Wednesday, 16 July 2025

उपहार

उपहार 

स्नेह की कोमल छाँव में बीते हर एक प्रहर से,
कामना है - आपके जीवन को नित मिलता रहे उपहार।
माँ की ममता, पिता का भरोसा,
भाई का संबल, बहन की हँसी, मित्रों का साथ 
आपको मिलता रहे, इन रिश्तों में छुपा हुआ प्यार ।

प्रेम का आशीष का — न कोई मोल है, न कोई शर्त,
हृदय की गहराईयों से निकलता ये है एक मधुर स्वर।
जो आपको देता रहे उम्मीदों की रौशनी,
हाथ थाम कर कहता रहे कि — "आप अकेले नहीं।"

स्वास्थ्य आपका उत्तम हो और जीवन हो आसान,
हर स्वास में खुशियाँ छेड़े, जीवन का मधुर गान।
कदम कदम पर होता रहे, दुआओं का असर,
चित्त चन्दन-सा शीतल, भाल सूरज-सा प्रखर।

प्रकृति के अनगिनत तोहफ़े, आपका यशगान करें 
नीला अम्बर, बहती नदियाँ, आपका सम्मान करें 
पर्वतों की चुप्पी में शांति का संगीत बनें आप 
बारिश की बूँदों में धरती की प्रीत बनें आप 
हर ऋतु हर दिशा आपका श्रृंगार करे 
पशु, पक्षी, जीव, जगत आपका सत्कार करे 

प्रत्येक सुबह एक नई शुरुआत हो 
प्रत्येक साँझ की मधुर विदाई हो 
कर्म की नई अवधारणा गढ़ो आप 
धर्म में व्याप्त सदभावना धरो आप 
और प्रभु की अनंत करुणा का मिले आपको आगार
कामना है - आपके जीवन को नित मिलता रहे उपहार।

उपहार न केवल वस्तुएँ हैं,
ये भावना हैं, ये संवाद हैं।
हर दिन, हर पल, हर व्यक्ति,
अगर प्रेम से देखा जाए —
तो स्वयं एक सुंदर उपहार हैं।

Monday, 30 June 2025

हो नहीं सकता

देर तक मुझसे ख़फ़ा वो हो नहीं सकता
थी ग़लतफ़हमी मुझे, मैं रो नहीं सकता

फिर बिछड़ने के मुझे अब ख्वाब आएंगे
चार दिन से जग रहा, पर सो नहीं सकता

उसके लहजे में जो छलका था वो पत्थर था
अब किसी उम्मीद पर भी ढो नहीं सकता

आँख नम है पर कोई आँसू नहीं गिरता
दर्द ऐसा है जिसे मैं धो नहीं सकता

जिसके जाने से 'तरुण' वीरान है दुनिया 
था यकीं उसको कभी मै खो नहीं सकता

बदलते हैं

मुश्किलों में हम सफर थोड़ी बदलते हैं 
राह जैसी हो डगर थोड़ी बदलते हैँ

जिनको अपने लोग की परवाह रहती है 
वो परिंदे अपना घर थोड़ी बदलते हैँ

धूप में भी पालते परिवार वो अपना 
देखकर मौसम शहर थोड़ी बदलते हैँ 

जिसकी जो आदत रही वो हो गया वैसा 
सांप कुछ भी हो जहर थोड़ी बदलते हैं

डाल अपनी टहनियों पर फूल आने से
झूम लेते हैं शज़र थोड़ी बदलते हैं

इस बदलते वक़्त में जो लोग जिंदा हैँ 
वो ज़रा सी बात पर थोड़ी बदलते हैँ 

जिसके सर पर हाथ हो बूढ़े बुजुर्गो का
वो कभी अपना हुनर थोड़ी बदलते हैँ 

वो बड़ा मशहूर था जिसने कहा था  ये 
जो खबर खुद हों खबर थोड़ी बदलते हैँ

जब बुलंदी पर किसी के पैर काबिज हों 
तब वहां जाकर नजर थोड़ी बदलते हैँ

Sunday, 22 June 2025

कैसे हैं आप

पाप अत्याचार सबकुछ सामने, कैसे हैं आप
लोग पीड़ित हो गए हैं आपसे, कैसे हैं आप

बाहुबल से जंग तो जीती नही जाती जनाब
बात करने से निकलते रास्ते, कैसे हैं आप

चार पैसे के लिए कितना सुनूं, कबतक सुनूं मै
सर है गर्दन पर हमारे, सोचिये, कैसे हैं आप

झूठ के बिस्तर पे सोने से नहीं आती है नींद
आप हैं जो ख्वाब बोना चाहते, कैसे हैं आप

काम मुश्किल था नही पर, ये तरीका आप का
इक दफा कहते तरुण को प्यार से, कैसे हैं आप

कविराज तरुण

Thursday, 24 April 2025

शहीद की पत्नी

हमारे ब्याह की बातें सभी क्या याद हैं शोना
पकड़ के हाथ बोला था जुदा हमको नही होना

चले थे सात फेरों में कई सपने सुहागन के
मिला था राम जैसा वर खुले थे भाग्य जीवन के

ख़ुशी के थार पर्वत सा हुआ तन और मन मेरा
मुझे भाया बहुत सच में तुम्हारे प्यार का घेरा

कलाई पर सजा कंगन गले का हार घूँघट भी
समझता अनकही बातें समझता मौन आहट भी

मगर जब सामने आया मेरे आतंक जिहादी 
हुई फिर खून से लथपथ हमारा प्यार ये शादी 

हुआ सिंदूर कोसो दूर मेरा छिन गया सावन
सुनाई दे रही चींखें बड़ा सहमा पड़ा आँगन

बुला पाओ बुला दो जो गया है छोड़ राहों में
सभी यादें सिसक कर रो रही हैं आज बाहों में

मगर चुपचाप ऐसा पाप हम अब सह नही सकते 
ख़तम इनको किए बिन और जिंदा रह नही सकते 

कविराज तरुण

Sunday, 16 March 2025

ज़िन्दगी कैसी चल रही है

किसी ने पूछा - जिंदगी कैसी कट रही है 
ये कट कहाँ रही है किश्तों में बंट रही है

न दिन का है ठिकाना न रात का पता है 
न दिल में जब्त अपने ज़ज़्बात का पता है
एक दौड़ है ये ऐसी दौड़े ही जा रहे हैं 
हम हसरतों को पीछे छोड़े ही जा रहे हैं 

और मंजिले हैं ऐसी छूते ही हट रही है 
किसी ने पूछा - जिंदगी कैसी कट रही है

पैसे की भूख ऐसी अंधे को जैसे लाठी
क्यों आदमी है भूला ये जिस्म एक माटी 
जिसको खबर नही है क्या मोह क्या है माया 
दिनभर संवारता है वो जिस्म देह काया

पर जिस्म की उमर तो पल पल ही घट रही है 
किसी ने पूछा - जिंदगी कैसी कट रही है

जो लालची है उसको तोहफ़े मिले हुए हैं 
दहशत को कौन रोके जब लब सिले हुए हैं 
जो सत्य का सिपाही सीधा है नेक बंदा 
उसके लिए बना है फाँसी का एक फंदा

उसकी तमाम कोशिश फंदे में घुट रही है 
किसी ने पूछा - जिंदगी कैसी कट रही है

पाने की उसको चाहत खोने का डर अलग है 
उसका गुलाबी चेहरा दुनिया से पर अलग है 
मै छोड़ना भी चाहूँ तो छोड़ कैसे पाऊं 
उसकी गली से खुद को मोड़ कैसे पाऊं 

अपनी जुबां जब वो मेरा नाम रट रही है
किसी ने पूछा - जिंदगी कैसी कट रही है
ये कट कहाँ रही है किश्तों में बंट रही है

Wednesday, 26 February 2025

दिव्य भव्य महाकुम्भ

कुम्भ गया है, साथ में लेकर, कितनी सारी बातें 
पैतालिस दिन, माँ गंगा के, तीरे बीती रातें 

छाछठ कोटि की जनता ने, स्नान किया है पावन 
ऊंच नीच के बंधन टूटे, हर्षित मन का आँगन 

दिखे अखाड़े तेरह, उनका वैभव दिव्य अलौकिक 
चार हजार हेक्टेयर का, वर्णन मुश्किल है मौखिक 

नेता फ़िल्म सितारे सब ने, देखा दृश्य विहंगम 
उद्योगपति के अंतर्मन को, भाया अद्भुत संगम 

महाकुम्भ में देखी सबने, तकनीकी सौगातें 
चैटबॉट और एप के जरिए, डिजिटल कुम्भ की बातें 

महाकुम्भ में श्रद्धालु पर, फूलों को बरसाना 
मेलभाव से पुलिसबलों का, हम सबको समझाना 

सब लोगों का महाकुम्भ ने, किया यहाँ उद्धार 
जाने कितनों के जीवन को, मिली यहाँ रफ्तार 

धन्य हुए वो, जिन लोगों ने, किया यहाँ स्नान 
धन्य हैं वो भी, जिनके मन में, महाकुम्भ का ध्यान

सदा ऋणी हम योगी के, उत्तम था संचालन 
गर्व हमेशा करेगा उनपर, अपना धर्म सनातन

Tuesday, 25 February 2025

ग़ज़ल - लौट आऊंगा

ग़ज़ल - लौट आऊंगा 
© कविराज तरुण 

अकेला चल रहा पर मै किसी दिन लौट आऊंगा 
किसी मंजिल को हाथों में लिए बिन लौट आऊंगा

मुझे रिश्ते निभाना ठीक से आता नही है पर
मुझे जिसदिन लगेगा काम मुमकिन लौट आऊंगा

ये पंछी और लहरें भी तो वापस लौट आते हैं 
मै तो इंसान हूँ उनकी ही मानिन लौट आऊंगा

ये बस्ती आम लोगों से भरी क्यों है बताओ तुम 
अगर मुझको मिले कोई मुदाहिन लौट आऊंगा

मेरे आने से कोई भी नयापन तो नही होगा 
न कोई गुल खिले ना ख़ार लेकिन लौट आऊंगा

Thursday, 9 January 2025

पूछ

अपने दिल अपने यार अपने आवाम से पूछ 
तू मुझे पूछ बेशक़ किसी काम से पूछ 

फलाना घर फलानी जगह ये सब क्या है 
घर खोजना अगर हो तो मेरे नाम से पूछ 

कविराज तरुण

कलियाँ भी खिलतीं थीं

पहले फूल भी आते थे और कलियाँ भी खिलतीं थीं 
मेरे घर के लिए तब तो सभी गलियाँ भी मुड़ती थीं

मै अपनी बाँह फैलाकर फकत आराम करता था 
समंदर की तरह आकर कई नदियाँ भी मिलती थीं

कविराज तरुण

Sunday, 22 December 2024

ज़रा ईमान रहने दो

मेरे घर में कहीं पर एक रौशनदान रहने दो 
गिरो बेशक़ मगर इतना! ज़रा ईमान रहने दो

जरूरी है कि रौनक हो भरे गुलदान हों सारे 
मगर फिरभी कोई कोना कहीं वीरान रहने दो

वो आयेंगे मचाने शोर जिनको है नही परवाह 
जिन्हें परवाह हमारी है उन्हें अंजान रहने दो

