Sunday, 8 January 2023

गजल - न थे न होंगे

वो हम पे महरबान न थे न होंगे
पर हम भी बेजुबान न थे न होंगे

उनसे रहम की गुजारिश भी क्या
जो बेहतर इंसान न थे न होंगे

बिन बुलाए आयेंगे हमारे करीब
वो घर के महमान न थे न होंगे

आसमां को जमीं पर खींच लायेंगे
ऐसे तो अरमान न थे न होंगे

क्या दिल में है क्या जुबान पर
हम इतने अनजान न थे न होंगे

Wednesday, 4 January 2023

गजल - जाने दो

वो जा रहा है तो उसे इस बार जाने दो
अब है किसी वो दूसरे का प्यार जाने दो

है फायदा कुछ भी नही क्यों गमजदा हो तुम
इन आंसुओं को यूं नही बेकार जाने दो

अब जो लिखा है किस्मतों में मान लो उसको
फिर क्या हुआ वो कर रहा इनकार जाने दो

रिश्ते बचाकर कुछ न होगा ये समझ लो तुम
जब दो दिलों में खिंच गई दीवार जाने दो

मै ही नही तुम ही नही सब है उसी रब का
फिर सोचना क्या जा रहा जो यार जाने दो

Sunday, 1 January 2023

मन की बात

अपने मन की बात बताकर जोड़ा हमसे नाता है
जैसे आप समझाते हो कोई नही समझाता है

राष्ट्र कहां तक पहुंचा है हमलोग कहां तक जायेंगे
किन बातों के द्वारा हम सब देश का मान बढ़ाएंगे
सोच हमें क्या रखनी होगी कर्तव्य हमारे क्या क्या हैं
काम कौन से ऐसे हैं जिससे देश को फायदा है

इन बातों का ताना बाना कोई नही बतलाता है
जैसे आप समझाते हो कोई नही समझाता है

वो क्षेत्र कौनसे ऐसे हैं जिनमें ज्यादा अवसर हैं
आवास योजना के अंतर्गत बने अभी कितने घर हैं
स्वच्छ देश का सपना अबतक पहुँचा है किस पटरी पर
विज्ञान के द्वारा सपनों की बुनी गई कितनी चादर

ढेरों ऐसी बातों से ये मन ज्ञानी हो जाता है
जैसे आप समझाते हो कोई नही समझाता है

आगे क्या क्या संकट हैं किन लोगों से लड़ना होगा
क्या क्या हमने नही किया क्या क्या हमको करना होगा
किन बातों को ध्यान में रखना हमको अभी जरूरी है
विश्वगुरु की राह में हमको चलनी कितनी दूरी है

आप के द्वारा ही हमको संकल्प पता चल पाता है
जैसे आप समझाते हो कोई नही समझाता है

और यार क्या

चल रहे तो है ये सफर , और यार क्या
पांव से तू नाप डगर , और यार क्या

जिंदगी क्या चाहती है और क्या नही
किसको पता किसको खबर , और यार क्या

दिल के तार जोड़कर दूर तक चलो
रह न जाए कोई कसर , और यार क्या

शाम को तू बैठ कभी इतमिनान से
ढल रही है तेरी उमर , और यार क्या

वक्त और साल तो ये बीत जायेगा
छोड़ देगा अपना असर , और यार क्या

जिंदगी की जंग सदा जीत लेंगे हम
है दोस्तों का साथ अगर , और यार क्या

Saturday, 17 December 2022

जमीं पे उतर के आओ

बड़े घरों में ओ रहने वाले, ज़रा सा रहमोकरम दिखाओ
बहुत दिनों तक रहे फलक पे, कभी जमीं पर उतर के आओ
तुम्हे मुहब्बत के इस सफर में, तमाम राहें दिखाई देंगी
के एक दरिया तुम्हे मिलेगा, है पार जाना तो डूब जाओ
कभी समंदर हुई थी आँखें, कभी बहारे चमन हुआ था
कहूं भला क्या मै आज तुमसे, कोई कहानी तुम्ही सुनाओ
तुम्हे मुबारक है शाम शबनम, गुले बहारा तुम्हे मुबारक
हमारे हिस्से में रात काली, ये चांद थाली चलो छुपाओ
जो साथ आये वो दूर हैं अब, यही तो उल्फत मे हो रहा है
बदल सको जो रिवाज़-ए-उल्फत, हमारी महफिल मे पेश आओ

कविराज तरुण

Sunday, 27 November 2022

निकल रहा है

कहीं पे जुगनू टहल रहा है
कहीं पे सूरज निकल रहा है

इसी गुमां में बढ़े कदम ये
ज़माना पीछे ही चल रहा है

हटा रहे क्यों ये धूल जाला
इसी से दिल ये बहल रहा है

तुम्हे लगेगा तुम्ही शहंशा
तुम्ही से हर कोई जल रहा है

मगर पता क्या किसे हक़ीक़त 
के ऊंट करवट बदल रहा है

कविराज तरुण

Saturday, 26 November 2022

आने वाला कल होगा

माना थोड़ा वक्त लगेगा पर संकट का हल होगा
आज नही है तेरा तो क्या आने वाला कल होगा

रात में जुगनू चांद सितारे माना कि इतराते हैं
भोर उदय जब होता सूरज ये सारे छुप जाते हैं
पर्वत को सन्नाटे में ही बरबस रहना पड़ता है
आंधी धूप थपेड़ों को भी डटकर सहना पड़ता है

तू जितना सह जायेगा तू उतना और प्रबल होगा
आज नही है तेरा तो क्या आने वाला कल होगा

चींटी इक इक दाना लेकर मीलों लंबा चलती है
हर कठिनाई से लड़कर वो जीवनयापन करती है
पतझड़ में पेड़ों की डाली बिन पाती रह जाती है
पर मौसम आने पर वो ही फूलों से भर जाती है

सही समय आने पर तेरा हर इक काम सफल होगा
आज नही है तेरा तो क्या आने वाला कल होगा

कर्म सिवा कुछ हाथ नही तब चिंता का मोल भला क्या
सत्य नही धारण जिसमे उस व्यक्ति का बोल भला क्या
तुझे पता है तेरी ताकत मात्र यही आवश्यक है 
जीवनपथ पर दौड़ अनवरत सोच यही तू धावक है

जैसी तेरी करन होगी वैसा आगे फल होगा
आज नही है तेरा तो क्या आने वाला कल होगा

Wednesday, 2 November 2022

गजल - हो जायेगा

दो शब्द मीठे बोलने से क्या बुरा हो जायेगा
पर दो दिलों के दरमियां कम फासला हो जायेगा

क्यों नफरतों का बीज फैला है जहां में हरतरफ
ये बीज आगे पेड़ बनकर फिर खड़ा हो जायेगा

ये आग वाला खेल माना दे रहा है मौज भी
पर एकदिन इस आग से ही हादसा हो जायेगा

इस प्यार में जो शक्ति है वो है नही अलगाव में
हां देखिए इस शक्ति से कितना भला हो जायेगा

है कौन किसका सोचने की क्या जरूरत है 'तरुण'
जो ना हुआ अबतक किसी का वो तेरा हो जायेगा

Wednesday, 12 October 2022

नही कोई

तेरे दर पे मेरा है बसर नही कोई
चल रहे हैं मगर है सफर नही कोई

लोग बेजान से मुर्दों की तरह जीते हैं
ये शहर है अगर तो शहर नही कोई

दाग़ हर रोज चहरे पे मेरे लगते हैं
ताब -ए -रुखसार पर है असर नही कोई

खार को गुल कहो ये भी क्या तमाशा है
हमको मालूम है ये शजर नही कोई

वो जिसे अपना कह करके मुस्कुराते हो
इल्म है , है कोई , है मगर नही कोई

Tuesday, 11 October 2022

होता है

चोट का बस निशान होता है
दर्द तो बेजुबान होता है
कौन कितना करीब है तेरे
वक्त पे इम्तिहान होता है

Wednesday, 14 September 2022

दोहावली 1-10

-//१//-
जीवन है उपहार ये , रखो अपना ध्यान
धरती पर अवतार को , तरसे हैं भगवान

-//२//-
जिसकी जैसी भावना , उसका वैसा रूप
कोई लागे छांव सा , कोई लागे धूप

-//३//-

जितनी होंगी मुश्किलें , उतना होगा काम
बाधाओं से जीतकर , आते हैं परिणाम

-//४//-

बाहर किसको दूंढता , अंदर हैं जब प्रान
दूजे को क्या देखना , अपने को पहचान

-//५//-

छोटी छोटी बात को , मत देना तुम तूल
अच्छी बातें छोड़कर , जाओ सबकुछ भूल

-//६//-

काम का ही मान है , काम का ही मोल
बाकी सब बकवास है , चाहे जितना बोल

-//७//-

बेमतलब की बात पर, करो नही अलगाव
छोटी सी इक चोट भी, बन जाती है घाव

-//८//-

राखो अपने आप को, सोने सा तुम साफ
जो बुरा तुमको कहे, कर दो उसको माफ

-//९//-

अपना मन यों साफ हो, नही किसी से बैर
ना कोई है आपका, ना ही कोई गैर

-//१०//-

मन की अपने कीजिए , कैसा है संकोच
अपनी हर इक चोट है , अपनी है हर मोच

हिंदी भाषा

हिंदी भाषा शक्ति है , हिंदी है अभिमान
हिंदी हरदम बोलिए , काहे का व्यवधान
हिंदी से ही हिंद है , हिंदी है गतिमान
हिंदी भाषा जोड़ती , सारा हिन्दुस्तान

Saturday, 10 September 2022

कविता - दो पैसे लाने का चक्कर

कविता - दो पैसे लाने का चक्कर

अपनी मर्जी से कब कोई, दूर शहर को जाता है
दो पैसे लाने का चक्कर , चक्कर खूब लगाता है
जब पिज्जा खाने की हसरत, मजबूरी बन जाती है
तब मां के हाथों की रोटी, उसको बड़ा सताती है
सोच सोचकर घर का खाना, भूखे ही सो जाता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

सपनों का मोहक आकर्षण, बातें चांद सितारों की
बेमानी हो जाती है जब, टोली अपने यारों की
सुध बुध खोने वाली चाहत, नेहप्रिया की बाहों में
धीरे धीरे थक जाती है, शामें ढलकर राहों में
तब उसको मखमल का बिस्तर, नींद कहां दे पाता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

रिश्तों की गर्माहट से जब, गंध जलन की आती है
सहकर्मी की मेल भावना, प्रायोजित रह जाती है
जब मीठी बातों का बादल, सच्चाई से टकराये
टूटा मन तब बारिश बनकर, इन आंखों में भर जाये 
झूठ कपट का मारा सावन, रोता ही रह जाता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

जब बूढ़ी मां, आ जाओ तुम, कह कह के थक जाती है
दीवारों की पपड़ी झड़कर, उम्र उसे बतलाती है
जब वो बूढ़ा बाप डपटकर, चुप होने को कहता है
बेटे की ना फिक्र करो तुम, वो लंदन में रहता है
फिर अपने कमरे में जाकर, वो आंसू पी जाता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

ढ़ेरों रुपया होने पर भी, खर्च नही कर पाते हैं
छुट्टी के दिन घर में बैठे, बैठे ही रह जाते हैं
मां से क्या ही बात करें वो, भावुक इतना होती है
'अच्छा' सुनकर रोती है वो, 'गड़बड़' सुनकर रोती है
जाने इतना प्यार कहां से, इस बेटे पर आता है
दो पैसे लाने का चक्कर, चक्कर खूब लगाता है

कविराज तरुण
7007789629

Monday, 18 July 2022

ये दिल हसरतों के सिवा और क्या है

ये दिल हसरतों के सिवा और क्या है
लुटा और क्या है बचा और क्या है
नही और कोई दुआ काम आये
तूही बता दे दवा और क्या है 

