Wednesday, 12 December 2012

DIVERSITY OF THOUGHTS ...



शीर्षक : सोच

नमस्कार !

कल एक शांत व्यक्ति से मुलाकात हुई | यूँ तो मन की अनगिनत वेगो में स्थिरता का समावेश खो सा गया है पर फिर भी अपने अन्दर के शांत प्रकोष्ठों में धैर्य की वेदना का साकार रूप अपने प्रत्यक्ष पाकर कुछ अच्छा सा लगा | मैंने तत्पर ही उससे पूछ लिया - मित्र इतने शांत कैसे ? फिर क्या था उसके भीतर का अशांत मानव बरबस ही बिलख बिलख के रोने लगा और वो बोल बैठा - हमारी (निश्चय ही उसके प्रियजन से  सम्बंधित ) सोच इतनी विपरीत क्यूँ है , हमें एक दुसरे की बात समझने में इतना समय क्यों लगता है , हम साथ होकर भी इतने अलग क्यूँ हैं ............ऐसे ही कुछ सवाल मेरे समक्ष प्रस्तुत हो गए |
अब मेरी बारी थी अपने जीवन की बारीकियों से जो कुछ सीखा , जो कुछ समझा उसे कर्णपटल पर उतारने की | मै बोला - हमारा ब्रह्माण्ड विविधता की एक ऐसी भेंट है जहाँ दो विचारो का एक ही समानार्थी नहीं मिल सकता , हम अपने जीवन में अनेक विचारो , आदर्शो और परिस्थितियों से प्रेरित होते हैं जो हमारी सोच का आधार तय करते हैं इसलिए इसकी सुन्दरता इसकी अद्वितीय परिवेश से ही है | जितना ये आधार मजबूत होता है उतना ही आसान हमें दूसरो के साथ समन्वय स्थापित करने में आसानी होती है | जरुरी तो ये है की हम दूसरे की सोच को प्रश्नचिन्ह लगाकर नहीं अपितु मूलभूत आवश्यकताओ की कसौटी पर रखकर आकलन करे तभी हम एक दूसरे को समझ सकते हैं | हो सकता है इसके लिए हमें झुकना पड़े पर जब हम आगे चलकर इसके दूरगामी परिणाम पर दृष्टि डालेंगे तो हमें प्यार , संतोष, आदर और शांति की एक वृस्तित सीमा दिखाई देगी जो हमें आनंद की अनुभूति कराएगी |

अपनी इन दो पंक्तियों के साथ बात ख़त्म करता हूँ :
"नज़र से देखो मेरी तो नज़र आएगा ... दूर लगता जो तुम्हे पास चला आएगा |
नज़र का फेर है नज़रिए का फरक ... बात समझोगे तो नजरिया बदल जायेगा || "

--- कविराज तरुण

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