उसे तो खेलने दो खेल सारे ही खिलौनों से 
जगाओ मत अभी तो ख़्वाब में अरमान रहने दो

ये मेरी रूह है इसको कहीं पर बेच दो लेकिन
किसी का प्यार से भेजा हुआ सामान रहने दो

मेरे घर में कहीं पर एक रौशनदान रहने दो 
गिरो बेशक़ मगर इतना! ज़रा ईमान रहने दो

Sunday, 8 December 2024

दो चार कदम

अपनी हद से आगे निकल के देखते हैं 
और दो चार कदम चल के देखते हैं 

वो कौन है जिसकी मलकियत है मंजिल पर 
आओ उसका चेहरा बदल के देखते हैं

ख़्वाब में अक्सर अपना घर बनाने वालों 
हम ख़्वाब देखते हैं तो महल के देखते हैं

दिल को समझा रखा है किस बात के लिए 
दिलवालों के दिल तो मचल के देखते हैं

क्यों चकाचौंध है तेरे वजूद के इर्द गिर्द 
क्यों लोग तुझे आँखें मल मल के देखते हैं

तुम शमा के जैसे रौशन हो शामियाने में 
हम परवाने तेरी आग में जल के देखते हैं

तेरे इंतज़ार में मै रो भी नही सकता
मेरे कुछ यार मेरी पलकें देखते हैं

अब तो दौलत भी किसी काम की नही
गुड्डे गुड़ियों में फिर से बहल के देखते हैं 

कागज़ की नाँव बनाये ज़माना बीत गया 
बारिश है.. नंगे पाँव टहल के देखते हैं

आतिशबाजी है शोर है हिदायत भी है 
पर बच्चे कहाँ तमाशा संभल के देखते हैं

अपनी हद से आगे निकल के देखते हैं 
और दो चार कदम चल के देखते हैं

लोग भुला नही पाते

हाल-ए-दिल जो कभी बता नही पाते
टूट जाते हैं वो मुस्कुरा नही पाते 

मै पाँव फैलाना तो छोड़ नही सकता 
भले मेरे पाँव चादर में समा नही पाते

मैं उन झरोखों से बाहर कूद जाता हूँ 
जिनसे मेरे सपनें अंदर आ नही पाते

ये तो उम्र का तकाजा है कि मै चुप हूँ 
वर्ना अच्छे-अच्छे भी चुप करा नही पाते

मुझे याद रखना आसान है बहुत 
दिक्कत ये है कि लोग भुला नही पाते

मुकम्मल

कि मै डोरियों में वो गुजरा ज़माना मोती समझकर पिरोता रहा
कि तू आएगी तो तुझे देके इसको मै अपनी मोहब्बत मुकम्मल करूँगा

मुसलसल करूँगा मै वो कोशिशेँ भी 
जो तन्हाईयों में इबादत करे
या कि बेचैनियों में हिमाकत करे

क्योंकि मुझको यकीं है कि इतनी मोहब्बत 
वो भी इतने दिनों से फकत माह सालों से या कि सदी से
वो भी इस ताज़गी से 
बड़ी सादगी से 
भला कोई कैसे कहाँ से करेगा

मुसलसल करूँगा मै वो कोशिशेँ भी 
जो मजनू ने लैला की खातिर नही की 
कोशिश जो राँझे ने आखिर नही की

कोशिश जो उन पगडंडियों को बना दे दोबारा जहाँ से मोहब्बत को राहें मिली थीं 
निगाहें मिली थीं जहाँ पे हमारी और क्या खूब बाहों को बाहें मिली थीं

कोशिश, चिरागों से उस आसमां को दिखाना कि इक चाँद है इस जमीं पर 
जिसने सितारों में मुझको चुना था
तेरी स्याह रातों में सपना बुना था 

मगर कुछ वजह ऐसी आई थी शायद 
मोहब्बत को परदे में रखना पड़ा था 
यही लफ्ज़ जाने से पहले कहा था 
और ये भी कहा था मै आऊंगी एक दिन 
तुम्हारे हवाले ये दिन रात करने 
खतम जो ना हो वो मुलाक़ात करने 

यही सोचकर मैंने दिल की इबारत को रखा है महफूज़ इक डायरी में 
कि तू आएगी तो तुझे देके इसको मै अपनी मोहब्बत मुकम्मल करूँगा

Tuesday, 3 December 2024

बहुत रमणीक स्थल था

बहुत रमणीक स्थल था 
घास थी हवा थी हवा में खुशबू और जल था 
बहुत रमणीक स्थल था 
मै गुजरा वहाँ से पर गुजर ना पाया 
कुछ फल लाये थे बैठा और खाया
घास को बिस्तर समझकर मै सो गया 
देखते ही देखते अँधेरा हो गया
फिर मै उठा आनन फानन में जेब टटोली मोबाइल निकाला 
सैकड़ों मिस कॉल पड़ी थी - घर ऑफिस दोस्त यार कुरियर वाला
पीछे मुड़कर देखा तो दो गिलहरी आपस में खेल रहीं थीं 
बड़ा खूबसूरत वो पल था
बहुत रमणीक स्थल था 
खैर! इस पल को कहकर अलविदा 
मै उठा और वापस चल दिया
मन में लाखों सवाल थे कि सबको मै क्या बताऊँगा 
जो ठहराव मैंने आज महसूस किया उसे कैसे जताऊंगा 
चिंता की रेखाएं मेरे माथे पर आ गईं 
खूबसूरत पलों पर जैसे बदली छा गईं 
मै तबीयत का बहाना बनाकर चुपचाप अपने घर में सो गया 
एक रात गुजरी एक नया सबेरा फिर से हो गया 
पर मेरे मन में जीवित मेरा बीता हुआ कल था 
बहुत रमणीक स्थल था 
घास थी हवा थी हवा में खुशबू और जल था 
बहुत रमणीक स्थल था

कविराज तरुण 

Tuesday, 26 November 2024

दो चार कदम

अपनी हद से आगे निकल के देखते हैं 
और दो चार कदम चल के देखते हैं 

वो कौन है जिसकी मलकियत है मंजिल पर 
आओ उसका चेहरा बदल के देखते हैं

ख़्वाब में अक्सर अपना घर बनाने वालों 
हम ख़्वाब देखते हैं तो महल के देखते हैं

दिल को समझा रखा है किस बात के लिए 
दिलवालों के दिल तो मचल के देखते हैं

क्यों चकाचौंध है तेरे वजूद के इर्द गिर्द 
क्यों लोग तुझे आँखें मल मल के देखते हैं

तुम शमा के जैसे रौशन हो शामियाने में 
हम परवाने तेरी आग में जल के देखते हैं

तेरे इंतज़ार में मै रो भी नही सकता
मेरे कुछ यार मेरी पलकें देखते हैं

अब तो दौलत भी किसी काम की नही
गुड्डे गुड़ियों में फिर से बहल के देखते हैं 

कागज़ की नाँव बनाये ज़माना बीत गया 
बारिश है.. नंगे पाँव टहल के देखते हैं

आतिशबाजी है शोर है हिदायत भी है 
पर बच्चे कहाँ तमाशा संभल के देखते हैं

अपनी हद से आगे निकल के देखते हैं 
और दो चार कदम चल के देखते हैं

मेरे घर के जालों की

मैंने अपने दिल की सुन ली तुमने दुनिया वालों की
तुम क्या जानो कीमत क्या है मेरे घर के जालों की

इन्हें पता है तुमने कैसे ख़्वाब दिखाए रातों में 
इन्हें पता है आशाओं के दीप जले थे बातों में
इन्हें पता तुम खुश कितनी हो जाती थी बरसातों में 
इन्हें पता है चलना फिरना हाथ पकड़कर हाथों में

इन्हें पता है अपनी सारी बातें बीते सालों की
तुम क्या जानो कीमत क्या है मेरे घर के जालों की

पहली दफा जो आई थी तो इन्हें हटाया था मैंने 
चिपक गए थे दीवारों से खूब छुड़ाया था मैंने
पर इनको इन दीवारों से जाने कैसी उल्फत थी 
मुझको तुमसे, इनको दीवारों से बड़ी मुहब्बत थी

तभी उकेरी दीवारों पर तस्वीरें उलझे बालों की
तुम क्या जानो कीमत क्या है मेरे घर के जालों की

इन जालों से कह लेता हूँ जो भी आता है मन में 
दर्द तेरे जाने का सहना सबसे मुश्किल जीवन में 
खुशियाँ लेकर चली गई तुम तबसे घर के आँगन में 
पतझड़ ही पतझड़ है शामिल वर्षा गर्मी सावन में

यही जानते हैं केवल गति क्या है हिय के छालों की 
तुम क्या जानो कीमत क्या है मेरे घर के जालों की

Saturday, 2 November 2024

मिट्टी के दीपक लेते जाना

दीवाली है, घर पर मिट्टी के दीपक लेते जाना 
बिक जायेंगे दीपक तो मिल जायेगा मुझको खाना

क्या तुम बस एलईडी से ही अपना घर चमकओगे 
या फिर मिट्टी के दीपक भी अपने घर ले जाओगे 
सोच समझकर जो भी मन में आये मुझको बतलाना 
दीवाली है, घर पर मिट्टी के दीपक लेते जाना

पिछली दीवाली में भी मै बैठा था इस कोने में 
मेरी सारी रात कटी थी मन ही मन बस रोने में 
इस बार अगर हो पाये तो मुझको ना तुम रुलवाना 
दीवाली है, घर पर मिट्टी के दीपक लेते जाना

उधर लाइट की चमक धमक है इधर बड़ा सन्नाटा है 
दीपक लेकर छत पर जाने में बालक शर्माता है 
उसे कभी तुम दीपक और दीवाली क्या है समझाना 
दीवाली है, घर पर मिट्टी के दीपक लेते जाना

मेरे घर में दीपक हैं पर रौशन कैसे कर दूँ मै 
भूखे हैं बच्चे मेरे पर पेट कहाँ से भर दूँ मै 
उन्हें पता क्या कितना मुश्किल है दीपक का बिक पाना 
दीवाली है, घर पर मिट्टी के दीपक लेते जाना

Thursday, 24 October 2024

ग़ज़ल- बताना तुम

जरा सी बात करना और हम से रूठ जाना तुम
यही आता यही करके हमें फिर से दिखाना तुम

मुझे लगता है सारी उम्र ऐसे बीत जायेगी
कभी तुमको मनाऊंगा कभी मुझको मनाना तुम

जमाने भर की दौलत का करूँगा क्या तुम्हारे बिन
मेरी हर एक पाई तुम मेरा सारा खजाना तुम

मै तुमसे जीत सकता हूँ मगर मै हार जाऊँगा 
मेरी बस एक कमजोरी नही आंसूँ बहाना तुम

'तरुण' होने की मुश्किल है कि बूढ़ा हो नही सकता 
बुढ़ापा आ भी जाये तो नही मुझको बताना तुम

Sunday, 20 October 2024

जंग

*मिलकर आवाज उठानी होगी, अधिकारों को पाना होगा*
*मूक रहोगे कबतक आखिर, एकदिन सच बतलाना होगा*
*एक अकेले के लड़ने से, जंग नही जीती जाती है*
*अगर जीत हासिल करनी तो, संग सभी को आना होगा*

