Thursday, 15 June 2017

ग़ज़ल - आतंक

*ग़ज़ल - आतंक*

बहर - 122 122 122 12

शहर लाल सारा का' सारा हुआ ।
चमन से अमन बे-सहारा हुआ ।।

करे खून इंसानियत बे-वज़ह ।
मुजाहिद मुहब्बत से' हारा हुआ ।।

खुदा नेक रस्ता तू' इनको बता ।
जिहादी अकल से ये' मारा हुआ ।।

जहन पाक हो तो मिलेगा ख़ुदा ।
नही नाम से ही गुजारा हुआ ।।

न रोके रुके हैं 'तरुण' मुश्किलें ।
लहू उस फ़रेबी का खारा हुआ ।।

*कविराज तरुण सक्षम*
*साहित्य संगम संस्थान*

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