्य निकल भी सकता है
सब में तो भगवान छुपे है, फिर क्या खोजे आज 'तरुण'
नेकी का परिणाम अचानक, तुझको फल भी सकता है
~कविराज तरुण