कविराज तरुण

Thursday, 3 October 2024

जिंदगी गुजरने को है बताओ कब आओगे

जिंदगी गुजरने को है बताओ कब आओगे
जिस्म से जां निकल जायेगी तब आओगे

आज हवा में ठंड है पहले से कहीं ज्यादा
ये तो इशारे हैं कुदरत के मतलब आओगे

हमने गुलदान में कुछ फूल सजा रखे हैं
ये खुद-ब-खुद ही खिल जायेंगे जब आओगे

इसी उम्मीद में नींदों से किनारा किया हमने
रात के मुसाफिर हो जब होगी शब आओगे

दिल तोड़कर फिर से जोड़ा कैसे जाता है
हमें यकीन तुम दिखाने ये करतब आओगे

मुश्किल लगता है

उम्मीदों के बिन ये जीवन कितना मुश्किल लगता है 
रेत में जैसे पानी का ही बहना मुश्किल लगता है 

इक दूजे का हाथ पकड़कर चलने वाले बतलाये
एक अकेले तूफ़ानो में चलना मुश्किल लगता है

गैरों से तो जीत हार का खेल पुराना है साहब 
पर अपनों से बीच युद्ध मे लड़ना मुश्किल लगता है

जिन लोगों को होती आदत कसमें वादे करने की 
उन लोगों पर यार भरोसा करना मुश्किल लगता है

भरते भरते भर जाता है जख्म हमारी चोटों का 
पर जब दिल में जख्म हुआ तो भरना मुश्किल लगता है

कविराज तरुण 

क़त्ल भी होगा इल्जाम भी ना आयेगा

कत्ल भी होगा इल्जाम भी न आयेगा
तुम्हारा हुनर कुछ काम भी न आयेगा

उसके चाहने वालों की लंबी फेरहिस्त में
हमें ये यकीं है तेरा नाम भी न आयेगा

इंतजार में बैठे हो किसके और किसलिए
वो सुबह का भूला अब शाम भी न आयेगा

मान लो ये इश्क तुम्हारे बस का नही
दर्द भी होगा तुम्हे आराम भी न आयेगा

क्यों उसके आने की उम्मीद करें बैठे हो 
तुम देखना उसका पैगाम भी न आयेगा

गणमान्य हेतु विदाई प्रशंसा गीत

आसमान से ऊंचा निश्चय मन मस्तक में जिनके है
कार्यसिद्धि को पूर्ण समर्पण करना जिनकी आदत है

कल का जिनको अनुमान है और पता है जिन्हें आज का
जिनके रहता संज्ञान में स्तर कैसा काम काज का

जो रखते हैं ध्यान सभी का जैसे मुखिया परिवार में
जो भरते हैं ज्ञानचक्षु से ज्योत असीमित अंधकार में

जो उन्नति की दिशा दिखाते सबसे आगे चलते हैं
जो अपने ऊंचे आदर्शों से भाव जीत का भरते हैं

हमें खुशी है उनके जैसा पथ प्रदर्शक हमने पाया
यूं लगता है सूर्य अलौकिक आसमान में अपने छाया

यही कामना करते हमसब स्वास्थ्य हमेशा बना रहें
खुशियों का संचार आपके जीवन में अब सदा रहे

मुश्किल लगता है

उम्मीदों के बिन ये जीवन कितना मुश्किल लगता है 
रेत में जैसे पानी का ही बहना मुश्किल लगता है 

इक दूजे का हाथ पकड़कर चलने वाले बतलाये
एक अकेले तूफ़ानो में चलना मुश्किल लगता है

गैरों से तो जीत हार का खेल पुराना है साहब 
पर अपनों से बीच युद्ध मे लड़ना मुश्किल लगता है

जिन लोगों को होती आदत कसमें वादे करने की 
उन लोगों पर यार भरोसा करना मुश्किल लगता है

भरते भरते भर जाता है जख्म हमारी चोटों का 
पर जब दिल में जख्म हुआ तो भरना मुश्किल लगता है

कविराज तरुण 

मात्र चले जाने से कोई दूर नही होता है

चांद बिना तो अंबर में भी नूर नहीं होता है 
मात्र चले जाने से कोई दूर नहीं होता है 
पल भर में ये रिश्ता चकनाचूर नहीं होता है 
मात्र चले जाने से कोई दूर नहीं होता है 

मिलने और बिछड़ने का क्रम चलता रहता है 
सदा साथ रहने का सपना पलता रहता है 
पर बिछड़न के बिन किस्सा मशहूर नहीं होता है
मात्र चले जाने से कोई दूर नहीं होता है

इन आंखों से कभी-कभी तो होगी ही बरसाते
अधर पुकारेंगे तुमको तुम काश चले आ जाते 
पर जो सोचो अक्सर वो मंजूर नही होता है
मात्र चले जाने से कोई दूर नहीं होता है

परिवर्तन तो नियम है समझाना है खुद को 
नये सफर में नया जोश ले जाना है खुद को 
मुड़कर पीछे जाने का दस्तूर नही होता है 
मात्र चले जाने से कोई दूर नहीं होता है

कुछ मिलता है हमें समय से कुछ मिलता है आगे 
कुछ तो ऐसा भी होता हम जिससे रहें आभागे 
पर मिल ना पाये तो खट्टा अंगूर नही होता है
मात्र चले जाने से कोई दूर नहीं होता है

चांद बिना तो अंबर में भी नूर नहीं होता है 
मात्र चले जाने से कोई दूर नहीं होता है

जरूरी है बहुत

चाहत-ए-इश्क़ में नगमात जरूरी है बहुत 
वहाँद सितारों की बारात जरूरी है बहुत 

तुम मुझे जानो या न जानो, कोई बात नहीं
मै तुम्हें जानता हूँ, ये बात जरूरी है बहुत

मै दर्द सोख लेता हूँ ये यार मेरे कहते हैं
तुम्हें जो दर्द है तो मुलाकात जरूरी है बहुत 

मैंने हवा में लिखा तेरा नाम और आजाद किया
अब तो इन आंखों से बरसात जरूरी है बहुत 

केवल जिस्म के मिलने से तो नही होता है 
है अगर इश्क़ तो ज़ज़्बात जरूरी है बहुत

Wednesday, 2 October 2024

हे पार्थ बोलो किस तरफ हो

युद्ध है ये धर्म का, हे पार्थ बोलो किस तरफ हो
नेत्र से पट्टी हटाकर, दृष्टि खोलो किस तरफ हो

एक तरफ तो फूल की चादर बिछाये झूठ बैठा 
एक तरफ काँटों से लिपटा सत्य सबसे रूठ बैठा
एक तरफ ये आधियाँ हैं शोर है तूफ़ान का 
एक तरफ ये दीप परिचय दे रहा अभिमान का

तुम अँधेरे और उजाले में टटोलो किस तरफ हो
युद्ध है ये धर्म का, हे पार्थ बोलो किस तरफ हो

तुमको दुश्शासन के जैसे चीर हरने की ललक है
या सभा के मध्य तुमको मौन धरने की ललक है
क्या तुम्हें पांडव के जैसे शर्म से बस सिर झुकाना
या तुम्हें कान्हा की तरहाँ द्रोपदी को है बचाना

उस सभा में हो कहाँ तुम? भेद खोलो किस तरफ हो
युद्ध है ये धर्म का, हे पार्थ बोलो किस तरफ हो

कर्ण के जैसे तुम्हें कुण्डल कवच का दान करना 
या दुयोधन की तरह तुमको अहम् का पान करना
तुम पितामह की तरह चुपचाप सब कुछ देख लोगे 
या कि संजय की तरह बस युद्ध का दर्शन करोगे

तुम उचित-अनुचित के भीतर भार तोलो किस तरफ हो
युद्ध है ये धर्म का, हे पार्थ बोलो किस तरफ हो

तुम हो शकुनी शल्य हो जरसंध या फिर द्रोण हो 
नीति नियम से अपरिचित पात्र आखिर कौन हो 
अश्वथामा सा तुम्हें वरदान है क्या ये कहो 
तुमको अभिमन्यु के जैसे ज्ञान है क्या ये कहो 

या तुम्हें लगता हवा के साथ हो लो किस तरफ हो
युद्ध है ये धर्म का, हे पार्थ बोलो किस तरफ हो

©कविराज तरुण 

Wednesday, 25 September 2024

जो सदा धरातल पर रहता

जो सदा धरातल पर रहता उसका होता सम्मान सखे 
सकल सृष्टि के जीव जंतु करते उसका गुणगान सखे 

जो धर्म पर अपने चलता, अत्याचार नहीं स्वीकारेगा
कर्म क्षेत्र में कुछ भी हो, प्रतिकार नहीं स्वीकारेगा 
मानवता के बीच कभी, व्यापार नहीं स्वीकारेगा
हां! जब तक जीत नहीं जाता, वो हार नहीं स्वीकारेगा

इन्हीं तत्व से मिला जुला वो बनता है इंसान सखे 
जो सदा धरातल पर रहता उसका होता सम्मान सखे

द्वेषभावना लेकर मन में, चिंता का अम्बार लगेगा 
इतना दिल पर बोझ पड़ेगा, के जीना दुश्वार लगेगा
सरल नही तू बन पाया तो, कठिन जीत का द्वार लगेगा
मिथ्या बातें मिथ्या जीवन मिथ्या ये संसार लगेगा

लेष मात्र भी अपने अंदर रखना मत अभिमान सखे 
जो सदा धरातल पर रहता उसका होता सम्मान सखे

धारण कर लो अपने अंदर, रघुकुल की रघुराई को
रामचरित की मन में अंकित कर लो हर चौपाई को 
ऐसे देखो किसी और को, जैसे अपने भाई को
मर्यादा के नाम करो तुम, जीवन की तरुणाई को 

तब जाकर तुम कर पाओगे इस जीवन का उत्थान सखे 
जो सदा धरातल पर रहता उसका होता सम्मान सखे

Tuesday, 24 September 2024

संशय मुक्तक

संशय की घोर अवस्था में राही कैसा विश्राम 
तबतक चल तू जबतक आ जाये ना पूर्ण विराम
नियति नही नियम से आता है उत्तम परिणाम
बस नेक भाव से पूरित कर तू अपना सारा काम

Sunday, 22 September 2024

लिखो कुछ

अनगिनत अहसासों की असंख्य अठखेलियाँ
भ्रमित चेहरे को प्रश्नों का हल देती हैं |
जिह्वा से अनजाने में निकली कोई बात 
इतिहास के पन्नो को सहसा बदल देती है ||
उन्मुक्त विचारो की बहती हवा ही अक्सर
संकुचित दायरों को वृस्तित महल देती है |
रुको नहीं... कुछ सोचो ... कुछ लिखो या कहो कुछ
बात निकलती है तो नई उम्मीद को पहल देती है ||

