Friday, 2 August 2013

prakritik avchetna


प्राकृतिक अवचेतना 

वसुंधरा है आज नम , वो वादियाँ कहाँ गयी |
दिखा के हमको सात रंग , इन्द्र रश्मियाँ कहाँ गयी |
कहाँ गयी वो स्वच्छ मारुत , कहाँ गयी तरु - मंजरी |
कहाँ बचे हैं वृक्ष ही , कहाँ बचा धन्वन्तरी |
बस प्राण रोकती हुई , जल वायु और आकाश है |
और धुल के हर एक कण में , विषधार का निवास है |
चन्द्र भी है आज मंद , रवि क्रोध में दहक रहा |
गर्मी वर्षा ठण्ड का , क्रम रोज ही बदल रहा |
लुप्त होते जीव-जंतु , विलुप्त प्राकृतिक अवचेतना |
मिट्टी के हर एक अंश में , बस है विरह की वेदना |
वो कर्त्तव्य बोध कहाँ गया , वो कल्पना कहाँ गयी |
पृथ्वी के संरक्षण की , कर्म भावना कहाँ गयी |
वसुंधरा है आज नम , वो वादियाँ कहाँ गयी |
दिखा के हमको सात रंग , इन्द्र रश्मियाँ कहाँ गयी |

--- कविराज तरुण 

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