Monday, 27 June 2022

युद्ध जब तांडव कराता

चित्र आधारित कविता - युद्ध जब तांडव रचाता 

युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता
रक्त के बीजाणु लेकर, नेत्र से क्रन्दन कराता

है अहम् के नाम पर जब, युद्ध तो फिर अंत क्या है
न्याय की सत्ता पुकारे, विश्व तेरा पंथ क्या है
त्रस्त हैं सबलोग इससे, युद्ध ये किसको सुहाता
युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता

हे! नये जग के पुरोधा, शक्ति अपनी थाम लो तुम
हो रही धरती अकिंचन, धैर्य से अब काम लो तुम
क्षेत्र के विस्तार में क्यों, तू रचे संहार गाथा
युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता

मर रहें लाखों सिपाही, मर रहें सब आमजन हैं
ये मनुजता के मरण का, काल शर्पित आगमन है
मन व्यथित हो सोचता है, काश! कोई रोक पाता
युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता

चोट की चादर लपेटे, लोग कितना रो रहे हैं
मृत्यु तेरा भय समेटे, सब तमस में खो रहे हैं
मान जा दमराज किलविश, क्यों प्रलय को यूँ बुलाता
युद्ध जब तांडव रचाता, कष्ट अगणित छोड़ जाता

तरुण कुमार सिंह
प्रबंधक
यूको बैंक, लखनऊ 
कर्मचारी संख्या - 57228

Friday, 3 June 2022

ग़ज़ल कहाँ से रास्ता होगा

मुझे मालूम है दिल का कहाँ से रास्ता होगा
ज़रा नज़रेँ मिला लो तुम वहीँ से दाखिला होगा

अगर तुम हो सके तो देख लो फिर आज सीने मे
तिरा ही नाम इसके हरतरफ सच में लिखा होगा

ये दुनिया प्यार की दुश्मन इसे दिल से नही मतलब
लगेगा जब सही सबकुछ तभी कुछ अटपटा होगा

कहानी हीर राँझा की सबक देती यही हमको
के सच्चा प्यार होगा तो हमेशा फलसफा होगा

किसी के लाख कहने पर रुका कब है 'तरुण' आशिक
ये दुनिया जबतलक होगी मुहब्बत का सिला होगा

Friday, 8 April 2022

होता है

22   22   22   22   22   2

दिल का लगना बेहद मुश्किल होता है
किस्मत से ही मौका हासिल होता है

जितनी भी कोशिश करके तुम पिघला लो
पत्थर दिल तो बस पत्थर दिल होता है

फिरते हैं आवारा सड़कों पर आशिक
ये किस्सा हर महफिल महफिल होता है

उससे कह पाता तो कबका कह देता
दिक्कत है हर आशिक बुझदिल होता है

जिसको अपने राज़ बताकर रखते हैं
अक्सर वो ही अपना कातिल होता है

कविराज तरुण

Sunday, 13 March 2022

गजल - संवर जाए मेरी

तुमको पा लें तो ये उम्र गुजर जाए मेरी
दिन संभल जाए ये रात संवर जाए मेरी

अपने होंठों पे तराजू लिए फिरता हूं
बात निकले तो तेरे दिल में उतर जाए मेरी

वो जो रौशन है जिसे लोग चांद कहते हैं
तेरे होते हुए क्यों उस पे नजर जाए मेरी

इसी फिराक में राहों पे तेरी बैठा हूं
तू जो देखे तो तबियत सुधर जाए मेरी

और ये इंस्टा एफबी के होने का तभी मतलब है
के जब प्रोफाइल तेरी फोटो से भर जाए मेरी

कविराज तरुण

Friday, 4 March 2022

आत्मचिंतन

घोर तिमिर जो छाया है तुम उसका तो संहार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

अभी समय है कर्मयुद्ध का अभी समय है तपने का
अभी समय है पूर्ण करो तुम हर इक हिस्सा सपने का
मिले कष्ट जो तुम्हे राह में तुम उनको स्वीकार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

किसे पता है कल क्या होगा वर्तमान है साथ अभी
तुझे कोशिशों से भरना है अपना खाली हाथ अभी
समय की रेखा पर चलकर तुम सारी बाधा पार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

घोर अंधेरा तो आयेगा डरने की है बात नही
सूर्य उदय तो होगा फिर से रही हमेशा रात नही
अपने मन की किरणों से तुम थोड़ा सा उजियार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

जीत सदा ही मिले सत्य को झूठ सदा ही हारा है
निर्भय जीवन जीने का बस मात्र यही इक चारा है
इसी सत्य को जीवन का तुम अब अपने आधार करो
आग नही बन सकते हो तो दीपक सा व्यवहार करो

Thursday, 30 December 2021

ग़ज़ल - ठीक है

हरकतें भी ठीक हैं और ये नज़र भी ठीक है
इक दफ़ा हो घूमना तो ये शहर भी ठीक है

सुब्ह-शामों पर लिखी नज़्में मुबारक हो तुम्हें
हम मिजाजी हैं ज़रा तो दोपहर भी ठीक है

तल्ख़ काँटों से भरी है ये डगर तो क्या हुआ
साथ है तेरी दुआ तो ये सफर भी ठीक है

वो पुरानी तख्तियों पर दिल बने हैं आज भी
वो पुरानी चिट्ठियों का डाकघर भी ठीक है

इश्क़ तेरी चाह में भटका रहा मै उम्रभर
दरबदर मै ठीक हूँ वो बे-खबर भी ठीक है

इक दफ़ा हो घूमना तो ये शहर भी ठीक है

Wednesday, 18 August 2021

थोड़ी थोड़ी गलती है

मेरी है या तेरी है या किसकी है
हर हिस्से की थोड़ी थोड़ी गलती है

आँखों में सैलाब छुपाकर क्या होगा
रो लेने दो दिल की जबतक मर्जी है

हर कोई तेरे जैसा हो बात गलत
सबकी अपनी रागें अपनी ढपली है

जो जैसा हो उसको वैसा ही मानो
दुनिया अपने ढर्रे पर ही चलती है

उम्मीदों का भार 'तरुण' जब ज्यादा हो
कुछ हटकर करने की जिद तब अच्छी है

Sunday, 18 July 2021

याद आओगे बहुत

जिंदगी का फलसफा दोहराने से पहले
याद आओगे बहुत याद आने से पहले

ये गलियां ये सड़कें बुलाएंगी तुमको
देख लेना इन्हें भूल जाने से पहले

दिल का क्या है कहीं न कहीं तो लगेगा
याद रखना हमें दिल लगाने से पहले

मुस्कुराता हुआ एक चेहरा यहाँ है
सोच लेना यही मुस्कुराने से पहले

हाथ रखना जरूरी है सीने पे अपने
बातें यहाँ की सुनाने से पहले

Sunday, 4 July 2021

मंज़िल नही मिलती

कभी साहिल नही मिलता कभी मंजिल नही मिलती
मेरे ज़ख्मों को जाने क्यों दवा काबिल नही मिलती

कि उसका नाम लेता हूँ तो अपने रूठ जाते हैं
किसी पत्ते की तरहा रोज सपने टूट जाते हैं

इसी इक बात से हिम्मत जुटा लेता हूँ रातों में
अँधेरों के मुसाफिर को कहीं मुश्किल नही मिलती

ख़फ़ा है या रज़ा है वो मुझे कोई तो बतलाओ
अगर मुझसे तुम्हे मतलब तो फिर उसकी खबर लाओ

बिना उसके लिखूँ मै क्या कहूँ मै क्या करूँ मै क्या
मेरी ग़ज़लें हुईं तन्हा इन्हें महफ़िल नही मिलती

वफ़ा के नाम पर कितने सितम अब और सहने हैं
ज़रा कह दो समंदर से ये आँसूँ और बहने हैं

जहाँ पर कत्ल होता है 'मुहब्बत' का 'मुहब्बत' से
वहाँ किस्से तो मिलते हैं मगर क़ातिल नही मिलती

कविराज तरुण 'सक्षम'
साहित्य संगम संस्थान

Thursday, 1 July 2021

संशय

शीर्षक - संशय

संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है
अच्छा खासा व्यक्ति कदम आगे करने से घबराता है

जो भी काम मिले उसको ना कहने की आदत लगती है
सीधी सादी बात उसे तब हिय के भीतर तक चुभती है
लोगों के फिर मानचित्र वो अनायास ही बनवाता है
संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है

निराधार विषयों पर चिंतन कारण बनता है दुविधा का
मार्ग उसे मुश्किल लगता है फिर चाहे वो हो सुविधा का
आड़ी तिरछी रेखाओं में उलझा अपने को पाता है
संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है

चित्त व्यथित हो जाता उसका घोर निराशा छा जाती है
मन की पीड़ा उछल उछल कर अश्रु हृदय से बरसाती है
दूर अकेलेपन का कोहरा चित्र भयानक दर्शाता है
संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है

अच्छा होगा यदि हम केवल कर्मभाव को अपनायेंगे
चिंता शंका वहम छोड़कर मनोयोग से लग जायेंगे
कोशिश करने वाला ही तो अपनी मंजिल को पाता है
संशय मन में आ जाने से सबकुछ दूभर हो जाता है

तरुण कुमार सिंह
प्रबंधक-विपणन विभाग
लखनऊ अंचल

Monday, 21 June 2021

कवि कौन ?

फिर वही प्रश्न कौन हूँ मै
शब्द मूर्छित हैं मौन हूँ मै

कवि को समझने से पहले कविता को समझना बेहद जरूरी है । हम अक्सर शब्दों के फेरों में लिपटी खूबसूरत कविता को देखते हैं , पढ़ते हैं और आगे बढ़ जाते हैं । पर वह कविता कैसी है इससे कहीं ज्यादा ये प्रश्न गंभीर है कि वह कविता क्यों लिखी गई है । हम-आप सब लोग ये जानते हैं कि भावों का लयबद्ध सम्प्रेषण ही कविता है , परंतु कविता इससे कहीं ज्यादा गहरी होती है । कवि ने किन परिस्थितियों में कविता लिखी, उसे आखिर क्या जरूरत पड़ी अपनी भावनाओं को शब्दों में गढ़ने की, उसने क्या कहा और वो कहना क्या चाह रहा था । इन्ही सब बातों में तो कविता का सच छुपा है और कवि का भी । मै नही मानता कि कवि या कविता की तुलना उसकी लय , गति अथवा शिल्प के आधार पर होनी चाहिए , अपितु उसमे निहित भाव ठीक उसी प्रकार दिखे जैसा कवि दिखाना चाहता है तो कविता सफल है ।

हर कहानी में कविता हो न हो पर हर कविता में एक कहानी होती है । बस वही कहानी अपनी कविता में दर्शाना कवि का धर्म है । कवि कभी भी बंधनों में बँधा नही हो सकता । मुक्त भाव ही कवि का सबसे कारगर साधन है । प्रशंसा मनोबल के लिए आवश्यक है परंतु कवि तो वही है जो इन सबसे मुक्त हो । 'कवि कौन' ये प्रश्न कठिन भी है और आसान भी । प्रकृति को देखेंगे तो पशु, पक्षी, पेड़, वायु , अम्बर, बादल सब कवि लगेंगे क्योंकि ये मुक्त होकर अपना भाव प्रकट करते हैं । मनुष्य में कवि को खोजना कठिन है क्योंकि हम जो हैं वो स्वीकारते नही, जैसा होना चाहते हैं वैसा प्रयास करते नही और जो हो सकते हैं वो हो नही पाते । अपने आप को पहचानना ही कवि होना है , अपने अंदर झाँकना ही कविता है ।