Sunday, 8 September 2024

लहजा बदल के देख

सब काम होगा तेरा लहजा बदल के देख 
इकबार अपने घर से बाहर निकल के देख

है झुनझुना मोहब्बत ये जानते हैं फिर भी
कुछ देर के लिए ही इससे बहल के देख

किस ख़ाक में जवानी हमने गुजार दी है
ये देखना अगर हो दुनिया टहल के देख

ये क्या कि छोटे छोटे सपनों की सैर करना 
गर देखना है सपना रंगो-महल के देख

कुछ बात बोल दी है कुछ बात है अधूरी
जो माइने छुपे हैं मेरी ग़ज़ल के देख

Wednesday, 28 August 2024

कहाँ से आयेंगे

कौन कितने कब कहाँ से आयेंगे 
अपने नजदीकी मक़ाँ से आयेंगे 

वो तो दुश्मन हैं फ़रिश्ते थोड़ी हैं 
जोकि उड़ के आसमां से आयेंगे 

अहतियातन खुद को मजबूत रखना
तीर नश्तर के जबाँ से आयेंगे 

वक़्त बदला ना तरीका बदला है 
पीठ में खंजर छुपा के आयेंगे

दोस्त समझा तो बुराई क्या इसमें 
फैसले अब इम्तिहाँ से आयेंगे 

दिल लुटाने से नही फुर्सत जिनको 
अपना सबकुछ गवाँ के आयेंगे

कविराज तरुण 

Monday, 19 August 2024

दोस्ती

दोस्ती 

रश्मोरिवाज हमको सिखाती है दोस्ती
इंसान को इंसान बनाती है दोस्ती

अच्छा हो या बुरा हो कि अपना या गैर हो
इन सब से बड़ा मेल कराती है दोस्ती

रिश्ते भी जहां छोड़ चले अपने साथ को 
उस मोड़ पर भी साथ निभाती है दोस्ती

पापा भी कभी कॉल करें मेरे वास्ते 
तो झूठ भी सच बोल बचाती है दोस्ती

मम्मी के लिए दोस्त मेरे लाजवाब हैं 
मेरी माँ को सबकी माँ बनाती है दोस्ती 

यारों को पता है कि मेरा दिल कहाँ फ़िदा
इस बात पे भी शर्त लगाती है दोस्ती

वैसे तो मजे लूटने में छोड़ते नही 
नाराज अगर हों तो मनाती है दोस्ती

जब राह में हों मुश्किलें तो टोर्च की तरह 
दे रोशिनी वो राह दिखाती है दोस्ती

लड़ना जो पड़े भीड़ से तो दोस्त के लिए 
कुछ सोचे बिना हाथ उठाती है दोस्ती

गमख्वार बने ढाल बने गम के सामने 
तन्हाइयों में जश्न मनाती है दोस्ती

आँखों की नमी पोंछ के गालों के दरमियाँ 
हलचल सी मचा जोर हँसाती है दोस्ती

ये बात सभी मानते जब यार साथ हों 
तो हार में भी जीत दिलाती है दोस्ती



कविराज तरुण

Saturday, 10 August 2024

जीवन क्या है?

कविता - जीवन क्या है?

जीवन क्या है? हार-जीत की, मिली-जुली सी एक कहानी 
गगरी ऐसी! जिसमें सुख-दुख, दोनों आकर भरते पानी 

कभी अचंभित करने वाली, घटनाओं का आना-जाना 
कभी बिना रस फीका-फीका, इच्छाओं का ताना-बाना

कभी सफलता खुद आकर, चलने वाले का पाँव पखारे 
कभी विफलता 'धैर्य धरो तुम' कहकर तेरा नाम पुकारे

यही सफलता और विफलता हमें बनाये ध्यानी-ज्ञानी
जीवन क्या है? हार-जीत की, मिली-जुली सी एक कहानी 

बाल्य अवस्था में जीवन का रहता हरदम प्रश्न अधूरा 
बढ़ते-बढ़ते करते हम सब, इन प्रश्नों का आशय पूरा 

वृद्ध हुए तो लगता ऐसे, जैसे जीवन बहकावा है 
मिथ्या सारा जीव जगत है, झूठी सारी माया है 

बातों की अनबूझ पहेली, लेकर आये नई जवानी
इसी बीच अनबूझ पहेली, लेकर आये नई जवानी

कभी-कभी तो चकाचौंध में, लगा रहे लोगों का मेला 
कभी-कभी सब लोग अपरिचित, मन भीतर से रहे अकेला 

कभी -कभी उत्थान-पतन का कारण, अपनों की चतुराई 
कभी -कभी अपनों से ज्यादा, हमको प्यारी प्रीत पराई

इसी प्रीत की बातों में मन, खोजें कोई बात पुरानी
जीवन क्या है? हार-जीत की, मिली-जुली सी एक कहानी 
गगरी ऐसी! जिसमें सुख-दुख, दोनों आकर भरते पानी 

कविराज तरुण

Sunday, 28 July 2024

ग़ज़ल - अगर हैं मंजिले

अगर हैं मंजिलें तो फिर कहीं पर रास्ता होगा
हमारे हक़ में जो भी है कहीं पर तो लिखा होगा

मै मीलों दूर जाने के लिए तैयार कबसे हूँ
अगर तुम साथ होगे तो सफर मे हौसला होगा

मुझे कुछ सोचकर रब ने बनाया है अलग तुमसे 
मै जैसा हूँ, नही बदलो, बदलकर क्या भला होगा

कभी जब साथ बैठेंगे पुराने दिन की कुर्बत में
रही क्या गलतियां अपनी इसी पर मशवरा होगा

मुझे अफ़सोस होता है मगर मै भूल जाता हूँ
अगर सब याद आ जाये तो कैसे फासला होगा

कविराज तरुण 

Monday, 22 July 2024

हुंकार

हम कबसे अपनी आँखों में अंगार दबाये बैठे हैं 
हम चुप हैं इसका मतलब है हुंकार छुपाये बैठे हैं

तुम जुल्म हमारे ऊपर कर के पलभर ना घबराते हो 
ये अहंकार ऐसा भी क्या तुम इतना क्यों इतराते हो 

ये वक़्त का पहिया घूम रहा दरकार लगाये बैठे हैं
हम चुप हैं इसका मतलब है हुंकार छुपाये बैठे हैं

वो कपटी लोग फरेबी हैं तुम जिनको गले लगाते हो 
वो झाँसा देते रहते हैं तुम झाँसे में आ जाते हो

क्यों आस्तीन में छुपकर वो अधिकार जमाये बैठे हैं
हम चुप हैं इसका मतलब है हुंकार छुपाये बैठे हैं

खुद को भला समझते क्या हो ये तो जरा बताओ तुम 
हिम्मत है तो चाँद पकड़कर इस धरती पर लाओ तुम 

क्यों चाटुकार से भरा हुआ दरबार सजाये बैठे हैं
हम चुप हैं इसका मतलब है हुंकार छुपाये बैठे हैं

Wednesday, 17 July 2024

ग़ज़ल - सिलसिले

ग़ज़ल - सिलसिले
©कविराज तरुण 

बड़े हुजूम से निकले तुम्हारे काफ़िले हैं 
बहुत से लोग ऐसे हैं जो तुमसे जा मिले हैं

तुम्हारे जुल्म के चर्चे सुनाई दे रहें हैं 
मगर मै कुछ नही कहता भले शिकवे-गिले हैं

मुझे तो बात बस ये ही तसल्ली दे रही है 
हमारे नाम से रौशन तुम्हारी महफिले हैं

जमीं पे कुछ नही निकला हमारे क्यों अभी तक 
उधर तो पत्थरों में भी तुम्हारे गुल खिले हैं

किसी से क्या बताऊँ हाल क्या है अब हमारा 
कहानी फिर वही है और फिर वो सिलसिले हैं

बहुत से लोग ऐसे हैं जो तुमसे जा मिले हैं

Sunday, 23 June 2024

तू साथ है मेरे

मुझको गुरूर था तू साथ है मेरे 
आँखों में नूर था तू साथ है मेरे 

कोई और हो न हो क्या फर्क है मुझे 
इतना जरूर था तू साथ है मेरे 

ये खौफ ये सजा ये दर्द ये सितम 
इन सबसे दूर था तू पास है मेरे

परवाह नही कोई किस ओर थे कदम 
कैसा फितूर था तू साथ है मेरे

जो बात चल पड़ी वो बात हो गई 
बस जी हुजूर था तू साथ है मेरे

जरुरत क्या है

चिंगारी भड़काने की जरुरत क्या है 
दिल मे आग लगाने की जरुरत क्या है 

मै कबसे तेरे जलवों का मुरीद हूँ 
तो मुझसे इतराने की जरुरत क्या है

तेरी हर बात से सहमत हो जाता हूँ 
फिर इतना समझाने की जरुरत क्या है

ज़ख्म से मुहब्बत का नाता गहरा है 
इस पे मरहम लगाने की जरुरत क्या है

बस तेरा साथ चाहिए और कुछ नही
इस बेदर्द ज़माने की जरुरत क्या है

Tuesday, 18 June 2024

कोशिश में रहा

मै दिल को आजमाने की कोशिश में रहा
अपनों को मनाने की कोशिश में रहा

तुम्हें पाने की रेखाएं तो थी ही नही
फिर भी तुझे पाने की कोशिश में रहा

अलफ़ाजों से दिल की बात न निकली
मै खामोशियाँ बताने की कोशिश में रहा

तेरे सच से मेरा कोई वास्ता नही है
तेरा झूठ ही छुपाने की कोशिश में रहा 

मुझे मालूम है तुझे मेरी याद आएगी
सो मै यादें बनाने की कोशिश में रहा

कविराज तरुण

Wednesday, 22 May 2024

बैठ जाते हैं

जहाँ से तुम गुजरते हो वहीँ पर बैठ जाते हैं 
अगर दाना मिले छत पर कबूतर बैठ जाते हैं

तुम्हारे घर के बाहर पत्थरों का ढेर कहता है 
मै इकलौता नहीं ऐसा अधिकतर बैठ जाते हैं

अजब सी बात लहरों ने बताई है मुझे तेरी 
किनारे तुम जो आती हो समंदर बैठ जाते हैं

मै बिल्कुल साफ शब्दों में उन्हें दिल की बताता हूँ
मगर वो फ़ालतू बातें बनाकर बैठ जाते हैं

मुझे तो तैरकर ही ये सफर अब पार करना है 
मै काठी हूँ सुना पानी में पत्थर बैठ जाते हैं 

कविराज तरुण

Thursday, 9 May 2024

जुदाई न दे

आग भी निकले धुआँ भी ये दिखाई न दे
लफ्ज़ हम दोनों के गैरों को सुनाई न दे

इसतरह महफूज़ हो जाये मुहब्बत मेरी 
तू अगर चाहे तो भी मुझको जुदाई न दे

ये बड़ा वाजिब है आँखों मे तेरी कैद रहूँ 
ये जरूरी है कि तू मुझको रिहाई न दे

दर्द जो देने हैं तू दे दे मुझे मंजूर है 
शर्त बस ये है कि फिर उसकी दवाई न दे

आज मै जो हूँ दुआओं का तेरे हाथ है 
खामखाँ इस बात पर मुझको बधाई न दे

कविराज तरुण

Wednesday, 3 April 2024

मशाल

सत्य के जो साथ हो, उसको क्या मलाल हो 
आँख में जूनून हो, हाथ में मशाल हो 
लक्ष्य क्यों सरल मिले, वो भव्य हो विशाल हो 
जीतना पड़े कि ऐसे, उसकी भी मिसाल हो 
रोक दे तुझे कोई, किसकी ये मजाल हो 
दुश्मनों की भीड़ बोले, तुम स्वयं ही काल हो

Wednesday, 6 March 2024

कविता - नारी जीवन || कविराज तरुण

कविता - नारी जीवन || कविराज तरुण || 7007789629

नारी जीवन बहुत कठिन है पग पग देखभाल के चलना
बेटी बनकर बाबुल के घर उनकी सारी चिंता हरना

