Wednesday, 6 March 2013

कुमुद वाटिका


मेरी कुमुद वाटिका से, अभी न तुम प्रस्थान करो...
आओ बैठो तनिक प्रिये , थोड़ा सा विश्राम करो ...

ये बाग़ बगीचे और गुलाब भी, तेरी हँसी का अर्दासी है
ये बारिश की बूंदे भी, तेरे स्पर्श मात्र की प्यासी हैं
मधुवेग पवन के भीतर का, कहता है मेरे कानो में
रोको जाने मत दो तुमको, दो प्रेम पुष्प अरमानो में
इस सांझ की अनुपम बेला का , प्रिये ज़रा सम्मान करो ...
मेरी कुमुद वाटिका से, अभी न तुम प्रस्थान करो...

समय को थोड़ा पीछे लाकर, तुमको आवाज़ लगाता हूँ
वो घंटे बैठे रहना संग संग , सब स्मृति में दोहराता हूँ
वो प्यार की बातें , दूर के सपने
जब तुम थे , बस मेरे अपने
आज उन्ही सपनो को फिर से , आओ यहाँ निर्माण करो ...
मेरी कुमुद वाटिका से, अभी न तुम प्रस्थान करो...

जो हुआ दु: स्वप्न समझकर भूलो, एक नयी सुबह कल आनी है
जीवन की आप धापी में , जो बीत गया वो बेमानी है
इस निश्चल निर्झर की सौगंध प्रिये, भविष्य हमारा उज्जवल है
कुछ तुम भी ये संकल्प करो , विश्वास में अपने असीम बल है
बस इसी विश्वास के सुपुर्त सन्लगित , अपनी भव बाधा तमाम करो ...
मेरी कुमुद वाटिका से, अभी न तुम प्रस्थान करो...
आओ बैठो तनिक प्रिये , थोड़ा सा विश्राम करो ...

--- कविराज तरुण

No comments:

Post a Comment