Tuesday, 9 January 2024

ग़ज़ल - खो गईं वो चिट्ठियां

खो गईं वो चिट्ठियां जिसमें लिखे ज़ज़्बात मैंने
प्यार की अंगड़ाईयों में अनकहे हालात मैंने

एक दिन बीता नही लगने लगा के साल बीते
बिन तुम्हारे किस कदर काटे यहाँ दिन रात मैंने

झूमकर नाचा था मै भी दिलजलो की भीड़ में तब
जब तुम्हारे घर पे देखी और की बारात मैंने

तुमने तो बस कह दिया के भूल जाओ तुम मुझे अब
और फिर घंटों करी थी आँख से बरसात मैंने

ख़त्म होती है कहानी प्यार के जिस मोड़ पर ये
उस जगह से की हमारे प्यार की शुरुआत मैंने

Sunday, 24 December 2023

हाँ यही अच्छा रहेगा

हो सके तो भूल जाना हाँ यही अच्छा रहेगा
फिर किसी से दिल लगाना हाँ यही अच्छा रहेगा

काटना मुश्किल है रातें खैर ये मेरे लिए है 
तुम हमेशा मुस्कुराना हाँ यही अच्छा रहेगा

पूछ लेगा कोई तुमसे मेरे बारे में कभी जब
सरफिरा था ये बताना हाँ यही अच्छा रहेगा

दो गुजरे साथ तेरे दो गुजारेंगे तेरे बिन
चार दिन का है ठिकाना हाँ यही अच्छा रहेगा

उसकी तस्वीरें हटा दो फोन से अपने 'तरुण' अब 
देख लेगा ये ज़माना हाँ यही अच्छा रहेगा

Monday, 27 November 2023

आती नही

मुझे हर चीज तो पसंद आती नही
ये चाँद सितारे हैं कोई बाराती नही
इतना कह के वो छोड़ गई मुझको
इक तेरे सिवा कोई मेरा साथी नही

जी पाऊँगा नही

इक गीत लिखा पर तुम्हें सुनाऊँगा नही
जो दूर गया तो कभी मै आऊंगा नही 
है मुझको तेरे प्यार में मरने की मनाही 
ज़िंदा भी रहूँ तो भी मै जी पाऊँगा नही

Wednesday, 22 November 2023

चंद मुलाकाते करना

कभी खामोश रहना कभी बे-इंतेहा बातें करना
कितना जरूरी है चंद मुलाकाते करना

तू एक ख्वाब है जो नींद में दिखाई देगा
इसी इंतज़ार में दिन काटना और रातें करना

Wednesday, 25 October 2023

खुश आमदीद है

221 222 2 22 1212

ये आंखें इक अरसे से जिनकी मुरीद है
वो आ गए महफिल में खुश आमदीद है

हम सरफिरों को चाँद-सितारे जहाँ मिले
उस रोज है दीवाली उस रोज ईद है

उसको गवाही देनी है जालसाज की
जो जालसाजी करके खुद मुस्तफीद है

इज्जत कमाने निकले हम देखभाल के
किसको पता था ये भी अब जर-खरीद है

इस रूह से मत पूछो के बिक के क्या मिला
वो झूठ कैसे बोले जो चश्मदीद है

Monday, 23 October 2023

ग़ज़ल - इकदिन

तुम्हें याद मेरी भी आएगी इकदिन
जमीं झूमकर मुस्कुराएगी इकदिन

हाँ गफलत रही है यही जिंदगी भर
ये है जिंदगी बीत जाएगी इकदिन

जियादा जरूरी है जो चीज तुमको
वही चीज तुमको सताएगी इकदिन

मुहब्बत के इन बेगुनाहों से कह दो
मुहब्बत ही दिल ये दुखाएगी इकदिन

बमुश्किल सँभाला है इन आंसुओं को
ये है जिंदगी तो हँसाएगी इकदिन

Friday, 6 October 2023

आज फिर

आ गया आँख में दर्द-ए-गम आज फिर
हर अकेले का रहबर अलम आज फिर

था जो अपने मुताबिक हमेशा से ही
वक़्त वो ही हुआ बेरहम आज फिर

देर तक राह पर आग जलती रही
और उसपर कदम दर कदम आज फिर

कौन कितना सही आज किसको कहे
हो रहा हर किसी को वहम आज फिर

दे रहा है ज़खम पर ज़खम इश्क़ ये 
सह रहा हूँ सितम पर सितम आज फिर

Thursday, 5 October 2023

मिल लिया करे

ये जरूरी नही मेरे हक़ में कोई फैसला करे
पर मिलने की जिद करूँ तो मिल लिया करे

तमाम शिकवे शिकायतें अपनी जगह महफूज़ हैं
पर कुछ बातों को पल भर के लिए अनसुना करे

जो काम मुश्किल है वही मेरे हिस्से आता है 
इतनी हिम्मत कहाँ मुझमे कि तुमको मना करे

जो मेरे साथ खुश है जिसे मुझपर यकीन भी है
वो मेरे साथ चले वर्ना वो मुझे अलविदा करे

मै अबतक न समझा इबादत में दखल का मकसद
जो अपना है ही नही उसका कोई क्या गिला करे

ये जरूरी नही मेरे हक़ में कोई फैसला करे
पर मिलने की जिद करूँ तो मिल लिया करे

Sunday, 1 October 2023

मौज हो

फूलों की फ़िकर क्या करें कांटों की मौज हो 
नीदों की जगह आँख में ख्वाबों की मौज हो 
जब चार दिन का ये सफर ही पास है तेरे
मंजिल की खबर हो न हो राहों की मौज हो

Thursday, 28 September 2023

ग़ज़ल - कलयुग

ग़ज़ल - कलयुग

221 2122 221 212
कल का ग़ुमान मत कर, जो है वो आज है
किसके हवाले कबतक, ये तख़्त-ओ-ताज़ है

अंतिम सफर सभी का होता है एक जैसा
माना अलग तरह का रश्मोरिवाज़ है

हर चीज मे मिलावट हर बात खोखली
कैसे हैं लोग इसके कैसा समाज है

वहशी बना हुआ है जिस दिन से आदमी
उस दिन से जानवर का बदला मिजाज है

कलयुग तुम्हे मुबारक अब रंग-ओ-रोशिनी
फैला जहाँ मे तेरा अब कामकाज है

मतला शेर - मोहब्बत मेरी

दो आँखों में सिमटी है सल्तनत मेरी
यही मक़ाम है मकसद और दौलत मेरी
तमाम किस्सों में क्या ख़ाक बयाबानी है
अभी देखी कहाँ जमाने ने मोहब्बत मेरी 

Friday, 22 September 2023

मतला शेर - कहा ही नही

साथ रहते हुए भी रहा ही नही
आँख में बस गया तो बहा ही नही 
उसकी धड़कन लगातार कहती रही
मुँहजुबानी मगर कुछ कहा ही नही

Thursday, 21 September 2023

लहजा समझता है

मेरी बातों से ज्यादा वो मेरा लहजा समझता है
बड़ा मगरूर है जाने वो खुद को क्या समझता है
मैं इतना ही तो कहता हूं मेरे ख्वाबों में आ जाओ
जरा सी बात का मतलब वो कुछ ज्यादा समझता है

Saturday, 16 September 2023

ग़ज़ल - काश

काश! ऐसा हो किसी दिन लौट आये तू कभी
वक़्त की रुसवाइयों को भूल जाये तू कभी

उन दिनों की याद में हम फिर न सोये रात भर
जागती आँखों को आकर फिर सुलाये तू कभी

तुमने हँसकर बादलों को ऐसे घायल कर दिया
वो बरसते ही रहे के भीग जाये तू कभी

अपने दिल की हसरतों को क्या बतायें आप से
बिन कहे और बिन सुने ही मुस्कुराये तू कभी

जिंदगी भर गीत तेरे ही लिखें मैंने तरुण
काश! ऐसा हो कि इनको गुनगुनाये तू कभी

Friday, 1 September 2023

ग़ज़ल - ताज़ा तरीन है

हर मोड़ पर हैं मुश्किलें फिर भी यकीन है 
अहसास तेरे साथ का ताज़ा तरीन है

जो रुक गया था बीच मे वो तो है ग़मज़दा 
जो साथ तेरे चल पड़ा वो मुतमईन है

मिट्टी के होके कर रहे किस बात का ग़ुमाँ 
कबतक किसी के नाम लिखी ये जमीन है

ये जिंदगी है और इसका है ये फलसफा
दिल की नजर से देखिये तो सब हसीन है

इस उम्र मे सही गलत का सोचना भी क्या
जिस ओर चल पड़े कदम वो बहतरीन है

कविराज तरुण

Sunday, 27 August 2023

है कि या नही

सारा जहान साथ मेरे है कि या नही
इस बात से तो वास्ता मुझको रहा नही
बस एक तेरा नाम दिल मे ऐसे छप गया
अब और कोई नाम छपने पायेगा नही

Saturday, 26 August 2023

ग़ज़ल - शायद

1212  1122 1212 22

मेरा ग़ुमान मेरे इश्क़ की जमीं शायद 
सज़ा थी एक हसीं और कुछ नही शायद

थी जिसकी प्यास मुझे जो तलाश थी मेरी
उसी के नाम रही उम्र-ए-आशिकी शायद

तेरे मकान से निकला उदासियाँ लेकर
खुदा का शुक्र तेरी आँख भर गई शायद

किसी ने पूछ लिया जो बताओ कैसे हो 
बता नही सकते हाल-ए-जिंदगी शायद

कि तेरी हद मे उजाले जवाँ रहे जबतक 
किसी ने देखी नही सैल-ए-तीरगी शायद

ये मेरा जिस्म मेरी रूह का तमाशा है
तमाशबीन रही साँस की लड़ी शायद

इसी फिराक मे तस्वीर ले के सोता हूँ
न जाने कब हो कोई शाम आखिरी शायद

कविराज तरुण 

चले गए

इसबार किसी हद से गुजरने चले गए
कुछ सोच के हम खुद को बदलने चले गए

वो काम जिसे लोग मुहब्बत कहा करें 
हम आज उसी काम को करने चले गए

तारीख मेरे हक़ मे करे कोई फैसला
हम इश्क़ के दरिया मे उतरने चले गए

बहके हुए दिन रात बुरा हाल है मेरा
इस हाल को फिलहाल बदलने चले गए

बेबाक हवा नाम तेरा लेके जब चली
हम उसकी महक साँस मे भरने चले गए

Friday, 4 August 2023

मुहब्बत करी जाये

काम मुश्किल है फिर भी ये हिमाकत करी जाये 
अपने दिल की दहलीज़ो से बगावत करी जाये

ऐसा क्या है जो तुझको मेरा होने नही देता
मिल जाओ किसी रोज तो मुहब्बत करी जाये

Wednesday, 12 July 2023

ॐ शिव शंकर शम्भू

ॐ शिव शंकर शम्भू 

शिव तुम ही रखवाले, तुम ही प्राणप्रिये
प्रभु तुम ही प्राणप्रिये
तुमको जो भी ध्यावे, उसको तार दिये
ॐ शिव शंकर शम्भू