बड़े भाई की निगरानी में अपने सारे फर्ज निभाना
और छोटे की माँ बन करके भले बुरे का भेद बताना
दादा दादी चाचा ताऊ सब रिश्तों में घुल मिल जाना
पापा की नित सेवा करना और मम्मी का हाथ बटाना

फिर इक दिन बाबुल के घर से दुल्हन बनकर दूर निकलना
नारी जीवन बहुत कठिन है पग पग देखभाल के चलना

पियहर में रिश्तों की डोरी नाजुक है ये भान उसे है
ननद जिठानी सास ससुर का हरदम रहता ध्यान उसे है
सबके हित का सोच रही वो सबका ही सम्मान उसे है
संग पिया के रहना उसको केवल ये अरमान उसे है

प्रेम भाव में प्रियतम से ही उसका लड़ना और झगड़ना
नारी जीवन बहुत कठिन है पग पग देखभाल के चलना

हालांकि उसके जीवन में भी सपनों का अम्बार बहुत है
उसके अंदर क्षमता इतनी जीवन में किरदार बहुत है
देख रही वो ऑफिस बिजनस देख रही परिवार बहुत है
उसे सफलता के पर्वत पर जाने का अधिकार बहुत है

यही सोचकर चलते रहना जीवन पथ पर आगे बढ़ना
नारी जीवन बहुत कठिन है पग पग देखभाल के चलना

Tuesday, 5 March 2024

ग़ज़ल - उसकी मासूमियत

ग़ज़ल - उसकी मासूमियत || कविराज तरुण || 7007789629

उसकी मासूमियत पर फ़िदा हो गए मेरे अल्फाज़ भी मेरे ज़ज़्बात भी
हम उसे देखकर ये कहाँ खो गए अब कटेगी नही मेरी ये रात भी

अब के मुस्का के तुमने जो देखा मुझे तो मै दिल को भला कैसे समझाऊंगा
मुझको डर है कहीं दिल ना दे दूँ तुम्हें कितने नाजुक हुए मेरे हालात भी

यूँ तो मुश्किल भरा है सफर ये मेरा आप आओगे तो रोशिनी आएगी
गूँज जायेगी ऐसे गली ये मेरी जैसे गलियों में गूंजे ये बारात भी

एक तो तू हसीं उसपे ऐसी अदा उसपे आवाज में मदभरा ये नशा
उसपे मौसम का ये जादुई पैतरा आज हद करने आई है बरसात भी

जबसे लिखने लगा हूँ तुम्हें नज़्म में सब मुबारक मुबारक ही कहने लगे
हो गए हैं रुहानी मेरे शेर भी हो गए हैं रुहानी ये नगमात भी

ग़ज़ल - थोड़ा धीरे धीरे

ग़ज़ल - थोड़ा धीरे धीरे || कविराज तरुण || 7007789629

सच को झूठ बताना है और वो भी थोड़ा धीरे-धीरे
दुख में भी मुस्काना है और वो भी थोड़ा धीरे-धीरे

वक़्त लगेगा कहते कहते ज़ख्म मेरा गहराया है
पर मुझको दर्द छुपाना है और वो भी थोड़ा धीरे-धीरे

एक नही दो नही न जाने कितनी बार सताया है 
फिर भी उसे मनाना है और वो भी थोड़ा धीरे-धीरे

इश्तहार में निकला है कल नाम हमारा महफिल से
ये तुमको भी दिखलाना है और वो भी थोड़ा धीरे-धीरे

इक बार इजाजत दो मुझको तो दुनिया तेरे नाम करूँ
ये बातें करते जाना है और वो भी थोड़ा धीरे-धीरे

Tuesday, 9 January 2024

ग़ज़ल - खो गईं वो चिट्ठियां

खो गईं वो चिट्ठियां जिसमें लिखे ज़ज़्बात मैंने
प्यार की अंगड़ाईयों में अनकहे हालात मैंने

एक दिन बीता नही लगने लगा के साल बीते
बिन तुम्हारे किस कदर काटे यहाँ दिन रात मैंने

झूमकर नाचा था मै भी दिलजलो की भीड़ में तब
जब तुम्हारे घर पे देखी और की बारात मैंने

तुमने तो बस कह दिया के भूल जाओ तुम मुझे अब
और फिर घंटों करी थी आँख से बरसात मैंने

ख़त्म होती है कहानी प्यार के जिस मोड़ पर ये
उस जगह से की हमारे प्यार की शुरुआत मैंने

Sunday, 24 December 2023

हाँ यही अच्छा रहेगा

हो सके तो भूल जाना हाँ यही अच्छा रहेगा
फिर किसी से दिल लगाना हाँ यही अच्छा रहेगा

काटना मुश्किल है रातें खैर ये मेरे लिए है 
तुम हमेशा मुस्कुराना हाँ यही अच्छा रहेगा

पूछ लेगा कोई तुमसे मेरे बारे में कभी जब
सरफिरा था ये बताना हाँ यही अच्छा रहेगा

दो गुजरे साथ तेरे दो गुजारेंगे तेरे बिन
चार दिन का है ठिकाना हाँ यही अच्छा रहेगा

उसकी तस्वीरें हटा दो फोन से अपने 'तरुण' अब 
देख लेगा ये ज़माना हाँ यही अच्छा रहेगा

Monday, 27 November 2023

आती नही

मुझे हर चीज तो पसंद आती नही
ये चाँद सितारे हैं कोई बाराती नही
इतना कह के वो छोड़ गई मुझको
इक तेरे सिवा कोई मेरा साथी नही

जी पाऊँगा नही

इक गीत लिखा पर तुम्हें सुनाऊँगा नही
जो दूर गया तो कभी मै आऊंगा नही 
है मुझको तेरे प्यार में मरने की मनाही 
ज़िंदा भी रहूँ तो भी मै जी पाऊँगा नही

Wednesday, 22 November 2023

चंद मुलाकाते करना

कभी खामोश रहना कभी बे-इंतेहा बातें करना
कितना जरूरी है चंद मुलाकाते करना

तू एक ख्वाब है जो नींद में दिखाई देगा
इसी इंतज़ार में दिन काटना और रातें करना

Wednesday, 25 October 2023

खुश आमदीद है

221 222 2 22 1212

ये आंखें इक अरसे से जिनकी मुरीद है
वो आ गए महफिल में खुश आमदीद है

हम सरफिरों को चाँद-सितारे जहाँ मिले
उस रोज है दीवाली उस रोज ईद है

उसको गवाही देनी है जालसाज की
जो जालसाजी करके खुद मुस्तफीद है

इज्जत कमाने निकले हम देखभाल के
किसको पता था ये भी अब जर-खरीद है

इस रूह से मत पूछो के बिक के क्या मिला
वो झूठ कैसे बोले जो चश्मदीद है

Monday, 23 October 2023

ग़ज़ल - इकदिन

तुम्हें याद मेरी भी आएगी इकदिन
जमीं झूमकर मुस्कुराएगी इकदिन

हाँ गफलत रही है यही जिंदगी भर
ये है जिंदगी बीत जाएगी इकदिन

जियादा जरूरी है जो चीज तुमको
वही चीज तुमको सताएगी इकदिन

मुहब्बत के इन बेगुनाहों से कह दो
मुहब्बत ही दिल ये दुखाएगी इकदिन

बमुश्किल सँभाला है इन आंसुओं को
ये है जिंदगी तो हँसाएगी इकदिन

Friday, 6 October 2023

आज फिर

आ गया आँख में दर्द-ए-गम आज फिर
हर अकेले का रहबर अलम आज फिर

था जो अपने मुताबिक हमेशा से ही
वक़्त वो ही हुआ बेरहम आज फिर

देर तक राह पर आग जलती रही
और उसपर कदम दर कदम आज फिर

कौन कितना सही आज किसको कहे
हो रहा हर किसी को वहम आज फिर

दे रहा है ज़खम पर ज़खम इश्क़ ये 
सह रहा हूँ सितम पर सितम आज फिर

Thursday, 5 October 2023

मिल लिया करे

ये जरूरी नही मेरे हक़ में कोई फैसला करे
पर मिलने की जिद करूँ तो मिल लिया करे

तमाम शिकवे शिकायतें अपनी जगह महफूज़ हैं
पर कुछ बातों को पल भर के लिए अनसुना करे

जो काम मुश्किल है वही मेरे हिस्से आता है 
इतनी हिम्मत कहाँ मुझमे कि तुमको मना करे

जो मेरे साथ खुश है जिसे मुझपर यकीन भी है
वो मेरे साथ चले वर्ना वो मुझे अलविदा करे

मै अबतक न समझा इबादत में दखल का मकसद
जो अपना है ही नही उसका कोई क्या गिला करे

ये जरूरी नही मेरे हक़ में कोई फैसला करे
पर मिलने की जिद करूँ तो मिल लिया करे

Sunday, 1 October 2023

मौज हो

फूलों की फ़िकर क्या करें कांटों की मौज हो 
नीदों की जगह आँख में ख्वाबों की मौज हो 
जब चार दिन का ये सफर ही पास है तेरे
मंजिल की खबर हो न हो राहों की मौज हो

Thursday, 28 September 2023

ग़ज़ल - कलयुग

ग़ज़ल - कलयुग

221 2122 221 212
कल का ग़ुमान मत कर, जो है वो आज है
किसके हवाले कबतक, ये तख़्त-ओ-ताज़ है

अंतिम सफर सभी का होता है एक जैसा
माना अलग तरह का रश्मोरिवाज़ है

हर चीज मे मिलावट हर बात खोखली
कैसे हैं लोग इसके कैसा समाज है

वहशी बना हुआ है जिस दिन से आदमी
उस दिन से जानवर का बदला मिजाज है

कलयुग तुम्हे मुबारक अब रंग-ओ-रोशिनी
फैला जहाँ मे तेरा अब कामकाज है

मतला शेर - मोहब्बत मेरी

दो आँखों में सिमटी है सल्तनत मेरी
यही मक़ाम है मकसद और दौलत मेरी
तमाम किस्सों में क्या ख़ाक बयाबानी है
अभी देखी कहाँ जमाने ने मोहब्बत मेरी 

Friday, 22 September 2023

मतला शेर - कहा ही नही

साथ रहते हुए भी रहा ही नही
आँख में बस गया तो बहा ही नही 
उसकी धड़कन लगातार कहती रही
मुँहजुबानी मगर कुछ कहा ही नही

Thursday, 21 September 2023

लहजा समझता है

मेरी बातों से ज्यादा वो मेरा लहजा समझता है
बड़ा मगरूर है जाने वो खुद को क्या समझता है
मैं इतना ही तो कहता हूं मेरे ख्वाबों में आ जाओ
जरा सी बात का मतलब वो कुछ ज्यादा समझता है

