Friday, 8 April 2022
होता है
Sunday, 13 March 2022
गजल - संवर जाए मेरी
Friday, 4 March 2022
आत्मचिंतन
Thursday, 30 December 2021
ग़ज़ल - ठीक है
Wednesday, 18 August 2021
थोड़ी थोड़ी गलती है
Sunday, 18 July 2021
याद आओगे बहुत
Sunday, 4 July 2021
मंज़िल नही मिलती
Thursday, 1 July 2021
संशय
Monday, 21 June 2021
कवि कौन ?
Friday, 18 June 2021
ग़ज़ल - तुम हो
Sunday, 6 June 2021
श्रीराम दिखाता सीने में
Friday, 28 May 2021
क्या मुझसे मिलने आओगी
Tuesday, 18 May 2021
ग़ज़ल - बू आ रही है
Friday, 14 May 2021
शायरी - खंडहर
Thursday, 13 May 2021
गुमान से निकला
Monday, 10 May 2021
नही मिलती
Saturday, 8 May 2021
ना बहलाओ तुम
Monday, 3 May 2021
बचपन के दिन
Tuesday, 27 April 2021
ग़ज़ल - सवाल खो गया
Monday, 26 April 2021
ग़ज़ल - आजकल
Sunday, 25 April 2021
ग़ज़ल - कुछ नही होगा
आप अपनी हेल्थ की चिंता न ज्यादा कीजिये
ठीक हो जायेगा सबकुछ ये भरोसा कीजिये
क्या हुआ जो आप थोड़ा सा हुए बीमार हैं
'हिम्मते मर्दे खुदा' बस ये ही सोचा कीजिये
मुश्किलों से है भरा पर वक़्त ये कट जायेगा
फुर्सतों में आप हँस के वक्त काटा कीजिये
पॉजिटिव हो सोच तो फिर हर जगह ही जीत है
शांत मन के साथ सबसे बात साँझा कीजिये
भाँप लेना है जरूरी ले सकें जितनी दफा
और यदि मौका मिले तो योग थोड़ा कीजिये
मास्क चहरे पर लगाना है जरूरी जान लो
हाथ धोने का कभी मौका न छोड़ा कीजिये
है दवा उपलब्ध तो घबरा रहे हो क्यों 'तरुण'
'कुछ नही होगा' ये मन मे भाव पैदा कीजिये
कविराज तरुण
Friday, 23 April 2021
लेकिन फरक किसको पड़े
Thursday, 15 April 2021
जन्मदिवस बधाई
Sunday, 28 March 2021
शायरी अपडेट
Sunday, 21 March 2021
क्या फायदा
Saturday, 6 March 2021
ख़ाक-ए-तमाम
Friday, 5 March 2021
अटल हो गया
Friday, 26 February 2021
मुश्किल हो जाता है
Saturday, 30 January 2021
3. प्रियतमे
2. प्रियतमे
1. प्रियतमे
Friday, 29 January 2021
मुक्तक - सहना पड़ता है
Thursday, 28 January 2021
ग़ज़ल - मंजूर है
Monday, 18 January 2021
गीत - आधा भाव
Thursday, 14 January 2021
जैसे जमाना चाहे
ग़ज़ल - निगहबान था
ग़ज़ल - नमी आपसे
Thursday, 7 January 2021
नववर्ष
Saturday, 19 December 2020
गीत - उम्मीदों का तारा देखा
Thursday, 29 October 2020
ग़ज़ल - मुहब्बत
चलो कुछ सोचते हैं
Wednesday, 16 September 2020
आ चले हम
Friday, 11 September 2020
राजभाषा हिंदी
Tuesday, 25 August 2020
उम्मीदों का तारा देखा
शेरों शायरी
Sunday, 23 August 2020
पुकारों यारों
Saturday, 8 August 2020
राम
Friday, 24 July 2020
ग़ज़ल - प्यार कीजिये उसे
Tuesday, 21 July 2020
आत्मनिर्भर भारत
Friday, 17 July 2020
ग़ज़ल - मिला कीजिये
ग़ज़ल - फैसला कीजिये
Thursday, 16 July 2020
गीत - सावन
Friday, 10 July 2020
ग़ज़ल - वार कर
Monday, 6 July 2020
गीतिका - सम्मान ज्ञान का