श्रावण मास तुम्हारे, हिय को अति प्यारा
प्रभु हिय को अति प्यारा
भक्त करे जल अर्पण, बोले जयकारा
ॐ शिव शंकर शम्भू

नाद करे जल मारुत, मेघ करे गर्जन
प्रभु मेघ करे गर्जन
विधिवत सृष्टि तुम्हारा, करती है अर्चन
ॐ शिव शंकर शम्भू

नेहभाव से रहते, मूषक बाघ शिखी
प्रभु मूषक बाघ शिखी
धेनु रहे सेवा में, नाग बने कंठी
ॐ शिव शंकर शम्भू

कांवड़ लेकर जाये, भक्त मगन तेरा
प्रभु भक्त मगन तेरा
झूमे नाचे गाये, जहाँ लगे डेरा
ॐ शिव शंकर शम्भू

भोलेनाथ तुम्हारा, जो भी नाम जपे
प्रभु जो भी नाम जपे
संकट उसका कटता, रूठे भाग्य जगे
ॐ शिव शंकर शम्भू

कविराज तरुण

Saturday, 8 July 2023

शायरी संग्रह 1

हम रो रहे हैं लेकिन रोते नही हैं हम
यें दर्द-ए-आशिकी का अंजाम है हमारा
मुझको सिखा रहे हो जीने का फलसफा तुम
एक उम्र से यही तो बस काम है हमारा
....................
आज फिर उस बेवफा को याद किया जायेगा
वक़्त बहुत है थोड़ा और बर्बाद किया जायेगा
उसने मेरी आँखों को दी है इतनी दौलत
इन मोतियों से गुलिस्तां आबाद किया जायेगा
....................
कुछ तुम आये और कुछ तुम्हारी याद आ गई
बहुत जोर की बरसात उसके बाद आ गई
लिखा था अपने गम हो दो चार पंक्तियों में
उस बेवफा की उस पर भी दाद आ गई 
....................
मेरा हर मर्ज दवा की तलाश करता है
दवा के बाद दुआ की तलाश करता है
ये मेरा इश्क़ कहाँ से इलाज खोजेगा
तुम्हारे दर पे खुदा की तलाश करता है
....................
जीवन क्या है थोड़े नियम थोड़ी लापरवाही है
रस्ता है ये अरमानों का जिसपर आवा जाही है
कहाँ खड़े हो हाथ पसारे उम्मीदों की चौखट पर
किस्मत तो बस उसकी है जो चलता फिरता राही है
....................
वो मंज़िल हो कहीं भी पर उसे आना है बाजू में
मेरे ज़ज़्बात आयेंगे कहाँ तक मेरे काबू में
चलो ये दिल इधर रक्खा उधर रक्खा है किस्मत को
वजन देखे किधर होगा मुहब्बत की तराजू में
....................
वो एक शाम थी तमाम शामों की तरह
अहदे उल्फत के वाजिब गुलामों की तरह
उसका आना क्या किसी दहशत से कम था
वो जब आई तो आई इलज़ामों की तरह
....................
हर ख़ुशी हर पाई का वो हिसाब रखता है
अपनी आँखों में बच्चों के ख्वाब रखता है
खुद की परवाह करना तो उसे आता नही
वो बाप है! अपने दुखों पर नकाब रखता है
....................
इस किनारे से उस किनारे का सफर
मोहब्बत क्या है इक इशारे का सफर
टूटने के बाद भला कौन याद रखता है
कैसा गुजरेगा टूटते तारे का सफर
....................
किसी को प्यार करने से मुनासिब कुछ नही होता
ये दिल का मामला है यार वाजिब कुछ नही होता
लिखा है जो हथेली पर वही होगा वही होगा
किसी के चाह लेने के मुताबिक कुछ नही होता
....................
एक तुम हो जो आवाज भी नही देते हो
एक वो है जो मुझपे जान देता है
तुम्हे तो मेरे आंसूँ भी नही दिखते हैं
वो तो मेरा दर्द भी पहचान लेता है
....................
तुम बोलो और मान लूं मै भी ये इतना आसान कहाँ
मै भी थोड़ा पढ़ा लिखा हूँ तुम भी हो विद्वान कहाँ
गायब होते देखे हैं लश्कर भी मैंने मौके पे
इतना तो मालुम है मुझको बिकता है इंसान कहाँ
....................
छोटी सी जिंदगी में क्या क्या न देखा मैंने
टूटी हुई नींद में टूटा हुआ सपना मैंने
प्यार धोखा दोस्त जलन और न जाने क्या क्या
इनसे ही सीख लिया जीने का तरीका मैंने
....................
बात अपनों की हो अगर फर्क तो पड़ता है
यूँही गुम जाये रहगुजर फर्क तो पड़ता है
यूँ तो उम्र गुज़ारने को ये जगह भी ठीक है
पर जो अपना हो ये शहर फर्क तो पड़ता है
....................
वो जब नाराज होता है तो बातें तक नही करता
मेरे कमरे में आकर के कभी बक बक नही करता
कि मेरा काम ऐसा है हज़ारों लोग मिलते हैं 
मगर इतनी गलीमत है कभी वो शक नही करता
....................
सबकी अपनी बातें हैं और सबका तौर तरीका है
तूफ़ानों से लड़ना हमने चट्टानों से सीखा है
बुझदिल समझा है क्या हमको जो ऐसे ही डर जायें
अपने अंदर खून अभी भी राणा का छत्रपती का है
....................

Sunday, 2 July 2023

शायरी - जीवन क्या है लापरवाही

जीवन क्या है थोड़े नियम थोड़ी लापरवाही है
रस्ता है ये अरमानों का जिसपर आवा जाही है
कहाँ खड़े हो हाथ पसेरे उम्मीदों की चौखट पर
किस्मत तो बस उसकी है जो चलता फिरता राही है

शायरी - तलाश करता है

मेरा हर मर्ज दवा की तलाश करता है
दवा के बाद दुआ की तलाश करता है
ये मेरा इश्क़ कहाँ से इलाज खोजेगा
तुम्हारे दर पे खुदा की तलाश करता है

मन बातों का एक ठिकाना

*मन बातों का एक ठिकाना*

मन बातों का एक ठिकाना
जिसमे सुख दुख आना जाना
कभी नये गीतों की सोचे
कभी सुनाये गीत पुराना

मौजी है मन बड़ा सयाना 
मन बातों का एक ठिकाना

मीत वही जो मन को भाये
प्रीत वही जो मन ले जाये
गीत वही जो मन ये गाये
रीत वही जो मन से आये

सबकुछ मन का ताना बाना
मन बातों का एक ठिकाना

कभी कभी व्याकुलता घेरे
कभी कभी इस जग के फेरे
कभी मिले मन तेरे मेरे
कभी मिलें बस धुप्प अँधेरे

फिर भी मन को चलते जाना
मन बातों का एक ठिकाना

रहती चिंता भारी मन को
तरसे वो फिर अपनेपन को
देखे ऐसे वो जीवन को
जैसे चातक देखे घन को

खोया अपना उसको पाना
मन बातों का एक ठिकाना

मन का बैरी मन ही जाने
अपनी दुनिया लगे बनाने
छलनी से बातों को छाने
लगा रहे फिर स्वाँग रचाने

मन ही अपना मन बेगाना 
मन बातों का एक ठिकाना

तरुण कुमार सिंह
प्रबंधक, यूको बैंक 
क.सं. - 57228

Wednesday, 10 May 2023

ग़ज़ल - कमाल है!

तुम्हे वफ़ा कबूल है कमाल है
तुम्हारा भी उसूल है कमाल है

तुम्हारे शौक आज भी हैं लाजिमी
हमारा सब फ़िजूल है कमाल है

कहीं किसी के बाग़ को उजाड़कर 
खिला तुम्हारा फूल है कमाल है

तुम्हे हवा लगी तपाक उड़ पड़े 
मिजाज तेरा धूल है कमाल है

करोगे सौ दफा तमाम गलतियाँ
बताओगे कि रूल है कमाल है

Wednesday, 8 March 2023

बदल ही गया

*ग़ज़ल - बदल ही गया*
*कविराज तरुण*

_याद आती है कई रोज बेवफा तेरी_
_कई रातें मै गुमसुम गुज़ार देता हूँ_
_ये नकाब-ए-हुस्न तेरा और किसको लूटेगा_
_आज महफिल मे इसे मै उतार देता हूँ_
••••••••••••••••
एक वो दौर था तू मेरे रूबरू
एक वो दौर था तू मेरे रूबरू
रेत के जैसे पल वो फिसल ही गया
एक वो दौर था तू मेरे रूबरू
रेत के जैसे पल वो फिसल ही गया

तुमसे मिलने से पहले बड़ा ठीक था
तुमसे मिलने से पहले बड़ा ठीक था
तुम जो बदले तो मै भी बदल ही गया

एक वो दौर था तू मेरे रूबरू
रेत के जैसे पल वो फिसल ही गया

बोतलों मे भरी तेरी मक्कारियाँ
और हम पैग अपना बनाते रहे
बात उल्फत की महफिल मे चलने लगी
जाम पे जाम खुद को पिलाते रहे (2)

पीते पीते कदम लड़खड़ाये मगर
पीते पीते कदम लड़खड़ाये मगर
था सँभलना मुझे मै सँभल ही गया

तुमसे मिलने से पहले बड़ा ठीक था
तुम जो बदले तो मै भी बदल ही गया

एक वो दौर था तू मेरे रूबरू
रेत के जैसे पल वो फिसल ही गया

रूह तुमसे जुड़ी तो जुड़ी रह गयी
दूसरा कोई दिल मे समाया नही
तुमने बस्ती बसाई पता है हमें
हमने खुद को कहीं भी बसाया नही (2)