एक कहानी सुनाता हूँ - एक व्यवसायी था जिसने वर्षों तक अथक परिश्रम करके अच्छी संपत्ति बना ली। सोते-जागते उसे अपने व्यवसाय की ही धुन सवार रहती। अपने व्यस्त जीवन में उसने महसूस किया कि उसे कढ़वेपन की बीमारी लग गई है। उसे कोई भी मीठी चीज फीकी या कढ़वी लगती । डॉक्टर को दिखाया, वैद्य, हकीम सभी के चक्कर लगा लिए फ़िरभी कोई फर्क नही पड़ा। विज्ञान समाधान खोजने में असमर्थ दिखा। बहुत परेशान होकर उसने एक आश्रम में शरण ली, वहां बैठे गुरूजी से अपना दुखड़ा कहा। वो कहते-कहते रो पड़ा कि बिना मिठास के जीवन का फायदा ही क्या है? गुरूजी हँस पड़े और कहा कि सब सही हो सकता है पर उसके लिए कुछ कठिन कार्य करने होंगे। वह झटपट सब कार्य के लिए तैयार हो गया।

सुबह हवन के लिए लकड़ी काटकर लाना, आश्रम में आये लोगों के लिए भोजन बनाना, आश्रम की सफाई करना और भोजन के नाम पर दिनभर खाली पेट रहने के बाद रात्रि में करेले की सब्जी एक रोटी के साथ खाकर सो जाना। कई दिन बीत गए, उसने मीठेपन की कल्पना करना तक छोड़ दिया।

पर इस नियमावली से तंग आकर आखिरकार वो गुरूजी के पास गया और बोला - गुरुदेव कई दिन से ठीक से भोजन तक नही किया। करेले की सब्जी इतने दिन से खाते-खाते परेशान हो गया हूँ। पहले तो मीठी चीज ही फीकी लगती थी पर अब तो करेला भी फीका लगने लगा है। बिना स्वाद के क्या जिंदगी गुरुदेव?
गुरुदेव ने कहा अभी ये कार्य कुछ दिन और करो।
पर कबतक गुरुदेव? - झुंझलाकर वो बोल पड़ा
जबतक करेले की सब्जी मीठी न लगने लगे - इतना कहकर गुरुदेव मुस्कुरा दिए
उस रात उसने यही सोचकर करेले की सब्जी खाई कि उसे वह मीठी लगे और यकीन मानिये हुआ भी ऐसा ही। वो भागकर गुरुदेव के पास गया और बोला - गुरुदेव आज तो करेला भी मीठा लगने लगा
गुरुदेव हँसकर उसे देखे और फिर बिना कुछ कहे सोने चले गए

सुबह जब वह उठा तो वो समझ चुका था कि अपने स्वाद को पुर्नजीवित करना उसी के हाथ में था पर वो अनायास ही दवाओं और डॉक्टरों की शरण में चला गया। उसने अपने दिनचर्या की व्यस्तताओं और अनिश्चिताओं में उलझकर जीवन के साथ-साथ, जिह्वा के स्वाद को भी कढ़वा कर लिया था। उसने खाने की मिठास को ही नजरअंदाज करना शुरू कर दिया था और शिकायतों के मकड़जाल में खुद को ही बीमार समझ लिया था परन्तु अब उसे सत्य की अनूभूति हो चुकी थी, संवेदना का परिचय हो चुका था, भावनाओं की महत्ता पता चल चुकी थी। उसे जीवन के हर स्वाद की उपयोगिता समझ आ चुकी थी। उसे यह पता चल चुका था कि हम जैसा महसूस करते हैं वैसे ही बन जाते हैं। अपने अंदर बसे जीव को पहचानना उसे आ चुका था, उसे यह पता चल चुका थे कि भावशून्य व्यक्ति स्वादहीन हो जाता है। अब वो भावप्रधान हो चुका था। उसे अपने अंदर की भावनाओं को पढ़ना और उसे प्रकट करना आ चुका था। वास्तव में अब स्वयं के लिए वो एक कवि बन चुका था।

कविराज तरुण

Friday, 18 June 2021

ग़ज़ल - तुम हो

मेरी जिंदगी की ग़ज़ल खास तुम हो
मेरी हर दुआ मेरी अरदास तुम हो

मै जब भी गुजरता हूँ तेरी गली से
मेरी धड़कनों की अहसास तुम हो

नही है किसी की मुझे अब जरूरत
ये दुनिया मेरी है अगर पास तुम हो

बनाया है तुमने बिगाड़ा है तुमने
मेरी इस कहानी का इतिहास तुम हो

समंदर तुम्ही हो ये दरिया तुम्ही हो
मेरी इन निगाहों की हर प्यास तुम हो

कविराज तरुण

Sunday, 6 June 2021

श्रीराम दिखाता सीने में

रघुनंदन की उस महिमा का गुणगान दिखाता सीने में
मै देवधरा के कण कण का अभिमान दिखाता सीने में

हाँ ! मुझमें अंश समाहित है उस मर्यादा पुरुषोत्तम का
हनुमान नही हूँ वर्ना मै भगवान दिखाता सीने में

भगवान दिखाता सीने में श्रीराम दिखाता सीने में

Friday, 28 May 2021

क्या मुझसे मिलने आओगी

मेरे अविनाशी मन का हर भाव तुम्हे जब प्रेषित हो
मेरे चित्तपटल पर तेरा नाम स्वयं आलेखित हो

तब तुम मिलने आओगी क्या मुझसे मिलने आओगी
तोड़ सभी ये बंधन तुम क्या मेरा साथ निभाओगी

अरुणांचल को छोड़ अरुण जब रूप चाँद का धर लेगा
दिन का उजियारा जब दीपक अपनी लौ में भर लेगा
जब अम्बर के तारे गिनते गिनते मै सो जाऊँगा
जब स्वप्नों की अमरबेल पर तुमको पास बुलाऊँगा

तब तुम मिलने आओगी क्या मुझसे मिलने आओगी
तोड़ सभी ये बंधन तुम क्या मेरा साथ निभाओगी

अधरालय की त्रिज्या से बात तुम्हारी की जायेगी
नयनों की हर कोन दिशा चित्र तुम्हारे दर्शायेगी
जब पुष्पों की गंध हृदय के भीतर आच्छादित होगी
ऋतुओं की जब भाव-भंगिमा तुमपर आधारित होगी

तब तुम मिलने आओगी क्या मुझसे मिलने आओगी
तोड़ सभी ये बंधन तुम क्या मेरा साथ निभाओगी

यदि मै सात वचन देने का वचन तुम्हारे नाम करूँ
अग्नि धरा जल जीवन अम्बर पवन तुम्हारे नाम करूँ
यदि मै नाम करूँ सब अपना जो भी मैंने पाया है
तुमसे कह दूँ तुम ही सच हो बाकी सब तो माया है

तब तुम मिलने आओगी क्या मुझसे मिलने आओगी
तोड़ सभी ये बंधन तुम क्या मेरा साथ निभाओगी

कविराज तरुण

Tuesday, 18 May 2021

ग़ज़ल - बू आ रही है

खतों से अजब आज बू आ रही है
कहीं कोई साजिश रची जा रही है

महकते थे जो वो दहकने लगे हैं
के हर लफ्ज़ साँसों को सुलगा रही है

न रंगों की बातें न फूलों की खुशबू
मुहब्बत नये ढंग अपना रही है

किनारे खड़ा कौन कबतक रहेगा
लहर तेज साहिल से टकरा रही है

बड़ी देर कर दी 'तरुण' आपने भी
ये दुनिया तो कबसे ही समझा रही है

कविराज तरुण

Friday, 14 May 2021

शायरी - खंडहर

विरासत में रख लेना ईमारत मेरी
एक उम्र लगी है इसे बनाने में
हर एक ईंट लहू से जोड़ी है
तब ये दीवार खड़ी ज़माने में

कविराज तरुण

Thursday, 13 May 2021

गुमान से निकला

अपने खुद के गुमान से निकला
तेरी महफ़िल मकान से निकला

मेरा जाना तो ऐसे जाना है
तीर जैसे कमान से निकला

था चराग़ों सा बंद कमरे में
आज मै आसमान से निकला

जब लिखा था अजाब सहना है
खामखाँ इम्तिहान से निकला

तू भी जिंदा है मै भी जिंदा हूँ
दर्द केवल जुबान से निकला

हीर राँझा फराद शीरी क्यों
तू नये खानदान से निकला

कविराज तरुण

Monday, 10 May 2021

नही मिलती

कभी साहिल नही मिलता कभी मंजिल नही मिलती
मेरे ज़ख्मों को जाने क्यों दवा काबिल नही मिलती
के उसका नाम लेता हूँ तो अपने रूठ जाते हैं
मेरी ग़ज़लें रहें तन्हा उन्हें महफ़िल नही मिलती

Saturday, 8 May 2021

ना बहलाओ तुम

उसके जैसा चहरा किसका अच्छा ये बतलाओ तुम
चाँद अगर तुम ला सकते हो तो धरती पर लाओ तुम

फूलों की खुशबू तो उसके आने से ही आती है
हाथों में गुलदस्ता देकर हमको ना बहलाओ तुम

मै पागल हूँ आशिक़ हूँ तो दर्द हमारे हिस्से है
चारा साजी कहकर दिल पर मरहम ना सहलाओ तुम

Monday, 3 May 2021

बचपन के दिन

बचपन के दिन बहुत याद आते हैं
चलो, हम फिर से वहीं लौट जाते हैं

एक मुद्दत से हँसना भूल गए हम
चलो, दो पल ठहरकर मुस्कुराते हैं

जो लोग इस दौड़ में पीछे छूट गए हैं
चलो, उन्हें मुड़कर आवाज़ लगाते हैं

हक़ीक़त का ये आईना कितना बुरा है
चलो, रेत पर नई तस्वीर बनाते हैं

दौलत शौहरत सियासत में उलझते रहे
चलो, नीम की छाँव तले वक्त बिताते हैं

हमें क्या मिला ? ये सवाल बेहद कठिन है
चलो, जो मिला उसी को आजमाते हैं

कविराज तरुण

Tuesday, 27 April 2021

ग़ज़ल - सवाल खो गया

जवाब दूंढते रहे सवाल खो गया
ये देखिये शहर का कैसा हाल हो गया

किसान इकतरफ लड़ाई लड़ रहे वहाँ
जहाँ कफन सँभालता वो लाल सो गया

लताड़ रोज लग रही है कोर्ट से मगर
चुनाव फिर भी हो रहा कमाल हो गया

वो आये और 'मन की बात' कह के चल दिये
ये पैंतरा तो फिर से इक मिसाल हो गया

दिखा सके जो सच 'तरुण' वो आइना कहाँ
ये मीडिया ही आजकल दलाल हो गया

कविराज तरुण

Monday, 26 April 2021

ग़ज़ल - आजकल

शहर की आजकल मेरे हवा खराब है
सुलग रही जमीं फलक ये माहताब है

अभी अभी खबर मिली कहीं गया कोई
अभी अभी दिलों का खौफ़ कामयाब है

जली हुई चिता की आग देख सामने
डरा हुआ सिमट रहा वो आफताब है

मिले अगर खुदा तो पूछ लूँगा मै उसे
तू जिंदगी का ले रहा ये क्या हिसाब है

सवाल जस का तस यही बना हुआ 'तरुण'
वो कौन बेरहम कुचल रहा गुलाब है

कविराज तरुण

Sunday, 25 April 2021

ग़ज़ल - कुछ नही होगा




आप अपनी हेल्थ की चिंता न ज्यादा कीजिये
ठीक हो जायेगा सबकुछ ये भरोसा कीजिये

क्या हुआ जो आप थोड़ा सा हुए बीमार हैं
'हिम्मते मर्दे खुदा' बस ये ही सोचा कीजिये

मुश्किलों से है भरा पर वक़्त ये कट जायेगा

फुर्सतों में आप हँस के वक्त काटा कीजिये

पॉजिटिव हो सोच तो फिर हर जगह ही जीत है
शांत मन के साथ सबसे बात साँझा कीजिये

भाँप लेना है जरूरी ले सकें जितनी दफा
और यदि मौका मिले तो योग थोड़ा कीजिये

मास्क चहरे पर लगाना है जरूरी जान लो

हाथ धोने का कभी मौका न छोड़ा कीजिये

है दवा उपलब्ध तो घबरा रहे हो क्यों 'तरुण'
'कुछ नही होगा' ये मन मे भाव पैदा कीजिये