Thursday, 2 July 2020
ग़ज़ल - इश्क़वालों का किरदार
Monday, 22 June 2020
शायरी - बारिश
Sunday, 21 June 2020
शायरी - बदल गया
ग़ज़ल - दूर नहीं
Friday, 19 June 2020
मुक्तक - शूरवीर
Thursday, 18 June 2020
निस्तारण
ग़ज़ल - मीत
Wednesday, 17 June 2020
देश मेरे
Monday, 15 June 2020
मन : लघु लेख
साहित्य और समाज : लघु लेख
Thursday, 11 June 2020
प्यार के किस्से
Wednesday, 10 June 2020
ग़ज़ल - दिन बहार के
Saturday, 23 May 2020
विषय - देख असीमित लक्ष्य बड़ा
Tuesday, 19 May 2020
एक सवेरा ऐसा भी हो
Tuesday, 12 May 2020
नजर
ग़ज़ल - आज फिर से
Monday, 27 April 2020
ग़ज़ल - कभी आओ तुम
Sunday, 26 April 2020
ग़ज़ल - गंगा
न्याय दो
Saturday, 25 April 2020
तुम क्या करोगे ?
Friday, 24 April 2020
बैंक वाले बैंक वाले ।। bank wale bank wale
Thursday, 23 April 2020
ग़ज़ल - हवा चल रही है
कविता - जिजीविषा
Sunday, 19 April 2020
गीत - मधुबन
Saturday, 18 April 2020
ग़ज़ल - रात में क्या क्या रहा
Thursday, 16 April 2020
होने को है
लॉकडाउन में
Wednesday, 15 April 2020
ग़ज़ल - रोता हूँ
Sunday, 5 April 2020
विषय - साधना कर लीजिए
Tuesday, 31 March 2020
इतिहास लिखा जायेगा
Monday, 30 March 2020
ग़ज़ल - जानते हो
ग़ज़ल - जानते हो
ग़ज़ल - हारा नही है
Tuesday, 24 March 2020
कबतलक ?
Tuesday, 17 March 2020
ग़ज़ल - गहरान होने दो
Saturday, 14 March 2020
करो-ना
ग़ज़ल - बुला रहा है
Friday, 6 March 2020
अलंकार
Thursday, 5 March 2020
ग़ज़ल - कमल
Saturday, 1 February 2020
ग़ज़ल - होने दो
Tuesday, 28 January 2020
ग़ज़ल - नही जानी
Sunday, 26 January 2020
लघुकथा - कोयल
लघुकथा - कोयल
बस गाँव आने वाला है । लखनऊ जैसे शहर में पली-बढ़ी मै पहली बार ससुराल वाले गाँव जा रही हूँ ,वो भी अपनी सासूमाँ के साथ । साड़ी , घूँघट और सासूमाँ के उपदेश कि 'कम बोलना' , 'नजरें ना मिलाना' , 'बड़ो के पैर छूना' और जाने क्या क्या ? इतनी घबराहट तो तब भी न थी जब शादी के बाद लखनऊ वाली ससुराल आई थी । खैर वहाँ तो कोई रोक-टोक नही थी, पर यहाँ परिस्थितियों के अनुसार ढलना पड़ेगा । लो ये सब सोचते-सोचते खड़ंजे से होते हुए हमारा घर आ गया ।
गाँव की आबादी से थोड़ा हटके एक कोने में आम के पेड़ों के बीच बना ये घर बहुत सुंदर है ,साथ में शानदार दुआरा और सामने बड़ा सा मैदान । दूर से तो ऐसा लग रहा था कि ये एक बड़ा सा बाग है । कार से पैर निकाले ही थे कि लाल रंग से लबालब थाली मेरे पैरों के नीचे आ गई । दादी की आवाज आई - "आज तो लक्ष्मी जी स्वयं पधारी हैं । हमे तो सुबह ही पता चल गया था कि तुम आने वाली हो जब कोयल शोर मचाये पड़ी थी । बहू! रंग में पैर डुबोकर दहलीज पर पैरों के निशान बनाते चलो ।" वैसे ऐसा करने में अलग सी खुशी भी मिली ।