लोग आये मगर वो चले भी गए
लोग आये मगर वो चले भी गए
वक़्त रहमोंसितम का निकल ही गया

तुमसे मिलने से पहले बड़ा ठीक था
तुम जो बदले तो मै भी बदल ही गया

एक वो दौर था तू मेरे रूबरू
रेत के जैसे पल वो फिसल ही गया

Tuesday, 7 March 2023

रंग का त्योहार होली

रंग, जो चमन के मुस्कुराते फूल में होते हैं 
रंग, जो हवा के हर मूल में होते हैं 
रंग, जो जड़ो में चेतन में धूल में होते हैं 
रंग, जो चुभते किसी शूल में होते हैं 
// उन रंगों की कहानी है भोली ...
आखिर रंग का त्योहार है होली //

रंग, जो कहे वतन के खून की कहानी 
रंग, जो हमें बताये बात कोई पुरानी 
रंग, जो अंतर कहे कि खून या पानी 
रंग, जो सादगी की पहचान हैं निशानी 
// उन रंगों की कहानी है भोली ...
आखिर रंग का त्योहार है होली //

रंग, जो उजड़ते चमन को महका दे 
रंग, जो खिलें और खिल के सबको बहका दे 
रंग, जो जल के भीतर भी ज्वाल दहका दे 
रंग, जो अंध में भी ज्योति दिखला दे 
// उन रंगों की कहानी है भोली ...
आखिर रंग का त्योहार है होली //

रंग, जो लाये सुन्दरता में नया निखार 
रंग, जो दूर कर दे मुख से दाग या विकार 
रंग, जो याद दिलाये विजय का सार 
रंग, जो मधुमास में ले आए नवबहार 

// उन रंगों की कहानी है भोली ...
आखिर रंग का त्योहार है होली //

रंग, जो हमारी पहचान हैं निशानी 
रंग, जो मिलकर बनाए रंग नूरानी
रंग, जिसकी चाह में है दुनिया दीवानी
रंग, जो कहता नही है बात जुबानी
// उन रंगों की कहानी है भोली ...
आखिर रंग का त्योहार है होली //

Tuesday, 21 February 2023

भूल जाने के लिए है

ये मोहब्बत और वादा भूल जाने के लिए है
दिल का क्या है इक दफा तो आजमाने के लिए है

रूह तो शामिल नही है जिस्म की ही बात है अब
शादियों का नाम तो रस्में निभाने के लिए है

मै ठहर कर देखता हूं और आगे चल पड़ूं मै
उसकी गलियां रासतो का शक मिटाने के लिए है

उम्र आधी गफलतों में और आधी उम्र मेरी
इश्क कर देगा निकम्मा ये बताने के लिए है

देख लेगा वो हकीकत हो सके तो साफ कह दो
इस जहां को छोड़कर दुनिया दिखाने के लिए है

Thursday, 16 February 2023

तू मेरे साथ नही

ये दुख अजीब है के तू मेरे साथ नही
कैसा नसीब है के तू मेरे साथ नही

मुमकिन नही था पर वो इंसान आज मेरे
बेहद करीब है के तू मेरे साथ नही

ये मर्ज ला-इलाज है क्या इलाज करूं
कहता तबीब है के तू मेरे साथ नही

कल तक हमारे प्यार के जो खिलाफ रहा
वो अब हबीब है के तू मेरे साथ नही

लिक्खा है जिसने प्यार को प्यार के बिना
किस्मत अदीब है के तू मेरे साथ नही

Tuesday, 14 February 2023

बसर वो रोज करते हैं

हमारे ख्वाब में आकर बसर वो रोज करते हैं
रहें ये ज़ख्म भी ताजा कसर वो रोज करते हैं

तअल्लुक कुछ नही होता है मांझी का मुसाफिर से
मगर फिर भी न जाने क्यों सफर वो रोज करते हैं

बड़ा आसान था उनका ये कहना अलविदा तुमको
मगर फिर खुशनसीबी की खबर वो रोज करते हैं

यहां डूबे रहे शब में अंधेरों से हुई यारी
वहां उजली हुई दिलकश सहर वो रोज करते हैं

गवाही दिल नही देता उधर नजरें इनायत हों
किसी के नाम का सजदा जिधर वो रोज करते हैं

डर लगता है

बस इसी बात से मुझे डर लगता है
एक शख़्स ही सारा शहर लगता है

मोहब्बत एक दो दिन की बात नही
उम्र भर का इसमें सफर लगता है

उड़ने का काम परिंदो पे छोड़ दो
यूं तो हर काम में हुनर लगता है

दिल में जगह रखना तो काफी नही
घर बसाने के लिए भी घर लगता है

यही कश्मकश है यही दर्द-ए-पैहम
अपना नही है वो अपना मगर लगता है

Tuesday, 7 February 2023

नजर भर देख लूं

देखकर नजरें उतारूं या नजर भर देख लूं
सोचता हूं आंख में तेरी उतरकर देख लूं

आसमां के चांद को है देखने का क्या सबब
इससे बेहतर चांद अपना मै जमीं पर देख लूं

एक मुद्दत बाद तुम आए हो मेरे सामने
अब जरूरी है तेरी खातिर कहीं घर देख लूं

दिल बहलता ही नही अब बारिशों में भींगकर
हुस्न तेरी मौज के भीतर समंदर देख लूं

इश्क तेरी राह में कितने मुसाफिर खो गए
इकदफा इस रहगुजर से मै गुजर कर देख लूं

Sunday, 5 February 2023

नंबर भी बदलता है

वो बाहर भी बदलता है वो अंदर भी बदलता है
वो जब खुद को बदलता है तो नंबर भी बदलता है

चले जिसके किनारे साथ दोनो हाथ हाथों में
बदलने को जो आए तो समंदर भी बदलता है

उसे मै खोजने की क्यों करूं कोशिश बताओ तुम
सितारे चांद बादल और अंबर भी बदलता है

पकड़ पाना नही मुमकिन निगाहों से हुए घायल
वो झपके जब पलक अपनी तो खंजर भी बदलता है

किसी दिन तुम खड़े होगे वहीं पर हैं जहां पर हम
सुना है वक्त बदले तो ये मंजर भी बदलता है

Sunday, 29 January 2023

मुझे वापस बुलाती है

कभी तेरी गली मुझको बड़ा आवाज देती है
कभी तेरी वो फुलवारी मुझे वापस बुलाती है

बमुश्किल से तुझे जाना कभी मै भूल पाता हूं
मगर जब भूल जाता हूं तो तेरी याद आती है

कई मौसम यहां बदले मगर ये बात ना सुलझी
ये बारिश घर मे आकर के मुझे ही क्यों भिगाती है

वो आँखें मर मिटा जिनपर कोई ख्वाबों का शहजादा
उन्हीं आंखों के दरिया में ये कश्ती डूब जाती है

मुझे बिल्कुल नही मतलब तू कैसी है कहां है तू
हवा फिर भी ये जाने क्यों खबर तेरी बताती है

Saturday, 28 January 2023

आग लगा दी

पुरानी बातें हैं वो इश्क मोहब्बत वाली
लड़का था पागल लड़की भोली भाली

एक दूसरे में उनकी जान बसा करती थी
जैसे फूलों की बगिया बगिया का माली

उनके बारे में लोग उड़ाते थे अफवाह
हर एक की नजर थी उन पर सवाली

दुनिया को उनसे दिक्कत थी इतनी
के हर कोई देता था उनको ही गाली

जमाना था दुश्मन घरवाले रुसवा
फिर क्या था दोनों ने आग लगा ली

आओ फिर से

इकबार तुम पागल बनाने आओ फिर से
दिल जान नींदों को चुराने आओ फिर से

जो तयशुदा है वो हमेशा साथ होगा
पर ये लकीरें आजमाने आओ फिर से

हूं अब नही वैसा जिसे तुम जानती हो
ये मोम जैसा दिल जलाने आओ फिर से

क्यों तोड़कर कसमें वफा की तुम गए थे
ये बात मुझको तुम बताने आओ फिर से

मै हूं अभी जिंदा तुम्हे मालूम होगा
जो हो सके मुझको मिटाने आओ फिर से

Sunday, 22 January 2023

जो भी है वो तुमसे है

इश्क मुहब्बत धोखा नफरत जो भी है वो तुमसे है
हसरत वसरत आदत वादत जो भी है वो तुमसे है

मुझको जो भी सबक मिला वो बोलो कैसे भूलूं मै
दहशत वहशत शिकवा शिद्दत जो भी है वो तुमसे है

आंख समंदर तेरी थी सो उसके अंदर डूब गया
डूबे इस दिल की अब हरकत जो भी है वो तुमसे है

कहते थे सब यार मुझे तुम कहां पड़े हो चक्कर में
पर मै कहता मेरी कुर्बत जो भी है वो तुमसे है

अब तुम वापस आकर भी कुछ ठीक नही कर सकती हो
सच तो ये है मेरी हालत जो भी है वो तुमसे है

Saturday, 21 January 2023

अच्छा कैसे लग सकता है

मुझको तेरा चुप हो जाना अच्छा कैसे लग सकता है
तुमको खोकर सबकुछ पाना अच्छा कैसे लग सकता है

जिन गलियों से खुशबू तेरी डोली सजकर निकल गई हो
उन गलियों में आना जाना अच्छा कैसे लग सकता है

अंत जहां पर खुशियों का हो इश्क जहां पर शर्मिंदा हो
दर्द भरा फिर वो अफसाना अच्छा कैसे लग सकता है

जिसने तेरी दहलीजों पे दिल की जन्नत देखी अबतक
उस पागल को पागलखाना अच्छा कैसे लग सकता है

तुम ही मुझको समझाती थी इश्क वफा की मीठी बातें
अब उल्टा तुमको समझाना अच्छा कैसे लग सकता है