Saturday, 16 September 2023

ग़ज़ल - काश

काश! ऐसा हो किसी दिन लौट आये तू कभी
वक़्त की रुसवाइयों को भूल जाये तू कभी

उन दिनों की याद में हम फिर न सोये रात भर
जागती आँखों को आकर फिर सुलाये तू कभी

तुमने हँसकर बादलों को ऐसे घायल कर दिया
वो बरसते ही रहे के भीग जाये तू कभी

अपने दिल की हसरतों को क्या बतायें आप से
बिन कहे और बिन सुने ही मुस्कुराये तू कभी

जिंदगी भर गीत तेरे ही लिखें मैंने तरुण
काश! ऐसा हो कि इनको गुनगुनाये तू कभी

Friday, 1 September 2023

ग़ज़ल - ताज़ा तरीन है

हर मोड़ पर हैं मुश्किलें फिर भी यकीन है 
अहसास तेरे साथ का ताज़ा तरीन है

जो रुक गया था बीच मे वो तो है ग़मज़दा 
जो साथ तेरे चल पड़ा वो मुतमईन है

मिट्टी के होके कर रहे किस बात का ग़ुमाँ 
कबतक किसी के नाम लिखी ये जमीन है

ये जिंदगी है और इसका है ये फलसफा
दिल की नजर से देखिये तो सब हसीन है

इस उम्र मे सही गलत का सोचना भी क्या
जिस ओर चल पड़े कदम वो बहतरीन है

कविराज तरुण

Sunday, 27 August 2023

है कि या नही

सारा जहान साथ मेरे है कि या नही
इस बात से तो वास्ता मुझको रहा नही
बस एक तेरा नाम दिल मे ऐसे छप गया
अब और कोई नाम छपने पायेगा नही

Saturday, 26 August 2023

ग़ज़ल - शायद

1212  1122 1212 22

मेरा ग़ुमान मेरे इश्क़ की जमीं शायद 
सज़ा थी एक हसीं और कुछ नही शायद

थी जिसकी प्यास मुझे जो तलाश थी मेरी
उसी के नाम रही उम्र-ए-आशिकी शायद

तेरे मकान से निकला उदासियाँ लेकर
खुदा का शुक्र तेरी आँख भर गई शायद

किसी ने पूछ लिया जो बताओ कैसे हो 
बता नही सकते हाल-ए-जिंदगी शायद

कि तेरी हद मे उजाले जवाँ रहे जबतक 
किसी ने देखी नही सैल-ए-तीरगी शायद

ये मेरा जिस्म मेरी रूह का तमाशा है
तमाशबीन रही साँस की लड़ी शायद

इसी फिराक मे तस्वीर ले के सोता हूँ
न जाने कब हो कोई शाम आखिरी शायद

कविराज तरुण 

चले गए

इसबार किसी हद से गुजरने चले गए
कुछ सोच के हम खुद को बदलने चले गए

वो काम जिसे लोग मुहब्बत कहा करें 
हम आज उसी काम को करने चले गए

तारीख मेरे हक़ मे करे कोई फैसला
हम इश्क़ के दरिया मे उतरने चले गए

बहके हुए दिन रात बुरा हाल है मेरा
इस हाल को फिलहाल बदलने चले गए

बेबाक हवा नाम तेरा लेके जब चली
हम उसकी महक साँस मे भरने चले गए

Friday, 4 August 2023

मुहब्बत करी जाये

काम मुश्किल है फिर भी ये हिमाकत करी जाये 
अपने दिल की दहलीज़ो से बगावत करी जाये

ऐसा क्या है जो तुझको मेरा होने नही देता
मिल जाओ किसी रोज तो मुहब्बत करी जाये

Wednesday, 12 July 2023

ॐ शिव शंकर शम्भू

ॐ शिव शंकर शम्भू 

शिव तुम ही रखवाले, तुम ही प्राणप्रिये
प्रभु तुम ही प्राणप्रिये
तुमको जो भी ध्यावे, उसको तार दिये
ॐ शिव शंकर शम्भू

श्रावण मास तुम्हारे, हिय को अति प्यारा
प्रभु हिय को अति प्यारा
भक्त करे जल अर्पण, बोले जयकारा
ॐ शिव शंकर शम्भू

नाद करे जल मारुत, मेघ करे गर्जन
प्रभु मेघ करे गर्जन
विधिवत सृष्टि तुम्हारा, करती है अर्चन
ॐ शिव शंकर शम्भू

नेहभाव से रहते, मूषक बाघ शिखी
प्रभु मूषक बाघ शिखी
धेनु रहे सेवा में, नाग बने कंठी
ॐ शिव शंकर शम्भू

कांवड़ लेकर जाये, भक्त मगन तेरा
प्रभु भक्त मगन तेरा
झूमे नाचे गाये, जहाँ लगे डेरा
ॐ शिव शंकर शम्भू

भोलेनाथ तुम्हारा, जो भी नाम जपे
प्रभु जो भी नाम जपे
संकट उसका कटता, रूठे भाग्य जगे
ॐ शिव शंकर शम्भू

कविराज तरुण

Saturday, 8 July 2023

शायरी संग्रह 1

हम रो रहे हैं लेकिन रोते नही हैं हम
यें दर्द-ए-आशिकी का अंजाम है हमारा
मुझको सिखा रहे हो जीने का फलसफा तुम
एक उम्र से यही तो बस काम है हमारा
....................
आज फिर उस बेवफा को याद किया जायेगा
वक़्त बहुत है थोड़ा और बर्बाद किया जायेगा
उसने मेरी आँखों को दी है इतनी दौलत
इन मोतियों से गुलिस्तां आबाद किया जायेगा
....................
कुछ तुम आये और कुछ तुम्हारी याद आ गई
बहुत जोर की बरसात उसके बाद आ गई
लिखा था अपने गम हो दो चार पंक्तियों में
उस बेवफा की उस पर भी दाद आ गई 
....................
मेरा हर मर्ज दवा की तलाश करता है
दवा के बाद दुआ की तलाश करता है
ये मेरा इश्क़ कहाँ से इलाज खोजेगा
तुम्हारे दर पे खुदा की तलाश करता है
....................
जीवन क्या है थोड़े नियम थोड़ी लापरवाही है
रस्ता है ये अरमानों का जिसपर आवा जाही है
कहाँ खड़े हो हाथ पसारे उम्मीदों की चौखट पर
किस्मत तो बस उसकी है जो चलता फिरता राही है
....................
वो मंज़िल हो कहीं भी पर उसे आना है बाजू में
मेरे ज़ज़्बात आयेंगे कहाँ तक मेरे काबू में
चलो ये दिल इधर रक्खा उधर रक्खा है किस्मत को
वजन देखे किधर होगा मुहब्बत की तराजू में
....................
वो एक शाम थी तमाम शामों की तरह
अहदे उल्फत के वाजिब गुलामों की तरह
उसका आना क्या किसी दहशत से कम था
वो जब आई तो आई इलज़ामों की तरह
....................
हर ख़ुशी हर पाई का वो हिसाब रखता है
अपनी आँखों में बच्चों के ख्वाब रखता है
खुद की परवाह करना तो उसे आता नही
वो बाप है! अपने दुखों पर नकाब रखता है
....................
इस किनारे से उस किनारे का सफर
मोहब्बत क्या है इक इशारे का सफर
टूटने के बाद भला कौन याद रखता है
कैसा गुजरेगा टूटते तारे का सफर
....................
किसी को प्यार करने से मुनासिब कुछ नही होता
ये दिल का मामला है यार वाजिब कुछ नही होता
लिखा है जो हथेली पर वही होगा वही होगा
किसी के चाह लेने के मुताबिक कुछ नही होता
....................
एक तुम हो जो आवाज भी नही देते हो
एक वो है जो मुझपे जान देता है
तुम्हे तो मेरे आंसूँ भी नही दिखते हैं
वो तो मेरा दर्द भी पहचान लेता है
....................
तुम बोलो और मान लूं मै भी ये इतना आसान कहाँ
मै भी थोड़ा पढ़ा लिखा हूँ तुम भी हो विद्वान कहाँ
गायब होते देखे हैं लश्कर भी मैंने मौके पे
इतना तो मालुम है मुझको बिकता है इंसान कहाँ
....................
छोटी सी जिंदगी में क्या क्या न देखा मैंने
टूटी हुई नींद में टूटा हुआ सपना मैंने
प्यार धोखा दोस्त जलन और न जाने क्या क्या
इनसे ही सीख लिया जीने का तरीका मैंने
....................
बात अपनों की हो अगर फर्क तो पड़ता है
यूँही गुम जाये रहगुजर फर्क तो पड़ता है
यूँ तो उम्र गुज़ारने को ये जगह भी ठीक है
पर जो अपना हो ये शहर फर्क तो पड़ता है
....................
वो जब नाराज होता है तो बातें तक नही करता
मेरे कमरे में आकर के कभी बक बक नही करता
कि मेरा काम ऐसा है हज़ारों लोग मिलते हैं 
मगर इतनी गलीमत है कभी वो शक नही करता
....................
सबकी अपनी बातें हैं और सबका तौर तरीका है
तूफ़ानों से लड़ना हमने चट्टानों से सीखा है
बुझदिल समझा है क्या हमको जो ऐसे ही डर जायें
अपने अंदर खून अभी भी राणा का छत्रपती का है
....................

Sunday, 2 July 2023

शायरी - जीवन क्या है लापरवाही

जीवन क्या है थोड़े नियम थोड़ी लापरवाही है
रस्ता है ये अरमानों का जिसपर आवा जाही है
कहाँ खड़े हो हाथ पसेरे उम्मीदों की चौखट पर
किस्मत तो बस उसकी है जो चलता फिरता राही है

शायरी - तलाश करता है

मेरा हर मर्ज दवा की तलाश करता है
दवा के बाद दुआ की तलाश करता है
ये मेरा इश्क़ कहाँ से इलाज खोजेगा
तुम्हारे दर पे खुदा की तलाश करता है

मन बातों का एक ठिकाना

*मन बातों का एक ठिकाना*

मन बातों का एक ठिकाना
जिसमे सुख दुख आना जाना
कभी नये गीतों की सोचे
कभी सुनाये गीत पुराना

मौजी है मन बड़ा सयाना 
मन बातों का एक ठिकाना

मीत वही जो मन को भाये
प्रीत वही जो मन ले जाये
गीत वही जो मन ये गाये
रीत वही जो मन से आये

सबकुछ मन का ताना बाना
मन बातों का एक ठिकाना

कभी कभी व्याकुलता घेरे
कभी कभी इस जग के फेरे
कभी मिले मन तेरे मेरे
कभी मिलें बस धुप्प अँधेरे

फिर भी मन को चलते जाना
मन बातों का एक ठिकाना

रहती चिंता भारी मन को
तरसे वो फिर अपनेपन को
देखे ऐसे वो जीवन को
जैसे चातक देखे घन को

खोया अपना उसको पाना
मन बातों का एक ठिकाना

मन का बैरी मन ही जाने
अपनी दुनिया लगे बनाने
छलनी से बातों को छाने
लगा रहे फिर स्वाँग रचाने

मन ही अपना मन बेगाना 
मन बातों का एक ठिकाना

तरुण कुमार सिंह
प्रबंधक, यूको बैंक 
क.सं. - 57228

Wednesday, 10 May 2023

ग़ज़ल - कमाल है!