गाँव वालों को खबर क्या लगी , लोगो के आने का क्रम ऐसा चला कि सारा दिन मुँह-दिखाई मे ही गुजर गया और रात में सासूमाँ ने दादी के पास पैर दबाने और पुण्य कमाने के लिए भेज दिया । मुझे दादी से थोड़ा डर तो लग रहा था पर हिम्मत करके मै उनके कमरे मे गई और पैर दबाने लगी। दादी ने पूछा कि गाँव मे कैसा लग रहा ? मै कुछ जवाब देती लेकिन मुँह से आवाज तक न निकली । दादी बोली - लगता है तुम्हारी सास ने तुम्हे बहुत डरा दिया है पर डरो मत! मै पुराने ख्यालों की नही हूँ । आठवीं पास हूँ और जब ब्याह होकर इस गाँव मे आई थी तो सब मास्टरनी कहते थे । गाँव की पहली शिक्षित बहू । तुम अपनी सहेली समझकर मुझसे बात कर सकती हो । मुझे थोड़ा अच्छा लगा और मैंने एक सवाल पूछ ही लिया - दादी जब मै आई तो आप कह रही थीं कि आपको पहले पता चल गया था, वो कैसे ? दादी जोर से हँसी और बोलीं- दोपहर से तुम्हे ये बात सताये जा रही है । हम व्हाट्सएप वाले जमाने के नही हैं । हमारे समय मे तो चिट्ठी से हालचाल , सूरज के उगने-डूबने से वक़्त और खाने की महक से बनाने वाले का बर्ताव पता चलता था । पेड़-पौधे , पशु-पक्षी और हवायें यहाँ गीत सुनाती हैं । किसी और चीज की जरूरत ही नही है । और ये तुम्हारे आने की खबर तो हमे सुबह कोयल ने ही दे दी थी । कुछ दिन में तुम सब समझ जाओगी । जाओ अब जाकर सो जाओ । सुबह जल्दी उठना तो आम के बाग में चलेंगे । दादी की बातों में इतनी मिठास है कि क्या बोलूँ । मै उठी और अपने कमरे मे सोने चली गई । मै ये तो बताना ही भूल गई कि मेरे पतिदेव और ससुर जी दिल्ली गए हैं । एक घर खरीद रहे हैं उसी सिलसिले में इसलिए हफ्ते भर हम गाँव मे रहेंगे । एक तो फोन में नेटवर्क नही आ रहा इसलिए जगने का कोई फायदा ही नही । सो ही जाती हूँ , वैसे भी सुबह पाँच बजे दादी के साथ आम के बाग में घूमने जाना है ।
यहाँ गाँव मे तो कुदरत खुद आके उठा जाती है । चिड़ियों की चहचहाहट, ठंडी हवा के झोंके और मुर्गे की बाग किसी अलार्म से कम थोड़े न होते हैं । सुबह के चार बजे रहे हैं और ऐसा लग रहा है जैसे कि आज पहली बार मैंने शुकून की नींद ली है । इतनी सुबह पहली बार उठी हूँ पर फिरभी बहुत तरो-ताजा महसूस कर रही हूँ । मैंने नहा-धोकर किचन में गरमागरम चाय बनाई और दादी को उठाने चली गई । पर दादी तो पहले से उठी हुई थी और सासूमाँ से बतिया रही थीं । मुझे देखकर उनकी आँखों मे चमक आ गई । दादी बोली - हमे तो लगा था कि पाँच बजे तुम उठ पाओगी या नही पर तुमने तो दिल ही जीत लिया । सासूमाँ के आँखों की चमक बता रही थी कि मैंने आज उनकी लाज रख ली । हम और दादी थोड़ी देर बाद आम के बाग की ओर निकल लिए ।
पगडंडी वाले उस रास्ते पर चलते हुए दादी मुझे हमारे खेत और फसलों के बारे में बहुत सी बातें बताती जा रही थीं । सरसों की पीली चादर में लिपटी धरती तो दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे फ़िल्म की याद दिला रही थी । थोड़ी देर में हम बगिया पहुँच गए । उस बगिया में एक बड़ा सा तालाब भी था ,जिसमे मछली पालन भी होता है । इतने बड़े तालाब में प्यारी प्यारी मछलियों को देखकर वो घरों में बने काँच के मछलीघर तो बेमानी लगने लगे । आम के बड़े बड़े पेड़ और चारो तरफ पक्षी ही पक्षी । सब कुछ किसी फिल्म के दृश्य जैसा सुंदर और मनमोहक लग रहा था ।