Thursday, 19 January 2023

हो जायेगा

धीरे धीरे हाथ मिलाना हो जायेगा
उसके घर फिर आना जाना हो जायेगा

रफ्ता रफ्ता बात चलेगी इश्क वफा की
दिल ही दिल में एक ठिकाना हो जायेगा

कुछ दिन तुमको भायेंगे फिर चांद सितारे
आगे चलकर चांद पुराना हो जायेगा

फिर छोटी छोटी बातों पर होगी अनबन
चुपके चुपके अश्क बहाना हो जायेगा

तब दूरी बढ़ जायेगी यूं मीलों लंबी
इश्क मुहब्बत प्यार फसाना हो जायेगा

Wednesday, 18 January 2023

ऐसा भी क्या

तुमने जाने उसमे देखा ऐसा भी क्या
खुद भी उलझे दिल भी उलझा ऐसा भी क्या

रोते रोते हँस देते हो पागल लड़के
खोजा तुमने खूब तरीका ऐसा भी क्या

कांटों की हसरत है खुशबू से भर जाएं
फूलों की फितरत है धोखा ऐसा भी क्या

पानी के अंदर ही डूबा आज समंदर
बारिश की बूंदों में भीगा ऐसा भी क्या

लाख वफा की कसमें तुमने खुद तोड़ी हैं
फिर भी हमसे इतना शिकवा ऐसा भी क्या

Monday, 16 January 2023

शायरी

धीरे धीरे सबकुछ सहना सीख गया हूं
तन्हा तन्हा घर पे रहना सीख गया हूं
तुमने तो कुछ कहने लायक कब छोड़ा था
अपना गम मै खुद से कहना सीख गया हूं

सही नही है मगर गलत भी लगा नही वो
कहीं नही है मगर अभी तक जुदा नही वो
अभी तो खुशबू भरी हुई है बदन मे मेरे
गया है लेकिन लगे यही के गया नही वो

इन रस्तों को मंजिल कहके कितने दिन इतराओगे
मै अपने रस्ते जाऊंगा तुम अपने रस्ते जाओगे
आते जाते मिलना तो फिर नज़रे तिरछी कर लेना
उलझे अबकी नजरो मे तो फिर वापस ना आओगे

Saturday, 14 January 2023

बन संवर के आए हैं

उसके शहर में कुछ दिन ठहर के आए हैं
गौर से देखो हम बन- संवर के आए हैं

अब तो दरिया से ये प्यास बुझेगी नही
हम समंदर के अंदर उतर के आए हैं

उन लोगों से पूछो उसे पाने का मतलब
जो बस उसके लिए आह भर के आए हैं

जिंदगी एक गश्त है और हम हैं मुसाफिर
बस यही सोचकर हम गश्त कर के आए हैं

इतना आसान नही है इश्क का ये सफर
हम आग के दरिया से गुजर के आए हैं

Wednesday, 11 January 2023

क्या क्या बताया जाए

क्या क्या बताया जाए क्या क्या छुपाया जाए
राज़ इतने हैं किस किस को दबाया जाए

मेरे चाहने वाले मुझको हिदायत यही देते हैं
तू गुजरे जिधर से उधर से न जाया जाए

मुकम्मल हो जायेगी यूंही तेरे प्यार की कहानी
क्यों टाइटैनिक की तरहा तुझको  डुबाया जाए

दोस्ती करने का तरीका तो बेहद आसान है
नज़रे मिल जाएं तो हाथों को मिलाया जाए

महफिल में भले रौशन हों चांद तारे और जुगनू
रौशनी तो तब है जब तुझको बुलाया जाए

Monday, 9 January 2023

गजल क्या क्या हुआ है

मत पूछो मेरे साथ क्या क्या हुआ है
दिल किसी बात से बहला हुआ है

चांद की आंखों में उदासी किसलिए
फिर किसी के प्यार का सौदा हुआ है

जिंदगी एक किताब है मालूम है हमें
क्या हुआ जो हर पन्ना बिखरा हुआ है

लिख देंगे तुम्हे हम शायरी में कभी
अभी दिल कहीं पे उलझा हुआ है

ये प्यार इश्क उल्फत मोहब्बत
यही बोलकर तो हमला हुआ है

Sunday, 8 January 2023

गजल - न थे न होंगे

वो हम पे महरबान न थे न होंगे
पर हम भी बेजुबान न थे न होंगे

उनसे रहम की गुजारिश भी क्या
जो बेहतर इंसान न थे न होंगे

बिन बुलाए आयेंगे हमारे करीब
वो घर के महमान न थे न होंगे

आसमां को जमीं पर खींच लायेंगे
ऐसे तो अरमान न थे न होंगे

क्या दिल में है क्या जुबान पर
हम इतने अनजान न थे न होंगे

Wednesday, 4 January 2023

गजल - जाने दो

वो जा रहा है तो उसे इस बार जाने दो
अब है किसी वो दूसरे का प्यार जाने दो

है फायदा कुछ भी नही क्यों गमजदा हो तुम
इन आंसुओं को यूं नही बेकार जाने दो

अब जो लिखा है किस्मतों में मान लो उसको
फिर क्या हुआ वो कर रहा इनकार जाने दो

रिश्ते बचाकर कुछ न होगा ये समझ लो तुम
जब दो दिलों में खिंच गई दीवार जाने दो

मै ही नही तुम ही नही सब है उसी रब का
फिर सोचना क्या जा रहा जो यार जाने दो

Sunday, 1 January 2023

मन की बात

अपने मन की बात बताकर जोड़ा हमसे नाता है
जैसे आप समझाते हो कोई नही समझाता है

राष्ट्र कहां तक पहुंचा है हमलोग कहां तक जायेंगे
किन बातों के द्वारा हम सब देश का मान बढ़ाएंगे
सोच हमें क्या रखनी होगी कर्तव्य हमारे क्या क्या हैं
काम कौन से ऐसे हैं जिससे देश को फायदा है

इन बातों का ताना बाना कोई नही बतलाता है
जैसे आप समझाते हो कोई नही समझाता है

वो क्षेत्र कौनसे ऐसे हैं जिनमें ज्यादा अवसर हैं
आवास योजना के अंतर्गत बने अभी कितने घर हैं
स्वच्छ देश का सपना अबतक पहुँचा है किस पटरी पर
विज्ञान के द्वारा सपनों की बुनी गई कितनी चादर

ढेरों ऐसी बातों से ये मन ज्ञानी हो जाता है
जैसे आप समझाते हो कोई नही समझाता है

आगे क्या क्या संकट हैं किन लोगों से लड़ना होगा
क्या क्या हमने नही किया क्या क्या हमको करना होगा
किन बातों को ध्यान में रखना हमको अभी जरूरी है
विश्वगुरु की राह में हमको चलनी कितनी दूरी है

आप के द्वारा ही हमको संकल्प पता चल पाता है
जैसे आप समझाते हो कोई नही समझाता है

और यार क्या

चल रहे तो है ये सफर , और यार क्या
पांव से तू नाप डगर , और यार क्या

जिंदगी क्या चाहती है और क्या नही
किसको पता किसको खबर , और यार क्या

दिल के तार जोड़कर दूर तक चलो
रह न जाए कोई कसर , और यार क्या

शाम को तू बैठ कभी इतमिनान से
ढल रही है तेरी उमर , और यार क्या

वक्त और साल तो ये बीत जायेगा
छोड़ देगा अपना असर , और यार क्या

जिंदगी की जंग सदा जीत लेंगे हम
है दोस्तों का साथ अगर , और यार क्या

Saturday, 17 December 2022

जमीं पे उतर के आओ

बड़े घरों में ओ रहने वाले, ज़रा सा रहमोकरम दिखाओ
बहुत दिनों तक रहे फलक पे, कभी जमीं पर उतर के आओ
तुम्हे मुहब्बत के इस सफर में, तमाम राहें दिखाई देंगी
के एक दरिया तुम्हे मिलेगा, है पार जाना तो डूब जाओ
कभी समंदर हुई थी आँखें, कभी बहारे चमन हुआ था
कहूं भला क्या मै आज तुमसे, कोई कहानी तुम्ही सुनाओ
तुम्हे मुबारक है शाम शबनम, गुले बहारा तुम्हे मुबारक
हमारे हिस्से में रात काली, ये चांद थाली चलो छुपाओ
जो साथ आये वो दूर हैं अब, यही तो उल्फत मे हो रहा है
बदल सको जो रिवाज़-ए-उल्फत, हमारी महफिल मे पेश आओ

कविराज तरुण

Sunday, 27 November 2022

निकल रहा है

कहीं पे जुगनू टहल रहा है
कहीं पे सूरज निकल रहा है

इसी गुमां में बढ़े कदम ये
ज़माना पीछे ही चल रहा है

हटा रहे क्यों ये धूल जाला
इसी से दिल ये बहल रहा है

तुम्हे लगेगा तुम्ही शहंशा
तुम्ही से हर कोई जल रहा है

मगर पता क्या किसे हक़ीक़त 
के ऊंट करवट बदल रहा है

कविराज तरुण

Saturday, 26 November 2022

आने वाला कल होगा

माना थोड़ा वक्त लगेगा पर संकट का हल होगा
आज नही है तेरा तो क्या आने वाला कल होगा

रात में जुगनू चांद सितारे माना कि इतराते हैं
भोर उदय जब होता सूरज ये सारे छुप जाते हैं
पर्वत को सन्नाटे में ही बरबस रहना पड़ता है
आंधी धूप थपेड़ों को भी डटकर सहना पड़ता है

तू जितना सह जायेगा तू उतना और प्रबल होगा
आज नही है तेरा तो क्या आने वाला कल होगा

चींटी इक इक दाना लेकर मीलों लंबा चलती है
हर कठिनाई से लड़कर वो जीवनयापन करती है
पतझड़ में पेड़ों की डाली बिन पाती रह जाती है
पर मौसम आने पर वो ही फूलों से भर जाती है

सही समय आने पर तेरा हर इक काम सफल होगा
आज नही है तेरा तो क्या आने वाला कल होगा

कर्म सिवा कुछ हाथ नही तब चिंता का मोल भला क्या
सत्य नही धारण जिसमे उस व्यक्ति का बोल भला क्या
तुझे पता है तेरी ताकत मात्र यही आवश्यक है 
जीवनपथ पर दौड़ अनवरत सोच यही तू धावक है

जैसी तेरी करन होगी वैसा आगे फल होगा
आज नही है तेरा तो क्या आने वाला कल होगा

Wednesday, 2 November 2022

गजल - हो जायेगा

दो शब्द मीठे बोलने से क्या बुरा हो जायेगा
पर दो दिलों के दरमियां कम फासला हो जायेगा

क्यों नफरतों का बीज फैला है जहां में हरतरफ
ये बीज आगे पेड़ बनकर फिर खड़ा हो जायेगा

ये आग वाला खेल माना दे रहा है मौज भी
पर एकदिन इस आग से ही हादसा हो जायेगा

इस प्यार में जो शक्ति है वो है नही अलगाव में
हां देखिए इस शक्ति से कितना भला हो जायेगा

है कौन किसका सोचने की क्या जरूरत है 'तरुण'
जो ना हुआ अबतक किसी का वो तेरा हो जायेगा

