Monday, 12 June 2017

ग़ज़ल - मुस्कुराया करो

ग़ज़ल - मुस्कुराया करो
बहर - 122 122 122 12

हमें पास आकर बताया करो
नही इसतरह से छुपाया करो

फरेबी नही हैं फिदरत हमारी
ज़रा हाल-ए-दिल दिखाया करो

न समझे ज़माना दिलों की फ़िज़ा
युं आँसू न खुलके बहाया करो

नज़र ही नज़र मे मुनासिब मुहब्बत
नज़र बेधड़क तुम मिलाया करो

तरुण नाम है रहगुजर हूँ तिरा
चलो साथ मे मुस्कुराया करो

*कविराज तरुण सक्षम*
साहित्य संगम संस्थान

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