कविराज तरुण

Friday, 23 April 2021

लेकिन फरक किसको पड़े

जिंदगी लाचार है लेकिन फरक किसको पड़े
हर कोई बीमार है लेकिन फरक किसको पड़े

वो चुनावी जंग के फिर सूरमा बनने चले
वाह क्या सरकार है लेकिन फरक किसको पड़े

कुंभ में जमकर नहाने चल दिये हैं इकतरफ
इकतरफ इफ़्तार है लेकिन फरक किसको पड़े

ब्लैक मे ही बिक रही है ये हवा औ ये दवा
चोर थानेदार है लेकिन फरक किसको पड़े

जान का जोखिम लिए वो काम पर तो जा रहा
घुस गया व्यापार है लेकिन फरक किसको पड़े

हरतरफ बस मौत का ही खेल चालू हो गया
खूब हाहाकार है लेकिन फरक किसको पड़े

कविराज तरुण


Thursday, 15 April 2021

जन्मदिवस बधाई

उन्मुक्त सोच के बलबूते जिसने सबको आवाजें दी हैं
संघर्षों के बीच भँवर मे जिसकी सारी उम्र तपी है
जो लोगों के हृदयांगन में जड़ें जमाये बैठा है
जिसने सूरज को पश्चिम से भी भोर निकलते देखा है

उनको उनके जन्मदिवस पर ढेरों-ढेर बधाई हो
स्वास्थ्य रहे मंगल मंगल उज्ज्वल सी परछाई हो

जिसने जीवन के हर लम्हे से लड़कर जीना सीखा है
जिसने विष का प्याला भी हँसकर पीना सीखा है
जिसको अपने से ज्यादा ही दूजे की चिंता रहती है
जिसके मन में निर्मल पावन गंगा अविरल बहती है

उनको उनके जन्मदिवस की ढेरों-ढेर बधाई हो
मधुर-मधुर संगीत सुनाती जीवन में पुरवाई हो

जिसको अपना कहने में गर्व हमेशा होता है
जिसके आदर्शों की बगिया में मन हम सबका खोता है
जिसकी लंबी उम्र रहे ये दुआ स्वयं ही आती है
जिससे मिलने से हर चिंता खुद गायब हो जाती है

उनको उनके जन्मदिवस की ढेरों-ढेर बधाई हो
खुशियों से भरपूर सदा हर सपनें की भरपाई हो


Sunday, 28 March 2021

शायरी अपडेट

बिना भरे ही छलक रहीं हैं मै और मेरे तमाम बातें
है स्याह जैसी घनी अँधेरी मै और मेरी तमाम रातें
न कोई अपना मिला हमें तो किया सभी ने सदा किनारा
तुम्हे मुबारक हों सारे रिश्ते तुम्हे मुबारक तमाम नाते

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है इश्क़ फिर तो मलाल कैसा
जुबाँ पे फिर ये सवाल कैसा
तुम्हे पता है तुम्हे खबर है
मेरे शहर का है हाल कैसा

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सितारों की चमक लेके जमीं पर आसरा लूँगा
मै पानी की तरह बहकर समंदर पार पा लूँगा
मुझे तेरे रिवाज़ो से नही कोई भी मतलब है
कि जिसदिन ठान लूँगा मै तुम्हे अपना बना लूँगा

मुहब्बत है नई फिरभी कशिश इसमें पुरानी है
बड़ी ही बंदिशों वाली तेरी मेरी कहानी है
जमाने के बदलने से बदलता है नही सबकुछ
हमें छुपकर भी रहना है निगाहें भी मिलानी है

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मेरी बेबाक नजरें जो कहती रहीं जान कर तू उन्हें जान पाया नही
आके रह जाओ दिल में मेरे उम्रभर यहाँ लगता ज़रा भी किराया नही

वो जो बातें हुईं थीं मेरे साथ में तुम उन्हें भूलने की न कोशिश करो
यार सबकुछ मिलेगा तुम्हें प्यार से बस जरूरी खुदा से कि ख़्वाहिश करो

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मेरी बेबाक नजरें जो कहती रहीं जान कर तू उन्हें जान पाया नही
आके रह जाओ दिल में मेरे उम्रभर यहाँ लगता ज़रा भी किराया नही

वो जो बातें हुईं थीं मेरे साथ में तुम उन्हें भूलने की न कोशिश करो
यार सबकुछ मिलेगा तुम्हें प्यार से बस जरूरी खुदा से कि ख़्वाहिश करो

Sunday, 21 March 2021

क्या फायदा

बिन तुम्हारे दिल लगाने का भला क्या फायदा
बिन तुम्हारे प्यार पाने का भला क्या फायदा

चौदवीं का चाँद हो या चाँद की भी कल्पना
तुम स्वयं श्रृंगार हो या हो रती की साधना
दृष्टि के हर छोर पर तुम विराजित हो रही तो
नेत्र पर अंकुश लगाने का भला क्या फायदा
बात आँखों की छुपाने का भला क्या फायदा

सात जन्मों का वचन देकर बढ़ाया हाथ ये
आपने क्यों राम छोड़ा सहचरी का साथ ये
दूर रखते इन वनों से प्रियतमे की देह को
आग लंका में लगाने का भला क्या फायदा
धर्म की बातें सिखाने का भला क्या फायदा

सूर्य को यदि दिन मिला तो चाँद को ये रात भी
है कहीं पर अंत तो फिर है कहीं शुरुआत भी
जीत खुद उसका वरण करती है जिसमे शक्ति हो
बिन लड़े ही हार जाने का भला क्या फायदा
स्वप्न आँखों मे सजाने का भला क्या फायदा

Saturday, 6 March 2021

ख़ाक-ए-तमाम

खाक-ए-तमाम होने का सिलसिला चलने लगा
उम्र ये बढ़ने लगी तो फासला बढ़ने लगा
हसरतों की प्यास में दरिया दरिया घूमकर
दिल ये मेरा बेदिली का दाखिला करने लगा

Friday, 5 March 2021

अटल हो गया

मेरा सपना अधूरा सकल हो गया
तू सफल हो गयी मै विफल हो गया

तुमको दिल दे दिया ये है गलती मेरी
अपने दिल से ही मै बेदखल हो गया

मैंने देखा जिसे वो हुआ खंडहर
तूने देखा जिसे वो महल हो गया

तुम हुई न कभी मेरी मायावती
मै तुम्हारे लिए ही अटल हो गया

सुर्ख कांटो से जख़्मी मेरा हाथ है
तू चमकता हुआ सा कमल हो गया

कविराज तरुण

Friday, 26 February 2021

मुश्किल हो जाता है

अक्सर तुमसे मन की बातें कहना मुश्किल हो जाता है
रेत में जैसे पानी का ही बहना मुश्किल हो जाता है

चुप रहकर सहते सहते एक उम्र हमारी बीत गई
बाधायें इतनी आईं कि निर-आशा भी जीत गई

ऐसे विषमकाल मे कुछ भी सहना मुश्किल हो जाता है
अक्सर तुमसे मन की बातें कहना मुश्किल हो जाता है

हमने जेठ दुपहरी में भी घंटों तेरी राह तकी है
सर्दी मे भी ठिठुर-ठिठुरकर छत पर जाकर बातें की हैं

अब जाने क्यों साथ मे तेरे रहना मुश्किल हो जाता है
अक्सर तुमसे मन की बातें कहना मुश्किल हो जाता है

Saturday, 30 January 2021

3. प्रियतमे

कबसे सोया हुआ हूँ उठा जाओ न
चाय हाथों से अपने पिला जाओ न
#प्रियतमे ! पास मेरे चले आओ तुम
चाँद सा रूप अपना दिखा जाओ न

2. प्रियतमे

बात साँझा करूँ क्या किसी और से
दिल लगाया करूँ क्या किसी और से
#प्रियतमे ! पास मेरे चले आओ तुम
वक़्त ज़ाया करूँ क्या किसी और से

1. प्रियतमे

तुम विटामिन हो मेरे बदन के लिए
गुनगुनी धूप हो सर्द मन के लिए
#प्रियतमे ! पास मेरे चले आओ तुम
प्रेम आतुर मेरा है मिलन के लिए

Friday, 29 January 2021

मुक्तक - सहना पड़ता है

जीवन मे तो दर्द सभी को सहना पड़ता है
पानी बनकर पर्वत से भी बहना पड़ता है
चुप रहकर ही कौन समझ पाया है बातों को
अपने दिल का हाल कभी तो कहना पड़ता है

Thursday, 28 January 2021

ग़ज़ल - मंजूर है

क्या हुआ जो इश्क़ हमसे दूर है
वक़्त का हर फैसला मंजूर है

फासला दो चार दिन से ही हुआ
दर्द लेकिन हर जगह मशहूर है

दिल पे उसके है मेरी ही मलकियत
आँख में जिंदा मेरा ही नूर है

वो सुहागन बन गई है गैर की
मांग में फिरभी मेरा सिंदूर है

कविराज तरुण

Monday, 18 January 2021

गीत - आधा भाव

तेरी मीठी बातें सुनकर , वैरागी को प्यार हुआ
आधा भाव समर्पण का है , आधे पर अधिकार हुआ

किसी डोर से बाँध रहा वो , मेरे चाँद सितारों को 
किसी छोर से साध रहा वो , मन के  इन अँधियारों को 
उसकी आँखों के सूरज में , दिन का ये विस्तार हुआ
आधा भाव समर्पण का है , आधे पर अधिकार हुआ

तुमसे मिलकर विरह तान भी , मधुर गीत बन जाती है
तुमसे मिलकर नागफनी भी , मंद मंद मुस्काती है
ऐसे में तुमको पाकर मै , खुशियों का आगार हुआ
आधा भाव समर्पण का है , आधे पर अधिकार हुआ

नेह लिए तुम आई जबसे , मेरे मन के आँगन में
झूल रहा मन पेंग मार के , जोर जोर से सावन में
नई किरण का नये पहर में , नया नया संचार हुआ
आधा भाव समर्पण का है , आधे पर अधिकार हुआ

गंगाजल सा हृदय तुम्हारा , और फूल सी काया है
रूप गढ़ा ये कूट कूट के , प्रभु की कैसी माया है
सतरंगी सपनों का जैसे , चिर यौवन श्रृंगार हुआ
आधा भाव समर्पण का है , आधे पर अधिकार हुआ

कविराज तरुण

Thursday, 14 January 2021

जैसे जमाना चाहे

रेत में क्यों कोई फूल उगाना चाहे
वैसे ढल जायेंगे जैसे ये जमाना चाहे

बात उम्मीद की सुनने में अच्छी है
अपने हालात भला कौन बताना चाहे

छोड़ के वो तो गया ये तेरा मुकद्दर है
क्या हुआ दिल कहीं और ठिकाना चाहे

हर जुर्म इसी बात पे बढ़ता ही चला जाता है
मै दर्द छुपाना चाहूँ वो जुर्म छुपाना चाहे