Wednesday, 12 October 2022

नही कोई

तेरे दर पे मेरा है बसर नही कोई
चल रहे हैं मगर है सफर नही कोई

लोग बेजान से मुर्दों की तरह जीते हैं
ये शहर है अगर तो शहर नही कोई

दाग़ हर रोज चहरे पे मेरे लगते हैं
ताब -ए -रुखसार पर है असर नही कोई

खार को गुल कहो ये भी क्या तमाशा है
हमको मालूम है ये शजर नही कोई

वो जिसे अपना कह करके मुस्कुराते हो
इल्म है , है कोई , है मगर नही कोई

Tuesday, 11 October 2022

होता है

चोट का बस निशान होता है
दर्द तो बेजुबान होता है
कौन कितना करीब है तेरे
वक्त पे इम्तिहान होता है

Wednesday, 14 September 2022

दोहावली 1-10

-//१//-
जीवन है उपहार ये , रखो अपना ध्यान
धरती पर अवतार को , तरसे हैं भगवान

-//२//-
जिसकी जैसी भावना , उसका वैसा रूप
कोई लागे छांव सा , कोई लागे धूप

-//३//-

जितनी होंगी मुश्किलें , उतना होगा काम
बाधाओं से जीतकर , आते हैं परिणाम

-//४//-

बाहर किसको दूंढता , अंदर हैं जब प्रान
दूजे को क्या देखना , अपने को पहचान

-//५//-

छोटी छोटी बात को , मत देना तुम तूल
अच्छी बातें छोड़कर , जाओ सबकुछ भूल

-//६//-

काम का ही मान है , काम का ही मोल
बाकी सब बकवास है , चाहे जितना बोल

-//७//-

बेमतलब की बात पर, करो नही अलगाव
छोटी सी इक चोट भी, बन जाती है घाव

-//८//-

राखो अपने आप को, सोने सा तुम साफ
जो बुरा तुमको कहे, कर दो उसको माफ

-//९//-

अपना मन यों साफ हो, नही किसी से बैर
ना कोई है आपका, ना ही कोई गैर

-//१०//-

मन की अपने कीजिए , कैसा है संकोच
अपनी हर इक चोट है , अपनी है हर मोच

हिंदी भाषा

हिंदी भाषा शक्ति है , हिंदी है अभिमान
हिंदी हरदम बोलिए , काहे का व्यवधान
हिंदी से ही हिंद है , हिंदी है गतिमान
हिंदी भाषा जोड़ती , सारा हिन्दुस्तान

Saturday, 10 September 2022

कविता - दो पैसे लाने का चक्कर

कविता - दो पैसे लाने का चक्कर

अपनी मर्जी से कब कोई, दूर शहर को जाता है
दो पैसे लाने का चक्कर , चक्कर खूब लगाता है
जब पिज्जा खाने की हसरत, मजबूरी बन जाती है
तब मां के हाथों की रोटी, उसको बड़ा सताती है
सोच सोचकर घर का खाना, भूखे ही सो जाता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

सपनों का मोहक आकर्षण, बातें चांद सितारों की
बेमानी हो जाती है जब, टोली अपने यारों की
सुध बुध खोने वाली चाहत, नेहप्रिया की बाहों में
धीरे धीरे थक जाती है, शामें ढलकर राहों में
तब उसको मखमल का बिस्तर, नींद कहां दे पाता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

रिश्तों की गर्माहट से जब, गंध जलन की आती है
सहकर्मी की मेल भावना, प्रायोजित रह जाती है
जब मीठी बातों का बादल, सच्चाई से टकराये
टूटा मन तब बारिश बनकर, इन आंखों में भर जाये 
झूठ कपट का मारा सावन, रोता ही रह जाता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

जब बूढ़ी मां, आ जाओ तुम, कह कह के थक जाती है
दीवारों की पपड़ी झड़कर, उम्र उसे बतलाती है
जब वो बूढ़ा बाप डपटकर, चुप होने को कहता है
बेटे की ना फिक्र करो तुम, वो लंदन में रहता है
फिर अपने कमरे में जाकर, वो आंसू पी जाता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

ढ़ेरों रुपया होने पर भी, खर्च नही कर पाते हैं
छुट्टी के दिन घर में बैठे, बैठे ही रह जाते हैं
मां से क्या ही बात करें वो, भावुक इतना होती है
'अच्छा' सुनकर रोती है वो, 'गड़बड़' सुनकर रोती है
जाने इतना प्यार कहां से, इस बेटे पर आता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

कविराज तरुण
7007789629

Monday, 18 July 2022

ये दिल हसरतों के सिवा और क्या है

ये दिल हसरतों के सिवा और क्या है
लुटा और क्या है बचा और क्या है
नही और कोई दुआ काम आये
तूही बता दे दवा और क्या है 

Monday, 27 June 2022

युद्ध जब तांडव कराता

चित्र आधारित कविता - युद्ध जब तांडव रचाता 

युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता
रक्त के बीजाणु लेकर, नेत्र से क्रन्दन कराता

है अहम् के नाम पर जब, युद्ध तो फिर अंत क्या है
न्याय की सत्ता पुकारे, विश्व तेरा पंथ क्या है
त्रस्त हैं सबलोग इससे, युद्ध ये किसको सुहाता
युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता

हे! नये जग के पुरोधा, शक्ति अपनी थाम लो तुम
हो रही धरती अकिंचन, धैर्य से अब काम लो तुम
क्षेत्र के विस्तार में क्यों, तू रचे संहार गाथा
युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता

मर रहें लाखों सिपाही, मर रहें सब आमजन हैं
ये मनुजता के मरण का, काल शर्पित आगमन है
मन व्यथित हो सोचता है, काश! कोई रोक पाता
युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता

चोट की चादर लपेटे, लोग कितना रो रहे हैं
मृत्यु तेरा भय समेटे, सब तमस में खो रहे हैं
मान जा दमराज किलविश, क्यों प्रलय को यूँ बुलाता
युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता

तरुण कुमार सिंह
प्रबंधक
यूको बैंक, लखनऊ 
कर्मचारी संख्या - 57228

Friday, 3 June 2022

ग़ज़ल कहाँ से रास्ता होगा

मुझे मालूम है दिल का कहाँ से रास्ता होगा
ज़रा नज़रेँ मिला लो तुम वहीँ से दाखिला होगा

अगर तुम हो सके तो देख लो फिर आज सीने मे
तिरा ही नाम इसके हरतरफ सच में लिखा होगा

ये दुनिया प्यार की दुश्मन इसे दिल से नही मतलब
लगेगा जब सही सबकुछ तभी कुछ अटपटा होगा

कहानी हीर राँझा की सबक देती यही हमको
के सच्चा प्यार होगा तो हमेशा फलसफा होगा

किसी के लाख कहने पर रुका कब है 'तरुण' आशिक
ये दुनिया जबतलक होगी मुहब्बत का सिला होगा

Friday, 8 April 2022

होता है

22   22   22   22   22   2

दिल का लगना बेहद मुश्किल होता है
किस्मत से ही मौका हासिल होता है

जितनी भी कोशिश करके तुम पिघला लो
पत्थर दिल तो बस पत्थर दिल होता है

फिरते हैं आवारा सड़कों पर आशिक
ये किस्सा हर महफिल महफिल होता है

उससे कह पाता तो कबका कह देता
दिक्कत है हर आशिक बुझदिल होता है

जिसको अपने राज़ बताकर रखते हैं
अक्सर वो ही अपना कातिल होता है

कविराज तरुण

Sunday, 13 March 2022

गजल - संवर जाए मेरी

तुमको पा लें तो ये उम्र गुजर जाए मेरी
दिन संभल जाए ये रात संवर जाए मेरी

अपने होंठों पे तराजू लिए फिरता हूं
बात निकले तो तेरे दिल में उतर जाए मेरी

वो जो रौशन है जिसे लोग चांद कहते हैं
तेरे होते हुए क्यों उस पे नजर जाए मेरी

इसी फिराक में राहों पे तेरी बैठा हूं
तू जो देखे तो तबियत सुधर जाए मेरी

और ये इंस्टा एफबी के होने का तभी मतलब है
के जब प्रोफाइल तेरी फोटो से भर जाए मेरी

कविराज तरुण

Friday, 4 March 2022

आत्मचिंतन

घोर तिमिर जो छाया है तुम उसका तो संहार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

अभी समय है कर्मयुद्ध का अभी समय है तपने का
अभी समय है पूर्ण करो तुम हर इक हिस्सा सपने का
मिले कष्ट जो तुम्हे राह में तुम उनको स्वीकार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

किसे पता है कल क्या होगा वर्तमान है साथ अभी
तुझे कोशिशों से भरना है अपना खाली हाथ अभी
समय की रेखा पर चलकर तुम सारी बाधा पार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

घोर अंधेरा तो आयेगा डरने की है बात नही
सूर्य उदय तो होगा फिर से रही हमेशा रात नही
अपने मन की किरणों से तुम थोड़ा सा उजियार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

जीत सदा ही मिले सत्य को झूठ सदा ही हारा है
निर्भय जीवन जीने का बस मात्र यही इक चारा है
इसी सत्य को जीवन का तुम अब अपने आधार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

Thursday, 30 December 2021

ग़ज़ल - ठीक है

हरकतें भी ठीक हैं और ये नज़र भी ठीक है
इक दफ़ा हो घूमना तो ये शहर भी ठीक है

सुब्ह-शामों पर लिखी नज़्में मुबारक हो तुम्हें
हम मिजाजी हैं ज़रा तो दोपहर भी ठीक है

