हैरान हूँ अपनी जवाँ बे-बस्तगी को देखकर
इस बेखुदी को देखकर, आवारगी को देखकर
दिल फिर किसी पे मर मिटा अपनी हदों को छोड़कर
समझायें क्या इस उम्र की नादानगी को देखकर
जब हर तरफ हो शोर तो फिर है यही तब लाजिमी
रुक जाइये थम जाइये अब सादगी को देखकर
सहरा में जैसे प्यास से लड़ता है कोई बावरा
जीता रहा मै उम्र भर उस तिशनगी को देखकर
आसान है इनके लिए दिल तोडना दिल जोड़ना
मन भर गया मेरा 'तरुण' इस दिल्लगी को देखकर
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