रायशुमारी से तेरा कुछ नही होगा
उसको दूंढो जो तेरा बोझ उठाना चाहे

कविराज तरुण

ग़ज़ल - निगहबान था

जिसकी सूरत का दिल ये कदरदान था
वो किसी और के दिल का महमान था

ख्वाब उल्फ़त के यूँही बिखर जायेंगे
बात से बेखबर मै तो अनजान था

उसकी हर मुश्किलों में उलझता रहा
मै इन्ही आदतों से परेशान था

हाथ आया नही फूल मुझको कभी
मै बगीचे का कबसे निगहबान था

वो जिसे मै खुदा ही समझता रहा
वो मुसलसल सा बस एक इंसान था

कविराज तरुण

ग़ज़ल - नमी आपसे

दिल लगाया था हमने कभी आपसे
आज आंखों मे आई नमी आपसे

और कोई कहे तो कहे माफ है
तू भी पागल कहे तो दुखी आपसे

एक दिन तो बुझेगा दिया प्यार का
आँधियों की हुई दोस्ती आपसे

नाम आता है जब भी जुबां पर तेरा
मुझको मिलती नही है खुशी आपसे

कविराज तरुण

Thursday, 7 January 2021

नववर्ष

रश्मियाँ भोर की कल तो आएँगी पर
रात स्वप्निल सुधा सी अमर कर दो
सोच लो ठान लो मन का संज्ञान लो
इस हिमालय से ऊँचा शिखर कर दो

रश्मियाँ भोर की कल तो आएँगी पर
रात स्वप्निल सुधा सी अमर कर दो

प्यार के द्वार पर हिय का दरबार है
आत्म चिंतन से संभव ये उद्गार है
नेत्र की अंजलि में चमक जीत की
बोली भाषा बने यों सहज फूल सी
कि लगे सब तरफ सिर्फ मुस्कान है
ये नया वर्ष आकर्ष मेहमान है

इन विचारों का मन में बसर कर दो
रात स्वप्निल सुधा से अमर कर दो

रश्मियाँ भोर की कल तो आएँगी पर
रात स्वप्निल सुधा सी अमर कर दो

तरुण कुमार सिंह
प्रबंधक
विपणन विभाग
लखनऊ

Saturday, 19 December 2020

गीत - उम्मीदों का तारा देखा

गीत - उम्मीदों का तारा देखा

काली तम की रेखाओं में , मैंने फिर उजियारा देखा
उम्मीदों का तारा देखा , उम्मीदों का तारा देखा

मेघ गगन पर आच्छादित था , और निशा छाई थी मन मे
प्रेम हृदय में संचित करने , भटक रहा था मै उपवन में

तभी दूर पर्वत पर मैंने , जलता हुआ सितारा देखा
उम्मीदों का तारा देखा , उम्मीदों का तारा देखा

राह कठिन थी पलपल माना , छोर-छोर पर निर-आशा थी
टूट रही थी पतझड़ बनके , जो भी मन में अभिलाषा थी

तभी राह का भेद बताते , मैंने एक इशारा देखा
उम्मीदों का तारा देखा , उम्मीदों का तारा देखा

झूठ बराबर छलक रहा था , कुंठाओं के साथ शहर में
अँधियारे की विकट कालिमा , घिरी हुई थी आठ पहर में

सच का दीप लिए तब हाथों , मैंने हाथ तुम्हारा देखा
उम्मीदों का तारा देखा , उम्मीदों का तारा देखा

आँच नही आ सकती सच पर , उम्र झूठ की क्षणभंगुर है
घोर तमस की परिपाटी पर , बीज सत्य का ही अंकुर है

इसी सत्य के लिए सदा ही , झूठ को मैंने हारा देखा
उम्मीदों का तारा देखा , उम्मीदों का तारा देखा

अंधे एक थपेड़े से ही , दूर हुई थी नाँव हमारी
शून्य हुआ था जलथल जीवन , छाई आँखों में अँधियारी

तभी जोहते बाँट हमारी , मैंने पास किनारा देखा
उम्मीदों का तारा देखा , उम्मीदों का तारा देखा

काली तम की रेखाओं में , मैंने फिर उजियारा देखा
उम्मीदों का तारा देखा , उम्मीदों का तारा देखा

तरुण कुमार सिंह
प्रबंधक
अंचल कार्यालय, लखनऊ
क. सं. - 57228

Thursday, 29 October 2020

ग़ज़ल - मुहब्बत

#ग़ज़ल - #मुहब्बत
#कविराजतरुण
#साहित्यसंगमसंस्थान

मुहब्बत में कोई भी पेशकश तो की नही जाती
अगर हो फूल कागज का तो फिर खुशबू नही आती

बना लोगे बहाने तुम मगर ये हो न पायेगा
जहाँ पर दिल नही लगता वहाँ नींदें नही आती

जो अपने इश्क़ को ही मान बैठा है खुदा बिस्मिल
उसे हर चीज मिल जाये मगर कुछ भी नही भाती

ज़रा सा चाँद पर बादल का पहरा और छाने दो
मुसीबत के बिना तो दिल्लगी भी हो नही पाती

'तरुण' हर दीन मजहब से यही तुम बोल कर आना
मुहब्बत से किसी भी धर्म की इज्जत नही जाती

चलो कुछ सोचते हैं

#विषय - #चलोकुछसोचतेहैं
#गीत
#कविराजतरुण
#साहित्यसंगमसंस्थान

चलो कुछ सोचते हैं आज नूतन
बजे जिससे खुशी के साज नूतन

बुरा कुछ भी नही सबका भला हो
महकते फूल से हर घर सजा हो
किसी को चोट ना पहुँचे कभी भी
कि मन को जीत लेने की कला हो
मिठाई सी लगे आवाज नूतन

चलो कुछ सोचते हैं आज नूतन
बजे जिससे खुशी के साज नूतन

करे सम्मान सबकी भावना का
विचारों की नई आराधना का
कदम मिलकर बढ़ाएं साथ ऐसे
कि पूरा हो मनोरथ साधना का
मिले सबको खुशी का ताज नूतन

चलो कुछ सोचते हैं आज नूतन
बजे जिससे खुशी के साज नूतन

सितारों सा सदा तुम जगमगाना
कि चिड़ियों से सदा ही चहचहाना
न डरना तुम ज़रा भी मुश्किलों से
हवाओं में खुशी के गीत गाना
बदलना तुम नही अंदाज नूतन

चलो कुछ सोचते हैं आज नूतन
बजे जिससे खुशी के साज नूतन

Wednesday, 16 September 2020

आ चले हम

बादलों की सीढ़ियों से आसमाँ तक आ चले हम
खोजें रस्ते मंजिलों के मुश्किलों से ना डरे हम
हर वो तिनका है प्रभू का सब तो उनके हाथ मे है
कौन क्या कर पायेगा जब वो हमारे साथ मे है

कविराज तरुण

Friday, 11 September 2020

राजभाषा हिंदी

राजभाषा हिन्दी

उठो ! जागो ! निज भाषा को अपना लो 
हिन्दी बुला रही है.. ऐ हिन्दुस्तानी ! लाज बचा लो

मै पुरखों की अतुल्य धरोहर,
और संस्कृत की बेटी हूँ ।
सिंहासन पर पली-बढ़ी मै,
आज चिता पर लेटी हूँ ।।

सहज , सरस और सरल सा,
मेरा ये इतिहास बड़ा ।
आकर काश मुझे कर दे तू,
निज पंजों पर फिरसे खड़ा ।

विस्मित माँ की आँखों से.. आँसू की हर बूँद हटा लो
हिन्दी बुला रही है.. ऐ हिन्दुस्तानी ! लाज बचा लो

एक हजार वर्षों से ज्यादा,
मैंने देश की सेवा की है ।
अवधी ब्रज बुंदेली मगही,
सब तो मेरी ही बोली है ।।

आजादी की लड़ी लड़ाई,
संविधान में शामिल हूँ मै ।
देशप्रेम की अलख जगाई,
जनवाणी हूँ काबिल हूँ मै ।।

फिल्मी दुनिया खुद कहती है.. हिंदी से संगीत सजा लो
हिन्दी बुला रही है.. ऐ हिन्दुस्तानी ! लाज बचा लो

तरुण कुमार सिंह
प्रबंधक 
विपणन विभाग - लखनऊ अंचल
क. सं. 57228

Tuesday, 25 August 2020

उम्मीदों का तारा देखा

गीत - उम्मीदों का तारा देखा

काली तम की रेखाओं में
मैंने फिर उजियारा देखा
उम्मीदों का तारा देखा

मेघ गगन पर आच्छादित था
और निशा छाई थी मन मे
प्रेम हृदय में संचित करने
भटक रहा था मै उपवन में

तभी दूर पर्वत पर मैंने
जलता हुआ सितारा देखा
उम्मीदों का तारा देखा

झूठ बराबर छलक रहा था
गगरी से उन मक्कारों की
छोटे मन के लोग मिले बस
नगरी से उन हत्यारों की

सच का दीप लिए हाथों में
मैंने हाथ तुम्हारा देखा
उम्मीदों का तारा देखा

आँच नही आ सकती सच पर
उम्र झूठ की क्षणभंगुर है
घोर तमस की परिपाटी पर
बीज सत्य का ही अंकुर है

इसी सत्य के लिए सदा ही
झूठ को मैंने हारा देखा
उम्मीदों का तारा देखा

अंधे एक थपेड़े से ही
दूर हुई थी नाँव हमारी
शून्य हुआ था जलथल जीवन
छाई आँखों में अँधियारी

तभी जोहते बाँट हमारी
मैंने पास किनारा देखा
उम्मीदों का तारा देखा

काली तम की रेखाओं में
मैंने फिर उजियारा देखा
उम्मीदों का तारा देखा
उम्मीदों का तारा देखा

कविराज तरुण

शेरों शायरी

बस इतना ही उनसे
अब सिलसिला रहा
कुछ गलतफहमी रही
कुछ शिकवा गिला रहा

सुंदरता इक जाने कैसा सच्चा झूठा स्वप्न हुआ
देखूँ जिसके मन के भीतर चोर दिखाई देता है
कलुषित कुंठित अभिमानी बन बैठे हैं जो गद्दी पर
उनकी ओछी बातों में इक शोर सुनाई देता है

Sunday, 23 August 2020

पुकारों यारों

बहुत शोर है यहाँ जोर से पुकारो यारों
ठहरे पानी में एक कंकड़ तो मारो यारों
कौन कहता है हमसे ये होगा नही
कोई रस्ता नया खोज के निकालो यारों

Saturday, 8 August 2020

राम

राम

राम ही शब्द हैं राम ही अर्थ हैं
राम आराध्य हैं राम उत्कर्ष हैं

राम एक सोच हैं राम विश्वास हैं
राम से ही धरा राम आकाश हैं

राम कण कण में हैं राम क्षण क्षण में हैं
राम जड़ जड़ में हैं राम तृण तृण में हैं

राम संजीवनी राम तारण भी हैं
राम ही सब दुखों का निवारण भी हैं

राम जीवनकला राम संघर्ष हैं
राम प्रारब्ध हैं राम निष्कर्ष हैं

राम ही शब्द हैं राम ही अर्थ हैं
राम आराध्य हैं राम उत्कर्ष हैं

राम से है जुड़ी देश की भावना
राम के नाम से सारी संभावना

राम ही प्राण हैं राम सर्वत्र हैं
भूमि जल ये गगन राम के क्षत्र हैं

राम ही श्लोक हैं राम ही मंत्र हैं
राम सद्भाव का मूल ही तंत्र हैं

राम से प्रीत है राम संगीत हैं
राम ही सत्य हैं राम ही जीत हैं

राम हर व्यक्ति में व्याप्त सामर्थ्य हैं
राम हैं चिर सखा राम आकर्ष हैं

राम ही शब्द हैं राम ही अर्थ हैं
राम आराध्य हैं राम उत्कर्ष हैं

कविराज तरुण

Friday, 24 July 2020

ग़ज़ल - प्यार कीजिये उसे

#साहित्यसंगमसंस्थान
#ग़ज़ल - प्यार

212121212121212

प्यार से मिले कोई तो प्यार कीजिये उसे
एकबार प्यार से पुकार लीजिये उसे

जाने कैसी उलझनों मे जी रहा है वो अभी
गौर से कभी कभी निहार लीजिये उसे

तेरा क्या है मेरा क्या है कौन लेके जायेगा
अपने हक की चीज भी उधार दीजिये उसे

बार बार कोसने से होगा तेरा क्या भला
नेकभाव से कभी विचार लीजिये उसे

प्यार से बड़ी कोई भी मापनी बनी नही
आप प्यार मे 'तरुण' उतार लीजिये उसे

कविराज तरुण

Tuesday, 21 July 2020

आत्मनिर्भर भारत

आत्मनिर्भर भारत

ये एक दौर है तुम इसे बीत जाने दो
बुरा वक्त तो आता है और निकल जाता है
जिसने दूसरों को हँसने के मौके दिए
एक न एक दिन वो जरूर मुस्कुराता है