तल्ख़ काँटों से भरी है ये डगर तो क्या हुआ
साथ है तेरी दुआ तो ये सफर भी ठीक है

वो पुरानी तख्तियों पर दिल बने हैं आज भी
वो पुरानी चिट्ठियों का डाकघर भी ठीक है

इश्क़ तेरी चाह में भटका रहा मै उम्रभर
दरबदर मै ठीक हूँ वो बे-खबर भी ठीक है

इक दफ़ा हो घूमना तो ये शहर भी ठीक है

Wednesday, 18 August 2021

थोड़ी थोड़ी गलती है

मेरी है या तेरी है या किसकी है
हर हिस्से की थोड़ी थोड़ी गलती है

आँखों में सैलाब छुपाकर क्या होगा
रो लेने दो दिल की जबतक मर्जी है

हर कोई तेरे जैसा हो बात गलत
सबकी अपनी रागें अपनी ढपली है

जो जैसा हो उसको वैसा ही मानो
दुनिया अपने ढर्रे पर ही चलती है

उम्मीदों का भार 'तरुण' जब ज्यादा हो
कुछ हटकर करने की जिद तब अच्छी है

Sunday, 18 July 2021

याद आओगे बहुत

जिंदगी का फलसफा दोहराने से पहले
याद आओगे बहुत याद आने से पहले

ये गलियां ये सड़कें बुलाएंगी तुमको
देख लेना इन्हें भूल जाने से पहले

दिल का क्या है कहीं न कहीं तो लगेगा
याद रखना हमें दिल लगाने से पहले

मुस्कुराता हुआ एक चेहरा यहाँ है
सोच लेना यही मुस्कुराने से पहले

हाथ रखना जरूरी है सीने पे अपने
बातें यहाँ की सुनाने से पहले

Sunday, 4 July 2021

मंज़िल नही मिलती

कभी साहिल नही मिलता कभी मंजिल नही मिलती
मेरे ज़ख्मों को जाने क्यों दवा काबिल नही मिलती

कि उसका नाम लेता हूँ तो अपने रूठ जाते हैं
किसी पत्ते की तरहा रोज सपने टूट जाते हैं

इसी इक बात से हिम्मत जुटा लेता हूँ रातों में
अँधेरों के मुसाफिर को कहीं मुश्किल नही मिलती

ख़फ़ा है या रज़ा है वो मुझे कोई तो बतलाओ
अगर मुझसे तुम्हे मतलब तो फिर उसकी खबर लाओ

बिना उसके लिखूँ मै क्या कहूँ मै क्या करूँ मै क्या
मेरी ग़ज़लें हुईं तन्हा इन्हें महफ़िल नही मिलती

वफ़ा के नाम पर कितने सितम अब और सहने हैं
ज़रा कह दो समंदर से ये आँसूँ और बहने हैं

जहाँ पर कत्ल होता है 'मुहब्बत' का 'मुहब्बत' से
वहाँ किस्से तो मिलते हैं मगर क़ातिल नही मिलती

कविराज तरुण 'सक्षम'
साहित्य संगम संस्थान

Thursday, 1 July 2021

संशय

शीर्षक - संशय

संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है
अच्छा खासा व्यक्ति कदम आगे करने से घबराता है

जो भी काम मिले उसको ना कहने की आदत लगती है
सीधी सादी बात उसे तब हिय के भीतर तक चुभती है
लोगों के फिर मानचित्र वो अनायास ही बनवाता है
संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है

निराधार विषयों पर चिंतन कारण बनता है दुविधा का
मार्ग उसे मुश्किल लगता है फिर चाहे वो हो सुविधा का
आड़ी तिरछी रेखाओं में उलझा अपने को पाता है
संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है

चित्त व्यथित हो जाता उसका घोर निराशा छा जाती है
मन की पीड़ा उछल उछल कर अश्रु हृदय से बरसाती है
दूर अकेलेपन का कोहरा चित्र भयानक दर्शाता है
संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है

अच्छा होगा यदि हम केवल कर्मभाव को अपनायेंगे
चिंता शंका वहम छोड़कर मनोयोग से लग जायेंगे
कोशिश करने वाला ही तो अपनी मंजिल को पाता है
संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है

तरुण कुमार सिंह
प्रबंधक-विपणन विभाग
लखनऊ अंचल

Monday, 21 June 2021

कवि कौन ?

फिर वही प्रश्न कौन हूँ मै
शब्द मूर्छित हैं मौन हूँ मै

कवि को समझने से पहले कविता को समझना बेहद जरूरी है । हम अक्सर शब्दों के फेरों में लिपटी खूबसूरत कविता को देखते हैं , पढ़ते हैं और आगे बढ़ जाते हैं । पर वह कविता कैसी है इससे कहीं ज्यादा ये प्रश्न गंभीर है कि वह कविता क्यों लिखी गई है । हम-आप सब लोग ये जानते हैं कि भावों का लयबद्ध सम्प्रेषण ही कविता है , परंतु कविता इससे कहीं ज्यादा गहरी होती है । कवि ने किन परिस्थितियों में कविता लिखी, उसे आखिर क्या जरूरत पड़ी अपनी भावनाओं को शब्दों में गढ़ने की, उसने क्या कहा और वो कहना क्या चाह रहा था । इन्ही सब बातों में तो कविता का सच छुपा है और कवि का भी । मै नही मानता कि कवि या कविता की तुलना उसकी लय , गति अथवा शिल्प के आधार पर होनी चाहिए , अपितु उसमे निहित भाव ठीक उसी प्रकार दिखे जैसा कवि दिखाना चाहता है तो कविता सफल है ।

हर कहानी में कविता हो न हो पर हर कविता में एक कहानी होती है । बस वही कहानी अपनी कविता में दर्शाना कवि का धर्म है । कवि कभी भी बंधनों में बँधा नही हो सकता । मुक्त भाव ही कवि का सबसे कारगर साधन है । प्रशंसा मनोबल के लिए आवश्यक है परंतु कवि तो वही है जो इन सबसे मुक्त हो । 'कवि कौन' ये प्रश्न कठिन भी है और आसान भी । प्रकृति को देखेंगे तो पशु, पक्षी, पेड़, वायु , अम्बर, बादल सब कवि लगेंगे क्योंकि ये मुक्त होकर अपना भाव प्रकट करते हैं । मनुष्य में कवि को खोजना कठिन है क्योंकि हम जो हैं वो स्वीकारते नही, जैसा होना चाहते हैं वैसा प्रयास करते नही और जो हो सकते हैं वो हो नही पाते । अपने आप को पहचानना ही कवि होना है , अपने अंदर झाँकना ही कविता है ।

एक कहानी सुनाता हूँ - एक व्यवसायी था जिसने वर्षों तक अथक परिश्रम करके अच्छी संपत्ति बना ली। सोते-जागते उसे अपने व्यवसाय की ही धुन सवार रहती। अपने व्यस्त जीवन में उसने महसूस किया कि उसे कढ़वेपन की बीमारी लग गई है। उसे कोई भी मीठी चीज फीकी या कढ़वी लगती । डॉक्टर को दिखाया, वैद्य, हकीम सभी के चक्कर लगा लिए फ़िरभी कोई फर्क नही पड़ा। विज्ञान समाधान खोजने में असमर्थ दिखा। बहुत परेशान होकर उसने एक आश्रम में शरण ली, वहां बैठे गुरूजी से अपना दुखड़ा कहा। वो कहते-कहते रो पड़ा कि बिना मिठास के जीवन का फायदा ही क्या है? गुरूजी हँस पड़े और कहा कि सब सही हो सकता है पर उसके लिए कुछ कठिन कार्य करने होंगे। वह झटपट सब कार्य के लिए तैयार हो गया।

सुबह हवन के लिए लकड़ी काटकर लाना, आश्रम में आये लोगों के लिए भोजन बनाना, आश्रम की सफाई करना और भोजन के नाम पर दिनभर खाली पेट रहने के बाद रात्रि में करेले की सब्जी एक रोटी के साथ खाकर सो जाना। कई दिन बीत गए, उसने मीठेपन की कल्पना करना तक छोड़ दिया।

पर इस नियमावली से तंग आकर आखिरकार वो गुरूजी के पास गया और बोला - गुरुदेव कई दिन से ठीक से भोजन तक नही किया। करेले की सब्जी इतने दिन से खाते-खाते परेशान हो गया हूँ। पहले तो मीठी चीज ही फीकी लगती थी पर अब तो करेला भी फीका लगने लगा है। बिना स्वाद के क्या जिंदगी गुरुदेव?
गुरुदेव ने कहा अभी ये कार्य कुछ दिन और करो।
पर कबतक गुरुदेव? - झुंझलाकर वो बोल पड़ा
जबतक करेले की सब्जी मीठी न लगने लगे - इतना कहकर गुरुदेव मुस्कुरा दिए
उस रात उसने यही सोचकर करेले की सब्जी खाई कि उसे वह मीठी लगे और यकीन मानिये हुआ भी ऐसा ही। वो भागकर गुरुदेव के पास गया और बोला - गुरुदेव आज तो करेला भी मीठा लगने लगा
गुरुदेव हँसकर उसे देखे और फिर बिना कुछ कहे सोने चले गए

सुबह जब वह उठा तो वो समझ चुका था कि अपने स्वाद को पुर्नजीवित करना उसी के हाथ में था पर वो अनायास ही दवाओं और डॉक्टरों की शरण में चला गया। उसने अपने दिनचर्या की व्यस्तताओं और अनिश्चिताओं में उलझकर जीवन के साथ-साथ, जिह्वा के स्वाद को भी कढ़वा कर लिया था। उसने खाने की मिठास को ही नजरअंदाज करना शुरू कर दिया था और शिकायतों के मकड़जाल में खुद को ही बीमार समझ लिया था परन्तु अब उसे सत्य की अनूभूति हो चुकी थी, संवेदना का परिचय हो चुका था, भावनाओं की महत्ता पता चल चुकी थी। उसे जीवन के हर स्वाद की उपयोगिता समझ आ चुकी थी। उसे यह पता चल चुका था कि हम जैसा महसूस करते हैं वैसे ही बन जाते हैं। अपने अंदर बसे जीव को पहचानना उसे आ चुका था, उसे यह पता चल चुका थे कि भावशून्य व्यक्ति स्वादहीन हो जाता है। अब वो भावप्रधान हो चुका था। उसे अपने अंदर की भावनाओं को पढ़ना और उसे प्रकट करना आ चुका था। वास्तव में अब स्वयं के लिए वो एक कवि बन चुका था।

कविराज तरुण

Friday, 18 June 2021

ग़ज़ल - तुम हो

मेरी जिंदगी की ग़ज़ल खास तुम हो
मेरी हर दुआ मेरी अरदास तुम हो

मै जब भी गुजरता हूँ तेरी गली से
मेरी धड़कनों की अहसास तुम हो

नही है किसी की मुझे अब जरूरत
ये दुनिया मेरी है अगर पास तुम हो

बनाया है तुमने बिगाड़ा है तुमने
मेरी इस कहानी का इतिहास तुम हो

समंदर तुम्ही हो ये दरिया तुम्ही हो
मेरी इन निगाहों की हर प्यास तुम हो

कविराज तरुण

Sunday, 6 June 2021

श्रीराम दिखाता सीने में

रघुनंदन की उस महिमा का गुणगान दिखाता सीने में
मै देवधरा के कण कण का अभिमान दिखाता सीने में