मैंने दादी से कहा - दादी गाँव आकर बहुत अच्छा लग रहा है । दादी बोली - मुन्ना की याद नही आ रही । दादी ! बहुत याद आ रही पर यहाँ फोन में नेटवर्क ही नही आता । बात कैसे करूँ? ये कहते कहते मेरी आँखों मे आँसूँ आ गए । दादी ने सिर पर हाथ फिराया और बोलीं - इसमें रोने वाली कौनसी बात है । हमारे जमाने मे नेटवर्क तो क्या फोन भी नही थे फिरभी मेरी बात तुम्हारे दादाजी से हो जाती थी । मैंने कहा - वो कैसे ? फिर दादी बताने लगी - जब मन के तार जुड़े हों तो किसी नेटवर्क की जरूरत नही होती । अपनी बात इस हवा से कहो और ये संदेशा वहाँ तक पहुंचा देगी । जैसे कल सुबह कोयल ने तुम्हारी खबर मुझतक पहुंचाई थी । तभी अचानक मेरे फोन की घंटी बजी । देखा तो उनका फोन आया था , मै तो घंटी की आवाज सुनकर दंग रह गई कि नेटवर्क कैसे आ गया अचानक । तभी दादी बोलीं - मुन्ना का फोन आया होगा बात कर लो वर्ना नेटवर्क चला जायेगा और हँसते हुए वो थोड़ा दूर चली गईं । थोड़ी देर ही बात हुई पर मन को बड़ी खुशी मिली । कभी कभी तो लगता है कि दादी जादूगर हैं।
थोड़ी देर टहलने के बाद दादी और मै घर आ गए । दिनभर दादी के किस्से-कहानी और बातें सुनकर बहुत मजा आता और इसतरह कब पाँच दिन बीत गए पता ही नही चला । शुक्रवार का दिन था , सुबह से ही कोयल बार-बार मेरे सामने आती और कुहुकने लगती । दादी के साथ बगिया जाते वक्त भी कोयल मेरे ऊपर से गुजरे और आवाज करने लगे । मैंने परेशान होकर दादी से पूछा- दादी ये कोयल आज इतना शोर क्यों मचा रही मेरे पास आकर । दादी हँसने लगी और बोलीं- तुमको बताने आई है कि आज वो आने वाला है जिसकी तुम राह देख रही हो । मैंने भी दादी से बोला - अरे दादी ऐसे थोड़ी न होता है । वैसे भी वो तो रविवार से पहले कहाँ आयेंगे । उनका टिकट ही रविवार का है आप भी न दादी । खैर दादी फिरभी अपनी बात पर पूरी तरह आश्वस्त थीं । उन्होंने कहा - तुमलोग ट्वीटर वाली चिड़िया पर ज्यादा भरोसा करती हो और हम इस असली वाली चिड़िया पर । कुछ देर बाद बगिया घूम कर हम लोग घर लौट आये ।
न जाने क्यों बेचैनी हो रही थी , किसी काम मे मन ही नही लग रहा था । मै छत पर जाकर टहलने लगी । तभी दूर से धूल उड़ाता हुआ एक ट्रैक्टर दिखाई दिया । वो सीधा अपने घर की तरफ आ रहा था । मै भाग कर दुआरे पर गई । पीछे से दादी भी बाहर आ गई । थोड़ी देर में ट्रैक्टर घर पर आकर रुका और उसपे से मेरे पतिदेव उतरे । उन्हें देखते ही मेरी आँखों से गंगा-जमुना बहने लगी और होंठों से बस ये निकला- "हमे तो सुबह ही पता चल गया था कि आप आने वाले हो । हमे कोयल ने बता दिया था ।" ये सुनकर दादी भी हँस पड़ी और मै भी ।
तरुण कुमार सिंह
(कविराज तरुण)