तुम्हे किस बात की फिक्र है
तुम्हे किस चीज़ पर ऐतराज है
ऐसा कौन है जो कभी हारा नही
ऐसा कौन जो हुआ बे-सहारा नही

पर खुद को तो संभालना पड़ता है
अपने आप को निखारना पड़ता है
मुसीबतों से घबराकर आखिर क्या होगा
इन्हीं हाथों से मुकद्दर सँवारना पड़ता है

पाँचो उँगलियाँ बराबर नही होतीं
हर मौसम एक जैसे नही होते
सही मौके की तलाश में चलते रहो तो
मंजिल की ओर बढ़ता रास्ता नजर आता है

ये एक दौर है तुम इसे बीत जाने दो
बुरा वक्त तो आता है और निकल जाता है
जिसने दूसरों को हँसने के मौके दिए
एक न एक दिन वो जरूर मुस्कुराता है

डर तो लगता है इसमे कोई नई बात नही
सूरज कल दस्तक देगा हमेशा ये रात नही
बस एक उम्मीद का दिया जलाना जरूरी है
जो हो गया सो हो गया उसे भुलाना जरूरी है

अपनी ताकत पहचानो और जमकर प्रयास करो
काबिल नही हो अगर तो भी अभ्यास करो
ऐसा कुछ भी नही जो तुम कर नही पाओगे
इन्ही कदमों से एकदिन फलक छू के आओगे

बस 'आत्मनिर्भर' होने का अहसास जरूरी है
अपने हौसलों पर ज़रा सा विश्वास जरूरी है
फिर देखना तस्वीर बदल जायेगी देश की जहान की
तुम्हारे हाथों मे छुपी है तकदीर हिंदुस्तान की

ये एक दौर है तुम इसे बीत जाने दो
बुरा वक्त तो आता है और निकल जाता है
जिसने दूसरों को हँसने के मौके दिए
एक न एक दिन वो जरूर मुस्कुराता है

तरुण कुमार सिंह
(कविराज तरुण)
7007789629
प्रबंधक - यूको बैंक

Friday, 17 July 2020

ग़ज़ल - मिला कीजिये

#साहित्यसंगमसंस्थान

जब भी मौका मिले तो मिला कीजिये
दर्द-ए-दिल की यही इक दवा कीजिये

प्यार में और कुछ तो जरूरी नही
पर जरूरी है इसमें वफ़ा कीजिये

दिलनशीं फूल सा तेरा ये रूप है
मेरी आँखों मे आके रहा कीजिये

चाँद का हो रहा चाँदनी से मिलन
आप भी हो सके तो मिला कीजिये

इश्क़ में जो हुआ वो तो बढ़िया हुआ
इस 'तरुण' के लिए सब दुआ कीजिये

कविराज तरुण

ग़ज़ल - फैसला कीजिये

#ग़ज़ल
#साहित्यसंगमसंस्थान

212 212 212 212

हर बुरी चीज से फासला कीजिये
मशविरा सिर्फ ये मत बुरा कीजिये

चाहिए उस खुदा की जो रहमत तुम्हे
उसके बंदों का खुलकर भला कीजिये

वक़्त के साथ चलने से होगा ही क्या
वक़्त के बाद का हौसला कीजिये

कोशिशों के बिना कुछ भी मिलता नही
कुछ अलग कीजिये कुछ नया कीजिये

एकदिन तो सभी को है जाना 'तरुण'
राह का आप ही फैसला कीजिये

कविराज तरुण
#साहित्यसंगमसंस्थान

Thursday, 16 July 2020

गीत - सावन

#विषय - सावन

जाने कब ये सावन आया , जाने कब बरसात हुई
सुंदर सपनों की कोशिश में , मेरी बीती रात हुई

जो भी मैंने सोचा था वो , नही अभी तक पूर्ण हुआ
मेरे सपनों का शीशा ये , रगड़-रगड़ कर चूर्ण हुआ

मन को बहलाने वाली भी , नही अभी तक बात हुई
जाने कब ये सावन आया , जाने कब बरसात हुई

प्रेमपथिक की मुश्किल इतनी , कलयुग के इस बंधन में
प्रेमसुधा का आशय सीमित , नश्वर वाले इस तन में

मन के भीतर के भावों को , नही कोई भी जाने अब
केवल झूठी दुनिया को ही , हर कोई पहचाने अब

पृष्ठों पर पीड़ा अंकन की , देखो अब शुरुआत हुई
जाने कब ये सावन आया , जाने कब बरसात हुई

कविराज तरुण
#साहित्यसंगमसंस्थान

Friday, 10 July 2020

ग़ज़ल - वार कर

#साहित्यसंगमसंस्थान
#दैनिककार्यक्रम : १०.०७.२०२०

एक शेर मिसरा के वास्ते-

मंजिलों की शर्त है बस मुश्किलों को पार कर
और मेरी जिद हदों के पार सीमा यार कर

#ग़ज़ल 

काफ़िया- आर
रदीफ़- कर
वज्न- 2122 2122 2122 212

दानवों का अंत करके देश का उद्धार कर
हर बुराई का बराबर भाव से संहार कर

जो किसी की जिंदगी का मोल करता है नही
धर्म कहता है कि खुलकर तू उसी पर वार कर

रौब अपना झाड़कर बे-खौफ घूमें सिरफिरें
तो जरूरी है तेरा तू अपनी सीमा पार कर

कामयाबी के नशे में जुल्म जब बेहद बढ़े
तब यकीनन पार्थ उसकी जोर से फटकार कर

न्याय की तहरीर में सबकुछ नही मिलता 'तरुण'
तू कभी तो न्याय की खातिर कोई यलगार कर

कविराज तरुण
साहित्य संगम संस्थान

Monday, 6 July 2020

गीतिका - सम्मान ज्ञान का

दिनाँक : ०७.०७.२०२०
दिवस : मंगलवार
#विषय : #सम्मान_ज्ञान_का
#साहित्यसंगमसंस्थान
#विधा : #छंदगीतिका
(14,12 पर यति, दो-दो चरण संतुकात, अंत मे लघु-गुरु)

हमसब करें सुंदर पहल
ज्ञान के सम्मान की
लेखनी हो सारगर्भित
वर्तनी में चासनी

कर्म का हो बोध अगणित
तर्कसंगत बात हो
धर्म का दीपक लिए ही
जगमगाती रात हो

कल्पना के पार जाओ
विश्व के निर्माण में
देवता के दिव्य दर्शन
हों सभी के प्राण में

सोच सुरभित पुष्प सी हो
भाव मधुकर सा बने
सत्य का स्वरूप निर्मित
हो सभी के सामने

प्रेम संचित हो हृदय मे
सद्गुणों का वास हो
सम्मान हो साहित्य का
हर सृजन में आस हो

साहित्य की इस राह पर
साथ में आओ चलें
बात मन की पूर्ण मन से
हम सभी आओ करें

कविराज तरुण
#साहित्यसंगमसंस्थान

Thursday, 2 July 2020

ग़ज़ल - इश्क़वालों का किरदार

ग़ज़ल
2122 2122 212
काफ़िया - आर
रदीफ़- है

इश्क़वालों का गज़ब किरदार है
एक है पर दूसरे से प्यार है

चायवाली टोपरी पर बैठकर
फिर मसौदा इक नया तैयार है

गफलतों में हैं छुपी चिंगारियाँ
हर युवा क्यों इश्क़ में बीमार है

जिसको बनना था बड़ा इंसान वो
अपनी छोटी सोच से लाचार है

कर्ज में डूबी हैं घर की हसरतें
कर्ज में डूबा सकल व्यापार है

बाप ने भेजा था पढ़ने गाँव से
और बेटा रच रहा श्रृंगार है

रोकना मुमकिन नही चुप हो 'तरुण'
आशिकी तो कुदरती अधिकार है

कविराज तरुण

Monday, 22 June 2020

शायरी - बारिश

आज फिर बारिश में सवाल धुल गए
जो चल रहे थे मन में ख़याल धुल गए

देख करके तुमको जो आता था गाल पर
तुम दूर हो गए तो वो गुलाल धुल गए

कविराज तरुण

Sunday, 21 June 2020

शायरी - बदल गया

जिसने कभी गुलाब से सज़दा किया मेरा
वो शख्स दूसरे के साँचे में ढल गया

फिर वक़्त हो या मौसम या हों सफर की बातें
बदला जो एक तू तो सबकुछ बदल गया

कविराज तरुण

ग़ज़ल - दूर नहीं

2122 1212 22/112

काफिया - ऊर 
रदीफ़ - नहीं

शाम इतनी भी दूर दूर नहीं
गम की बातें गमों से चूर नहीं

बस ज़रा दिल मेरा है बेगाना
इसमे तेरा कोई कसूर नहीं

इश्क़ हमको समझ न आया तो
हमने माना हमें शऊर नहीं

बोल दूँ हाल दिल का आज तुझे
इतनी हिम्मत अभी हुजूर नहीं

ये तो किस्मत का खेल सारा है
अपनी किस्मत मे कोई नूर नहीं

कविराज तरुण
#साहित्यसंगमसंस्थान

Friday, 19 June 2020

मुक्तक - शूरवीर

प्रेमपथिक प्रिय पावन के पदकंजन मे रह जाता है
सौंदर्य का मुक्तिबोध कृत्रिम अभिव्यंजन में रह जाता है

शूरवीर को शोभित है संग्राम शत्रु की शैय्या पर
धिक्कार उसे जो घर बैठे आलिंगन में रह जाता है

कविराज तरुण

Thursday, 18 June 2020

निस्तारण

उत्थान पतन के बीच कदाचित अभ्यारण करना पड़ता है
अपनी युद्ध कुशलता का विस्तारण करना पड़ता है

बातों से जो कार्य बने वो निश्चय ही हितकारी है
पर अवसर आने पर रण में निस्तारण करना पड़ता है

कविराज तरुण

ग़ज़ल - मीत

विषय - मीत
विधा - ग़ज़ल

#मीतग़ज़ल #साहित्यसंगमसंस्थान

2122 2122 2122

देखकर तुमको बजे संगीत यारा
तुम बने हो मन मुताबिक मीत यारा

शाम की अंगड़ाइयों से पूछ लेना
हर अदा में आ गई है प्रीत यारा

हारकर दिल खुश हुआ है आज इतना
जैसे हासिल हो गई हो जीत यारा

प्यार का अहसास कितना दिलनशीं है
चल पड़ी शहनाइयों की रीत यारा

लफ्ज़ उसके नाम रुकने लगे हैं
और धड़कन गा रही है गीत यारा

कविराज तरुण
साहित्य संगम संस्थान

Wednesday, 17 June 2020

देश मेरे

गलवान भिड़ंत में शहीद हुए जवानों को विनम्र श्रद्धांजलि 

(देश मेरे)

देश तेरा ये कर्ज भला मै कैसे आज चुकाऊँगा
मिट्टी से तेरी बना हुआ मै मिट्टी मे मिल जाऊँगा

