Wednesday, 14 June 2017

ग़ज़ल - किसान

ग़ज़ल - किसान

बहर - 122 122 122 12

सियासत मुबारक कफ़न कर रहा ।
किसानों को' यूँही दफ़न कर रहा ।।

मुखौटा लगा जो मुखालत करे ।
घरों को जला वो हवन कर रहा ।।

दुपहरी मे' निकला फसल नापने ।
उपज का मुनासिब जतन कर रहा ।।

मिले मूल्य थोड़ा खटे रात दिन ।
दलाली मे' हक़ वो गबन कर रहा ।।

उसे क्यों लपेटो हवस वोट मे ।
घुट घुट कर आधा बदन कर रहा ।।

खुदा से रहम की गुजारिश करूँ ।
सफेदी पहन वो हनन कर रहा ।।

तरुण हाथ जोड़े खड़ा सामने ।
बड़े भाव से अब नमन कर रहा ।।

कविराज तरुण सक्षम
साहित्य संगम संस्थान

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