तुम्हे वफ़ा कबूल है कमाल है
तुम्हारा भी उसूल है कमाल है

तुम्हारे शौक आज भी हैं लाजिमी
हमारा सब फ़िजूल है कमाल है

कहीं किसी के बाग़ को उजाड़कर 
खिला तुम्हारा फूल है कमाल है

तुम्हे हवा लगी तपाक उड़ पड़े 
मिजाज तेरा धूल है कमाल है

करोगे सौ दफा तमाम गलतियाँ
बताओगे कि रूल है कमाल है

Wednesday, 8 March 2023

बदल ही गया

*ग़ज़ल - बदल ही गया*
*कविराज तरुण*

_याद आती है कई रोज बेवफा तेरी_
_कई रातें मै गुमसुम गुज़ार देता हूँ_
_ये नकाब-ए-हुस्न तेरा और किसको लूटेगा_
_आज महफिल मे इसे मै उतार देता हूँ_
••••••••••••••••
एक वो दौर था तू मेरे रूबरू
एक वो दौर था तू मेरे रूबरू
रेत के जैसे पल वो फिसल ही गया
एक वो दौर था तू मेरे रूबरू
रेत के जैसे पल वो फिसल ही गया

तुमसे मिलने से पहले बड़ा ठीक था
तुमसे मिलने से पहले बड़ा ठीक था
तुम जो बदले तो मै भी बदल ही गया

एक वो दौर था तू मेरे रूबरू
रेत के जैसे पल वो फिसल ही गया

बोतलों मे भरी तेरी मक्कारियाँ
और हम पैग अपना बनाते रहे
बात उल्फत की महफिल मे चलने लगी
जाम पे जाम खुद को पिलाते रहे (2)

पीते पीते कदम लड़खड़ाये मगर
पीते पीते कदम लड़खड़ाये मगर
था सँभलना मुझे मै सँभल ही गया

तुमसे मिलने से पहले बड़ा ठीक था
तुम जो बदले तो मै भी बदल ही गया

एक वो दौर था तू मेरे रूबरू
रेत के जैसे पल वो फिसल ही गया

रूह तुमसे जुड़ी तो जुड़ी रह गयी
दूसरा कोई दिल मे समाया नही
तुमने बस्ती बसाई पता है हमें
हमने खुद को कहीं भी बसाया नही (2)

लोग आये मगर वो चले भी गए
लोग आये मगर वो चले भी गए
वक़्त रहमोंसितम का निकल ही गया

तुमसे मिलने से पहले बड़ा ठीक था
तुम जो बदले तो मै भी बदल ही गया

एक वो दौर था तू मेरे रूबरू
रेत के जैसे पल वो फिसल ही गया

Tuesday, 7 March 2023

रंग का त्योहार होली

रंग, जो चमन के मुस्कुराते फूल में होते हैं 
रंग, जो हवा के हर मूल में होते हैं 
रंग, जो जड़ो में चेतन में धूल में होते हैं 
रंग, जो चुभते किसी शूल में होते हैं 
// उन रंगों की कहानी है भोली ...
आखिर रंग का त्योहार है होली //

रंग, जो कहे वतन के खून की कहानी 
रंग, जो हमें बताये बात कोई पुरानी 
रंग, जो अंतर कहे कि खून या पानी 
रंग, जो सादगी की पहचान हैं निशानी 
// उन रंगों की कहानी है भोली ...
आखिर रंग का त्योहार है होली //

रंग, जो उजड़ते चमन को महका दे 
रंग, जो खिलें और खिल के सबको बहका दे 
रंग, जो जल के भीतर भी ज्वाल दहका दे 
रंग, जो अंध में भी ज्योति दिखला दे 
// उन रंगों की कहानी है भोली ...
आखिर रंग का त्योहार है होली //

रंग, जो लाये सुन्दरता में नया निखार 
रंग, जो दूर कर दे मुख से दाग या विकार 
रंग, जो याद दिलाये विजय का सार 
रंग, जो मधुमास में ले आए नवबहार 

// उन रंगों की कहानी है भोली ...
आखिर रंग का त्योहार है होली //

रंग, जो हमारी पहचान हैं निशानी 
रंग, जो मिलकर बनाए रंग नूरानी
रंग, जिसकी चाह में है दुनिया दीवानी
रंग, जो कहता नही है बात जुबानी
// उन रंगों की कहानी है भोली ...
आखिर रंग का त्योहार है होली //

Tuesday, 21 February 2023

भूल जाने के लिए है

ये मोहब्बत और वादा भूल जाने के लिए है
दिल का क्या है इक दफा तो आजमाने के लिए है

रूह तो शामिल नही है जिस्म की ही बात है अब
शादियों का नाम तो रस्में निभाने के लिए है

मै ठहर कर देखता हूं और आगे चल पड़ूं मै
उसकी गलियां रासतो का शक मिटाने के लिए है

उम्र आधी गफलतों में और आधी उम्र मेरी
इश्क कर देगा निकम्मा ये बताने के लिए है

देख लेगा वो हकीकत हो सके तो साफ कह दो
इस जहां को छोड़कर दुनिया दिखाने के लिए है

Thursday, 16 February 2023

तू मेरे साथ नही

ये दुख अजीब है के तू मेरे साथ नही
कैसा नसीब है के तू मेरे साथ नही

मुमकिन नही था पर वो इंसान आज मेरे
बेहद करीब है के तू मेरे साथ नही

ये मर्ज ला-इलाज है क्या इलाज करूं
कहता तबीब है के तू मेरे साथ नही

कल तक हमारे प्यार के जो खिलाफ रहा
वो अब हबीब है के तू मेरे साथ नही

लिक्खा है जिसने प्यार को प्यार के बिना
किस्मत अदीब है के तू मेरे साथ नही

Tuesday, 14 February 2023

बसर वो रोज करते हैं

हमारे ख्वाब में आकर बसर वो रोज करते हैं
रहें ये ज़ख्म भी ताजा कसर वो रोज करते हैं

तअल्लुक कुछ नही होता है मांझी का मुसाफिर से
मगर फिर भी न जाने क्यों सफर वो रोज करते हैं

बड़ा आसान था उनका ये कहना अलविदा तुमको
मगर फिर खुशनसीबी की खबर वो रोज करते हैं

यहां डूबे रहे शब में अंधेरों से हुई यारी
वहां उजली हुई दिलकश सहर वो रोज करते हैं

गवाही दिल नही देता उधर नजरें इनायत हों
किसी के नाम का सजदा जिधर वो रोज करते हैं

डर लगता है

बस इसी बात से मुझे डर लगता है
एक शख़्स ही सारा शहर लगता है

मोहब्बत एक दो दिन की बात नही
उम्र भर का इसमें सफर लगता है

उड़ने का काम परिंदो पे छोड़ दो
यूं तो हर काम में हुनर लगता है

दिल में जगह रखना तो काफी नही
घर बसाने के लिए भी घर लगता है

यही कश्मकश है यही दर्द-ए-पैहम
अपना नही है वो अपना मगर लगता है

Tuesday, 7 February 2023

नजर भर देख लूं

देखकर नजरें उतारूं या नजर भर देख लूं
सोचता हूं आंख में तेरी उतरकर देख लूं

आसमां के चांद को है देखने का क्या सबब
इससे बेहतर चांद अपना मै जमीं पर देख लूं

एक मुद्दत बाद तुम आए हो मेरे सामने
अब जरूरी है तेरी खातिर कहीं घर देख लूं

दिल बहलता ही नही अब बारिशों में भींगकर
हुस्न तेरी मौज के भीतर समंदर देख लूं

इश्क तेरी राह में कितने मुसाफिर खो गए
इकदफा इस रहगुजर से मै गुजर कर देख लूं

Sunday, 5 February 2023

नंबर भी बदलता है

वो बाहर भी बदलता है वो अंदर भी बदलता है
वो जब खुद को बदलता है तो नंबर भी बदलता है

चले जिसके किनारे साथ दोनो हाथ हाथों में
बदलने को जो आए तो समंदर भी बदलता है

उसे मै खोजने की क्यों करूं कोशिश बताओ तुम
सितारे चांद बादल और अंबर भी बदलता है

पकड़ पाना नही मुमकिन निगाहों से हुए घायल
वो झपके जब पलक अपनी तो खंजर भी बदलता है

किसी दिन तुम खड़े होगे वहीं पर हैं जहां पर हम
सुना है वक्त बदले तो ये मंजर भी बदलता है

Sunday, 29 January 2023

मुझे वापस बुलाती है

कभी तेरी गली मुझको बड़ा आवाज देती है
कभी तेरी वो फुलवारी मुझे वापस बुलाती है

बमुश्किल से तुझे जाना कभी मै भूल पाता हूं
मगर जब भूल जाता हूं तो तेरी याद आती है

कई मौसम यहां बदले मगर ये बात ना सुलझी
ये बारिश घर मे आकर के मुझे ही क्यों भिगाती है

वो आँखें मर मिटा जिनपर कोई ख्वाबों का शहजादा
उन्हीं आंखों के दरिया में ये कश्ती डूब जाती है

मुझे बिल्कुल नही मतलब तू कैसी है कहां है तू
हवा फिर भी ये जाने क्यों खबर तेरी बताती है

Saturday, 28 January 2023

आग लगा दी

पुरानी बातें हैं वो इश्क मोहब्बत वाली
लड़का था पागल लड़की भोली भाली

एक दूसरे में उनकी जान बसा करती थी
जैसे फूलों की बगिया बगिया का माली

उनके बारे में लोग उड़ाते थे अफवाह
हर एक की नजर थी उन पर सवाली

दुनिया को उनसे दिक्कत थी इतनी
के हर कोई देता था उनको ही गाली

जमाना था दुश्मन घरवाले रुसवा
फिर क्या था दोनों ने आग लगा ली

आओ फिर से

इकबार तुम पागल बनाने आओ फिर से
दिल जान नींदों को चुराने आओ फिर से

जो तयशुदा है वो हमेशा साथ होगा
पर ये लकीरें आजमाने आओ फिर से

हूं अब नही वैसा जिसे तुम जानती हो
ये मोम जैसा दिल जलाने आओ फिर से

क्यों तोड़कर कसमें वफा की तुम गए थे
ये बात मुझको तुम बताने आओ फिर से

मै हूं अभी जिंदा तुम्हे मालूम होगा
जो हो सके मुझको मिटाने आओ फिर से

Sunday, 22 January 2023

जो भी है वो तुमसे है

इश्क मुहब्बत धोखा नफरत जो भी है वो तुमसे है
हसरत वसरत आदत वादत जो भी है वो तुमसे है

मुझको जो भी सबक मिला वो बोलो कैसे भूलूं मै
दहशत वहशत शिकवा शिद्दत जो भी है वो तुमसे है

आंख समंदर तेरी थी सो उसके अंदर डूब गया
डूबे इस दिल की अब हरकत जो भी है वो तुमसे है

कहते थे सब यार मुझे तुम कहां पड़े हो चक्कर में
पर मै कहता मेरी कुर्बत जो भी है वो तुमसे है

अब तुम वापस आकर भी कुछ ठीक नही कर सकती हो
सच तो ये है मेरी हालत जो भी है वो तुमसे है

Saturday, 21 January 2023

अच्छा कैसे लग सकता है

मुझको तेरा चुप हो जाना अच्छा कैसे लग सकता है
तुमको खोकर सबकुछ पाना अच्छा कैसे लग सकता है

जिन गलियों से खुशबू तेरी डोली सजकर निकल गई हो
उन गलियों में आना जाना अच्छा कैसे लग सकता है

अंत जहां पर खुशियों का हो इश्क जहां पर शर्मिंदा हो
दर्द भरा फिर वो अफसाना अच्छा कैसे लग सकता है

जिसने तेरी दहलीजों पे दिल की जन्नत देखी अबतक
उस पागल को पागलखाना अच्छा कैसे लग सकता है