और नही कुछ ख़्वाहिश दिल मे बस तेरा ही नाम रहे
सुबह तेरी मिट्टी मे हो मिट्टी मे ही शाम रहे
और नही कुछ माँगूँ रब से बस तेरी रखवाली हो
आँच ज़रा भी आये तो फिर अपना वार न खाली हो

जान का अपने दाँव लगाकर अपना फर्ज निभाऊँगा
मिट्टी से तेरी बना हुआ मै मिट्टी मे मिल जाऊँगा

लहू का कतरा-कतरा तेरा साँसों पर अधिकार तेरा
रगो-रगो मे शामिल मेरे देश सदा ही प्यार तेरा
शान रहे ऐ देश तेरी फिर चाहे जंग जमीनी हो
फर्क हमे क्या पड़ता है वो पाकी हो या चीनी हो

तुझको आँख दिखाये जो मै उसे नोच खा जाऊँगा
मिट्टी से तेरी बना हुआ मै मिट्टी मे मिल जाऊँगा

जीवन का हर अक्षर मैंने देश तुझी पर वार दिया
साथ दिया जबतक साँसों ने दुश्मन का संहार किया
लगी गोलियाँ तन पर मेरे कोना-कोना छलनी है
देश मेरे तेरी सेवा मुझको वापस फिरसे करनी है

मौत भला क्या कर लेगी मै वापस फिरसे आऊँगा
मिट्टी से तेरी बना हुआ मै मिट्टी मे मिल जाऊँगा
देश तेरा ये कर्ज भला मै कैसे आज चुकाऊँगा
मिट्टी से तेरी बना हुआ मै मिट्टी मे मिल जाऊँगा

कविराज तरुण

Monday, 15 June 2020

मन : लघु लेख

साहित्य और समाज का संबंध:

स्थाई व अस्थाई मानवीय भावनाओं का रेखांकन ही साहित्य है और मानव से ही समाज निर्मित है ।  मानव ही साहित्य और समाज के बीच की कड़ी है । किसी भी समाज का अध्ययन वहाँ के साहित्य को पढ़कर आसानी से किया जा सकता है । साहित्य में न सिर्फ समाज को प्रदर्शित करने की कला होती है अपितु सामाजिक मूल्यों के निर्माण, उसके परिष्करण और विकास मे भी अहम भूमिका रहती है । 

सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन , जनमानस के नवजागरण , नैतिक जनाधिकारों के बचाव में भी साहित्य ने सदैव योगदान दिया । साहित्य ही समाज का निर्माता होता है और समाज ही साहित्य को समृद्ध बनाता है । साहित्य केवल खुशियों और आनन्द का बखान ही नही करता अपितु विरह, वेदना और अभाव को चित्रित भी करता है । इतिहास साक्षी है कि जब-जब समाज बंधन और घुटन मे फँसा, साहित्य ने ही उसे मुक्त किया । कई ऐसी क्रांतियाँ रही हैं जिसमे साहित्य ने स्वयं एक क्रांतिकारी की भूमिका निभाई ताकि एक भयमुक्त, समर्थ और समृद्ध समाज की स्थापना हो सके । यह पंक्ति कहने में कोई गुरेज नही-
साहित्य समाज का दर्पण है, निर्माता है , आलोचक है
साहित्यिक उत्कर्ष सदा ही, सभ्य समाज का द्योतक है

कविराज तरुण

साहित्य और समाज : लघु लेख

साहित्य और समाज का संबंध:

स्थाई व अस्थाई मानवीय भावनाओं का रेखांकन ही साहित्य है और मानव से ही समाज निर्मित है ।  मानव ही साहित्य और समाज के बीच की कड़ी है । किसी भी समाज का अध्ययन वहाँ के साहित्य को पढ़कर आसानी से किया जा सकता है । साहित्य में न सिर्फ समाज को प्रदर्शित करने की कला होती है अपितु सामाजिक मूल्यों के निर्माण, उसके परिष्करण और विकास मे भी अहम भूमिका रहती है । 

सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन , जनमानस के नवजागरण , नैतिक जनाधिकारों के बचाव में भी साहित्य ने सदैव योगदान दिया । साहित्य ही समाज का निर्माता होता है और समाज ही साहित्य को समृद्ध बनाता है । साहित्य केवल खुशियों और आनन्द का बखान ही नही करता अपितु विरह, वेदना और अभाव को चित्रित भी करता है । इतिहास साक्षी है कि जब-जब समाज बंधन और घुटन मे फँसा, साहित्य ने ही उसे मुक्त किया । कई ऐसी क्रांतियाँ रही हैं जिसमे साहित्य ने स्वयं एक क्रांतिकारी की भूमिका निभाई ताकि एक भयमुक्त, समर्थ और समृद्ध समाज की स्थापना हो सके । यह पंक्ति कहने में कोई गुरेज नही-
साहित्य समाज का दर्पण है, निर्माता है , आलोचक है
साहित्यिक उत्कर्ष सदा ही, सभ्य समाज का द्योतक है

कविराज तरुण

Thursday, 11 June 2020

प्यार के किस्से

कभी फुर्सतों में सुनना मेरे प्यार के किस्से
दिल-ए-करार के किस्से , दिल-ए-बहार के किस्से
वो चाँद मुझसे रूबरू था ये बात जमाने को खलती थी
बुरी नज़र अक्सर आकर मेरी खुशियों पर पड़ती थी
अब वो चाँद मुझमे खफा है आँखों से ओझल हो गया है
इन बादलों की साजिश के चलते देखो कहीं खो गया है
अब कैसे तुम्हे सुनाऊँ वो दीदार के किस्से
दिल-ए-करार के किस्से , दिल-ए-बहार के किस्से

कविराज तरुण

Wednesday, 10 June 2020

ग़ज़ल - दिन बहार के

212 1212 1212 1212

क्यों खफा खफा हुए ये दिन बहार के तरुण
देखता नही हमे गुलाब प्यार से तरुण

फूल फूल खिल रहे हैं आस-पास मे तेरे
एक हम ही रह गए हैं दरकिनार से तरुण

बेवफा ने कह दिया है जाने ऐसा क्या मुझे
आँख से निकल पड़ा है आबशार ये तरुण

फिरसे आज रात हमसे चाँदनी खफा हुई
चाँद को नजर लगी है जार-जार से तरुण

मुश्किलों से ही सफर मे हमसफर मिला करे
मिल गया तो थाम लो नजर उतार के तरुण


कविराज तरुण

Saturday, 23 May 2020

विषय - देख असीमित लक्ष्य बड़ा

विषय - देख असीमित लक्ष्य बड़ा

निज खोल नयन तू कलरव कर ले
क्यों भूतल पर निष्प्राण पड़ा
अभी बहुत जीना है तुझको
देख असीमित लक्ष्य बड़ा

कुंठाओं से पार क्षितिज पर
पंख खोल के उड़ना है ?
या इन कीट-पतंगों जैसे
तुझे दीप मे जलना है ?

चयन तुम्हारा नियति तुम्हारी
गति हृदय-स्थल की बोल रही
संकल्पित अनुशासित मन को
ज्वार सिंधु की तोल रही

तू सिंधु ज्वार को आरव कर दे
देख राह मे आज अड़ा
अभी बहुत जीना है तुझको
देख असीमित लक्ष्य बड़ा

दिग-दिगंत के बीच कहो क्यों
साहस का ये काल बुरा
बस इतनी कठिनाई से ही
उच्छ्वासों का हाल बुरा

अभी बहुत है जीवन बाकी
दुर्दिन बदलेगा निश्चय से
नया सवेरा आएगा जब
पंख खोल के उड़ना फिरसे

तू नभ छूने की कोशिश कर ले
क्या सोचे यूँही खड़ा खड़ा
अभी बहुत जीना है तुझको
देख असीमित लक्ष्य बड़ा

कविराज तरुण

Tuesday, 19 May 2020

एक सवेरा ऐसा भी हो

ॐ सुप्रभात

एक सवेरा ऐसा भी हो ,
प्रेम जहाँ पर संचित हो
एक सवेरा ऐसा भी हो ,
छाप प्रेम की अंकित हो

अतिदूर तमस का घेरा हो ,
ऐसा एक सवेरा हो
जो मेरा हो वो सब तेरा ,
जो तेरा सब मेरा हो

स्वार्थ कपट की बातों के बिन ,
मुक्त दिखे हर छोर दिशा
मन के भीतर गहराई में ,
लुप्त दिखे घनघोर निशा

जहाँ नेक व्यवहार लिये सब ,
इक-दूजे के साथ रहें
जो सबके मन को हर्षित हो ,
बस वैसी ही बात कहें

ना अंतस हो भारी भारी ,
ना आँखें हों जलधारी
दीप जले केवल आँखों मे ,
स्नेहभाव के हितकारी

नफरत की कोई पौध नही ,
घर मे बोई जाती हो
माधुर्य लिए वाणी वाणी ,
मधुरस मे घुल जाती हो

धन का कोई मोल नही हो ,
मन का कोना कोना हो
मन हीरा हो मन मोती हो ,
मन चाँदी मन सोना हो

शक्ति स्वरूपा माँ लक्ष्मी का ,
हम सबको उपहार मिले
एक सवेरा ऐसा भी हो ,
जहाँ प्यार ही प्यार मिले

कविराज तरुण

Tuesday, 12 May 2020

नजर

खुद से नजर कभी मिला लिया करो
ये आईना कभी उठा लिया करो

मिल जायेंगे तुम्हे अपने फरेब भी
चश्म-ए-दीद दिल को बना लिया करो

कविराज तरुण

ग़ज़ल - आज फिर से

आँखों मे गुमशुदा हैं , जज़्बात आज फिर से
काटे से न कटेगी , ये रात आज फिर से

कैसे मै भूल जाऊँ , नज़दीकियों को तेरी
होने लगी है बाहर , बरसात आज फिर से

पहले पहल मिले थे , तो लफ्ज़ ही सिले थे
अब याद आ रही है , वो बात आज फिर से

वो धुन अभी है ताजा , तुमने जो छेड़ दी थी
आकर मुझे सुना दो , नगमात आज फिर से

चंदा है चाँदनी है , क्या खूब रौशिनी है
कितना संवर रहे हैं , हालात आज फिर से

हर शायरी में तुमको , लिखने लगा 'तरुण' है
हर लफ्ज़ बन रहे हैं , सौगात आज फिर से

कविराज तरुण

Monday, 27 April 2020

ग़ज़ल - कभी आओ तुम

मेरे गुमगश्ता ठिकानों पे कभी आओ तुम
अहले-उल्फ़त के तरानों पे कभी आओ तुम

ख्वाहिशे-दिल जो कहे वो भी कभी करने दो
यार बादल की उड़ानों पे कभी आओ तुम

ये जो सिलवट है शगुफ्ता से मेरे चहरे पर
इनके गुजरे उन ज़मानों पे कभी आओ तुम

फिर गमो की रात मेरी मयकशी में गुजरी
मेरे ख्वाबों के मचानों पे कभी आओ तुम

भीड़ लगती है अमीरों की दुकानों पे 'तरुण'
इन गरीबों की दुकानों पे कभी आओ तुम

कविराज तरुण

(गुमगश्ता- खोया हुआ , अहल-ए-उल्फ़त- प्यारा इंसान , शगुफ्ता- खिला हुआ, )

Sunday, 26 April 2020

ग़ज़ल - गंगा

ग़ज़ल - गंगा

सभी के पाप धोने की करे कोशिश यही गंगा
इसी कोशिश मे पहले से कहीं मैली हुई गंगा

थे भागीरथ उठा लाये उन्हें शिव की जटाओं से
इसी अफसोस मे शायद रहे अबतक दुखी गंगा

ये अपने ज़ख्म जो तुम धो रहे हो रात में आकर
रहेगी कबतलक पावन सितारों से धुली गंगा

ये मानुष तो समझता है कि इनको दर्द क्यों होगा
सहेगी चोट ये हँसकर बड़ी ही है भली गंगा

