Thursday, 10 August 2017

ग़ज़ल - मुहब्बत मर गयी

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ग़ज़ल - मुहब्बत मर गयी

सिलसिला कुछ यूँ चला मेरी शराफत मर गयी ।
छोड़ कर उसकी गली अब ये मुहब्बत मर गयी ।।

थाम कर था रख लिया मैंने हसीं जज़्बात को ।
आँख की कोरी सियाही की नियामत मर गयी ।।

मै पशो-उर-पेश मे वो रासता तकता रहा ।
कहकशों की दौड़ मे अहसास चाहत मर गयी ।।

सर्दियों की मौज मे अब बर्फ़ भी गिरने लगी ।
जम गये असरार मेरे तो अकीदत मर गयी ।।

मुन्तज़िर था मै कि वो आये वफ़ा के साथ मे ।
गैर के कंधे दिखा सिर सारी' हसरत मर गयी ।।

जब तराशा हाथ को हमने ज़िगर की आंच पे ।
ख़्वाब पाने का भरोसा और क़ूवत मर गयी ।।

मुफ़लिसी दिल की करी तुम दिलरुबा हो ही नही ।
मै तरुण ख़ामोश बैठा और दौलत मर गयी ।।

*कविराज तरुण सक्षम*

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