तुम ही मुझको समझाती थी इश्क वफा की मीठी बातें
अब उल्टा तुमको समझाना अच्छा कैसे लग सकता है

Thursday, 19 January 2023

हो जायेगा

धीरे धीरे हाथ मिलाना हो जायेगा
उसके घर फिर आना जाना हो जायेगा

रफ्ता रफ्ता बात चलेगी इश्क वफा की
दिल ही दिल में एक ठिकाना हो जायेगा

कुछ दिन तुमको भायेंगे फिर चांद सितारे
आगे चलकर चांद पुराना हो जायेगा

फिर छोटी छोटी बातों पर होगी अनबन
चुपके चुपके अश्क बहाना हो जायेगा

तब दूरी बढ़ जायेगी यूं मीलों लंबी
इश्क मुहब्बत प्यार फसाना हो जायेगा

Wednesday, 18 January 2023

ऐसा भी क्या

तुमने जाने उसमे देखा ऐसा भी क्या
खुद भी उलझे दिल भी उलझा ऐसा भी क्या

रोते रोते हँस देते हो पागल लड़के
खोजा तुमने खूब तरीका ऐसा भी क्या

कांटों की हसरत है खुशबू से भर जाएं
फूलों की फितरत है धोखा ऐसा भी क्या

पानी के अंदर ही डूबा आज समंदर
बारिश की बूंदों में भीगा ऐसा भी क्या

लाख वफा की कसमें तुमने खुद तोड़ी हैं
फिर भी हमसे इतना शिकवा ऐसा भी क्या

Monday, 16 January 2023

शायरी

धीरे धीरे सबकुछ सहना सीख गया हूं
तन्हा तन्हा घर पे रहना सीख गया हूं
तुमने तो कुछ कहने लायक कब छोड़ा था
अपना गम मै खुद से कहना सीख गया हूं

सही नही है मगर गलत भी लगा नही वो
कहीं नही है मगर अभी तक जुदा नही वो
अभी तो खुशबू भरी हुई है बदन मे मेरे
गया है लेकिन लगे यही के गया नही वो

इन रस्तों को मंजिल कहके कितने दिन इतराओगे
मै अपने रस्ते जाऊंगा तुम अपने रस्ते जाओगे
आते जाते मिलना तो फिर नज़रे तिरछी कर लेना
उलझे अबकी नजरो मे तो फिर वापस ना आओगे

Saturday, 14 January 2023

बन संवर के आए हैं

उसके शहर में कुछ दिन ठहर के आए हैं
गौर से देखो हम बन- संवर के आए हैं

अब तो दरिया से ये प्यास बुझेगी नही
हम समंदर के अंदर उतर के आए हैं

उन लोगों से पूछो उसे पाने का मतलब
जो बस उसके लिए आह भर के आए हैं

जिंदगी एक गश्त है और हम हैं मुसाफिर
बस यही सोचकर हम गश्त कर के आए हैं

इतना आसान नही है इश्क का ये सफर
हम आग के दरिया से गुजर के आए हैं

Wednesday, 11 January 2023

क्या क्या बताया जाए

क्या क्या बताया जाए क्या क्या छुपाया जाए
राज़ इतने हैं किस किस को दबाया जाए

मेरे चाहने वाले मुझको हिदायत यही देते हैं
तू गुजरे जिधर से उधर से न जाया जाए

मुकम्मल हो जायेगी यूंही तेरे प्यार की कहानी
क्यों टाइटैनिक की तरहा तुझको  डुबाया जाए

दोस्ती करने का तरीका तो बेहद आसान है
नज़रे मिल जाएं तो हाथों को मिलाया जाए

महफिल में भले रौशन हों चांद तारे और जुगनू
रौशनी तो तब है जब तुझको बुलाया जाए

Monday, 9 January 2023

गजल क्या क्या हुआ है

मत पूछो मेरे साथ क्या क्या हुआ है
दिल किसी बात से बहला हुआ है

चांद की आंखों में उदासी किसलिए
फिर किसी के प्यार का सौदा हुआ है

जिंदगी एक किताब है मालूम है हमें
क्या हुआ जो हर पन्ना बिखरा हुआ है

लिख देंगे तुम्हे हम शायरी में कभी
अभी दिल कहीं पे उलझा हुआ है

ये प्यार इश्क उल्फत मोहब्बत
यही बोलकर तो हमला हुआ है

Sunday, 8 January 2023

गजल - न थे न होंगे

वो हम पे महरबान न थे न होंगे
पर हम भी बेजुबान न थे न होंगे

उनसे रहम की गुजारिश भी क्या
जो बेहतर इंसान न थे न होंगे

बिन बुलाए आयेंगे हमारे करीब
वो घर के महमान न थे न होंगे

आसमां को जमीं पर खींच लायेंगे
ऐसे तो अरमान न थे न होंगे

क्या दिल में है क्या जुबान पर
हम इतने अनजान न थे न होंगे

Wednesday, 4 January 2023

गजल - जाने दो

वो जा रहा है तो उसे इस बार जाने दो
अब है किसी वो दूसरे का प्यार जाने दो

है फायदा कुछ भी नही क्यों गमजदा हो तुम
इन आंसुओं को यूं नही बेकार जाने दो

अब जो लिखा है किस्मतों में मान लो उसको
फिर क्या हुआ वो कर रहा इनकार जाने दो

रिश्ते बचाकर कुछ न होगा ये समझ लो तुम
जब दो दिलों में खिंच गई दीवार जाने दो

मै ही नही तुम ही नही सब है उसी रब का
फिर सोचना क्या जा रहा जो यार जाने दो

Sunday, 1 January 2023

मन की बात

अपने मन की बात बताकर जोड़ा हमसे नाता है
जैसे आप समझाते हो कोई नही समझाता है

राष्ट्र कहां तक पहुंचा है हमलोग कहां तक जायेंगे
किन बातों के द्वारा हम सब देश का मान बढ़ाएंगे
सोच हमें क्या रखनी होगी कर्तव्य हमारे क्या क्या हैं
काम कौन से ऐसे हैं जिससे देश को फायदा है

इन बातों का ताना बाना कोई नही बतलाता है
जैसे आप समझाते हो कोई नही समझाता है

वो क्षेत्र कौनसे ऐसे हैं जिनमें ज्यादा अवसर हैं
आवास योजना के अंतर्गत बने अभी कितने घर हैं
स्वच्छ देश का सपना अबतक पहुँचा है किस पटरी पर
विज्ञान के द्वारा सपनों की बुनी गई कितनी चादर

ढेरों ऐसी बातों से ये मन ज्ञानी हो जाता है
जैसे आप समझाते हो कोई नही समझाता है

आगे क्या क्या संकट हैं किन लोगों से लड़ना होगा
क्या क्या हमने नही किया क्या क्या हमको करना होगा
किन बातों को ध्यान में रखना हमको अभी जरूरी है
विश्वगुरु की राह में हमको चलनी कितनी दूरी है

आप के द्वारा ही हमको संकल्प पता चल पाता है
जैसे आप समझाते हो कोई नही समझाता है

और यार क्या

चल रहे तो है ये सफर , और यार क्या
पांव से तू नाप डगर , और यार क्या

जिंदगी क्या चाहती है और क्या नही
किसको पता किसको खबर , और यार क्या

दिल के तार जोड़कर दूर तक चलो
रह न जाए कोई कसर , और यार क्या

शाम को तू बैठ कभी इतमिनान से
ढल रही है तेरी उमर , और यार क्या

वक्त और साल तो ये बीत जायेगा
छोड़ देगा अपना असर , और यार क्या

जिंदगी की जंग सदा जीत लेंगे हम
है दोस्तों का साथ अगर , और यार क्या

Saturday, 17 December 2022

जमीं पे उतर के आओ

बड़े घरों में ओ रहने वाले, ज़रा सा रहमोकरम दिखाओ
बहुत दिनों तक रहे फलक पे, कभी जमीं पर उतर के आओ
तुम्हे मुहब्बत के इस सफर में, तमाम राहें दिखाई देंगी
के एक दरिया तुम्हे मिलेगा, है पार जाना तो डूब जाओ
कभी समंदर हुई थी आँखें, कभी बहारे चमन हुआ था
कहूं भला क्या मै आज तुमसे, कोई कहानी तुम्ही सुनाओ
तुम्हे मुबारक है शाम शबनम, गुले बहारा तुम्हे मुबारक
हमारे हिस्से में रात काली, ये चांद थाली चलो छुपाओ
जो साथ आये वो दूर हैं अब, यही तो उल्फत मे हो रहा है
बदल सको जो रिवाज़-ए-उल्फत, हमारी महफिल मे पेश आओ

कविराज तरुण

Sunday, 27 November 2022

निकल रहा है

कहीं पे जुगनू टहल रहा है
कहीं पे सूरज निकल रहा है

इसी गुमां में बढ़े कदम ये
ज़माना पीछे ही चल रहा है

हटा रहे क्यों ये धूल जाला
इसी से दिल ये बहल रहा है

तुम्हे लगेगा तुम्ही शहंशा
तुम्ही से हर कोई जल रहा है

मगर पता क्या किसे हक़ीक़त 
के ऊंट करवट बदल रहा है

कविराज तरुण

Saturday, 26 November 2022

आने वाला कल होगा

माना थोड़ा वक्त लगेगा पर संकट का हल होगा
आज नही है तेरा तो क्या आने वाला कल होगा

रात में जुगनू चांद सितारे माना कि इतराते हैं
भोर उदय जब होता सूरज ये सारे छुप जाते हैं
पर्वत को सन्नाटे में ही बरबस रहना पड़ता है
आंधी धूप थपेड़ों को भी डटकर सहना पड़ता है

तू जितना सह जायेगा तू उतना और प्रबल होगा
आज नही है तेरा तो क्या आने वाला कल होगा

चींटी इक इक दाना लेकर मीलों लंबा चलती है
हर कठिनाई से लड़कर वो जीवनयापन करती है
पतझड़ में पेड़ों की डाली बिन पाती रह जाती है
पर मौसम आने पर वो ही फूलों से भर जाती है

सही समय आने पर तेरा हर इक काम सफल होगा
आज नही है तेरा तो क्या आने वाला कल होगा

कर्म सिवा कुछ हाथ नही तब चिंता का मोल भला क्या
सत्य नही धारण जिसमे उस व्यक्ति का बोल भला क्या
तुझे पता है तेरी ताकत मात्र यही आवश्यक है 
जीवनपथ पर दौड़ अनवरत सोच यही तू धावक है

जैसी तेरी करन होगी वैसा आगे फल होगा
आज नही है तेरा तो क्या आने वाला कल होगा

Wednesday, 2 November 2022

गजल - हो जायेगा

दो शब्द मीठे बोलने से क्या बुरा हो जायेगा
पर दो दिलों के दरमियां कम फासला हो जायेगा

क्यों नफरतों का बीज फैला है जहां में हरतरफ
ये बीज आगे पेड़ बनकर फिर खड़ा हो जायेगा

ये आग वाला खेल माना दे रहा है मौज भी
पर एकदिन इस आग से ही हादसा हो जायेगा

इस प्यार में जो शक्ति है वो है नही अलगाव में
हां देखिए इस शक्ति से कितना भला हो जायेगा

है कौन किसका सोचने की क्या जरूरत है 'तरुण'
जो ना हुआ अबतक किसी का वो तेरा हो जायेगा