'तरुण' की बात सुन लो गौर से सुनने सभी वालों
है देवी माँ इसे पूजो है आफत मे मेरी गंगा

कविराज तरुण

न्याय दो

सोचा था नही लिखूँगा या लिख नही मै पाऊँगा
पर बात इतनी खास थी कि चुप नही रह पाऊँगा

दो संत आखिर मर गए तो कौन सा भूचाल है
कीमती जानें यहाँ कब ? हरतरफ कंकाल है
खुद को ज्ञानी मै समझकर दूर सारी झंझटों से
सोचता बस ये रहा जो हाल है वो हाल है

पर मेरे अंतस का कोना खोजता मुझको रहा
हर घड़ी आवाज देकर कोसता मुझको रहा
सुनकर उसे मै अनसुना करता रहा था आजतक
पर वो सपनों में भी आकर नोचता मुझको रहा

तो कलम का मौनव्रत अब तोड़ने का वक़्त है
जो बहा है लाठियों से वो न केवल रक्त है
तुम भूल जाने के लिए जो सुन रहे तो मत सुनो
जो चल रहा है देश मे वो न दिखे तो मत सुनो
तुम साम्यवादी हो बड़े घनघोर तो फिर मत सुनो
हो सनातन धर्म मे कमजोर तो फिर मत सुनो


सिर्फ हिन्दू मर गया है बात केवल ये नही है
संत तो भगवान का है रूप केवल ये सही है
चोर का तमगा लगाकर मारने का हक़ किसे है
जब पुलिस थी सामने तो और कोई शक किसे है
बेशर्म होके दानवों ने पीटकर हाय मार डाला
इस सनातन धर्म के विश्वास को ललकार डाला
जिसतरह से वो पुलिस का हाथ थामे चल रहे थे
भीड़ में वो इन दरिंदो की सहमकर डर रहे थे
शर्म आनी चाहिए जब हाथ छोड़ा उस पुलिस ने
कर्म अपना भूलकर जो साथ छोड़ा उस पुलिस ने
इन सभी लोगों को सच का आईना देना पड़ेगा
इस घिनोने कार्य का परिणाम तो सहना पड़ेगा
इतिहास कहता है जहाँ पर संत पर प्रहार हो
इसतरह बेबाक होकर घोर अत्याचार हो
तो वहाँ भगवान का एक जलजला आ जायेगा
चुप रहेंगे बुद्धजीवी तो फिर कहा क्या जायेगा
है अगर ये राजनीति तो सही पर न्याय दो
भूल जाने का नही फिर एक ये अध्याय दो

कविराज तरुण

Saturday, 25 April 2020

तुम क्या करोगे ?

यूँ लिपटकर छोड़ देने से बुरा तुम क्या करोगे ?
कर सके खुद का भला ना तो भला तुम क्या करोगे ?

देख लेंगी ये तुम्हे भी वक़्त की चिंगारियां सब
उस खुदा के नाम पर अब आसरा तुम क्या करोगे ?

कविराज तरुण

Friday, 24 April 2020

बैंक वाले बैंक वाले ।। bank wale bank wale

चाहे जान जोखिम में , फिर भी करें सेवा
ये सिंपल से बंदे हैं , खाते नही मेवा
पूरे ईमान से , लगे हैं जी-जान से
बैंक वाले बैंक वाले
सच मे महान हैं
बैंक वाले बैंक वाले
सॉलिड इंसान हैं

पहले आया जन-धन तो , खाते खुले लोगों के
लाइन लगी पब्लिक की , हमने कहा ओके है
फिर आई नोटबन्दी , फिर से कतार लगी
बारह बजे रात में भी , हमने करी सेवा थी

चाहे हो जीएसटी या , चाहे पैसे ईंधन के
सभी को संभाला है , हमने तो तन-मन से
छोटा बड़ा कोई नही , जो भी यहाँ आया है
डिजिटल जमाने को , हमने बनाया है
जनता के काम मे , लगे हैं जी-जान से
बैंक वाले बैंक वाले
सच मे महान हैं
बैंक वाले बैंक वाले
सॉलिड इंसान हैं

मुद्रा के लोन खाते , खुले ये अपार जब
गली गली गाँव मे भी , बढ़े रोजगार तब
चाहे आधार हो , चाहे पगार हो
बैंक की ही मेहनत से , काम-व्यापार हो

इन दिनों छाया ये , वायरस कोरोना का
हम गए काम पर , काहे का रोना था
जनता की सेवा का , अपना प्रयास है
सल्लू ने भी बोला , बैंक वाले खास हैं
पूरे ही ध्यान से , लगे हैं जी-जान से
बैंक वाले बैंक वाले
सॉलिड इंसान हैं

कविराज तरुण
7007789629
9451348935

Thursday, 23 April 2020

ग़ज़ल - हवा चल रही है

ग़ज़ल - हवा चल रही है

बड़ी तेज फिर से हवा चल रही है
इन्हें क्या पता है शमा जल रही है

कि भटकी हुई हैं मुहब्बत की गलियाँ
यही बात दिल मे मुझे खल रही है

न समझे जमाना तो इसमें नया क्या
ये अपने उसूलों पे ही चल रही है

वो लड़की जिसे ख़्वाब आते थे मेरे
किसी और के घर में वो पल रही है

तुम्हे आज फिर याद आई तरुण की
ये किस्मत मेरी हाथ फिर मल रही है

कविराज तरुण

कविता - जिजीविषा

विषय - जिजीविषा

पथभ्रमित करे जब ओर-छोर
जब लुप्त दिखे हर कोण दिशा
शून्य रहे अंतर्मन जब
हो घोर कालिमा लिए निशा

तब जीने की हर कोशिश पर
प्रश्नचिन्ह लग जाता है
आगे बढ़ने का संकल्प कदाचित
संकल्प मात्र रह जाता है

निर-आशा का घेर लिपटकर
विचलित कर देता है मन को
मिट्टी के सूखे बर्तन सा
वही तोड़ता है तब तन को

ऐसे दुष्कर विषम काल मे
वही उभरकर आता है
जिजीविषा हो जिसके अंदर
वही शिखर पर जाता है

कविराज तरुण

Sunday, 19 April 2020

गीत - मधुबन

मै तेरे मधुबन में आके , बाहर जाना भूल गया
ऐसा मुझको स्वाद चढ़ा है , पीना खाना भूल गया

राधा को प्रभु गिरिधर नागर , सीता को प्रभु राम मिले
मैंने देखा जबसे तुमको , मुझको चारों धाम मिले

प्रेम हृदय मे संचित करके , दर्द पुराना भूल गया
मै तेरे मधुबन में आके , बाहर जाना भूल गया

तू शीतल है तू निर्मल है , तू कोमल बनफूल सखे
मै भँवरा हूँ रज का प्यासा , दे दो अपनी धूल सखे

ऐसा मधुरस तुमने बाँटा , पंख चलाना भूल गया
मै तेरे मधुबन में आके , बाहर जाना भूल गया

वृक्ष लता के नख से सिर तक , आकर्षण का द्वार मिला
मै विस्मित हूँ पाकर तुमको , जीवन को अब प्यार मिला

अनुरागी हो प्रीत-कमल से , ठौर ठिकाना भूल गया
मै तेरे मधुबन में आके , बाहर जाना भूल गया


कविराज तरुण

Saturday, 18 April 2020

ग़ज़ल - रात में क्या क्या रहा

ग़ज़ल - रात में क्या क्या रहा

इश्क़ गफलत में रहा कल , हुस्न भी टूटा रहा
आप अब ना पूछिये फिर , रात में क्या क्या रहा

वो सिसक कर चादरों के , दरमियां ही सो गई
मै ज़रा मजबूत था तो , दूर ही बैठा रहा

कुछ तेरे इल्ज़ाम ऐसे , जो नही वाजिब लगे
रो रहे थे तुम तो मै चुप-चाप ही सहता रहा

ये कहानी रोज की है , बात है कल की नही
एक आँसूँ बह गया तो , रातभर बहता रहा

और भी मसले कई थे , इस दरो-दीवार में
मै उसे सुनता रहा वो , जोर से कहता रहा

सिलसिले ये जब रुकेंगे , उम्र भी ढल जाएगी
आमना की चाह में मै , सामना करता रहा

कौन किसको दोष दे जब , बोल दोनों के बुरे
तल्ख़ बातें हो रही तो , तल्ख़ ही लहजा रहा

इश्क़ के हर लफ्ज़ से वो , आज कोसों दूर है
क्यों 'तरुण' तू खामखाँ ही , प्यार में उलझा रहा

कविराज तरुण

Thursday, 16 April 2020

होने को है

फिर तुम्हारी याद में ये आसमाँ रोने को है
रात भी होने को है ये चाँद भी सोने को है

फिर न कहना इश्क़ के दो चार किस्से मै कहूँ
एक किस्से में बहुत कुछ आज भी खोने को है

बेकरारी और उल्फत दूर से सब ठीक पर
पास इसके जो गया वो ग़मज़दा होने को है

मै फरिश्ता हूँ नही इक आम ही इंसान हूँ
झेल कर ये मुश्किलें 

लॉकडाउन में

किस तरह खुद को सँवारें लॉकडाउन में
ये बड़ी मुश्किल तुम्हारे लॉकडाउन में

तुम न निकलो मै न निकलूँ वक़्त ही निकले
तो समय कैसे गुजारें लॉकडाउन में

हाल ये है नींद भी आती नही हमको
चाँद को कबतक निहारें लॉकडाउन में

शायरी लिख लिख मै हारा तुम नही आये
और किसको अब पुकारें लॉकडाउन में

जिसके सर पर छत नही वो क्या करे आखिर
जाए वो अब किस किनारे लॉकडाउन में

घर मे रोटी दाल की अब हो रही किल्लत
बंद हैं जब काम सारे लॉकडाउन में

कर सको तो कुछ करो तुम इन गरीबों का
इनकी हालत को विचारें लॉकडाउन में

जिंदगी रुक सी गई है ये 'तरुण' अब तो
फिर कई खरगोश हारे लॉकडाउन में

कविराज तरुण

Wednesday, 15 April 2020

ग़ज़ल - रोता हूँ

हर विफलता पे बड़ा मायूस होता हूँ
दिखता खुश हूँ पर अकेले मै भी रोता हूँ

कर्म अपना साधने में देर हो जाये
तो कहाँ फिर चैन की मै नींद सोता हूँ

जो मिलें खुशियाँ उसे मै बाँट कर सबको
सबके चहरे की खुशी दिल में पिरोता हूँ

वक़्त आयेगा हसीं ये मानता मै भी
पर मिला जो वक़्त उसको मै सँजोता हूँ

वो लहर चुपचाप अपना काम करती है
और मै चुपचाप अपने पाप धोता हूँ

जिंदगी जब भी मिले तो पूछना उससे
क्या हुआ उस ख़्वाब का जो रोज बोता हूँ

पा लिया जितना अभी तुमने 'तरुण' उतना
रोज पाता और फिर मै रोज खोता हूँ

कविराज तरुण

Sunday, 5 April 2020

विषय - साधना कर लीजिए

देश है ये साधको का साधना कर लीजिए
हो सके तो भक्तिमय आराधना कर लीजिए

दे दिया प्रभुराम ने है ये समय विस्तार का
अपने अंदर की छुपी दुर्भावना संहार का

एक दीपक की हृदय स्थापना कर लीजिए
देश है ये साधको का साधना कर लीजिए

दोष देने से किसी को क्या मिलेगा फल बता
जीव होकर तू किसी भी जीव को अब ना सता

धर्म अपना कर्म अपना है जगत अब साथ मे
एक दीपक आस का हो प्रज्वलित  अब हाथ मे

रात में सब नौ बजे शुभ-कामना कर लीजिए
देश है ये साधको का साधना कर लीजिए

कविराज तरुण