हाँ ! मुझमें अंश समाहित है उस मर्यादा पुरुषोत्तम का
हनुमान नही हूँ वर्ना मै भगवान दिखाता सीने में

भगवान दिखाता सीने में श्रीराम दिखाता सीने में

Friday, 28 May 2021

क्या मुझसे मिलने आओगी

मेरे अविनाशी मन का हर भाव तुम्हे जब प्रेषित हो
मेरे चित्तपटल पर तेरा नाम स्वयं आलेखित हो

तब तुम मिलने आओगी क्या मुझसे मिलने आओगी
तोड़ सभी ये बंधन तुम क्या मेरा साथ निभाओगी

अरुणांचल को छोड़ अरुण जब रूप चाँद का धर लेगा
दिन का उजियारा जब दीपक अपनी लौ में भर लेगा
जब अम्बर के तारे गिनते गिनते मै सो जाऊँगा
जब स्वप्नों की अमरबेल पर तुमको पास बुलाऊँगा

तब तुम मिलने आओगी क्या मुझसे मिलने आओगी
तोड़ सभी ये बंधन तुम क्या मेरा साथ निभाओगी

अधरालय की त्रिज्या से बात तुम्हारी की जायेगी
नयनों की हर कोन दिशा चित्र तुम्हारे दर्शायेगी
जब पुष्पों की गंध हृदय के भीतर आच्छादित होगी
ऋतुओं की जब भाव-भंगिमा तुमपर आधारित होगी

तब तुम मिलने आओगी क्या मुझसे मिलने आओगी
तोड़ सभी ये बंधन तुम क्या मेरा साथ निभाओगी

यदि मै सात वचन देने का वचन तुम्हारे नाम करूँ
अग्नि धरा जल जीवन अम्बर पवन तुम्हारे नाम करूँ
यदि मै नाम करूँ सब अपना जो भी मैंने पाया है
तुमसे कह दूँ तुम ही सच हो बाकी सब तो माया है

तब तुम मिलने आओगी क्या मुझसे मिलने आओगी
तोड़ सभी ये बंधन तुम क्या मेरा साथ निभाओगी

कविराज तरुण

Tuesday, 18 May 2021

ग़ज़ल - बू आ रही है

खतों से अजब आज बू आ रही है
कहीं कोई साजिश रची जा रही है

महकते थे जो वो दहकने लगे हैं
के हर लफ्ज़ साँसों को सुलगा रही है

न रंगों की बातें न फूलों की खुशबू
मुहब्बत नये ढंग अपना रही है

किनारे खड़ा कौन कबतक रहेगा
लहर तेज साहिल से टकरा रही है

बड़ी देर कर दी 'तरुण' आपने भी
ये दुनिया तो कबसे ही समझा रही है

कविराज तरुण

Friday, 14 May 2021

शायरी - खंडहर

विरासत में रख लेना ईमारत मेरी
एक उम्र लगी है इसे बनाने में
हर एक ईंट लहू से जोड़ी है
तब ये दीवार खड़ी ज़माने में

कविराज तरुण

Thursday, 13 May 2021

गुमान से निकला

अपने खुद के गुमान से निकला
तेरी महफ़िल मकान से निकला

मेरा जाना तो ऐसे जाना है
तीर जैसे कमान से निकला

था चराग़ों सा बंद कमरे में
आज मै आसमान से निकला

जब लिखा था अजाब सहना है
खामखाँ इम्तिहान से निकला

तू भी जिंदा है मै भी जिंदा हूँ
दर्द केवल जुबान से निकला

हीर राँझा फराद शीरी क्यों
तू नये खानदान से निकला

कविराज तरुण

Monday, 10 May 2021

नही मिलती

कभी साहिल नही मिलता कभी मंजिल नही मिलती
मेरे ज़ख्मों को जाने क्यों दवा काबिल नही मिलती
के उसका नाम लेता हूँ तो अपने रूठ जाते हैं
मेरी ग़ज़लें रहें तन्हा उन्हें महफ़िल नही मिलती

Saturday, 8 May 2021

ना बहलाओ तुम

उसके जैसा चहरा किसका अच्छा ये बतलाओ तुम
चाँद अगर तुम ला सकते हो तो धरती पर लाओ तुम

फूलों की खुशबू तो उसके आने से ही आती है
हाथों में गुलदस्ता देकर हमको ना बहलाओ तुम

मै पागल हूँ आशिक़ हूँ तो दर्द हमारे हिस्से है
चारा साजी कहकर दिल पर मरहम ना सहलाओ तुम

Monday, 3 May 2021

बचपन के दिन

बचपन के दिन बहुत याद आते हैं
चलो, हम फिर से वहीं लौट जाते हैं

एक मुद्दत से हँसना भूल गए हम
चलो, दो पल ठहरकर मुस्कुराते हैं

जो लोग इस दौड़ में पीछे छूट गए हैं
चलो, उन्हें मुड़कर आवाज़ लगाते हैं

हक़ीक़त का ये आईना कितना बुरा है
चलो, रेत पर नई तस्वीर बनाते हैं

दौलत शौहरत सियासत में उलझते रहे
चलो, नीम की छाँव तले वक्त बिताते हैं

हमें क्या मिला ? ये सवाल बेहद कठिन है
चलो, जो मिला उसी को आजमाते हैं

कविराज तरुण

Tuesday, 27 April 2021

ग़ज़ल - सवाल खो गया

जवाब दूंढते रहे सवाल खो गया
ये देखिये शहर का कैसा हाल हो गया

किसान इकतरफ लड़ाई लड़ रहे वहाँ
जहाँ कफन सँभालता वो लाल सो गया

लताड़ रोज लग रही है कोर्ट से मगर
चुनाव फिर भी हो रहा कमाल हो गया

वो आये और 'मन की बात' कह के चल दिये
ये पैंतरा तो फिर से इक मिसाल हो गया

दिखा सके जो सच 'तरुण' वो आइना कहाँ
ये मीडिया ही आजकल दलाल हो गया

कविराज तरुण

Monday, 26 April 2021

ग़ज़ल - आजकल

शहर की आजकल मेरे हवा खराब है
सुलग रही जमीं फलक ये माहताब है

अभी अभी खबर मिली कहीं गया कोई
अभी अभी दिलों का खौफ़ कामयाब है

जली हुई चिता की आग देख सामने
डरा हुआ सिमट रहा वो आफताब है

मिले अगर खुदा तो पूछ लूँगा मै उसे
तू जिंदगी का ले रहा ये क्या हिसाब है

सवाल जस का तस यही बना हुआ 'तरुण'
वो कौन बेरहम कुचल रहा गुलाब है

कविराज तरुण

Sunday, 25 April 2021

ग़ज़ल - कुछ नही होगा




आप अपनी हेल्थ की चिंता न ज्यादा कीजिये
ठीक हो जायेगा सबकुछ ये भरोसा कीजिये

क्या हुआ जो आप थोड़ा सा हुए बीमार हैं
'हिम्मते मर्दे खुदा' बस ये ही सोचा कीजिये

मुश्किलों से है भरा पर वक़्त ये कट जायेगा

फुर्सतों में आप हँस के वक्त काटा कीजिये

पॉजिटिव हो सोच तो फिर हर जगह ही जीत है
शांत मन के साथ सबसे बात साँझा कीजिये

भाँप लेना है जरूरी ले सकें जितनी दफा
और यदि मौका मिले तो योग थोड़ा कीजिये

मास्क चहरे पर लगाना है जरूरी जान लो

हाथ धोने का कभी मौका न छोड़ा कीजिये

है दवा उपलब्ध तो घबरा रहे हो क्यों 'तरुण'
'कुछ नही होगा' ये मन मे भाव पैदा कीजिये

कविराज तरुण

Friday, 23 April 2021

लेकिन फरक किसको पड़े

जिंदगी लाचार है लेकिन फरक किसको पड़े
हर कोई बीमार है लेकिन फरक किसको पड़े

वो चुनावी जंग के फिर सूरमा बनने चले
वाह क्या सरकार है लेकिन फरक किसको पड़े

कुंभ में जमकर नहाने चल दिये हैं इकतरफ
इकतरफ इफ़्तार है लेकिन फरक किसको पड़े

ब्लैक मे ही बिक रही है ये हवा औ ये दवा
चोर थानेदार है लेकिन फरक किसको पड़े

जान का जोखिम लिए वो काम पर तो जा रहा
घुस गया व्यापार है लेकिन फरक किसको पड़े

हरतरफ बस मौत का ही खेल चालू हो गया
खूब हाहाकार है लेकिन फरक किसको पड़े

कविराज तरुण


Thursday, 15 April 2021

जन्मदिवस बधाई

उन्मुक्त सोच के बलबूते जिसने सबको आवाजें दी हैं
संघर्षों के बीच भँवर मे जिसकी सारी उम्र तपी है
जो लोगों के हृदयांगन में जड़ें जमाये बैठा है
जिसने सूरज को पश्चिम से भी भोर निकलते देखा है

उनको उनके जन्मदिवस पर ढेरों-ढेर बधाई हो
स्वास्थ्य रहे मंगल मंगल उज्ज्वल सी परछाई हो

जिसने जीवन के हर लम्हे से लड़कर जीना सीखा है
जिसने विष का प्याला भी हँसकर पीना सीखा है
जिसको अपने से ज्यादा ही दूजे की चिंता रहती है
जिसके मन में निर्मल पावन गंगा अविरल बहती है

उनको उनके जन्मदिवस की ढेरों-ढेर बधाई हो
मधुर-मधुर संगीत सुनाती जीवन में पुरवाई हो

जिसको अपना कहने में गर्व हमेशा होता है
जिसके आदर्शों की बगिया में मन हम सबका खोता है
जिसकी लंबी उम्र रहे ये दुआ स्वयं ही आती है
जिससे मिलने से हर चिंता खुद गायब हो जाती है

उनको उनके जन्मदिवस की ढेरों-ढेर बधाई हो
खुशियों से भरपूर सदा हर सपनें की भरपाई हो


Sunday, 28 March 2021

शायरी अपडेट

बिना भरे ही छलक रहीं हैं मै और मेरे तमाम बातें
है स्याह जैसी घनी अँधेरी मै और मेरी तमाम रातें
न कोई अपना मिला हमें तो किया सभी ने सदा किनारा
तुम्हे मुबारक हों सारे रिश्ते तुम्हे मुबारक तमाम नाते

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है इश्क़ फिर तो मलाल कैसा
जुबाँ पे फिर ये सवाल कैसा
तुम्हे पता है तुम्हे खबर है
मेरे शहर का है हाल कैसा

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सितारों की चमक लेके जमीं पर आसरा लूँगा
मै पानी की तरह बहकर समंदर पार पा लूँगा
मुझे तेरे रिवाज़ो से नही कोई भी मतलब है
कि जिसदिन ठान लूँगा मै तुम्हे अपना बना लूँगा

मुहब्बत है नई फिरभी कशिश इसमें पुरानी है
बड़ी ही बंदिशों वाली तेरी मेरी कहानी है
जमाने के बदलने से बदलता है नही सबकुछ
हमें छुपकर भी रहना है निगाहें भी मिलानी है

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मेरी बेबाक नजरें जो कहती रहीं जान कर तू उन्हें जान पाया नही
आके रह जाओ दिल में मेरे उम्रभर यहाँ लगता ज़रा भी किराया नही

वो जो बातें हुईं थीं मेरे साथ में तुम उन्हें भूलने की न कोशिश करो
यार सबकुछ मिलेगा तुम्हें प्यार से बस जरूरी खुदा से कि ख़्वाहिश करो

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मेरी बेबाक नजरें जो कहती रहीं जान कर तू उन्हें जान पाया नही
आके रह जाओ दिल में मेरे उम्रभर यहाँ लगता ज़रा भी किराया नही

वो जो बातें हुईं थीं मेरे साथ में तुम उन्हें भूलने की न कोशिश करो
यार सबकुछ मिलेगा तुम्हें प्यार से बस जरूरी खुदा से कि ख़्वाहिश करो

Sunday, 21 March 2021

क्या फायदा

बिन तुम्हारे दिल लगाने का भला क्या फायदा
बिन तुम्हारे प्यार पाने का भला क्या फायदा

चौदवीं का चाँद हो या चाँद की भी कल्पना
तुम स्वयं श्रृंगार हो या हो रती की साधना
दृष्टि के हर छोर पर तुम विराजित हो रही तो
नेत्र पर अंकुश लगाने का भला क्या फायदा
बात आँखों की छुपाने का भला क्या फायदा

सात जन्मों का वचन देकर बढ़ाया हाथ ये
आपने क्यों राम छोड़ा सहचरी का साथ ये
दूर रखते इन वनों से प्रियतमे की देह को
आग लंका में लगाने का भला क्या फायदा
धर्म की बातें सिखाने का भला क्या फायदा

सूर्य को यदि दिन मिला तो चाँद को ये रात भी
है कहीं पर अंत तो फिर है कहीं शुरुआत भी
जीत खुद उसका वरण करती है जिसमे शक्ति हो
बिन लड़े ही हार जाने का भला क्या फायदा
स्वप्न आँखों मे सजाने का भला क्या फायदा

Saturday, 6 March 2021

ख़ाक-ए-तमाम

खाक-ए-तमाम होने का सिलसिला चलने लगा
उम्र ये बढ़ने लगी तो फासला बढ़ने लगा
हसरतों की प्यास में दरिया दरिया घूमकर
दिल ये मेरा बेदिली का दाखिला करने लगा

Friday, 5 March 2021

अटल हो गया

मेरा सपना अधूरा सकल हो गया
तू सफल हो गयी मै विफल हो गया

तुमको दिल दे दिया ये है गलती मेरी
अपने दिल से ही मै बेदखल हो गया

मैंने देखा जिसे वो हुआ खंडहर
तूने देखा जिसे वो महल हो गया

तुम हुई न कभी मेरी मायावती
मै तुम्हारे लिए ही अटल हो गया

सुर्ख कांटो से जख़्मी मेरा हाथ है
तू चमकता हुआ सा कमल हो गया

कविराज तरुण

Friday, 26 February 2021

मुश्किल हो जाता है

अक्सर तुमसे मन की बातें कहना मुश्किल हो जाता है
रेत में जैसे पानी का ही बहना मुश्किल हो जाता है

चुप रहकर सहते सहते एक उम्र हमारी बीत गई
बाधायें इतनी आईं कि निर-आशा भी जीत गई

ऐसे विषमकाल मे कुछ भी सहना मुश्किल हो जाता है
अक्सर तुमसे मन की बातें कहना मुश्किल हो जाता है

हमने जेठ दुपहरी में भी घंटों तेरी राह तकी है
सर्दी मे भी ठिठुर-ठिठुरकर छत पर जाकर बातें की हैं

अब जाने क्यों साथ मे तेरे रहना मुश्किल हो जाता है
अक्सर तुमसे मन की बातें कहना मुश्किल हो जाता है

Saturday, 30 January 2021

3. प्रियतमे

कबसे सोया हुआ हूँ उठा जाओ न
चाय हाथों से अपने पिला जाओ न
#प्रियतमे ! पास मेरे चले आओ तुम
चाँद सा रूप अपना दिखा जाओ न

2. प्रियतमे

बात साँझा करूँ क्या किसी और से
दिल लगाया करूँ क्या किसी और से
#प्रियतमे ! पास मेरे चले आओ तुम
वक़्त ज़ाया करूँ क्या किसी और से

1. प्रियतमे

तुम विटामिन हो मेरे बदन के लिए
गुनगुनी धूप हो सर्द मन के लिए
#प्रियतमे ! पास मेरे चले आओ तुम
प्रेम आतुर मेरा है मिलन के लिए

Friday, 29 January 2021

मुक्तक - सहना पड़ता है

जीवन मे तो दर्द सभी को सहना पड़ता है
पानी बनकर पर्वत से भी बहना पड़ता है
चुप रहकर ही कौन समझ पाया है बातों को
अपने दिल का हाल कभी तो कहना पड़ता है

Thursday, 28 January 2021

ग़ज़ल - मंजूर है

क्या हुआ जो इश्क़ हमसे दूर है
वक़्त का हर फैसला मंजूर है

फासला दो चार दिन से ही हुआ
दर्द लेकिन हर जगह मशहूर है

दिल पे उसके है मेरी ही मलकियत
आँख में जिंदा मेरा ही नूर है

वो सुहागन बन गई है गैर की
मांग में फिरभी मेरा सिंदूर है

कविराज तरुण

Monday, 18 January 2021

गीत - आधा भाव

तेरी मीठी बातें सुनकर , वैरागी को प्यार हुआ
आधा भाव समर्पण का है , आधे पर अधिकार हुआ

किसी डोर से बाँध रहा वो , मेरे चाँद सितारों को 
किसी छोर से साध रहा वो , मन के  इन अँधियारों को 
उसकी आँखों के सूरज में , दिन का ये विस्तार हुआ
आधा भाव समर्पण का है , आधे पर अधिकार हुआ

तुमसे मिलकर विरह तान भी , मधुर गीत बन जाती है
तुमसे मिलकर नागफनी भी , मंद मंद मुस्काती है
ऐसे में तुमको पाकर मै , खुशियों का आगार हुआ
आधा भाव समर्पण का है , आधे पर अधिकार हुआ

नेह लिए तुम आई जबसे , मेरे मन के आँगन में
झूल रहा मन पेंग मार के , जोर जोर से सावन में
नई किरण का नये पहर में , नया नया संचार हुआ
आधा भाव समर्पण का है , आधे पर अधिकार हुआ

गंगाजल सा हृदय तुम्हारा , और फूल सी काया है
रूप गढ़ा ये कूट कूट के , प्रभु की कैसी माया है
सतरंगी सपनों का जैसे , चिर यौवन श्रृंगार हुआ
आधा भाव समर्पण का है , आधे पर अधिकार हुआ

कविराज तरुण

Thursday, 14 January 2021

जैसे जमाना चाहे

रेत में क्यों कोई फूल उगाना चाहे
वैसे ढल जायेंगे जैसे ये जमाना चाहे

बात उम्मीद की सुनने में अच्छी है
अपने हालात भला कौन बताना चाहे

छोड़ के वो तो गया ये तेरा मुकद्दर है
क्या हुआ दिल कहीं और ठिकाना चाहे

हर जुर्म इसी बात पे बढ़ता ही चला जाता है
मै दर्द छुपाना चाहूँ वो जुर्म छुपाना चाहे

रायशुमारी से तेरा कुछ नही होगा
उसको दूंढो जो तेरा बोझ उठाना चाहे

कविराज तरुण

ग़ज़ल - निगहबान था

जिसकी सूरत का दिल ये कदरदान था
वो किसी और के दिल का महमान था

ख्वाब उल्फ़त के यूँही बिखर जायेंगे
बात से बेखबर मै तो अनजान था

उसकी हर मुश्किलों में उलझता रहा
मै इन्ही आदतों से परेशान था

हाथ आया नही फूल मुझको कभी
मै बगीचे का कबसे निगहबान था

वो जिसे मै खुदा ही समझता रहा
वो मुसलसल सा बस एक इंसान था

कविराज तरुण

ग़ज़ल - नमी आपसे

दिल लगाया था हमने कभी आपसे
आज आंखों मे आई नमी आपसे

और कोई कहे तो कहे माफ है
तू भी पागल कहे तो दुखी आपसे

एक दिन तो बुझेगा दिया प्यार का
आँधियों की हुई दोस्ती आपसे

नाम आता है जब भी जुबां पर तेरा
मुझको मिलती नही है खुशी आपसे

कविराज तरुण

Thursday, 7 January 2021

नववर्ष

रश्मियाँ भोर की कल तो आएँगी पर
रात स्वप्निल सुधा सी अमर कर दो
सोच लो ठान लो मन का संज्ञान लो
इस हिमालय से ऊँचा शिखर कर दो

रश्मियाँ भोर की कल तो आएँगी पर
रात स्वप्निल सुधा सी अमर कर दो

प्यार के द्वार पर हिय का दरबार है
आत्म चिंतन से संभव ये उद्गार है
नेत्र की अंजलि में चमक जीत की
बोली भाषा बने यों सहज फूल सी
कि लगे सब तरफ सिर्फ मुस्कान है
ये नया वर्ष आकर्ष मेहमान है

इन विचारों का मन में बसर कर दो
रात स्वप्निल सुधा से अमर कर दो

रश्मियाँ भोर की कल तो आएँगी पर
रात स्वप्निल सुधा सी अमर कर दो

तरुण कुमार सिंह
प्रबंधक
विपणन विभाग
लखनऊ